नहीं माफ हुआ बड़े बकायेदारों का कर्ज, जेटली का दावा-No forgiveness of big defaulters, Jaitley claims

वित्त मंत्री जेटली का दावा, नहीं माफ हुआ बड़े बकायेदारों का कर्ज

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने दावा है किया है कि दिवालिया कानून के प्रावधानों के तहत 12 बड़े बकायेदारों से 1.75 लाख करोड़ रुपये के फंसे कर्ज की वसूली के मामले नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल यानी एऩसीएलटी मे चल रहे हैं.

By: | Updated: 28 Nov 2017 07:59 PM
No forgiveness of big defaulters, Jaitley claims

नई दिल्ली: वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि किसी भी बड़े बकायेदार का कर्ज माफ नहीं किया गया है. उनका दावा है कि दिवालिया कानून के प्रावधानों के तहत 12 बड़े बकायेदारों से 1.75 लाख करोड़ रुपये के फंसे कर्ज की वसूली के मामले नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल यानी एऩसीएलटी मे चल रहे हैं. कोशिश है कि छह से नौ महीने के भीतर कर्ज की वसूली हो जाए.


जेटली का ये बयान ऐसे समय में आया है जब ये अफवाह जोरों पर है कि सरकार ने बड़े बकायेदारों को राहत दी है. जेटली ने अपनी बातें एक ब्लॉग के जरिए सामने रखी है जिसमें फंसे कर्ज यानी एनपीए का बही-खाता पेश किया गया है. ध्यान रहे कि किसी भी कर्ज में जब लगातार तीन महीने तक किश्त नहीं चुकायी जाती है तो वो फंसा कर्ज यानी एनपीए में तब्दील हो जाता है. जब एनपीए की वसूली की कोई उम्मीद नहीं होती है तो वो डूबा कर्ज बन जाता है, वो रकम बट्टे खाते में डाल दी जाती है. तकनीकी भाषा में इसे ‘राइट ऑफ’ कहा जाता है.


जेटली ने लिखा है कि 2008 से 2014 (यूपीए 1 का कार्यकाल 2004-2009 औऱ यूपीए 2 का कार्यकाल 2009-2014) के बीच सरकारी बैंकों ने विभिन्न उद्योगों को काफी ज्यादा कर्ज बांटे. बतौर वित्त मंत्री, “अब लोगों को अफवाह फैलाने वालों से ये पूछना चाहिए कि किसके कहने पर या किसके दवाब में ये कर्ज बांटे गए. उन्हे ये भी पूछना चाहिए कि जब कर्ज या ब्याज चुकाने में देरी हो रही थी तो उस समय की सरकार ने क्या कदम उठाया. ”


पिछली कांग्रेस सरकार का नाम लिए बगैर जेटली ने आरोप लगाया कि उस समय की सरकार ने कर्ज से जुड़े मानकों को लगातार आसान बनाती रही. नतीजा ये हुआ कि कर्ज नहीं चुकाने के बावजूद बकायदारों का खाता एनपीए नहीं बना. इन खातों को नयी शक्ल दी गयी और बैंकों के घाटे को छिपाया जाता रहा. इन बकायेदारों को लगातार कर्ज मिलता रहा. इन सब का नतीजा ये हुआ कि सरकारी बैंकों की हालत खराब होती गयी.


फंसे कर्ज पहचानने की नयी व्यवस्था


वित्त मंत्री ने जानकारी दी कि 2008 से 2014 के बीच बैंकों का कुल कर्ज 34 लाख करोड़ रुपये बढ़ा. दूसरी ओर 2015 में रिजर्व बैंक के विशेष अभियान (असेट क्वालिटी रिव्यू) के जरिए 2015 में पता चला कि फंसा कर्ज काफी ज्यादा है. फंसे कर्ज पहचानने के नए मानकों से पता चला कि सरकारी बैंकों का एनपीए मार्च 2015 के 2.78 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर जून 2017 के अंत में 7.33 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया. दूसरे शब्दों में कहे तो साढ़े चार लाख करोड़ रुपये का फंसा कर्ज छिपाया जा रहा था, जो एक्यूआर की बदौलत ही सामने आ पया.


