म्यांमार ऑपरेशन: पारा कमांडो की असाधारण बहादुरी ने दिलाई सफलता

By: | Last Updated: Wednesday, 10 June 2015 9:13 AM
parachute regiment

नई दिल्ली: भारतीय सेना के पारा कमांडो चर्चा में हैं, म्यांमार की सीमा में घुसकर उस आतंकी संगठन के कैंपों को ध्वस्त करने और आतंकियों को मार गिराने के कारण, जिस आतंकी संगठन ने इसी चार जून को एक बड़ी वारदात को अंजाम दिया था और जिसमे भारतीय सेना के 18 जवान शहीद हुए थे.

 

भारत की तरफ से इसके जरिये बड़ा संकेत दिया गया है कि सीमा पार से आतंकी घटनाओं को अंजाम देने वालों की खैर नहीं. भारतीय सेना ऐसे संगठनों के ठिकानों को ध्वस्त करने के लिए सीमा पार जाकर भी ऑपरेशन कर सकती है.

 

मंगलवार के ऑपरेशन की वजह से भारतीय सेना के पारा कमांडो की तारीफ देश और दुनिया में हो रही है. लेकिन ऐसा नहीं है कि इन पारा कमांडो ने पहली बार ऐसी किसी बहादुरी का परिचय दिया है. आजादी के बाद से हुई तमाम लड़ाइयों ने पारा कमांडो ने जबरदस्त साहस और बहादुरी का परिचय दिया है.

 

यही नहीं, शांतिकाल में भी इनकी भूमिका काफी सराहनीय रही है. दरअसल पारा कमांडो, भारतीय सेना की उस खास पाराशूट रेजिमेंट के बहादुर जवानों को कहा जाता है, जो अपनी कड़ी मेहनत और प्रशिक्षण की वजह से असाधारण किस्म के ऑपरेशंस को अंजाम देते हैं.

 

भारत में पाराशूट रेजिमेंट का इतिहास देश की आजादी के छह वर्ष पहले से शुरु होता है. 1941 में दिल्ली में 50वीं इंडियन पाराशूट ब्रिगेड का गठन हुआ. द्वितीय विश्वयुद के दौरान तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने दो और ब्रिगेड खड़े किये, 77पारा और 14पारा के नाम से और इन तीनों को मिलाकर 44वां इंडियन एयरबौर्न डिविजन खड़ा किया गया. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस डिविजन के जवानों ने असाधारण वीरता का परिचय दिया.

 

1947 में जब देश का विभाजन हुआ, तो सेना का पुनर्गठन भी हुआ. 44वें एयरबौर्न डिविजन की दो ब्रिगेड, 50 पारा और 77पारा भारत के हिस्से आई, तो 14पारा पाकिस्तान के हिस्से. विभाजन के समय ब्रिगेडियर उस्मान 77पारा के कमांडर थे.

 

चूंकि वो मुस्लिम अधिकारी थे, इसलिए पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना से लेकर तमाम नेताओं और पाकस्तानी अधिकारियों ने उनसे पाकिस्तान के साथ जुड़ने के लिए कहा, लेकिन उस्मान ने भारत और भारत की सेना की सेवा करना मुनासिब समझा और 77पारा ब्रिगेड के कमांडर के तौर पर वो भारतीय सेना का हिस्सा बन गये.

 

विभाजन के समय ही उस्मान और उनकी पारा ब्रिगेड की सेवा की आवश्यकता आन पड़ी. उपद्रवियों पर काबू पाने और नागरिकों को एक-तरफ से दूसरी तरफ सुरक्षित ले जाने के लिए पारा ब्रिगेड का खूब इस्तेमाल हुआ और ब्रिगेडियर उस्मान की अगुआई में पारा ब्रिगेड के जवानों ने अपने कर्तव्यों का खूब निर्वाह किया और शांति बहाली के काम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

 

15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी मिली और इसके कुछ ही महीनों बाद पारा ब्रिगेड की सेवाओं की आवश्यकता फिर से आन पड़ी. अक्टूबर में ही कश्मीर को लेकर भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध छुड़ गया. आजादी के बाद की इस पहली लड़ाई में 50 पाराशूट ब्रिगेड ने जबरदस्त कामयाबी हासिल की.

 

हालांकि जब लड़ाई की शुरुआत हुई, तो इस ब्रिगेड के कमांडर थे ब्रिगेडियर वाई एस परांजपे. लेकिन लड़ाई के दौरान ही जब वो घायल गो गये, तो 50पारा ब्रिगेड की कमान ब्रिगेडियर उस्मान को सौंपी गई, जो तब तक 77पारा ब्रिगेड कमांडर के तौर पर अमृतसर में थे.

 

पारा ब्रिगेड की कमान संभालने के साथ ही ब्रिगेडियर उस्मान ने पाकिस्तानी सेना और घुसपैठियों के सामने जबरदस्त लड़ाई लड़ी. हालात ये बने कि पाकिस्तानी उनका सर काट कर लाने वाले को बड़ा इनाम देने की घोषणा करने लगे. इसी लड़ाई में ब्रिगेडियर उस्मान ने अपनी शहादत भी दी.

 

भारत सरकार ने उनकी बहादुरी और अदम्य साहस का सम्मान करते हुए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया. पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ ब्रिगेडियर उस्मान का अंतिम संस्कार हुआ. दरअसल 1947-48 के इस पहले भारत-पाक युद्ध में भारत की तरफ से शहादत देने वाले ब्रिगेडियर उस्मान भारतीय सेना के सबसे उच्च अधिकारी थे.

ब्रिगेडियर उस्मान की अगुआई में पहले भारत-पाकिस्तान युद्ध में पाराशूट ब्रिगेड के जवानों ने बहादुरी और विजय का जो सिलसिला शुरु किया, वो आगे की भी तमाम लड़ाइयों में जारी रहा. इसका प्रमाण बड़ी तादाद में पाराशूट रेजिमेंट को हासिल होने वाले सैन्य सम्मान हैं.

 

पाराशूट रेजिमेंट 15 अप्रैल 1952 को अस्तित्व में आया. 50 पारा ब्रिगेड के तीनों बटालियनों के साथ इस रेजिमेंट की शुरुआत हुई थी. आज इस रेजिमेंट के अंदर दस पारा बटालियन हैं, जिसमें से सात पारा स्पेशल फोर्सेज की बटालियन हैं.

 

पाराशूट रेजिमेंट के अंदर पारा स्पेशल बटालियन उन उत्कृष्ट सैनिकों की बटालियन हैं, जिन्हें अतिरिक्त प्रशिक्षण देकर भारत की सबसे विशिष्ट सैन्य टुकड़ी बनाया जाता है, जिनके फन का लोहा म्यांमार सीमा के अंदर घुसकर हाल में किये गये ऑपरेशन की वजह से भारत और दुनिया ने माना है.

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