इस साल तमिलनाडु में नहीं मनेगा जलीकट्टू, पूरे देश में जानवरों के खेलों पर SC की रोक

By: | Last Updated: Tuesday, 12 January 2016 2:13 PM
No Jallikattu in Tamil Nadu this year

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु में सांढों को काबू में करने वाले जल्लीकटू पर्व पर रोक लगा दी है. केंद्र सरकार ने तमिलनाडु में पोंगल त्योहार पर जल्लीकटू को हरी झंडी दी थी लेकिन कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी.

पशुओं के लिए काम करने वाली संस्था ने जल्लीकटू के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी थी. मतलब इस साल 14 जनवरी को पोंगल के मौके पर जलीकट्टू में बेकाबू बैलों को लोग काबू नहीं कर पाएंगे.

क्या है जलीकट्टू?

जलीकट्टू सांड के साथ मौत के खेल का नाम है. एक ऐसा खेल जहां हर पल जान जाने का खतरा होता है. साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने इस खेल पर बैन लगा दिया था लेकिन केंद्र सरकार ने नोटिफिकेशन जारी करके कुछ शर्तों के साथ इस खेल को हरी झंडी दी थी.
गुस्से से भरे हुए सैकड़ों बैल, अपनी सींगों को इंसान के पेट में घुसाने के लिए एक दरवाजे के पीछे बंद होते हैं. दरवाजे के दूसरी तरफ लोगों की भीड़ बैल को अपने पास बुलाने के लिए तरह-तरह के जतन करती है. दरवाजा खुलता है और शुरू हो जाता है मौत का तांडव. इस खतरनाक खेल को जलीकट्टू कहा जाता है.

तमिलनाडु के मदुरै में लगता है जलीकट्टू के जानलेवा खेल मेला, जहां 300-400 किलो के बैल को चुनौती देता है इंसान. रिवाज कुछ ऐसा है कि बैलों के सीगों पर लगे नोट उतारने के लिए लोग जान की परवाह भी नहीं करते. खेल में हिस्सा लेने वाले लोग बैल का इंतजार करते हैं और जो फुर्ती और मुस्तैदी दिखाकर सांड को चंद सेकेंड भी रोकने में कामयाब होता है वो बन जाता है सिकंदर.

साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने जानवरों के साथ हिंसक बर्ताव को देखते हुए इस खेल को बैन कर दिया था. लेकिन तमिलनाडु में खेल की लोकप्रियता का आलम ये है मुख्यमंत्री जयललिता को प्रधानमंत्री मोदी से इस खेल को फिर से शुरू करने की अपील करनी पड़ी. मोदी सरकार ने भी जलीकट्टू को कुछ शर्तों के साथ मंजूरी दे दी है, जलीकट्टू को हरी झंडी देने के फैसले को राज्य में इसी साल होने वाले विधानसभा चुनाव से जोड़कर भी देखा जा रहा है.

जलीकट्टू तमिलनाडु में सिर्फ एक खेल नहीं बल्कि बहुत पुरानी परंपरा है. जलीकट्टू तमिलनाडु में 15 जनवरी को नई फसल के लिए मनाए जाने वाले त्योहार पोंगल का हिस्सा है. जलीकट्टू त्योहार से पहले गांव के लोग अपने-अपने बैलों की प्रैक्टिस तक करवाते हैं. जहां मिट्टी के ढेर पर बैल अपनी सींगो को रगड़ कर जलीकट्टू की तैयारी करता है. बैल को खूंटे से बांधकर उसे उकसाने की प्रैक्टिस करवाई जाती है ताकि उसे गुस्सा आए और वो अपनी सींगो से वार करे.

क्या हैं इस खेल के नियम

खेल के शुरु होते ही पहले एक-एक करके तीन बैलों को छोड़ा जाता है. ये गांव के सबसे बूढ़े बैल होते हैं. इन बैलों को कोई नहीं पकड़ता, ये बैल गांव की शान होते हैं और उसके बाद शुरु होता है जलीकट्टू का असली खेल. मुदरै में होने वाला ये खेल तीन दिन तक चलता है.

कितनी पुरानी है परंपरा

तमिलनाडु में जलीकट्टू 400 साल पुरानी परंपरा है. जो योद्धाओं के बीच लोकप्रिय थी. प्राचीन काल में महिलाएं अपने वर को चुनने के लिए जलीकट्टू खेल का सहारा लेती थी. जलीकट्टू खेल का आयोजन स्वंयवर की तरह होता था जो कोई भी योद्धा बैल पर काबू पाने में कामयाब होता था महिलाएं उसे अपने वर के रूप में चुनती थी.

जलीकट्टू खेल का ये नाम सल्ली कासू से बना है. सल्ली का मतलब सिक्का और कासू का मतलब सींगों में बंधा हुआ. सींगों में बंधे सिक्कों को हासिल करना इस खेल का मकसद होता है. धीरे-धीरे सल्लीकासू का ये नाम जलीकट्टू हो गया.

कई बार जलीकट्टू के इस खेल की तुलना स्पेन की बुलफाइटिंग से भी की जाती है लेकिन ये खेल स्पेन के खेल से काफी अलग है इसमें बैलों को मारा नहीं जाता और ना ही बैल को काबू करने वाले युवक किसी तरह के हथियार का इस्तेमाल करते हैं.

तैयारी कुछ ऐसी होती है कि खेल के दौरान मदुरै के कलेक्टर मौजूद होते हैं भारी पुलिस बल होता है और एक मेडिकल टीम भी मौजूद होती है. तैयारी कितनी ही क्यों ना हो इस खेल में जान का खतरा हर वक्त बना रहता है.

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