प्रेस कॉन्फ्रेंस: क्या पाकिस्तान कभी PoK को भारत को वापस देगा?

By: | Last Updated: Saturday, 5 September 2015 2:34 PM
Pakistan High Commissioner Abdul Basit

एबीपी न्यूज़ के खास कार्यक्रम प्रेस कॉन्फ्रेंस में पाकिस्तान के उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने कहा कि भारत से अब बातचीत में पाकिस्तान शुरूआत नहीं करेगा. हाल ही में पाकिस्तान ने भारत के साथ होने वाली वार्ता को रद्द कर दिया था क्योंकि भारत एनएसए लेवल की उस वार्ता में सिर्फ आतंकवाद पर बात करना चाहता था लेकिन पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे पर अड़ा हुआ था. अब पाकिस्तान के उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने इस पर यू-टर्न लेते हुए दावा किया है कि भारत के साथ होने वाली वार्ता में पाकिस्तान कश्मीर के मुद्दों पर बातचीत नहीं करना चाहता था.

 

सवाल दिबांग- उफा समझौता में जो ज्वॉइंट स्टेटमेंट आया उसमें जो पहला प्वाइंट था वो ये था कि दिल्ली में जो बातचीत होगी, उसमें सिर्फ आतंकवाद पर बातचीत होगी. आप ने बातचीत तोड़ दी क्योंकि आप सभी मुद्दों पर बातचीत चाहते थे, आतंकवाद के अलावा भी और बात करना चाहते थे. फिर आप भारत को दोष भी दे रहे हैं तो हुआ क्या, वजह क्या रही  ?

 

जवाब अब्दुल बासित- जहां तक उफा का सवाल है हमारे एनएसए के बीच नई दिल्ली में बात होनी थी. अगर आप उफा के ज्वॉइंट स्टेटमेंट को ध्यान से देखें तो उसके दो हिस्से हैं. पहले हिस्से में दोनों देशों के प्रधानमंत्री ने इस बात को माना कि हम तमाम मुद्दों पर बातचीत करेंगे. दूसरे हिस्से में पांच स्टेप हैं जिसमें पहला है कि जो हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं वो आतंकवाद के मुद्दे पर बात करेंगे. मैं आप की बात से सहमत हूं. लेकिन इसमें बहुत सी चीजें नहीं हैं जो दोनो देशों के प्रधानमंत्री के बीच जिस पर सहमति बनी उफा में. उसमें हमारी कोशिश ये थी कि जहां एनएसए दहशतगर्दी पर बात करें वहीं दोनों देशों के विदेश सचिव भी नई दिल्ली में मुलाकात कर सकते हैं भविष्य में. लेकिन चूंकि भारत ने हमारा सुझाव नहीं माना तो हमने मुनासिब समझा कि जो भविष्य में बात करनी है, उसको हम किस तरह आगे लेकर चलें.

 

दिबांग- बासित साहब उसमें साफ लिखा है, आप उसको पढ़ रहे हैं फिर जो बातें उसमें नहीं थी तो आप उसको क्यों ध्यान रख कर चल रहे हैं?

 

अब्दुल बासित- मैं तो आप से सहमत हूं कि जो एनएसए की मीटिंग है वो आतंकवाद पर चर्चा के लिए होगी. हम अब भी यही बात कह रहे हैं कि जब भी दोनों देशों के एनएसए मिलेंगे दहशतगर्दी पर ही बात करेंगे. क्योंकि आतंकवाद हमारा भी बड़ा मुद्दा है. लेकिन एक और चीज पर उफा में समझौता हुआ जिसके तहत हमें दूसरे मुद्दों पर भी बात करनी है.

 

सवाल सुहासिनी हैदर- ये पहली बार नहीं हो रहा है कि एनएसए स्तर की वार्ता रद्द की गई है, दूसरी बार हो रहा है. उसी मुद्दे, उसी विषय पर जो आप ने हुर्रियत को आप ने न्यौता दिया था. ये तो नहीं कह सकते आप की भारत की नाराजगी का अंदाजा नहीं था आपको, क्योंकि पिछले साल भी यही हुआ था. तो फिर क्या वजह थी. कम्यूनिकेशन गैप था, कुटनीति का फेलियर था कि आप का पर्सनल फेलियर है.

 

जवाब अब्दुल बासित- ये जरुरी है तय कर लेना कि जो वार्ता नहीं हुई वो क्यों नहीं हो सकी. मैं समझता हूं कि जो वार्ता रद्द हुई उसकी बुनियादी वजह थी वो ये कि उफा की व्याख्या शायद अलग-अलग थी. उस वजह से वार्ता आगे नहीं बढ़ सकी. हमारा कतई ये मकसद नहीं था कि वार्ता का एजेंडा हम बढ़ाना चाहते हैं. हम एनएसए की वार्ता को सिर्फ और सिर्फ आतंकवाद पर ही रखना चाहते थे. हमारा मकसद ये था कि इस मीटिंग से जो भविष्य की जो बातचीत है विभिन्न मुद्दों पर हम उसको सामने रखें.

 

मैं समझता हूं कि जो वार्ता को रद्द करने की असल वजह बनी वो एजेंडा था. या हमारी अगल-अलग व्याख्या थी उफा समझौते को लेकर. जहां तक हुर्रियत से मुलाकात की बात है तो सुहासिनी आप जानती हैं कि पिछले 20 सालों में हमारी बात होती रही है. और जब पिछले साल भारत ने ये फैसला कि अपने विदेश मंत्री को इस्लामाबाद नहीं भेजना तो उसमें उन्होंने एक नई पोजिशन ली जिसपर हमसे चर्चा नहीं की, हमें नहीं बताया. हमारी मुलाकात पहले भी होती रही हैं तो क्यों इस समय इन मुलाकातों पर अब क्या आपत्ति है.

 

सवाल दिबांग- जब पिछली बार वार्ता टूटी तब सउदी गजट को आप के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ कहा कि बहुत ही मामूली बात पर भारत ने बातचीत तोड़ दी. क्या आप समझते हैं कि हुर्रियत से मिलने वाली बात थी ये बहुत ही मामूली बात है. क्या आप सहमत हैं?

 

जवाब अब्दुल बासित- हम ये समझते हैं कि हमारी ये मुलाकात जो हुर्रियत के साथ ये एक मददगार साबित होगी. कश्मीर का जो मसला है उसको आगे ले जाने के लिए. हम इसको ये नहीं समझते कि ये कोई दिक्कत है. जिस तरह मैंने पहले कहा कि भारत कुछ मौंको पर इसको फेसीलिटेट भी करता रहा है.

दिबांग- क्या ये बहुत ही हल्का बहाना है.

अब्दुल बासित- मैं ये समझता हूं कि ये पोजिशन है हमारी कि हम हुर्रियत के लोगों से मुलाकात करते रहे हैं और हम समझते हैं कि मुलाकात का सिलसिला जारी रहना चाहिए.

 

दिबांग- बासित साहब अगर ये इतनी छोटी चीज है तो छोड़ क्यों नहीं दे ते आप. आप शांति चाहते हैं, आप खुद बोल रहे हैं कि ये बहुत ही मामूली बात है तो छोड़ दीजिए एक बात. दूसरी चीज क्या इस पर भी बात हुई कि जब आप बातचीत करते हैं तो बड़ी बातचीत से पहले ये मुलाकातें ना करें. क्या इसपर भी कोई बात हुई आप की.