नतीजा बैंकों को ज्यादा रकम का प्रावधान करना पड़ा, ताकि उनका बैलैंश शीट दुरुस्त हो सके. फंसे कर्ज से होने वाले संभावित घाटे के मद्देनजर 2013-14 से लेकर चालू वित्त वर्ष 2017-18 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) के बीच कुल 3 लाख 79 हजार 80 करोड़ रुपये का प्रावधान करना पड़ा जबकि उसके पहले बीते दस वर्षें में महज करीब दो लाख करोड़ रुपये का प्रावधान करना पड़ा था.


दिवालिया कानून में बदलाव


सरकार ने दिवालिया कानून में बदलाव कर जानबुझ कर्ज नहीं चुकाने वालों के हाथ बांध दिए हैं. एक अध्यादेश के जरिए ऐसे कर्जदार अपनी उस संपत्ति के लिए बोली नहीं लगा सके जिसे एनसीएलटी ने दिवालिया प्रक्रिया के तहत शामिल कर दिया है. मौजूदा व्यवस्था में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल यानी एनसीएलटी कर्ज देने वालों यानी बैंक या वित्तीय संस्थाओं की याचिका पर तय करती है कि किस कंपनी को दिवालिया घोषित करने की प्रक्रिया शुरू की जाए या नहीं. इस प्रक्रिया में कंपनी के निदेशक बोर्ड को भंग कर दिया है औऱ एक इनसॉलवेंशी प्रोफेशनल नियुक्त किया जाता है.


ये प्रोफेशनल, कंपनी प्रबंधन और बैंकों के साथ मिलकर कंपनी की वित्तीय स्थिति सुधारने और कर्ज चुकाने का रास्ता ढ़ुंढ़ने की कोशिश करता है. इसके लिए शुरुआती तौर पर छह महीने का समय मिलता है जिसे बाद में तीन महीने के लिए और बढ़ाया जा सकता है. इसके बाद भी अगर कंपनी की माली हालत नही सुधरी और कर्ज चुकाने का रास्ता नहीं निकला तो बैंक उसकी संपत्ति बेचने का काम शुरू कर सकते है.


यहीं पर शुरू होता है खेल. पहले तो कोशिश यही होती है कि बैंक कुछ डिस्काउंट के बाद बकाया कर्ज का रकम लेना स्वीकार कर लें. तकनीकी भाषा में इसे ‘हेयरकट’ कहते हैं. इसका मतलब ये हुआ कि बैंक का बकाया अगर 100 करोड़ रुपये है तो वो 50 या 60 करोड़ रुपये पर कर्ज निबटाने की कोशिश की जाती है. इसी का फायदा जानबुझ कर कर्ज नहीं चुकाने वाले उठाते हैं. पहले तो सस्ते में बकाया कर्ज का निबटारे की पहल करते हैं, फिर कंपनी की संपत्ति बिकने की सूरत में बोली भी लगा देते हैं. कोशिश यही होती है कि किसी तरह से मालिकाना हक बना रहे. अब दिवालिया कानून में बदलाव कर इसी प्रवृति को रोकने की कोशिश है.


बैंकों को अतिरिक्त पूंजी


जेटली ने बताया कि 2.11 लाख करोड़ रुपये की पूंजी सरकारी बैंकों को मुहैया कराने का फैसला किया गया है. इसमे 1.35 लाख करोड़ रुपये बांड के जरिए जुटाए जाएंगे जबकि 18,139 करोड़ रुपये का प्रावधान बजट में होगा, वहीं बाकी 58 हजार करोड़ रुपये शेयर बेचकर जुटाए जाएंगे. अतिरिक्त पूंजी से बैंक मजबूत होंगे. साथ ही बैंकों में कई तरह के सुधार भी करने होंगे जिससे 2008-14 जैसी स्थिति दोबारा नहीं बन सके.


जेटली ने साफ किया कि मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल में बैंको की परेशानियों का न केवल निदान किया गया है, बल्कि उन्हे नए सिरे से मजबूत बनाने की कोशिशें भी रंग ला रही है. दूसरी ओऱ भारतीय स्टेट बैंक में उसके सहयोगी बैंकों के विलय से एक मजबूत और बड़ा बैंक बनाने की पहल की गयी. अब कोशिश यही है कि ईमानदार कारोबारी को कर्ज लेने में कोई दिक्कत नहीं हो.

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Web Title: No forgiveness of big defaulters, Jaitley claims
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