आतंक के खिलाफ पाकिस्तान की अधूरी लड़ाई

By: | Last Updated: Saturday, 27 December 2014 4:18 PM
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नई दिल्लीः पिछले हफ्ते जब पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में सैकड़ों लोग आतंकवाद के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे, उसी दरम्यान इस्लामाबाद से महज चंद किलोमीटर दूर आतंकी अरशद महमूद का जनाजा निकाला जा रहा था. जनाजे में अरशद महमूद के समर्थक हजारों लोग शामिल थे जिनके लिए वो आतंकवादी नहीं एक शहीद था. पेशावर हमले के बाद पाकिस्तान के सियातसदान ने एक आवाज में आतंकवाद के खात्मे की कसम खाई थी लेकिन उसके एक दिन बाद ही मुंबई हमले के मास्टरमाइंड जकी उर रहमान लखवी को कोर्ट से जमानत मिल जाती है.

जाहिर है पाकिस्तान की आवाम से लेकर सियासत तक आतंकवाद को तोलने के तराजू अलग अलग हैं. अच्छे और बुरे आतंकवाद के पलड़ों में तोलने की मानसिकता है. इसको समझने के लिए पाकिस्तान की सामाजिक पेचीदगियां और उनकी बुनियाद पर बने आतंकी गुटों की विचारधारा समझना जरूरी है.

 

 

पाकिस्तान में राजनीति, नस्लवाद और आतंक आपस में गुंथे हुए हैं. आतंकियों से फायदे या नुकसान के बिना पर उनकी अच्छाई और बुराई मापी जाती है. आतंकी गुटों को किसी ना किसी वजह से एक तबके से सामाजिक स्वीकार्यता मिल जाती है जो उनकी प्राणवायु बनती है. यहां तक की पाकिस्तान की नेशनल सिक्योरिटी पॉलिसी की रिपोर्ट में भी उग्रवादियों को स्थानीय समर्थन की बात मानी गई है. इस बात से जरा भी इनकार नहीं किया जा सकता कि पाकिस्तान में आवाम का बड़ा हिस्सा धर्म और नस्ल के नाम पर बांटने वालों का शिकार है. फिरका परस्ती की इसी आबो हवा में वहां आतंकी संगठन को पनाह मिल रही है. ना सिर्फ अतिवादी संगठन बल्कि वहां की राजनीति पार्टियों में भी ये छाप देखी जा सकती है.

 

पाकिस्तान में अभी नवाज शरीफ की पीएमएल(एन) पार्टी की सत्ता है. पाकिस्तान का सबसे बड़ा सूबा पंजाब पीएमएल(एन) का गढ़ है. भुट्टो की पार्टी पीपीपी का गढ़ सिंध है. इमरान खान की पार्टी तहरीक ए इंसाफ का वजूद खैबर पख्तुनख्वा प्रांत के बाहर नहीं है. इलाकों के आधार पर राजनीतिक पार्टियां का आतंकी गुटों से भी एक अलिखित समझौता है. पेशावर धमाके से पहले इमरान खान ने तहरीक ए तालिबान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जरब ए अजब का विरोध किया था. तहरीक ए तालिबान पश्तून संगठन है और खैबर पख्तूनख्वा और आदिवासी इलाके फाटा में मजबूत है.  ये बात छिपी नहीं है कि तहरीक ए तालिबान भी इमरान खान पर मेहरबान रहा है. 

 

 

पेशावर में आर्मी स्कूल पर हमले से पहले तहरीक ए तालिबान सेना पर हमले करता रहा है. तहरीक ए तालिबान अफगानिस्तान से लगी पाकिस्तान की सीमा वाले इलाके में अमेरिकी ड्रोन हमलों के लिए सेना को जिम्मेदार मानता है. सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ ने अमेरिका को ड्रोन हमलों की इजाजत दी थी. इस बात पर तहरीक ए तालिबान अपने हमलों को इलाके में सही साबित कर देता है. पाकिस्तान का ये भी आरोप है तहरीक ए तालिबान को अब अफगानिस्तान से मदद मिलती है. लेकिन ये बात भी जाहिर है कि पाकिस्तान की सेना और खुफिया एजेंसी ISI से अफगान तालिबान को मदद मिलती रही है.