 

जवाब अब्दुल बासित– हमारे हवाले से ये मसला बहस के काबिल है ही नहीं. हम समझते हैं कि ये मसला कोई ऐसा नहीं है जिसपर कोई बातचीत की गुंजाइश है. हम समझते हैं कि हमारी जो हुर्रियत के नेताओं से मुलाकात है उसको सही तरीके से देखना चाहिए. मुझको समझ नहीं आती कि एक चीज जो पिछले 20 साल से ठीक थी उसमें अचानक किस तरह का मसला पैदा हो गया. हमें कोई एक्सप्लेनेशन तो देनी चाहिए. एक चीज जो 20 साल से ठीक थी वो एक ही लम्हें में तब्दील कैसे हो गई. हमें इसपर एतराज है क्योंकि हम समझते हैं कि मुलाकातों का सिलसिला है वो बेहतर है. कश्मीरी इस झगड़े में अहम कड़ी हैं. और कोई भी मसला उनकी मर्जी के बगैर हल नहीं हो सकता है. पाकिस्तान और भारत चाहे भी तो जब तक कश्मीरियों को वो कबूल नहीं होगा वो मसला आगे चल ही नहीं सकता है.

 

दिबांग- मैं ये पूछ रहा हूं कि क्या आप को नहीं दिखाई दे रहा है कि मोदी सरकार नहीं चाहती कि इस तरह की मुलाकातें हो. क्या इस पर बात हुई कि भारत सरकार से बातचीत से पहले इस तरह की मुलाकात ना हो.

 

अब्दुल बासित- भारत ने एक स्टैंड रखा है कि आप बातचीत से पहले हुर्रियत से मुलाकात ना करें, आप बाद में मुलाकात कर सकते हैं. आप मिलन पार्टी में मिल सकते हैं, आप इफ्तार पार्टी में मिल सकते हैं. लेकिन हमारी कभी इस पर बातचीत नहीं हुई.

 

सुहासिनी हैदर- आप कह रहे हैं कि हुर्रियत के साथ बातचीत मददगार हैं लेकिन जरूरी नहीं है. अगर ये हुर्रियत से नहीं मिल पाते सरताज अजीज साहब तो फिर भी वो वार्ता के लिए आते.

 

अब्दुल बासित- मैंने कहा ना कि मसला अगल-अगल व्याख्या का था उफा समझौते के. और समझता हूं कि उसी वजह से बातचीत आगे नहीं बढ़ी. बाकि भारत की हुकूमत ने एक फैसला लिया कि जो हुर्रियत के रहनुमा कहीं पहुंच गए थे उनको नजरबंद कर दिया. लेकिन हम बुनियादी तौर पर समझते हैं कि हुर्रियत से बातचीत मददगार साबित होगी और कश्मीर का मसला है उसको हल करने के लिए जरुरी है.

 

दिबांग- कहीं ये भाव आया जो कुछ चीजें पाकिस्तान लिखवाता था वो छूट गई और वो भारी पड़ा उनको.

जवाब अब्दुल बासित- देखिए ऐसी कतई कोई बात नहीं है.

दिबांग- पर ऐसा होता रहता है.

अब्दुल बासित- बुनियादी बात ये है कि ने अगर कोई लचक दिखाई भी दी है तो एक लार्जर कांटेक्स में दिखाई है. लेकिन भारत को एक बात याद रखना चाहिए कि जो बात हुई है भारत और पाकिस्तान के पीएम के बीच उसमें बहुत सी चीजें ज्वॉइंट स्टेटमेंट में नहीं है. लेकिन हमारे लिए उनकी वही अहमियत है जो ज्वॉइंट स्टेटमेंट में लिखी बातों की है. हम चाहते हैं कि बातचीत का सिलसिला शुरु हो,जिसमें हम तमाम मुद्दों पर हम चर्चा करें. क्योंकि वही सही तरीका है दो देशों के बीच अमन लाने के लिए.

 

संगीता तिवारी- जब उफा में बातचीत का एजेंडा तय हो चुका था उसके बात पाकिस्तान पीछे क्यों हटा? क्या इसकी वजह पाकिस्तान की अंदरूनी राजनीति है? ये बात इसलिए कह रहे हैं क्योंकि जब नवाज शरीफ वापस गए थे तो उनकी काफी आलोचना हुई थी. और क्या पाकिस्तान में वो लोग ज्यादा मजबूत हैं जो भारत के साथ बेहतर संबंध नहीं चाहते.

 

जवाब अब्दुल बासित- मैं दोबारा यही कहूंगा कि जो एनएसए की बातचीत है उसमें सिर्फ और सिर्फ दहशतगर्दी के मुद्दे पर ही बातचीत होगी. हमारा इस पर कोई दूसरा मत नहीं है, ना हमने ये कहा है. अगर आप हमारे सरताज अजीज साहब की प्रेस कॉन्फ्रेंस को पूरा देखिए. तो उन्होंने कहा है कि जिस तरह दोनों देशों के पीएम के बीच सहमति बनी कि हम आगे जो भविष्य में बातचीत है दूसरे मुद्दों पर भी हम बातचीत करना चाहते हैं. इसलिए हमने अपने वफद में विदेश सचिव को भी शामिल किया. ताकि एनएसए दहशतगर्दी पर बात करें और विदेश सचिव दूसरे मुद्दों पर बात कर लेंगे. लेकिन बदकिस्मती के साथ हमारा प्रस्ताव माना नहीं गया. क्योंकि दूसरे मुद्दों पर बातचीत को हम रद्द नहीं कर सकते.

 

भारत उफा स्टेटमेंट से अलग चला गया है कि जब तक वायलेंस जारी रहेगा, आतंकवाद जारी रहेगा तब तक हम दूसरे मुद्दों पर बात नहीं करेंगे. मेरे ख्याल से उफा में ये समझौता नहीं था. उफा में क्लियर था कि हम दोनों को शांति और विकास की बात करनी है. और दूसके मुद्दों पर भी बात करनी है. तो हम समझते हैं कि एसएसए स्तर की बातचीत दहशतगर्दी तक ही रखिए. लेकिन साथ-साथ बतौर परिपक्व राष्ट्र की तरह, हम कितने सालों से बात कर रहे हैं कश्मीर पर बात कर रहे हैं, सियाचिन पर बात कर रहे हैं. तो हम नहीं समझते कि ऐसी कोई मजबूरी है दोनों देशों के बीच की इन मुद्दों पर बता ना हो.

 

सवाल सचिन- आप ने विदेश सचिव की बात की तो आप ने उफा में ये क्यों नहीं किया कि आपके लिए कश्मीर का मुद्दा इतना जरुरी है तो एनएसए के साथ-साथ एक विदेश सचिव स्तर की भी बता हो. आप ने ये क्यों नहीं कहा कि इसे ज्वॉइंट स्टेटमेंट में मेंशन किया जाए. और इसके अलावां आगे के लिए जो कंपोजिट डायलॉग है जिसको हम 2010 के बाद से रिज्यूम डायलॉग बोलते हैं इसका क्या भविष्य है. भारत ने पब्लिक में एक पोजिशन ले लिया है कि आप हुर्रियत से नहीं मिल सकते. आप का एक बयान आया है कि हम तब तक इंतजार करेंगे इसमें चाहे जितना भी समय लगे. तो ऐसे मामले में जब तक कोई पीछे नहीं हटेगा तब तक कैसे बातचीत आगे बढ़ेगी. मैं समझ सकता हूं कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आप लोगों की मीटिंग तब भी होती रहेगी लेकिन भारत और पाकिस्तान दोनों एक दूसरे के देश में जाकर बातचीत कर सके. ये कैसे होगा.

