मेरा घर मेरा हक: इन वजहों से नहीं मिल रहा है आपको अपना घर!

मेरा घर मेरा हक: इन वजहों से नहीं मिल रहा है आपको अपना घर!

नई दिल्ली: एक आम आदमी की जिंदगी में उसके घर खरीदने का फैसला सबसे बड़ा और सबसे अहम होता है. घर खरीदने के लिए उसे अपनी पूरी जिंदगी की कमाई लगानी पड़ती है. सपनों के घर में रहने के लिए उसे लगभग पूरी जिंदगी बैंक का कर्जदार बने रहना पड़ता है. कोई जिंदगी भर के पीएफ के पैसे से घर खरीदता है. कोई जिंदगी भर पाई-पाई जमा किये गए पैसों से सिर के ऊपर छत की व्यवस्था करता है. जरा सोचिए अगर किसी इंसान की जिंदगी का लिया गया उसका सबसे बड़ा फैसला ही गलत साबित हो जाए तो उसका क्या हाल होगा.

55 साल की उर्मिला सिंह… इनके पति अब नौकरी से रिटायर हो चुके हैं. उर्मिला ने दिल्ली से सटे नोएडा के सेक्टर 120 में आम्रपाली जोडिएक में अपना घर बुक कराया था. उर्मिला को 2013 में इस सोसायटी में घर मिलना था लेकिन 2016 गुजर रहा है. पूरा पैसा दे चुके हैं पर अब तक इन्हें इनका आशियाना नहीं मिला. जिस सोसाइटी में उर्मिला ने घर खरीदा था आज उसी सोसाइटी में ये किराए के घर में रहने को मजबूर हैं.

ये कहानी सिर्फ उर्मिला सिंह की नहीं है. आपके घर के लिए एबीबी न्यूज के चलाए गए मुहिम में अब तक ऐसी एक नहीं 15 हजार से भी ज्यादा कहानियां आ चुकी हैं. एबीपी न्यूज की वेबसाइट www.abplive.in/meraghar पर बिल्डरों से पीड़ित लोगों की शिकायतों का अंबार लग चुका है. ये संख्या लगातार बढ़ रही है और ये भी सोचने के लिए मजबूर कर रही है कि बिल्डरों ने आम आदमी पर कितना सितम ढाया है. एबीपी न्यूज ने 12 हजार शिकायतों की पड़ताल की जिनमें सबसे ज्यादा शिकायतें आम्रपाली की 3800, यूनीटेक की 800 शिकायतें, जेपी की 550, सुपरटेक की 400 और बीपीटीपी 350 शिकायतें मिली.

गुड़गांव के सेक्टर 65 में मौजूद इस आलिशान और लग्जरी फ्लोर्स हैं देश के बड़े बिल्डर एमार एमजीएफ का. प्रोजेक्ट का नाम एमरल्ड हिल्स. सिर्फ फ्लोर्स और विला हैं इस प्रोजेक्ट में …देखने में एकदम रहने के लिए तैयार हैं. लेकिन इनमें रहने को तरस रहे हैं इनके खरीदार.

वी पी गोगिया अक्सर यहां आकर अपने फ्लोर को निहारते हैं और चले जाते हैं. बिल्डर हर बार पजेशन की नई तारीख बता देता है. गोगिया साहब ने 2009 में अपनी बेटी के नाम पर यहां फ्लोर बुक किया था. 2012 में फ्लोर मिलने का वादा था. लगभग पूरे पैसे भी दे चुके हैं. लेकिन गृह प्रवेश का इंतजार लंबा होता जा रहा है.

दिल्ली के करीब नोएडा में जेपी ग्रुप का यहां विशटाउन बन रहा है. जेपी ने यहां देश के पहले इंटिग्रेटेड टाउनशिप बनाने का दावा और वादा किया था. इसकी हकीकत क्या है ये नवीन तलवार से बेहतर और कौन समझ सकता है. नवीन इसी तरह जेपी विशटाउन में अक्सर अपना घर देखने आते हैं लेकिन हर बार उन्हें निराश होकर लौटना पड़ता है. बुकिंग के चार साल बाद भी अब तक बिल्डिंग का पहला फ्लोर तक नहीं बना है. नवीन ने जेपी के प्रोजेक्ट क्रीसेंट होम्स में 2012 में घर बुक करवाया था. 2015 में डिलीवरी का वादा था लेकिन अब तक सिर्फ बेसमेंट का काम ही हुआ है.

