DEPTH INFORMATION: बदलेगा देश का नक्शा !

By: | Last Updated: Friday, 5 June 2015 3:23 PM
PM Modi’s Bangladesh visit

नई दिल्ली: 6 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिन के बांग्लादेश दौरे पर जा रहे हैं . इस यात्रा के दौरान ही दोनों देश एक एतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे . इसके साथ ही भारत बांग्लादेश के बीच 41 साल से चला आ रहा जमीन विवाद भी खत्म हो जाएगा . लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट के बाद भारत और बांग्लादेश की सीमाएं नक्शे पर हमेशा हमेशा के लिए बदल जाएगी और साथ ही बदल जाएगी सीमा पर रह रहे हजारों लोगों की जिंदगी.

 

भारत बांग्लादेश की सरहद पर जहां चलती थी गोलियां वहां अब जिंदगी गुलजार होगी . सीमा पर बसे जो गांव बरसों से गुमनामी में खोए थे अब उन्हें एक नई पहचान मिल जाएगी . बॉर्डर के जिन सुनसान रास्तों से नकली नोट , ड्रग्स और मवेशियों की तस्करी होती थी- अब वो रास्ता बंद हो जाएगा .

 

भारत बांग्लादेश की सीमा पर हजारों एकड़ जमीन को लेकर जो विवाद था. जमीन का वो झगड़ा भी अब खत्म हो जाएगा . क्योंकि अब बदल जाएगी सरहद की तस्वीर- और बदलेगा देश का नक्शा .

 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 6 जून को दो दिन की बांग्लादेश यात्रा पर जाने वाले हैं. इस दौरे के दौरान मोदी बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के साथ सीमा से जुड़े एक ऐतिहासिक समझौते पर करार करने वाले हैं .

 

भारत बांग्लादेश की सीमा पर चलते हुए आपको मीलों मील तक कंटीले बाड़ों का घेरा दिखेगा. दोनों देश के बीच करीब चार हजार एक सौ किलोमीटर लंबी सीमा है. जो कि दुनिया की पांचवी सबसे लंबी बाउंड्री मानी जाती है. यहां बीएसएफ के जवान बारह महीनों चौबीसो घंटे तैनात रहते हैं. क्योंकि इस खामोश सरहद से जुड़ी है जमीन के बंटवारे और विवाद की एक लंबी कहानी.

 

दरअसल भारत बांग्लादेश बॉर्डर से सटे 80 से 90 फीसदी हिस्से का सीमांकन यानी बंटवारा हो चुका है . लेकिन सीमा के बाकी हिस्सों का बंटवारा नहीं हो पाया. सीमा पर बसे कई गांव और बस्तियां को लेकर ये तय नहीं हो पाया कि वो किस देश का हिस्सा हैं. भारत की सीमा पर बसे कई इलाके ऐसे थे जिनपर बांग्लादेश अपना बताता था वहीं बांग्लादेश के भी ऐसे कई गांव और खेत-खलिहान थे जिन पर भारत अपना दावा करता आ रहा था. इस बात को लेकर सीमा कई बार हिंसक झड़पें भी हो चुकी थी. साल 2001 की घटना को कौन भूल सकता है जब सीमा पर बसे एक गांव के अधिकार को लेकर विवाद हुआ और बांग्लादेश ने बीएसएफ के 16 जवानों को बड़े ही बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया. इस घटना को लेकर भारत बांग्लादेश के बीच कई सालों तक कड़वाहट बनी रही. लेकिन इतिहास की उन खूनी और विवादों से भरी यादों को पीछे छोड़ भारत और बांग्लादेश अब रिश्तों की एक नई इबारत लिखने जा रहे हैं.

 

भारत और बांग्लादेश जिस लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट यानि भूमि सीमा समझौते पर करार करने वाले हैं, उसके तहत पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय और त्रिपुरा की सीमाएं बदल जायेंगी.

 

लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर कर भारत और बांग्लादेश ना केवल पूरे एशिया बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक उदाहरण पेश करने वाले हैं कि दो पड़ोसी देश आपसी सहयोग और सोहार्द के लिए अपनी-अपनी जमीन देने के लिए तैयार हो गए . आखिर भारत और बांग्लादेश इस ऐतिहासिक करार पर हस्ताक्षर क्यों कर रहे हैं . इस समझौते की जरूरत क्यों पड़ी- इसके लिए ये जानना जरुरी है कि भारत और बांग्लादेश के बीच सीमा विवाद आखिर है क्या और ये विवाद पैदा क्यों हुआ . 