 

जवाब अब्दुल बासित- आपने बड़ा अच्छा सवाल उठाया है. देखिए बुनियादी तौर पर दो चीजें हैं यहां पर और उसको बड़े अच्छे तरीके से समझ लेना चाहिए. हमारा मानना है कि तमाम मुद्दों पर बातचीत होनी चाहिए. चाहे वो दहशतगर्दी हो,चाहे वो जम्मू और कश्मीर हो, सियाचिन हो सभी विषयों पर हम तरीके से आगे बढ़ें. ये बात तो सही है कि कुछ मुद्दों पर पहले कामयाबी मिल जाएगी. जैसे व्यापार संबंधी मुद्दों पर जल्द कामयाबी हासिल कर लेंगे लेकिन कुछ मुद्दे ऐसे हैं जिसमें शायद ज्यादा समय लग जाए. हमारा कहना ये है कि आप सभी मुद्दों पर बातचीत करें, कई मुद्दों पर कामयाबी मिलती रहेगी और वातावरण खुद बेहतर हो जाएगा.

 

सवाल विनोद शर्मा-  पिछले साल अक्टूबर में भारत सरकार ने पाक से बातचीत सस्पेंड किया था इस साल आपने बातचीत करने से मना किया. पहले आप ने बातचीत की पहल की थी इस बार भारत के तरफ से पहल हुई लेकिन आप बातचीत करने से मना कर दिया है. क्या भारत सरकार से बातचीत करने के लिए अब पाकिस्तान पहल करेगा.

 

भारत का कहना है कि कश्मीर मुद्दे पर हुर्रियत थर्ड पार्टी है और दोनों देशों के बीच बातचीत से पहले हुर्रियत से मुलाकात से भारत को एतराज है. क्या आप हुर्रियत को थर्ड पार्टी मानते  हैं.

 

जवाब अब्दुल बासित- पहली बात तो मैं आप की बात से इत्तेफाक नहीं रखता कि पाकिस्तान ने ये वार्ता रद्द की है. चूंकि भारत ने कंडीसन लगा दी थी जो हमारे लिए काबिल-ए-कबूल नहीं थी और इस लिए ये मुलाकात नहीं हो पायी. जहां तक आपका दूसरा सवाल है मुझे यकीन है दोनो मालिकों के बीच बातचीत होगी. सियासत और सफारत में किसी चीज को रद्द नहीं किया जा सकता है. लेकिन अभी कुछ वक्त चाहिए दोनों मालिक को कुछ इंट्रोस्पेक्शन की. उसके बात देखते हैं कि किस तरह रिइंगेजमेंट हो सकती है.

 

दिबांग- ये जो डीजी स्तर की बात होने वाली है 9 तारीख को क्या उसमें भी कोई अड़ंगा आ सकता है.

जवाब अब्दुल बासित- नहीं मुझे कोई ऐसी मुश्किल नजर नहीं आती है. मुलाकात तय है और हमारे डीजी रेंजर नई दिल्ली आएंगे. हमारी साइट तो बहुत ही प्रीपेयर्ड तरीके से आ रही है. हम चाहेंगे कि जो हमारी अंडरस्टैंडिंग थी 2003 की उसको दोनों साइड मेकश्योर करें कि उसका वायलेशन ना हो.

दिबांग- ये जो सीजफायर वाली बात है. यानि की अगस्त में 55 हुई, पूरे साल में 2045 हुई कैसे आप देखते हैं कि जब बातचीत होती है तब ये खेल शुरू हो जाता है.

जवाब अब्दुल बासित- नहीं मैं इसे खेल नहीं मानता ये बहुत गंभीर मुद्दा है. वहां पर लोग मारे जा रहे हैं. बेगुनाह लोग मारे जा रहे हैं. ये बदकिस्मती है. और इसको यकीनी बनाना चाहिए कि आइंदा इस किस्म की वाकयात ना हों.

दिबांग- ये बदकिस्मती है या पीछे से कोई डोर खींचता है.

 

जवाब अब्दुल बासित- मैं ये समझता हूं कि बदकिस्मती है कि ये हो रहा है. मेरे ख्याल से जो ये बातचीत होने जा रही है नई दिल्ली में दोनों डीजी इसका जायजा लेंगे. और कोशिश यही होनी चाहिए कि हम ऐसा मैक्निज्म ले आएं कि आइंदा से इस किस्म की वाकयात ना हों. ये सीरियस इशू है और दोनों डीजी को मिल बैठ कर ये यकीनी बना सके कि इस तरह के वाकयात आगे ना हों.

 

सवाल आशीष सिंह- उफा में भारत ने पाकिस्तान से बातचीत करने के लिए कदम बढ़ाया था. अब बात पटरी से उतर गई है क्या अब भारत से बातचीत करने के लिए पाकिस्तान कोई पहल करेगा, पीएम लेवल, एफएम लेवल और एनएसए लेवल पर. क्या आप को लगता है ये मुनासिब होगा कि पाकिस्तान बातचीत के लिए पहल करे.

 

जवाब अब्दुल बासित- मुलाकातों में तो कोई हर्ज नहीं है, मेरा निजी तौर पर ये समझता हूं. लेकिन मुलाकातों से हम क्या चाहते हैं उसके बारे में बड़ी क्लैरिटी चाहिए. अगर मुलाकत कर के इसी तरह चलना है तो शायद इस तरह कि मुलाकातों की जरूरत नहीं है. मेरी ख्वाइश ये है कि दोनों मालिक बैठें और बातचीत करें और मामलों को आगे लेकर जाएं. लेकिन मैं बार बार ये कहूंगा कि जो नई दिल्ली में वार्ता होनी थी ये पाकिस्तान ने कैंसिल नहीं की. लेकिन आप कह रहे हैं कि पाकिस्तान पहल करे तो मेरे ख्याल से ये मुनासिब नहीं है. अब ये देखते हैं कि मामलात कैसे आगे बढ़ते हैं.

 

सवाल- क्या फर्क पड़ता है कि अगर आप की तरफ से बातचीत के लिए पहल हो जाए. 

दिबांग- पाकिस्तान में भी लोग कह रहे हैं कि असली जो डर है आपको वो एनएसए अजीत डोभाल का है. क्या समझते हैं अजीत डोभाल साहब का डर है.

 

जवाब अब्दुल बासित– नहीं मैं इन तहजियाकार(एक्सपर्ट) की बातों पर कमेंट करना मुनासिब नहीं समझता. मैं समझता हूं कि दोनों प्रधानमंत्री ने ये मुलाकात तय की और मैं समझता हूं कि भविष्य में इंशाअल्लाह मुलाकात होगी.