 

पेशावर हमले के बाद अब सेना ने तालिबान के खात्मे के लिए ताबड़तोड़ कार्रवाई शुरू भी कर दी है, लेकिन तालिबान को खत्म करना सेना के लिए इतना आसान नहीं होगा. इस गुट को पाकिस्तान के पख्तुन बहुल इलाकों में समर्थन है. तारीख गवाह है कि पठानों को इस इलाके में अंग्रेज भी नहीं हरा पाए थे. सेना के अंदर से भी तहरीक ए तालिबान  के खिलाफ चल रहे जरब ए अजब अभियान पर सवाल उठाए गए हैं. आगे चलकर ये पाकिस्तान के लिए घातक हो सकता है.

इसी तरह पाकिस्तान के ब्लूचिस्तान सूबे में कई संगठन अलगाववादी राजनीति कर रहे हैं. ब्लूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट और ब्लूचिस्तान लिबरेशन आर्मी जैसे संगठन का कई हिंसक हमलों का इतिहास रहा है. ब्लूचिस्तान में अलगाववादियों की मदद के लिए पाकिस्तान भारत को जिम्मेदार ठहराता है. हालांकि, मुंबई हमलों का गुनहगार हाफिज सईद पाकिस्तान के लिए हरगिज आतंकवादी नहीं है. इसमें पाकिस्तान की आवाम भी सरकार से कदम मिलाकर चलती है.

 

दूसरी तरफ तकफिरी आतंकियों के गुटों को भी पाकिस्तान में मौन सहमति मिलती रहती है. तकफिरी वो संगठन हैं जो शियाओं को गैर-इस्लामिक बताकर उन पर हमला करते हैं. पाकिस्तान के पंजाब में लश्कर ए जहांगवी ऐसा ही एक कुख्यात तकफिरी गुट है. कहने को पाकिस्तान में लश्कर ए जहांगवी पर साल 2001 से बैन है लेकिन इस संगठन के कारनामे बदस्तूर जारी रहे हैं. खुद लश्कर ए जहांगवी के सरगना मलिक इशाक की 3 साल हिरासत में रखे जाने के बाद रिहा हो गया है. मलिक इशाक वो आतंकी है जिसने 1997 में एक उर्दू अखबार को दिए इंटरव्यू में खुद कबूला था कि उसने 102 शियाओं का कत्ल किया है. इशाक की हिरासत बढ़ाए जाने की मांग नवाज शरीफ सरकार ने की ही नहीं. पंजाब में सक्रिय आतंकवादियों पर भी नवाज सरकार के नरम रवैये पर सवाल उठते रहे हैं. .

 

पाकिस्तान में 60 संगठन बैन हैं. लेकिन ये तंजीम महज कागजों में बैन हैं, इनके ऑपरेशन बाकायदा पाकिस्तान की सरजमीं पर जारी हैं. सरकारों की नरमी इसके लिए जिम्मेदार है. सेना को निशाना बनाने वाला तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान को सबसे बड़ा खतरा लग रहा है लेकिन भारत को जख्म देने वाले हाफिज सईद और लखवी जैसे आतंकियों को जरूरी अमानत समझा जाता है.

 

 

जब तक पाकिस्तान इस रवैये से ऊपर नहीं उठता तब तक आतंकवाद से लड़ाई अधूरी ही मानी जाएगी. पाकिस्तान की सिविल सोसायटी उग्रवाद और संकीर्णवाद के घुटन को महसूस कर रही है. इसका सबूत पिछले कई दिनों से लाल मस्जिद के बाहर चल रहे प्रदर्शन हैं. पाकिस्तान के हुक्मरानों और फिरकापरस्ती की राजनीति करने वालों को भी ये समझ लेना चाहिए. आतंकवाद का कोई जस्टिफिकेशन नहीं है. सैन्य अदालतों के फैसले पर आतंकियों को फांसी देना भी पाकिस्तान में मुसीबत बन सकता है. इस पर भी पाकिस्तान को गौर करने की जरूरत है.

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