 

हालांकि भारत और बांग्लादेश के बीच जमीन विवाद 1971 से ही चला आ रहा था जब पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश ने एक नए राष्ट्र के रुप में जन्म लिया था. लेकिन ये विवाद 1947 से ही चला आ रहा था. रेडक्लीफ लाइन खिंचने के बावजूद विवाद बना रहा. जिसके चलते कुछ इलाके भारत में होते हुए भी बांग्लादेश का हिस्सा थे, तो कमोबेश यही स्थिति बांग्लादेश की भी थी.

 

दरअसल, भारत और बांग्लादेश सीमा विवाद की तीन बड़ी वजह थी. पहला एन्कलेव  दूसरा APL यानी Adverse Possession Land  और तीसरा Undemarcated Boundary.  सबसे पहले बात एन्कलेव की .  दरअसल एन्कलेव और कुछ नहीं बल्कि सीमा पर बसे छोटे-छोटे गांव और बस्तियां हैं. इसको स्थानीय लोग छींट, चित्तमहल या फिर पाशा-एन्कलेव के नाम से भी पुकारते हैं. ये इलाके दरअसल एक आइलैंड यानी किसी द्वीप की तरह होते हैं जिनके चारों तरफ की जमीन दूसरे देश की होती है. ये इलाके भौगोलिक रूप से अपने देश से पूरी तरह से कटे रहते हैं.

 

इसको नो-मैनस लैंड (No Man’s Land) भी कहते हैं. अपने देश से कटे रहने की वजह से यहां रहने वाले लोगों की जिंदगी बेहद मुश्किल भरी होती है. एबीपी न्यूज पश्चिम बंगाल के कूच बिहार इलाके में नलग्राम नाम के एक एन्क्लेव में पहुंचा. ये  बांग्लादेश का है. लेकिन इसके चारों तरफ की जमीन भारत की है. यहां के लोगों की जिंदगी एक ही इलाके में सिमटकर रह गई है. इसमें रहने वाले लोगों की नागरिकता को लेकर हमेशा विवाद बना रहता है . उन्हें बिजली, पानी, सड़क, स्कूल और अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाएं भी मिल नहीं पाती.

 

भारत बांग्लादेश की सीमा पर छींट बना कैसे? सीमा पर जमीन के ये हिस्से कैसे छिटक कर अपने अपने देश से अलग हो गए. इसकी भी कई कहानी है . बताते हैं कि मध्यकालीन युग में बंगाल के कूच-बिहार में राज करने वाले राजाओं पर जब मुगलों ने आक्रमण किया तो कूच-बिहार के कुछ इलाकों को उन्होंने जीत लिया था. उन जीते हुए इलाकों को मुगलों ने कूच-बिहार के नजदीक ही रंगपुर स्थित अपने एक मनसबदार के हवाले कर दिया. जिसकी वजह से ये इलाके हमेशा से बदहाली का शिकार रहे हैं.  कुछ स्थानीय लोगों का ये भी मानना है कि ब्रिटिश राज में इलाके के लोगों ने अंग्रेजी हुकुमत का विरोध किया था. लोग टैक्स नहीं दिया करते थे. इसलिए ये इलाके अलग –थलग पड़ गए जिसे छींट कहा जाने लगा .

 

छींट बनने की एक कहानी ये भी है कि कूच-बिहार और रंगपुर के राजा शतरंज और ताश खेलने के शौकीन थे. खेल में वो अपने इलाके के गांव और बस्तियां दांव पर लगाते थे. इन गांवों की किस्मत का फैसला शतरंज और ताश की बाजियों से ही तय होता था. खेल में हार और जीत से फैसला होता था कि कौन से गांव किस रियासत का हिस्सा बनेंगे. इस बात का ख्याल नहीं रखा गया कि भौगोलिक रूप से वो गांव कहां स्थित है. इनमें रहने वाले लोग आज भी ऐसे दस्तावेज लिए घूमते रहते हैं जो राजाओं ने उन्हें दिए थे. कूच बिहार के फलनपुर एन्कलेव के लोगों के पास तो राजा के दिए हुए दस्तावेज अब तक मौजूद हैं.