 

सवाल रमालक्ष्मी- मोदी सरकार की फॉरेन पीलिसी को सभी आंकलन में सभी ने एक सफल नीति माना है. सभी का मानना है कि नई उर्जा, नई सोच, नया अंदाज लेकर आए हैं तो इस सफल नीति से पाकिस्तान क्यों छूटता जा रहा है.

जवाब अब्दुल बासित- मेरे लिए मुनासिब नहीं होगा मोदी साहब की विदेश नीति पर पब्लिकली कमेंट करूं. जहां तक पाकिस्तान की बात है तो हमारे प्रधानमंत्री की दिली ख्वाइश है कि पाकिस्तान और भारत के बीच के ताल्लुकात बेहतर हों. और उसकी हम अच्छी बुनियादें रखें.

 

सवाल कमर आगा– हुर्रियत कोई रिप्रजेंटेटिव ऑर्गनाइजेशन नहीं है वो 36 ग्रुप में बटी हुई है. कश्मीर का मुद्दा टू नेशन थ्योरी से जुड़ा हुआ है. ये मुद्दा उसी दिन खत्म हो गया जब बांग्लादेश बना था. और ना ही पाकिस्तान की आम जनता चाहती है कि वो पाकिस्तान में मिले वो पहले भी नहीं थी. तो हुर्रियत को लेकर क्यों इतनी आफत है.

 

जवाब अब्दुल बासित- ये आपका ख्याल और सोच है और मैं इसकी बड़ी कद्र करता हूं. लेकिन मैं आप की बात से सहमत नहीं हूं. हम प्रतिबद्ध हैं कि इस मसले का हमें हल तलाशना है. अगर आप यूनाइटेड नेशन की बात ले लें,आप शिमला समझौता लेलें. यूनाइटेड सिक्योरिटी कांउसिल की 6 जून 1998 की रेजुलूशन है 1172 आप उसको ले लीजिए. आप लाहौर डेक्लेरेशन ले लीजिए. इन तमाम में कश्मीर को एक खास हैसियत मिली है. और हम दोनों मालिक इस बात पर सहमत हैं कि इस मसले को हल करना है. 1947 से लेकर अब तक चाहे जो भी मुद्दे हों,सियाचिन,सरक्रीक हो और जो जंगे लड़ी हों उसका बुनियादी जो मुख्य कारण था वो कश्मीर है. आप मुझसे सहमत हों या ना हों. मेरे ख्याल से अब वक्त आ गया है कि मिल बैठकर इस मसले को हल करें.

 

दिबांग- बासित साहब फिजा बदल रही है, चीजें बदल रही है और आप चहाते हैं कि जो 20-30 साल पहले चीजें थी, उसी हिसाब से चीजें हों. हुसैन हक्कानी साहब जो आप के राजदूत रह चुके हैं. वो कह रहे हैं कि कश्मीर पर जिस तरह का इंटरनेशलन सपोर्ट आप को पहले था या हो सकता था वो अब नहीं है. चुकि ये इतना इमोटिव इशू है, इसलिए आप के नेता लोग जनता को बताते नहीं है. दूसरा उन्होंने कहा कि वहां फौज बैठी हुई है. फौज और कट्टरपंथी इस्लामी हैं वो मानने को तैयार नहीं होगें. इस वजह से उन्होंने रोका हुआ है,वरना तो इसको छोड़कर बातचीत को आगे बढ़ाना चाहिए. बड़ी अच्छी दोस्ती हो सकती है. कितने सहमत हैं और ये मैं इसलिए बोल रहा हूं कि वो राजदूत रह चुके हैं वाशिंगटन में.

 

जवाब अब्दुल बासित- देखिए इंटरनेशनल कम्यूनिटी क्या कहती है, पाकिस्तान क्या कहता है, भारत क्या कहता है. मेरे हवाले से ये सब चीजें बेमानी है असल जो मसला है वो कश्मीरियों का है. बुनियादी चीज ये है कि जम्मू और कश्मीर के लोग क्या चाहते हैं. हमें तो वो देखना है. जब तक वहां के लोग अपना फैसला नहीं सुना देते. मेरे ख्याल में किसी को हक नहीं है कि इस बारे में अपनी फाइनल राय दें. असल फैसला वहां की आवाम को करना है.

 

दिबांग- आप जानते हैं कि वहां हर बार चुनाव होते हैं और चुनाव वो लोग करवाते हैं जो दुनिया भर में चुनाव करवाते हैं. और लगातार मत प्रतिशत बढ़ता जा रहा है. उसके बावजूद आप उसको मानते नहीं हैं जिद पर हैं ऐसा लगता है.

 

दिबांग- बासित साहब क्या कहना है आप का. कितने आप कसाब और नवेद भेजेंगे और कितनी बार आप छुपते और बचते फिरेंगे.

 

जवाब अब्दुल बासित- मुझे समझ नहीं आ रहा कि मीडिया रिपोर्टस के हवाले से क्या गुफ्तगू करूं. या तो ये होता कि भारत की सरकार ने कुछ जानकारी हमारे साथ शेयर की होती.

 

दिबांग- मुझे पता था कि मैं इस तरह की बात करेंगे. इसलिए मैंने कसाब का भी नाम लिया. जब पहली बार खबर आई तो आपने कहा वो पाकिस्तान का है ही नहीं. फिर आप ही के यहां के एक टीवी स्टेशन ने कहा कि हां भई ये अपना ही आदमी है.

 

जवाब अब्दुल बासित- ऐसी बात नहीं है देखिए हमारे साथ अगर कोई बात शेयर की जाएगी तो यकीनन हम उस पर अमल करेंगे.  मुंबई के बाद भी हमने कुछ लोगों को वहां पकड़ा है. उन पर केस चल रहा है. तो हमारी नीयत बिल्कुल साफ है. लेकिन आप मीडिया के थ्रू कहेंगे कि ये नवेद है, सज्जाद है तो हमारे लिए उसपर एक्शन लेना, अमल करना बनता ही नहीं है. सरकारी तौर हम से बात शेयर करेंगे तो फिर आप देखिए हम किस तरह उस पर रिएक्ट करेंगे. आप पहले से एज्यूम कर लेते हैं कि ये लोग पाकिस्तान से आए, पाकिस्तान सरकार ने इन्हें भेजा है, पाकिस्तान छुपता फिर रहा है तो फिर ये मुनासिब नहीं है. और इस तरह डिप्लोमेसी कंडक्ट भी नहीं होती. अगर आप संजीदा है कि हम दहशतगर्दी के खिलाफ एक्शन लें तो जितना संजीदा मसला है उसी संजीदगी के साथ हल भी करें. मीडिया के हवाले से ये चीजें नहीं हो सकती हैं.

 

दिबांग- तारिख खोसा जो आपके डीजी थे वे मुबंई हमले के बारे में कह रहे हैं कि किस तरीके से पाकिस्तान उसमें शामिल था. आप ने कहा कि हम कार्रवाई करेंगे. उन्होंने लखवी की भी बात की. आप एक बहुत जरा सी बता पर पूरे मामले को अटकाए हुए हैं. आप उसका वॉइस सैंपल नहीं देना चाहते हैं. उन्होंने खुद कहा कि वो वहां से करवा रहा था. उसको गिरफ्तार भी करवा लिया लेकिन एक वॉइस सैंपल की बात अटकी हुई है. वो ये कह रहे हैं कि कब पाकिस्तान ऐसी हिम्मत जुटाएगा कि सामने आकर कहे. और आप का जो नया कानून है फेयर ट्रायल एक्ट  उसके हिसाब से ये वाइस सैंपल दिया जा सकता है. क्यों नहीं पाकिस्तान एक बड़ी पहल करता. ये लीजिए वाइस सैंपल. और लखवी की जहां तक बता है कि आप कहते हैं कि हम कार्रवाई करेंगे. किताब छपी हुई है जिसमें बताया जाता है कि लखवी किस तरह से रहता है.

