आस्था के नाम पर ये कैसी प्रथा? दीवाली से अगले दिन बरसाते हैं एक-दूसरे पर पत्थर

आस्था के नाम पर ये कैसी प्रथा? दीवाली से अगले दिन बरसाते हैं एक-दूसरे पर पत्थर

दरअसल, ये प्रथा सेंकडों सालों से चली आ रही है. इसके पीछे कहानी बताते हैं कि पहले यहां नरबलि दी जाती थी. कालांतर में एक राजा की मौत के बाद उसकी रानी सती हुई. जिसने सती होने पर इस नरबलि को खत्म करवा दिया. बाद में यहां पशु बलि भी दी गयी लेकिन माता ने पशु बलि स्वीकार नहीं की. लिहाज़ा माता को मानव रक्त का अभिषेक करने के लिए नई व्यवस्था निकाली गई.

By: | Updated: 21 Oct 2017 10:41 AM

शिमला: हिमाचल प्रदेश के शिमला से करीब 30 किमी दूर धामी गांव में दीवाली के अगले दिन एक अनोखी प्रथा के तहत गांव के दो गुट एक दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं. जिस गुट के शख्स को पत्थर से खून निकलता है उसे काली माता के मंदिर में चढ़ाया जाता है. आप भी देखिये कैसे पत्थरबाज़ी होती है धामी गांव में.


दरअसल, ये प्रथा सेंकडों सालों से चली आ रही है. इसके पीछे कहानी बताते हैं कि पहले यहां नरबलि दी जाती थी. कालांतर में एक राजा की मौत के बाद उसकी रानी सती हुई. जिसने सती होने पर इस नरबलि को खत्म करवा दिया. बाद में यहां पशु बलि भी दी गयी लेकिन माता ने पशु बलि स्वीकार नहीं की. लिहाज़ा माता को मानव रक्त का अभिषेक करने के लिए नई व्यवस्था निकाली गई. जिसमें गांव की दो टुकड़ियां आपस में पत्थरबाज़ी करती है. पत्थर के इस खेल को स्थानीय भाषा मे 'बेहड़' कहते हैं. कटेड़ू, तुनड़ू, धगोई और जमोगी इन टोलियों के नाम होते हैं.


करीब 10 मिनट तक ये पत्थरबाज़ी चलती रही. जमोगी के प्रकाश ठाकुर को पत्थर लगा जिनके सिर में तीन टांके आये. प्रकाश इसे सौभाग्य मानते हैं. प्रकाश कहते हैं कि 7-8 साल से खेल रहे हैं लेकिन पहली बार अब लगा है. प्रकाश ठाकुर के खून से माता को तिलक लगाकर इस प्रथा को पूरा किया गया.


गांव में लगता है मेला


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धामी में पत्थरबाज़ी के इस खेल को देखने के लिए लोग दूर दराज के गांवों से पंहुचते है. गांव में बड़े मेले का आयोजन किया जाता है. बच्चों में लिए झूले रहते हैं. चाट- पकौड़ी की रेहड़ियों के साथ बाजार सजता है. जिस जगह पत्थरबाज़ी का ये खेल होता है उसे सती चौक कहते हैं. इस खेल को देखने के लिए उसको दोनों तरफ बड़ा मजमा इकट्ठा होता है.


लोग चाहते हैं बंद हो ये प्रथा!


धामी में इस अनोखी प्रथा को देखने के लिए जुड़ते हैं. लेकिन हमें कुछ लोग यहां ऐसे मिले जो देखने आए तो ज़रूर थे लेकिन वो इसे अंधविश्वास ही मानते हैं. हरीशा शर्मा कहती हैं कि ये बंद होना चाहिए. पुलिस विभाग से रिटायर पूर्णचंद शर्मा कहते हैं कि ये आयोजन पूरी तरह से दकियानूसी सोच का नतीजा है. ये बंद होना चाहिए लेकिन नेता राजनीतिक हित साधने के लिए इस पर कुछ नहीं बोलते.

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