 

भारत और बांग्लादेश के बीच होने वाले लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट से अब सबकुछ बदल जाएगा . समझौते के तहत सीमा पर मौजूद सभी एन्कलेव को उसी देश में शामिल कर दिया गया हैं जहां उनकी भौगोलिक स्थिति है. इस समझौते के बाद भारत की सरहद में बांग्लादेश के 51 एन्कलेव अब कानूनी तौर से भारत का हिस्सा हो जायेंगे. जबकि भारत के 111 एन्कलेव अब बांग्लादेश में शामिल हो जाएंगे. अब छींट में रहनेवाले लोगों को अपने-अपने देश की नागरिकता और बुनियादी सुविधाएं भी मिल जाएगी. इस एतिहासिक समझौते की खबर मिलने से लोग बेहद खुश है और वो उन्हें अब एक बेहतर जिंदगी की उम्मीद दिखाई दे रही है .

 

नए समझौते के तहत भारत जिन 111 एन्कलेव को बांग्लादेश को सौंपनेवाला है वो करीब 17 हजार एकड़ जमीन है . जबकि बांग्लादेश 7 हजार एकड़ की जमीन पर बसे 51 एन्क्लेव भारत को देगा .

 

भारत और बांग्लादेश की सीमा पर Adverse Possession Land  भी विवाद की एक बड़ी वजह है. ये वो इलाके हैं जो बांग्लादेश के कब्जे में हैं और भारत उनपर अपना दावा करता है. पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी का खुदीपाड़ा इलाका भी उन्हीं में एक है. कानूनी तौर पर ये इलाका भारतीय सीमा में है लेकिन बांग्लादेश इस पर अपना दावा जताता रहा है. इस विवाद  की वजह से खुदीपाड़ा इलाके का विकास हमेशा अधर में लटका रहा.

 

एबीपी न्यूज जब खुदीपाड़ा गांव पहुंचा तो वहां के लोग पिछले 68 सालों से उपेक्षा का शिकार हो चुकी अपनी जिंदगी की कहानी सुनाने लगे. उन्होने बताया कि कैसे बांग्लादेश की सिक्योरिटी फोर्स, बॉर्डर गार्ड्स बांग्लादेश यानी बीजीबी उन्हें परेशान करती है. यहां तक कि उन्होंने गांव में बिजली की लाइन तक जाने नहीं दिया. कुछ दिनों पहले ही स्थानीय सांसद ने गांव में सोलर बिजली का प्रबंध करने की कोशिश की है लेकिन गांव तक पहुंचने के लिए अबतक पक्की सड़क तक नहीं बनी है .

 

भारत बांग्लादेश की चार हजार एक सौ किलोमीटर लंबी सीमा पर चलते चलते हम असम के डूबरी जिले के बोराईबारी गांव पहुंचे . बोराईबारी गांव को लेकर भारत बांग्लादेश के बीच लंबे समय तनाव रहा . दरअसल विभाजन के बाद बोराईबारी के इस इलाके को भारत में शामिल होने की घोषणा की गई थी लेकिन इसपर पहले पाकिस्तान का कब्जा रहा और बाद में बांग्लादेश का. इस सीमा पर कई बार हिंसक झड़पें हो चुकी हैं. साल 2001 में इस इलाके में पेट्रोलिंग कर रहे बीएसएफ के 16 जवानों को बांग्लादेश ने बेरहमी से मार डाला था. लेकिन नए लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट के तहत अब ये इलाका हमेशा-हमेशा के लिए बांग्लादेश का हो जायेगा. भारत का दावा इस इलाके पर खत्म हो गया है.

 

असम-मेघालय की सीमा पर बसा इलाका भारत-बांग्लादेश सीमा की आखिरी बस्ती है. डूबरी से बोराईबरी पहुंचने तक के लिए कोई सड़क मार्ग नहीं है. यहां तक पहुंचने के लिए डेढ़ घंटे तक बह्मपुत्र नदी में एक बोट पर सफर करना पड़ता है. उसके बाद सड़क के रास्ते एक घंटे के सफर के बाद ही इस इलाके तक आएंगे. यहां बॉर्डर की फेंसिंग पर लगे गेट को पार करने के बाद बीएसएफ के जवानों के साथ एबीपी न्यूज बोराईबारी पहुंचा. सरहद पर लगे बॉर्डर-पिलर से ये पता चल रहा था कि ये ग्राउंड-जीरो है.  बोराईबारी में बांग्लादेश की बॉर्डर-पोस्ट भी साफ दिखाई पड़ती है. बॉर्डर पीलर के दूसरे तरफ बांग्लादेश की सीमा पर कई किसान काम कर रहे थे. लेकिन उनके जानवर भारत की सीमा में चर रहे थे. बांग्लादेश के ज्यादातर किसान और मजदूर बांग्ला में बात कर रहे थे और वहां हिंदी बोलने समझने वाले लोग भी थे. हैरानी की बात ये थी कि उन्हें अबतक नहीं पता नहीं था कि उनका गांव अब हमेशा हमेशा के लिए बांग्लादेश का हिस्सा हो जाएगा . हलांकि उन्हें इस बात की खबर थी कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जल्द ही बांग्लादेश की राजधानी ढाका जाने वाले हैं.