 

उसको इंटरनेट, टीवी, वो अपनी बीबी से मिल सकता है, उनको एक बच्चा भी होने वाला है. तो किस तरह की आप उनको जेलों में रखते हैं.

 

जवाब अब्दुल बासित- तारिख खोसा साहब ने ये कहीं नहीं का कि पाकिस्तान की सरकार इसमें शामिल थी.

दिबांग- खोसा साहब ने अपना आर्टिकल खत्म किया कि कब पाकिस्तान कड़वी सच्चाइयों का सामना करेगा. कब ये मानेगा कि ये सारी घटनाएं हुई थी और अब इससे आगे चलें. उन्होंने कहा कि हम क्यों नही वॉइस सैंपल दे देते.

 

जवाब अब्दुल बासित- इससे तो हम इन्कार ही नहीं कर रहे हैं. हकीकत ये है कि हमने कार्रवाई शुरू तो की है. सात लोगों को हमने गिरफ्तार किया हुआ है और केस चल रहा है. अगर हम डिनायल में होते ना हम उनको पड़ते और ना ही केस चल रहा होता उनपर. हम ये समझते हैं कि भारत ने जो सबूत दिए हैं वो नाकाफी है. हमें कुछ मजबूत सबूत चाहिए. जिसपर हम काम कर रहे हैं और मुनसिब वक्त में हम भारत के साथ वो शेयर भी करेंगे. लेकिन अभी हम दोनों ने के बीच बातचीत होनी है कि इस मुकदमें को किस तरह तेज कर सकें. और हम चाहते हैं कि हम जल्द से जल्द इस मुकदमें को जल्द से जल्द खत्म करें. और जस्टिस हो. हम ये भी नहीं चाहते कि इस केस को दबाव में खत्म कर दें और जस्टिस भी ना हो.

    

सवाल अशोक वानखेड़े- पाकिस्तान में सत्ता की बागडोर किसके हाथ में है. क्या सेना के हाथ में है या चुने हुए प्रतिनिधियों के हाथ में हैं या उन आतंकवादियों के हाथ में है जो कठमुल्लाओं का भेष पहनकर पाकिस्तान पर राज करने का प्रयास कर रहा है.

 

जवाब अब्दुल बासित- हमारे यहां लोकतंत्र है. हमारे यहां चुने हुए प्रधानमंत्री हैं. संसद है और पीएम हमारी हुकूमत को चला रहे हैं और वही उसके सिपहसलार हैं. जहां तक आप बात स्टेकहोल्डर की कर रहे हैं तो वो हर मुल्क में हैं. अगर कोई सिक्योरिटी पॉलिसी है तो आप तमाम इदारों से इनपुट लेते हैं. हमारे यहां भी यही है. मैं नहीं समझता कि किसी को भी इस हवाले से शक होना चाहिए जहां तक हमारी पॉलिसी है कश्मीर के हवाले से या भारत के हवाले से या अफगानिस्तान के हवाले से उसमें पाकिस्तान में कोई डिपरेंसेज हैं. ऐसी कतई कोई बात नहीं है. हमारे सिक्योरिटी इशू हैं और इसपे तमाम स्टेक होल्डर सेम पेज और बड़े ही कुहीजन के साथ हम अपनी पॉलिसी को परस्यू कर रहे हैं.

 

अशोक- ये जो बातचीत के लिए आते हैं तो क्या स्टेकहोल्डर के साथ डिस्कसन नहीं करते हैं. क्योंकि कई बार देखा गया है कि जब भी इंटरनेशनल लेवल पर कोई बातचीत होती है. जब वापस जाते हैं तो पूरा मीडिया एक बखेड़ा खड़ा कर देता है. और फिर आप की पॉलिटक लीडरशिप बैकफुट पर आती है. फिर आर्मी हावी होती है और बाकी लोग हावी होते हैं.

 

जवाब अब्दुल बासित- पहले तो इस बात को समझने की कोशिश कीजिए कि हम उफा स्टेटमेंट से आप से ज्यादा कमीटमेंट करते हैं. हम चाहते हैं कि हम उफा स्टेटमेंट की हर बात पर अमल करें.

 

अशोक- आप को हर कमिटमेंट पूरा करना है लेकिन एक रायडर के साथ. एक ऐसा कमीटमेंट की बातचीत आगे बढ़े ही नहीं.  जब दोनों एनएसए की मीटिंग होनी थी तो आपने विदेश सचिव स्तर की बात को ले आते हैं ताकि उसका फायदा हो फायदा तो कुछ हुआ नहीं लॉस ही हुआ.

 

अब्दुल बासित– हमने ये नहीं कहा कि एनएसए की मीटिंग में दूसरे मुद्दों पर बता हो. आप ज्वॉइंट स्टेटमेंट का एक पार्ट तो आप देख लेते हैं जो उससे पहले का पार्ट है आप उसे भूल जाते हैं.

 

अशोक- जिससे बातचीत शुरु हो उसी से शुरु करें. अगर बातचीत का माहौल बनता तो अगले महीने सचिव स्तर की वार्ता करवा सकते थे. आप सारी चीजें इकट्ठा क्यों चाहते हैं. अगर सबकुछ एक साथ चाहेंगे तो रायता फैलेगा ही.

 

अब्दुल बासित- फिर तो आप ने 5 साल पुरानी ही पोजिशन ले ली जो 2008 से चली आ रही थी.

अशोक-  20 साल पोजिशन आप छोड़ने को तैयार नहीं है तो हमसे कैसे अपेक्षा कर सकते हैं.

दिबांग- लखवी वाले पर आप ने पूरा जवाब दिया नहीं. आप कैसे उसको जेल में रखते हैं. 6 साल में 7 बार जज बदल जाते हैं, 2 बार प्रासिक्यूट बदल जाते है, तीन बार कोर्ट बदल जाती हैं. तो हम तो जानते हैं ये खेल तारीख पर तारीख वाला. ये तब होती है जब आप सीरियस नहीं होते किसी मुद्दे को लेकर.

 

जवाब अब्दुल बासित- नहीं ऐसी बात नहीं है. असल जो चीज है उस पर नजर रखनी चाहिए. केस पाकिस्तान में चल रहा है. 7 मुज्लिम गिरफ्तार हो चुके हैं. और अगर उनको बेल मिल भी चुकी है तो मुंबई का ट्रायल खत्म हो चुका है. वो ट्रायल जारी है. अब हमें मिल बैठ कर डिस्कसन करना है कि हम इस मामले को किस तरह हल करें.

 

दिबांग-ये जो आपका फेयर ट्रायल एक्ट है. आप को लगता है कि लखवी की आवाज का सैंपल दे ही देना चाहिए.