दिल्ली से सटे फरीदाबाद में भी बिल्डरों के सितम की कहानी कोई कम नहीं है. रेणु खट्टर फरीदाबाद में एक छोटा सा बिजनेस करती हैं. बीपीटीपी पार्क एलीट फ्लोर्स में अपने घर को ये अक्सर देखने आती हैं और मायूस होकर लौट जाती हैं. 2009 में रेणु ने यहां फ्लैट बुक करवाया था, 2013 में फ्लैट मिलने का वादा किया गया था लेकिन अब तो सात साल हो चुके हैं. रेणु अब अपने घर के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं.

एबीपी न्यूज ने ग्रेटर नोएडा में चल रहे सुपरटेक के उस प्रोजेक्ट की पड़ताल की जिसे आम लोगों की जेब का खयाल रखने के दावे के साथ बनाया गया था. सुपरटेक इको विलेज वन में भी हालात अलग नहीं हैं. बिना मंजूरी के टावर खड़े किए गए और अब खरीदारों को कब्जा नहीं दिया जा रहा है.

सुपरटेक के इको विलेज 1 में घर खरीदने वाले लोगों में शामिल हैं बीएन गुप्ता. इन्होंने अपनी मेहनत की कमाई लगाकर साल 2010 में एक आशियाने का सपना देखा था लेकिन अब वो कह रहे हैं कि उनके फ्लैट वाले टावर की तो मंजूरी ही नहीं ली गई है.

देश की राजधानी से लेकर मायानगरी तक एक ही कहानी है. महाराष्ट्र में मुंबई के पास पालघर में एक नामी बिल्डिंग कंन्स्ट्रक्शन कंपनी HDIL एक नया शहर बसा रही है. HDIL के इस प्रोजेक्ट का नाम है पैराडाइज सिटी. HDIL के नाम को देखते हुए लोगों ने उस पर भरोसा किया लेकिन उन्हें नाउम्मीदी हाथ लगी.

हमारा ड्रीम होम हमारे बजट में – ये टैगलाइन है मुंबई की नामी रियल एस्टेट कंपनी HDIL की. सपनों के घर की उम्मीद और HDIL के भरोसे पर संदीप पाटिल ने मुंबई के पास पालघर में HDIL के पैराडाइज सिटी प्रोजेक्ट में अपना घर बुक कराया. 2010 में इस प्रोजेक्ट में बुकिंग शुरू होने के साथ ही उन्होने 5 लाख रुपए भी जमा करा दिए थे. लेकिन 6 साल बाद उन्हें क्या मिला….सिर्फ छलावा.

नोएडा हो या गाजियाबाद
मुंबई हो या गुड़गांव
बिल्डरों से घर खरीदने वालों की हर जगह एक ही कहानी …एक ही दर्द … जो वादा किया वो निभाया क्यों नहीं?

एबीपी न्यूज की मुहिम के बाद बिल्डरों पर कार्रवाई की जाने लगी है, सरकार सख्त चेतावनी दे रही लेकिन सवाल ये है कि बिल्डर वादा क्यों नहीं पूरा करते.

सबसे पहली वजह है रियल एस्टेट बाजार से काले धन का गायब होना. इस वजह को कोई भी खुलकर नहीं बताना चाहता और ना ही बात करना चाहता है. लेकिन सच्चाई ये है कि पहले प्रॉपर्टी के दाम बढ़ा-चढ़ा कर बताए जाते थे और बिक्री होती थी. एक मोटी रकम को दो-तीन छोटे मकान खरीद कर खपाया जाता था लेकिन अब ऐसे खऱीदार गायब हैं. काले धन के बाजार में ना आने के पीछे सख्त होते नियम और रियल एस्टेट कानून का डर है.

दूसरी बड़ी वजह है एक प्रोजेक्ट का पैसा दूसरे प्रोजेक्ट में डालना, और दूसरे प्रोजेक्ट का पैसा तीसरे प्रोजेक्ट में. ऐसे में कोई भी प्रोजेक्ट समय पर पूरा नहीं हो पाता है. खऱीदार EMI भी भरता है और किराया भी.हालांकि नए रियल एस्टेट बिल के कानून बनने पर एक प्रोजेक्ट का पैसा बिल्डर दूसरे प्रोजेक्ट में नहीं लगा सकेंगे.

समय पर घर की डिलिवरी ना होने की चौथी वजह बड़े-बड़े बिल्डरों का क़र्ज़ में डूबा होना है.

प्रॉपर्टी के बाजार में आज हर बड़ा नाम कई कई हज़ार करोड के क़र्ज़ में डूबा है, तो भला ऐसे प्रोजेक्ट में पैसा कौन लगाये. जाहिर है जब प्रोजेक्ट में पैसा नहीं लगेगा तो प्रोजेक्ट या तो डूब जाएगा या फिर देर से पूरा होगा. हालांकि जानकारों की माने तो अभी रियल एस्टेट मार्किट में सुधार का वक्त है क्रैश का नहीं.