 

नए लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट के तहत असम के बोराईबारी के अलावा करीमगंज का पलाथल इलाका भी अब बांग्लादेश का हिस्सा हो जायेगा. इसी तरह पश्चिम बंगाल के नाडिया जिले का बाऊसमारी . मधुगिरी, जलपाईगुड़ी का बेरुबाड़ी और अंधरकोटा भी बांग्लादेश को दे दिया गया है . मेघालय का लोबाचेरा ननचेरा भी अब बांग्लादेश के नक्शे का हिस्सा होगा .  कुल मिलाकर  APL यानी Adverse Possession land  की करीब 2268 एकड़ की जमीन नए समझौते के तहत बांग्लादेश में चली जायेगी.  वहीं बांग्लादेश के एपीएल इलाके की करीब 2777 एकड़ जमीन भारत को मिल जायेगी .  इस नए करार के तहत जो नए इलाके भारत को मिल जाएंगे वो हैं-

 

पश्चिम बंगाल में जलपाईगुड़ी का खुदीपाड़ा और बेरुबारी इलाका . नाडिया का पकुरिया . चर-महिषकुंडी और हरीपाल .  इसके अलावा मेघालय में बांग्लादेश के जो एपीएल भारत में शामिल हो जाएंगे वे हैं पिरदिवा, लंईगखट, दावकी और नलजुरी . त्रिपुरा का चांदनगर-मौलवी बाजार इलाका भी अब भारत का हिस्सा हो जायेगा.

 

वो प्रतिकूल या फिर बदनसीब इलाके जो दूसरे देश के कब्जे में गैरकानूनी रुप से हैं. यानि इस समझौते से किसी भी आदमी को अपना घर या फिर जमीन छोड़कर जाने की जरुरत नहीं पड़ेगी, जैसा कि अमूमन बंटवारे या फिर सीमा विवाद को सुलझाने के लिए किया जाता है.

 

एन्कलेव और ADVERSE POSSESSIONS LAND के अलावा भारत और बांग्लादेश सीमा का एक बड़ा हिस्सा अभी भी विवादित है. जिसकी वजह से बॉर्डर का सीमांकन नहीं हो पाया.  नतीजा ये हुआ कि भारत यूडी- जमीन पर कभी घेराबंदी नहीं कर पाया. और इसलिए बिना फैंसिंग वाले इन इलाकों में बांग्लादेश से घुसपैठ, स्मैगलिंग और पशुओं की तस्करी पर लगाम लगाना बीएसएफ के लिए एक बड़ी चुनौती रहा है . उन्हें ये पता ही नहीं चल पाता था कि ये जमीन भारत की है या बांग्लादेश की.

 