जवाब अब्दुल बासित– जब मुलाकात होगी तब हम ये सारी बातें डिस्कस करेंगे. लेकिन ये चीजें मीडिया में डिस्कस नहीं हो सकती. जब मुलाकात होगी हम यकीनन इस पर बात करेंगे.

 

दिबांग- क्या आप सहमत हैं कि हम फौज के साथ मिलकर कश्मीर में जेहाद कर रहे हैं.

जवाब अब्दुल बासित- देखिए उनकी ख्वाइश तो हो सकती है लेकिन पाकिस्तान की पॉलिसी ये नहीं है. पाकिस्तान की पॉलिसी बड़ी क्लियर है कि सियासी तौर पर हम कश्मीरियों की मदद करते आए हैं और करते रहेंगे. जब तक उनको उनका हक नहीं मिल जाता है. ये हुकूमत-ए-पाकिस्तान की पॉलिसी है.

 

दिबांग- आप ने हाफिज सईद जैसे लोगों को खुला क्यों छोड़ रखा है. यूएन का रेजुलेशन है 1267 जिसमें खुले घूमने पर, फंड्स पर रोक लगी है. इनका नाम उसमें लिखा हुआ है. क्यों नहीं आप लोग इनको पकड़ कर बंद कर देते हैं. क्यों ये हल्ला आप को अच्छा लगता है.

 

जवाब अब्दुल बासित-  भारत-पाकिस्तान में ऐसे बहुत से लोग मिल जाएंगे जो नहीं चाहते हैं कि हमारे बीच अच्छे ताल्लुकात हों.

 

दिबांग- यहां आप को कोई ऐसा नहीं मिलेगा जिसको यूएन ने आतंकवादी घोषित किया हुआ है.

जवाब अब्दुल बासित- जिस यूनए के 1267 रेजूलूशन की बात कर रहे हैं. 1989 के अलायदा कमेटी की रेजुलूशन का हवाला आप दे रहे हैं.

 

दिबांग- उस पर ट्रैवेल पर बैन है. ये खुले आम घूमते हैं.

जवाब अब्दुल बासित- 1989 की जो रेजुलुशन है उसमें कहीं भी इस किस्म की बता नहीं है कि कैद करने की बात है ना ही मुकदमा चलाने की बात है.

 

दिबांग- जो दूसरा क्लॉज है कि ट्रैवेल पर बैन है.

अब्दुल बासित- देश में नहीं देश के बाहर जाने पर बैन है.

दिबांग- आप कह रहे हैं कि ठीक ये आतंकवादी है लेकिन हमारे आतंकवादी हैं. इसलिए हम इनको नहीं रोकेंगे. क्या ये बात आप को जायज लगती है.

 

अब्दुल बासित- अगर आप पाकिस्तान को 15 साल पुरानी ऐनक से देखेंगे तो शायद ठीक नहीं होगा. ये हमारी कमिटमेंट है कि हम यूएन के रेजुलुशन को मानेंगे. लेकिन उसमें ये कहां लिखा है कि उनको हम जेल में बंद करेंगे और उन पर मुकदमा चलाएंगे.

 

दिबांग- आप ये जानते हैं कि भारत गया था यूएन में और वहां आप को चीन से मदद मिल गई वरना आप जानते हैं कि यूएन अपनी तरफ से कहता. एक तरह से मदद मिली हुई है जो शायद तीन महीने की होती है. उसके बाद फिर ये बात उठेगी.

 

सवाल शुभाजीत रॉय- पाकिस्तान का कैसा लोकतंत्र है कि हाफिज सईद जैसे लोग कोर्ट को अप्रोच करके बॉलीवुड की फिल्म फैंटम पर कैसे रोक लगाती है?

 

जवाब अब्दुल बासित– मैं आप से सहमत हूं. लेकिन हमारी जो न्यायपालिका है उसमें हमें पक्के सबूत चाहिए किसी भी पाकिस्तानी बाशिंदे को जेल में डालने के लिए. मुकदमा चलाने के लिए कुछ जरूरी चीजे तो होती हैं ना. जमात-उत-दावा को निगरानी में रखा है और अगर हमारे पास कोई ऐसा सबूत आएगा और हम देखेंगे कि किसी भी हिंसा में शामिल है या यहां से कोई दहशतगर्दी करना चाहता है. तो मैं आपको यकीन दिलाना चाहता हूं कि एक्शन होगा. लेकिन आप अनुमान के हिसाब से कहेंगे कि हुकमत-ए-पाकिस्तान इन्वाल्व है तो मैं आपके खिलाफ रहूंगा.

 

शुभाजीत- तो क्या जमात-उत-दावा चैरिटेबल ऑर्गनाइजेशन है ये टेररिस्ट आउटफिट है.

जवाब अब्दुल बासित- देखिए जो नजर आता है वो चैरिटेबल काम ही कर रहे हैं. और बहुत लोग उनको एप्रिशिएट भी करते हैं उसके इस काम को.

 

दिबांग- जिस तरह से हमारे पीएम यूएई गए. और वहां जो ज्वॉइंट स्टेटमेंट आया है कि धर्म के नाम पर दूसरे देशों में आंतक को सपोर्ट करना, उसकी हम भर्सना करते हैं. राजनीतिक विवादों में धार्मिक रंग देना और लक्ष्य को प्राप्त करना. यानि जब इसको पढ़ते हैं लोग तो इसकी तस्वीर दिखाई देती है, जब इसको पढ़ते हैं लोग. तो आप को लग रहा है कि जो आप का साथी था इतने दिनों से वो भी अब जग रहा है, उसको भी अब चोट पड़ रही है. आंतकवाद अब और मजबूत हुआ है और दुनिया भर में इसके खिलाफ गोलबंदी चल रही है. क्या आप इस बात से सहमत हैं.

 

जवाब अब्दुल बासित- तो हमने कब इन्कार किया है. पाकिस्तान ने दहशतगर्दी से जितना नुकसान उठाया है, मैं नहीं समझता हूं कि किसी और मुल्क ने उठाया है. 60 हजार हमारे इनोसेंट नागरिग मर गए. पिछले 12-13 सालों में. और 5 हजार के करीब सिक्योरिटी फोर्स के लोग शहीद हो गए. आप वर्ड बैंक की रिपोर्ट अगर उठा लीजिए तो तकरीबन 120 अबर डालर का पाकिस्तान ने नुकसान उठाया है. तो जितना संजीदा हम हो सकते हैं दहशतगर्दी को लेकर,मैं नहीं समझता कि कोई और मुल्क भी हो सकता है.

 

दिबांग- आपको नहीं लगता कि पाकिस्तान को पॉलिसी बदलने की जरूरत है. क्या ये सोच है कि हम आतंक को एक स्टेट इन्ट्रूमेंट की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.

 

जवाब अब्दुल बासित- ये सोच ना कभी थी, ना है. ना कभी होगी. हम दहशतगर्दी को बढ़ावा दे ही नहीं सकते. मुझे नहीं मालूम कि किस तरह यहां पर नैरेटिन बन जाता है. पाकिस्तान ने दहशतगर्दी के खिलाफ शुरुआत की है. आप देखिए अफगानिस्तान में 1979 से उस वक्त का जो सोवियत यूनियन था वो जो दखल देता और वो जो वार थी पाकिस्तान पिछले 35 साल से उसकी जो विरासत है, दुष्परिणाम है अभी तक हम भुगत रहे हैं. अब भी हमारे देख में तकरीबन 30 लाख अफगान रिफ्यूजी हैं. हम चाहते हैं कि वो डिग्निटी और ऑनर के साथ वापस जाएं. अफगानिस्तान और हमारी किस्मत एकदम जुड़ी हुई है आपस में.