प्रॉपर्टी कंसल्टेंट नाइट फ्रैंक इंडिया के आकड़ें कहते हैं कि 18 मंजिल की इमारत वाले प्रोजेक्ट को पूरा होने में करीब चार साल तक का वक्त लगना चाहिए जबकि एनसीआर में ज्यादातर प्रोजेक्ट 5 से 8 साल की देरी से चल रहे हैं. प्रॉपर्टी के बाजार में आज हर बड़ा नाम कई कई हज़ार करोड के क़र्ज़ में डूबा है, तो भला ऐसे प्रोजेक्ट में पैसा कौन लगाये. रियल एस्टेट मार्किट में सुधार का वक्त है क्रैश का नहीं.

बिल्डरों की मनमानी को आखिर कैसे रोका जाए. इसके लिए सरकार ने हाल में एक कानून बनाया है. इस कानून के दायरे में वो सभी प्रोजेक्ट आयेगे जो पूरे नहीं हुए हैं या जो प्रोजेक्ट पूरे हो तो चुके हैं लेकिन उपभोक्ताओ के साथ किये गए वायदे पर खरे नहीं उतरे हैं.

रियल एस्टेट कानून के तहत अब बिल्डर प्रोजेक्टा की बिक्री सुपर एरिया पर नहीं बल्कि कारपेट एरिया पर कर पाएगा. पजेशन देने के तीन महीने के अंदर बिल्डिंग को आरडब्ल्यूए को हैंडओवर करनी होगी. कानून में इस बात का प्रावघान है कि पजेशन में देरी या कंस्ट्ररक्शनन में दोषी पाए जाने पर डेवलपर को ब्या ज और जुर्माना देना होगा. ग्राहकों से वसूले गए पैसे को 15 दिनों के भीतर बैंक में जमा करना होगा. इस पैसे को एस्क्रोन अमाउंट के रूप में रखा जाएगा जिसका 70 फीसदी सिर्फ उसी प्रोजेक्ट पर खर्च हो सकेगा जिसके लिए खरीददार ने पैसा दिया है. प्रोजेक्टा लॉन्च होते ही बिल्डररों को पूरी जानकारी अपनी वेबसाइट पर देनी होगी. कानून के तहत हर राज्यो में रियल एस्टेीट रेग्युोलर नियुक्तू होंगे, जो सभी प्रोजेक्ट् की निगरानी करेंगे और ग्राहकों की शिकायत सुनेंगे. पर सवाल उठता है ये कानून पहले क्यों नहीं बना. अब जिन खरीददारों का फ्लैट सालों से अटका पड़ा है अब उन ग्राहकों का क्या होगा?

केंद्र सरकार 1 मई को तीन अधिसूचनाएं जारी करने जा रही है. इन अधिसूचनाओं में राज्यों को अपने हिसाब से नियम बनाने के लिये 6 महीने का वक्त दिया जायेगा. बिल्डरों से जुड़े विवाद के निपटारे के लिए राज्यों को रियल एस्टेट अथॉरिटी बनानी होगी जिसके लिए 1 साल का वक्त दिया जायेगा. सवाल उठता है तक घर खरीद चुके लोग क्या करें?

बिल्डरों पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने नया कानून तो बना दिया है. लेकिन इस कानून को प्रभावी तौर पर लागू होने में 1 साल तक का समय लग सकता है. रियल एस्टेट बिल के संसद से पास होने के बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर भी हो गए हैं लेकिन इस बिल कानून का अमलीजामा पहनाने के लिए कुछ नियमों की भी जरूरत होती है जिस पर इस समय काम चल रहा है.
हालांकि राज्यों को ये छूट होगी कि वो कभी भी योग्य व्यक्ति को रियल एस्टेट अथॉरिटी का चेयरमैन बनाकर अथॉरिटी को अधिसूचित कर सकते हैं. राज्यों की और से नियमों का निर्धारण होते ही राज्य और केंद्र रियल एस्टेट डेवलेपमेंट ट्रिब्यूनल को घोषित कर देंगे. उपभोक्ता अगर अथॉरिटी के फैसले से खुश नहीं होंगे तो केंद्रीय ट्रिब्यूनल में अपील कर सकेंगे. इस तरह से 30 अप्रैल 2017 तक रियल एस्टेट बिल कानून की शक्ल में लागू हो जाएगा. यानी राज्य सरकारें जितनी जल्दी रियल एस्टेट अथॉरिटी बना लेंगी, उतनी जल्दी बिल्डरों की मनमानी पर लगाम लगाई जा सकेगी. लेकिन किसी भी हाल में एक साल बाद ये कानून हर हाल में लागू हो जाएगा. जाहिर है तब तक घर के खरीददारों को राहत मिलती नजर नहीं आ रही है.

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