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी इलाके का दईखाता भी असीमांकित वाला इलाका है. इस बॉर्डर का भी सीमांकन नहीं हो पाया है. जिला मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर दूर इस इलाके तक पहुंचने के लिए एक कमजोर से पुल को पैदल पार कर पहुंचना पड़ता है. पुल के दूसरी तरफ बीएसएफ की एक चौकी है. और एक छोटा सा गांव हैं . गांव और सीमा चौकी से कुछ दूर चलने पर ही बॉर्डर शुरू हो जाता है. यहां बीएसएफ के जवान पैदल या फिर साईकिल पर सीमा की रखवाली कर रहे हैं. सीमा पर लगी फैंसिग एक जगह जाकर खत्म हो जाती है . सीमा पर दोनों देशों की बॉर्डर गार्डिंग फोर्स को किसी प्रकार की कोई दिक्कत ना हो इसके लिए बीएसएफ ने कुछ इलाकों की मार्किंग करने के लिए बांस पर सफेद कपड़ा या बोरी बांध रखी है . इससे जवानों को ये पता रहता है कि कौन सी जमीन किस देश की है. यहां बीएसएफ की गाड़ी और जवानों को आते देख देख बांग्लादेशी किसान अपने मवेशियों को लेकर भागने लगते हैं. उन्हें शायद ये लगा कि उनके जानवर भारत की सीमा पर चर रहे थे और उन्हें पकड़ने के लिए ही बीएसएफ की टीम वहां पहुंची है. लेकिन बीएसएफ के अधिकारी उनकी इस शंका को दूर कर देते हैं . भारत बांग्लादेश के बीच हुए नए समझौते के बाद ये स्थिति बदल जायेगी. यहां भी दूसरे जगहों की तरह बाकयदा बॉर्डर-पिलर्स लगा दिए जाएंगे.  इसके बाद यहां भी फैंसिंग हो जायेगी और बांग्लादेश के लोग और मवेशी भारत की सीमा को पार नहीं कर सकेंगे.

 

नए समझौते के लागू होने से भारत बांग्लादेश सीमा पार से हो रही गैरकानूनी घुसपैठ, नकली नोटों और ड्रग्स की तस्करी पर लगाम लगाया जा सकता है. साथ ही इलाके में बड़ी तादाद में हो रही पशुओं की तस्करी भी रुक जायेगी. तस्करी को रोकने के लिए यहां कई बार बीएसएफ को गोलियां चलानी पड़ी है. कई दफा तस्करों ने बीएसएफ के जवानों पर भी हमला किया है .

 

बांग्लादेश के साथ एतिहासिक लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट के बाद दोनों देश के बीच सीमा विवाद पूरी तरह सुलझ जाएगा . दरअसल 1947 में भारत और पाकिस्तान विभाजन के बाद दोनों देशों के बीच में रेडक्लीफ लाइन खींच दी गई. लेकिन इस बंटवारे में काफी वक्त लग गया. जिसके चलते कई इलाके विवादित रह गए. इस विवाद को निपटाने के लिए दोनों देशों के बीच में 1958 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री फिरोज खान नून के बीच समझौता हुआ. जिसे नेहरू नून समझौता कहा जाता है . इस समझौते के तहत पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी इलाके के बेरुबारी गांव की आधी जमीन पाकिस्तान को दे दी गई. लेकिन इससे पहले की इस समझौता पर अमल हो पाता इसके खिलाफ मामला अदालत में चला गया. 1971 में बांग्लादेश बना . इसके बाद 1974 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और बांग्लादेश के राष्ट्रपति शेख मुजीबुर्रहमान के कार्यकाल में एक समझौता हुआ . इस समझौते के तहत बांग्लादेश के दो एन्कलेव जो अपने देश से कटे हुए थे और भारत की सीमा में थे, उन्हें जोड़ने के लिए भारत ने तीन बीघा जमीन बांग्लादेश को दे दी. इस जमीन पर एक 178X85 वर्ग मीटर (कुल तीन बीघा) का कॉरिडोर बनाया गया. जो बांग्लादेश के दोनों एन्कलेव अंग्रारपोट और दाहग्राम को बांग्लादेश से जोड़ता था. ये समझौता 1992 में लागू हुआ. इसके लिए दुनियाभर में भारत की सराहना की गई थी. ये कॉरिडोर दोनों देशों की दोस्ती और सहयोग का प्रतीक है.

 

साल 2011 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ढाका यात्रा के दौरान ये तय किया गया कि सीमा पर बसे जितने भी विवादित इलाके हैं वहां रहने वाले लोगों की राय पूछी जाएगी कि वो किस देश में रहना चाहते हैं. उसके आधार पर इन इलाकों का बंटवारा किया जायेगा. दोनों देशों के सरकारी अधिकारियों ने घर-घर जाकर सर्वे किया और उसके बाद लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट तैयार किया गया. इस समझौते को संसद से मंजूरी मिल चुकी है . और अब  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ढाका यात्रा के दौरान दोनों देश इस समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे .

 

बांग्लादेश के लोग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ढाका यात्रा का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. लोग सीमा विवाद खत्म होने के बाद दोनो देशों के बीच तीस्ता नदी पानी बंटवारे विवाद को भी जल्द खत्म होने की उम्मीद लगा रहे हैं.

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