 

अगर अफगानिस्तान में अमन नहीं होगा तो पाकिस्तान में भी नहीं होगा.

सवाल जयंतो घोषाल- दाऊद इब्राहिम पाकिस्तानी नहीं है, भारतीय क्रिमिनल है. तो क्या पाकिस्तान दोनों देशों के बीच विश्वास बढ़ाने के लिए दाऊद को भारत को सौंपेगा. इससे शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में आप को भी ताकत मिलेगी.

 

जवाब अब्दुल बासित- अगर पाकिस्तान में होता तो जरूर सौंपा जाता. वो पाकिस्तान में नहीं है. मई में आपकी संसद में कुछ और बयान दिया जाता है. आप को खुद मालूम नहीं है कि वो कहां पर है. मेरे ख्याल में इतना बढ़ा इशू बन गया है यहां पर. हमारी जानकारी के मुताबिक वो साहब हमारे यहां नहीं हैं.

 

दिबांग- पर उनके तो टेलीफोन बिल वगैरह भी आप को भिजवाया गया है.

जवाब अब्दुल बासित- जो टेलीफोन वाला आया था वो सारा फेक था. मीडिया में जो चलता है ना हम उसको इतनी अहमियत नहीं देते हैं.

 

कंचन गुप्ता- आप कहते थे कि ओसामा बिन लादेन भी वहां नहीं था.

जवाब अब्दुल बासित- हम मानते हैं कि तमाम एजेंसी का एक कलेक्टिव फेलियर था. यकीनन था.

कंचन गुप्ता- तो शायद दाऊद भी कलेक्टिव फेलियर हो. तो आप इतने कॉन्फीडेंस से कैसे कह रहे हैं कि वो वहां नहीं है.

जवाब अब्दुल बासित- आप इतने कॉन्फिडेंस से कैसे कह सकते हैं कि वो पाकिस्तान में ही है.

कंचन गुप्ता- ये आप को डिप्रूफ करना है मुझे प्रूफ नहीं करना है.

जवाब अब्दुल बासित- ये तो आप क्लेम कर रहे हैं. हम कहते हैं कि वो नहीं है पाकिस्तान में.

 

सवाल कंचन गुप्ता-  पाकिस्तान का जो हेट इंडिया एटीट्यूट है. आप लोग इसको मन में बिठाए हुए हैं. इसमें आप के आर्मी की कन्ट्रीब्यूशन रही है, इसमें आपकी राजनीति की कन्ट्रीब्यूशन रही है, आप के एजुकेशन सेलेबस जो बच्चों को पढ़ाया जाता है. ये हेट एक दिन आप के लिए ही खतरा बन जाएगा. बातचीत तो होती रहेगी लेकिन सवाल ये है कि पाकिस्तान अपने आप को किस दिशा में लेकर जा रही है.

 

जवाब अब्दुल बासित- हमारा ख्याल है कि हमारा जो जरबेअस्ब ऑपरेशन चल रहा है पिछले ढेड़ साल से वो बढ़ा कामयाब हो रहा है. तकरीबन हमने 11 हजार ऑपरेशन किए हैं हमने. इस वक्त हमने तकरीबन 68 हजार आतंकी गिरफ्तार किए हैं.

 

कंचन गुप्ता- नहीं मैं भारत के खिलाफ हेट भावना को बढ़ावा देने की बात कर रहा हूं जब तक इसको नहीं खत्म किया जाएगा तब तक कितनी भी बात कर लें कुछ फायदा नहीं होगा.

 

जवाब अब्दुल बासित- नहीं आप की बात सही है लेकिन कश्मीर का मसला तो जब से पाकिस्तान, भारत आजाद हुए हैं तब से बना हुआ है. लेकिन ये एक बुनियादी मसला है. अगर जम्मू और कश्मीर का मसला ना होता तो आज एक भी दिक्कत ना होती जो हम फेस कर रहे हैं. और आज भी मौका है कि इस मसले को हल कर लेना चाहिए ताकि जो 68 साल हमने बर्बाद किए हैं उसको आगे बर्बाद ना करें. आज से 68 साल के बाद हम यही बात फिर ना कर रहे हों. तो बेहतर यही है कि हम इन मुद्दों को हल करें. और फिर आप देखिएगा कि माहौल कैसे बदलता है.

 

सवाल शेषनारायण- हूजूर आप जहालत और मुफलिसी की बात की है. लेकिन आप लोग आखिर में चाहते क्या हैं 1947 में आप ने कबाली भेजे वो भगाए गए. 1995 मे हमारी फौजें लाहौर तक पहुंच गई वो तो शुक्र करिए ताशकंद का. 1971 में आप ने सबकुछ गंवा दिया बांग्लादेश खो दिया. 1999 करगिल की हार में क्लिंटन की मेहरबानी से जान बची. इतनी गरीबी और जहालत के बाद आप इतनी लड़ाईयां क्यों लड़ते हैं. बुरा मत मानिएगा चीन और अमेरिका की खैरात पर आपकी इकोनॉमी चलती है तो फिर भी आप न्यूक्लियर वार की धमकी क्यों देते हैं?

 

जवाब अब्दुल बासित- अब इस पर मैं क्या कमेंट दूं. हम चाहते हैं कि हमारे ताल्लुकात भारत के साथ बेहतर हों. अब इसपर आप बहस कर सकते हैं कि वार किसने शुरू की, 65 की वार किसने जीती, करगिल क्यों हुआ, सियाचिन का वाकया 1984 में क्यों पेश आया? किसने सियाचिन ग्लेशियर पर कब्जा जमाया? तो इन बातों पर अलग-अलग लोग अपनी राय दे सकते हैं. लेकिन आज के हालात बिल्कुल अलग हैं. आप यकीनन तरक्की कर रहे हैं, आपका सुरत-ए-हाल हमसे बेहतर हो लेकिन आपके यहां भी लाखों लोग गरीबी रेखा के नीचे जी रहे हैं. आप को भी चाइना से साथ चलने के लिए तकरीबन 12 मीलियन जॉब हर साल चाहिए. आपकी परेशानियां भी हमारी तरह बेशुमार हैं. ये मुमकिन है कि आप 7-8 परसेंट ग्रोथ कर रहे हों लेकिन ये नहीं है कि आप की सारी दिक्कतें खत्म हो गई हैं. हम चाहते हैं कि विकास हो.

 

हमारे पीएम की जो पॉलिसी है कि पीस फॉर डेवलमेंट और डेवलमेंट फॉर पीस के साथ चल रहे हैं और परेशानियों को कम करने की कोशिश कर रहे हैं. यकीकन अगर पाकिस्तान और भारत के बीच हालात बेहतर होते तो इससे बेहतर चीज कोई हो ही नहीं सकती ना. लेकिन ये कहना कि हम बिल्कुल ही बदहाली की तरफ जा रहे हैं तो ये बिल्कुल भी सही नहीं है.

