मेडिकल कॉलेज मान्यता मामले की SIT जांच नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका

मेडिकल कॉलेज मान्यता मामले की SIT जांच नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका

प्रशांत भूषण का नाम लिए बिना उन्होंने कहा, 'वरिष्ठ वकील ने एक याचिका 2 बार दाखिल की. कोर्ट को गुमराह कर मनचाही बेंच पाने की कोशिश की. ये अवमानना भरी हरकत है.'

By: | Updated: 14 Nov 2017 08:27 PM
No SIT for MCI scam: Supreme court
नई दिल्ली: मेडिकल कॉलेज मान्यता मामले में एसआईटी जांच नहीं होगी. इस बारे में दायर याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है. याचिका में जजों के नाम पर रिश्वत लेने के आरोप की सीबीआई जांच की निगरानी की मांग की गई थी.

कोर्ट ने कहा कि सीबीआई की एफआईआर में किसी जज का नाम नहीं है. याचिकाकर्ता ने सुनवाई के दौरान खुद इस बात को स्वीकार किया. ऐसे में जांच की निगरानी की कोई ज़रूरत नहीं है.

वकीलों के खिलाफ कार्रवाई नहीं :-

कोर्ट ने एक ही याचिका 2 बार दाखिल करने के लिए याचिकाकर्ता को आड़े हाथों लिया. 3 जजों की बेंच का फैसला जस्टिस अरुण मिश्रा ने पढ़ा. प्रशांत भूषण का नाम लिए बिना उन्होंने कहा, 'वरिष्ठ वकील ने एक याचिका 2 बार दाखिल की. कोर्ट को गुमराह कर मनचाही बेंच पाने की कोशिश की. ये अवमानना भरी हरकत है.'

उन्होंने न्यायपालिका को बदनाम करने के लिए भी याचिकाकर्ता के वकीलों की खिंचाई की. कहा, 'सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ बिना तथ्य आरोप लगाए गए. न्यायपालिका की बदनामी की गई. ये अवमानना भरी हरकत है.'

हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ता कामिनी जायसवाल और उनके वकील प्रशांत भूषण के खिलाफ अवमानना का नोटिस जारी नहीं किया. जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा, 'हमें उम्मीद है कि वकील आगे बेहतर काम करेंगे. हम सबको मिल कर न्यायपालिका की गरिमा बढ़ाने वाले काम करने चाहिए.'

क्या है मामला :-

मामला मेडिकल कॉलेजों को मान्यता देने में हुए कथित भ्रष्टाचार का है. सीबीआई ने इस बारे में एक केस दर्ज कर रखा है. आरोप है कि मेडिकल कॉलेजों से जुड़े एक मामले का फैसला एक कॉलेज के हक में करवाने के लिए दलाल विश्वनाथ अग्रवाल ने पैसे लिए. याचिकाकर्ता की मांग थी कि मामले में सुप्रीम कोर्ट के जजों पर आरोप लग रहे हैं. इसलिए, पूर्व चीफ जस्टिस की निगरानी में जांच होनी चाहिए.

एक ही मामले पर 2 याचिका :-

पहले कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स (CJAR) नाम के एनजीओ की तरफ से मामले में याचिका दाखिल की गई. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने अपनी प्रशासनिक शक्ति का इस्तेमाल करते हुए इसे जस्टिस ए के सीकरी और अशोक भूषण की बेंच के पास भेज दिया.

इसके अगले दिन एक और याचिका दाखिल कर दी गई. CJAR की याचिका से बिल्कुल मिलती-जुलती याचिका में इस बार वकील कामिनी जायसवाल को याचिकाकर्ता बनाया गया.

कोर्ट को गुमराह करने का आरोप :-

जब दूसरी याचिका दाखिल हुई तब चीफ जस्टिस दिल्ली-केंद्र मामले में सुनवाई कर रही संविधान पीठ में व्यस्त थे. वकीलों ने दूसरे वरिष्ठतम जज जस्टिस चेलमेश्वर के सामने मामला रखा और उसी दिन सुनवाई की मांग की. जस्टिस चेलमेश्वर और अब्दुल नज़ीर ने मामला सुना. उन्होंने सोमवार को मामले की सुनवाई 5 वरिष्ठतम जजों की बेंच में करने का आदेश दिया.

आदेश निरस्त हुआ :-

शुक्रवार को चीफ जस्टिस की अध्यक्षता में 5 जजों की बेंच बैठी. हालांकि, ये सभी वरिष्ठतम जज नहीं थे. बेंच ने 5 वरिष्ठतम जजों की संविधान पीठ बनाने के आदेश पर सवाल उठाए.

5 जजों ने कहा कि बेंच का गठन सिर्फ चीफ जस्टिस कर सकते हैं. इस बारे में नियम पहले से साफ़ है. इसलिए, अगर किसी बेंच ने इसके विपरीत आदेश दिया हो तो उसे अप्रभावी माना जाएगा.

3 जजों की बेंच ने मामला सुना :-

सोमवार को 3 जजों- आर के अग्रवाल, अरुण मिश्रा और ए एम खानविलकर ने मामला सुना. प्रशांत भूषण ने जजों से सुनवाई न करने को कहा. डेढ़ घंटे से ज़्यादा चली सुनवाई में कई बार बेंच के साथ उनकी बहस हुई.

बेंच ने माना कि उनका और उनके साथी वकीलों का रवैया अवमानना भरा है. कोर्ट में मौजूद सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के वकीलों ने भी इन लोगों पर कोर्ट को गुमराह करने और न्यायपालिका की बदनामी करने के लिए कार्रवाई की मांग की.

एटॉर्नी जनरल की दलील :-

एटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने कहा कि सीबीआई की एफआईआर मुख्य आरोपियों के साथ अज्ञात सरकारी लोगों के खिलाफ है. इसमें कहीं भी किसी मौजूदा जज का ज़िक्र नहीं है. इसलिए, जजों पर आरोप लगाना गलत है.

वेणुगोपाल ने कहा कि इस मामले से न्यायपालिका की बदनामी हो रही है. इसका निपटारा ऐसे हो कि न्यायपालिका की गरिमा बनी रही. उन्होंने याचिकाकर्ताओं से याचिका वापस लेने का भी आग्रह किया.

कोर्ट का फैसला :-

साफ़ है कि जजों ने एटॉर्नी जनरल की सलाह को गंभीरता से लिया. उन्होंने याचिकाकर्ता वकीलों के आचरण को अवमानना भरा माना. लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई कर मामले को आगे नहीं बढ़ाया. कोर्ट ने मामले में एसआईटी के गठन को गैरज़रूरी करार देते हुए याचिका खारिज कर दी.

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Web Title: No SIT for MCI scam: Supreme court
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