 

कंचन गुप्ता- लेकिन हमारे और आप में थोड़ा सा डिफरेंस है कि हमारे यहां कोई ये नहीं कहता कि घास खाएंगे लेकिन न्यूक्लियर बम बनाएंगे.

 

जवाब अब्दुल बासित- देखिए अगर हमारे बगल में हमसे तीन-चार गुना बड़ा मुल्क है तो हमको उससे हिफाजत तो करनी है. हमे तो सोचना है कि हमारी सेक्योरिटी किस चीज में है. अगर ये पब्लिक बयान है तो इसमें कोई हर्ज नहीं है.

 

सवाल सचिन- जो आतंकी संगठन भारत के खिलाफ काम कर रहे हैं तो आप उनके खिलाफ एक्शन नहीं ले रहे हैं और एक बात एनएसए वार्ता रद्द हो गई और सीजफायर वायलेशन बढ़ते जा रहे हैं. इससे एक फिलिंग आ रही है कि एक लिमिटेड वार की पॉसिबिलिटी ही नहीं प्राबिलिटी भी बनता जा रहा है. आप इस बात से इत्तेफाक रखते हैं.

 

जवाब अब्दुल बासित- पहली बात तो हम कोई भेदभाव नहीं करते. हम जर्ब-ए-अस्ब ऑपरेशन को लेकर जा रहे हैं. और इस पर कोई भेदभाव नहीं रखी जाएगी कि टेररिस्ट कौन है. और ये भी आप को बताता चलूं कि ये बैड तालिबान और गुड तालिबान की थ्योरी पाकिस्तान ने नहीं इजात की है, ये भी कहीं बाहर से इंपोर्ट होकर आई है. दूसरा जो आपका सवाल है तो देखिए हमें जंग की बातें नहीं करनी चाहिए और इस वक्त जंग की बातें नामुनासिब हैं मेरे ख्याल में. हमें शांति, अमन की बात करनी चाहिए और उसपर अपना फोकस रखना चाहिए.

 

दिबांग- न्यूक्लियर हथियारों की जब आप याद दिलाते हैं तो आप दुनिया को बताना चाहते हैं या भारत के लिए होता है या पाकिस्तानी लोगों के लिए होता है. जब इसपर बात करते हैं तो इशारा किस तरफ करते हैं.

 

जवाब अब्दुल बासित- ये हकीकत है कि हम एक न्यूक्लिराइस वातावरण में रह रहे हैं. और ये बात अपनी जगह दुरुस्त है कि न्यूक्लियर वातावरण में जंग की बात करनी नहीं चाहिए. ये सारी बहुत डेंजरस बातें हैं. इस तरह की बातों को बढ़ावा नहीं देना चाहिए. मैं बार-बार ये बात कह रहा हूं कि दो देशों के दरमियान हर चीज बातचीत से ही हल हो सकती है. जरूरत है कि हम मुश्किल मामलों में मेच्योर देशों की तरह आगे बढ़ें. अगर हम दहशतगर्दी और जम्मू कश्मीर इन बातों में उलझ कर रह जाएंगे तो नुकसान हम दोनों का ही होगा.

 

दिबांग- आप बड़ी सुलझी बातें करते हैं लेकिन इन सब में एक नवेद खड़ा हो जाता है, एक सज्जाद खड़ा हो जाता है तो आपकी सारी बातें खोखली लगती हैं. आप कहना कुछ और चाहते थे और करते कुछ और हैं. ये भाव आता है. एक कसाब जब पहली बार आया तो आप ने कहा वो पाकिस्तानी है ही नहीं. तो जब इस तरह के लोग आ जाते हैं तो आप जो बड़ी बता करते हैं तो वो कहां तक चोट पहुंचती है.

 

जवाब अब्दुल बासित- इन चेहरों को हम हर रोज स्क्रीन पर देख रहे हैं. जब तक भारत की सरकार हमसे ऑफिसियली कोई चीज शेयर नहीं करेगी तो मैं किस तरह इन चीजों पर कमेंट करूं. आप के लिए कमेंट करना आसान है मेरे लिए नहीं है. जब तक हमें सबूत नहीं मिलेंगे.

 

दिबांग- आप का कहना है कि ये झूठे हैं.

जवाब अब्दुल बासित- नहीं मैं ये भी नहीं कह रहा. मैं ये कह रहा हूं कि मेरे लिए कमेंट करना मुनासिब नहीं है. मैं चाहता हूं कि इस किस्म की वाकई बात है तो हमसे इन्फॉरमेशन शेयर की जाए. फिर हमें देखिए किस तरह हम रिएक्ट करते हैं. आप पहले से ही हमें मुजरिम करार दे देते हैं. ये मुनासिब नहीं है. अब हमें इस तरीके की कुटनीति से भी बाहर निकलना होगा.

दिबांग- ये बात तो मानेंगे कि बेशक इनके पते ना दिए गए हों लेकिन आए वहीं से हैं.

जवाब अब्दुल बासित- मैं कुछ नहीं कर सकता.

 

रैपिड फायर राउंड

दिबांग- इस राउंड में मैं 5 सवाल पूछूगा और दो ऑप्शन दूंगा. आप चाहे तो सवाल छोड़ भी सकते हैं. पांच में से तीन सही जवाब देने पर आप को एक गिफ्ट मिलेगा.

 

सवाल – जब आतंकी हमले होते हैं तब फैसला कौन लेता है. आपकी आर्मी इशारा करती है या सरकार की तरफ से इशारा होता है?

जवाब अब्दुल बासित- इसको छोड़ देते हैं तो बेहतर होगा. मेरे ख्याल में सवाल मुनासिब ही नहीं है.

सवाल – आप को मौका मिला तो कौन सी फिल्म देखना चाहेंगे. फैंटम जिसमें हाफिज सईद वाली कहानी है या डीडे जो दाऊद इब्राहिम की कहानी है.

जवाब अब्दुल बासित- मैं इस किस्म की फिल्में अवाइड करता हूं. मैं कामेडी फिल्में ज्यादा देखता हूं.

सवाल- अगर आप को वापस मांगना हो तो आप किस को वापस मांगेंगे नवेद को या सज्जाद को?

जवाब अब्दुल बासित- मालूम नहीं ये कौन लोग हैं. मैं तो कहूंगा कि इनको आप अपने पास ही रखिए.

सवाल- अगर आप को भारत को सौंपना हो तो किसको खुशी से सौंपेंगे. लखवी को या हाफिज सईद को.

जवाब अब्दुल बासित- दोनों पाकिस्तानी बाशिंदे है तो सौंपने का सवाल ही नहीं पैदा होता. लखवी के खिलाफ तो मुकदमा भी चल रहा है तो सौंपने का सवाल ही नहीं उठता है.

सवाल – हां या ना में जवाब दीजिएगा. क्या पाकिस्तान कभी PoK को भारत को वापस देगा?

जवाब अब्दुल बासित- ये मसला ना आप के लिए है ना मेरे लिए. इसका फैसला तो कश्मीरी आवाम करेगी. जो वहां की आवाम फैसला करेगी वह पाकिस्तान को मंजूर होगा.

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Web Title: Pakistan High Commissioner Abdul Basit
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