प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को क्यों भाए बुद्ध?

By: | Last Updated: Monday, 4 May 2015 4:36 PM
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नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज दिल्ली में बुद्ध पूर्णिमा के मौके पर एक बड़े कार्यक्रम में शिरकत की. मोदी का ये कदम उनकी सरकार के उस एजेंडे से जोड़कर देखा जा रहा है जिसके जरिए वो एशिया में भारत को सबसे बड़े बौद्ध केंद्र के तौर पर प्रचारित करना चाहते हैं. ये उनकी विदेश नीति का भी हिस्सा है और पर्यटन के जरिए देश की आमदनी बढ़ाने का भी.

 

बुद्धम शरणम गच्छामि

 

मोदी आज भगवान बुद्ध की शरण में पहुंचे. मौका भी बेहद खास था और कार्यक्रम इतना बड़ा कि इसमें शामिल होने के लिए 31 देशों के प्रतिनिधि मौजूद थे. बौद्ध धर्म के मानने वालों से भरा था दिल्ली का तालकटोरा स्टेडियम और मौका था बुद्ध पूर्णिमा पर भगवान बुद्ध को याद करने के लिए अतंर्राष्ट्रीय बुद्ध पूर्णिमा दिवस समारोह का. इस कार्यक्रम के आयोजन के लिए सरकार ने गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू की अगुवाई में बाक़ायदा आयोजन समिति का गठन किया था.

 

ये मौका इसलिए खास माना गया कि क्योंकि अब तक सिर्फ दो बार ही सरकार के स्तर पर ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं. सबसे पहले जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने 2500वीं बुद्ध जयंती पर बोधगया में बड़े सरकारी कार्यक्रम का आयोजन किया था. उसके बाद कुशीनगर में 2007 में महात्मा बुद्ध के 2550वें परिनिर्वाण दिवस पर सरकार ने कार्यक्रम का आयोजन किया था.

 

8 साल बाद अब मोदी भी भगवान बुद्ध की शरण में आ गए हैं तो क्यों? आखिर मोदी सरकार का इतने बड़े स्तर पर बुद्ध पूर्णिमा कार्यक्रम के आयोजन का मकसद क्या है और मोदी अपनी जड़ों का नाता बुद्ध से जोड़कर क्यों पेश कर रहे हैं.

 

मोदी ने अपने जन्मस्थान से बौद्ध धर्म के नाते की कहानी दरअसल एक बड़े मकसद से सामने रखी है. इस मकसद को जानने के लिए आपको बताते हैं 9 साल पहले चीन के हांग्जोउ में हुए एक कार्यक्रम के बारे में.

 

चीन के प्रधानमंत्री शी जिनपिंग तब प्रधानमंत्री नहीं थे. लेकिन बौद्ध धर्म को मानने वाले शी जिनपिंग ने एक बड़ी योजना चीन के सामने रख दी थी. चीन को बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा केंद बनाकर पेश करने की योजना.

 

ये सिलसिला चल पड़ा. साल 2009 में और फिर साल 2012 में चीन ने वर्ल्ड बुद्धिस्ट फोरम का आयोजन जारी रखा.

 

असर ये हुआ की दुनिया की नजर में चीन को बौद्ध धर्म के सबसे अहम केंद्र के तौर पर प्रचार मिलना शुरू हो गया. भारत पिछड़ने लगा जहां ढाई हजार साल पहले भगवान बुद्ध ने ना सिर्फ ज्ञान प्राप्त किया था बल्कि बौद्ध धर्म की नींव भी रखी थी. चीन की इस हलचल से भारत सरकार जागी और उसने भी आयोजन शुरू किए.

 

मोदी ने आज जिस कार्यक्रम में शिरकत की है वैसा ही एक कार्यक्रम करने की कोशिश साल 2011 में यूपीए सरकार ने की थी. यही नहीं म्यांमार में बौद्ध दर्शन की पढ़ाई करने वालों के सबसे बड़ा सम्मेलन भी भारत की मदद से ही हुआ लेकिन जैसी चर्चा आज के मोदी के कार्यक्रम को मिल रही है वैसी तब नहीं मिल पाई.

 

दरअसल मोदी ने सत्ता संभालते ही चीन की इस कोशिश का जवाब तलाशने की कोशिश शुरू कर दी थी. वो भारत को बौद्ध धर्म के सबसे बड़े केंद्र के तौर पर पेश करना चाहते थे. इसलिए अपने पहले दौरे के लिए उन्होंने भूटान को चुना. और दक्षिण एशिया से बाहर पहले दौरे के लिए जापान को.

 

जापान में मोदी राजधानी टोकियो की बजाए क्योटो जैसे बौद्ध शहर में ही पहुंचे और वहां के तोजी मंदिर में दर्शन करके दोनों देशों की साझा बौद्ध विरासत को चर्चा में ला दिया.

 

यही नहीं जब शी जिनपिंग जब भारत दौरे पर आए थे तो मोदी ने अहमदाबाद में उनके स्वागत के बाद एक बार फिर बौद्ध धर्म को अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की एजेंडे में लाने की कोशिश की. और अब मोदी इसी महीने चीन जा रहे हैं. तब भी नरेंद्र मोदी अपनी चीन यात्रा की शुरुआत जियान शहर के ऐतिहासिक पैगोडा का दर्शन कर करेंगे. जियान शहर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का अपना शहर है. जियान में मौजूदा ये ऐतिहासिक पैगोडा प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु व यात्री ह्वेन त्सांग की याद में निर्मित हुआ है. ह्वेन त्सांग को भारत में हुएन सांग के तौर पर भी जाना जाता है. उसने अपनी यात्रा 29 वर्ष की अवस्था में 629 ई. में प्रारम्भ की थी.

 

इससे मोदी और उनकी सरकार को क्या हासिल होगा. इसके लिए आपको अंतराष्ट्रीय पर्यटन का नक्शा समझना होगा. दरअसल एशिया की बात करें तो हिंदू, मुस्लिम बौद्ध और ईसाई ये चार धर्मों के अनुयायी अपने धर्मों की जड़ें तलाशने के लिए सैलानी बन जाते हैं. हिंदुओं के बाद मुस्लिम और ईसाई धर्म के लोगों के लिए भारत के पास भले ही कुछ ना हो लेकिन बौद्ध धर्म से जुड़ी अहम विरासतें भारत की जमीन पर मौजूद हैं.

 

भारत का बौद्ध धर्म से जुड़ाव यानी बौद्ध टूरिज्म सर्किट कैसा है. बोधगया जहां भगवान बुद्ध को ज्ञान मिला. सारनाथ जहां उन्होंने पहली शिक्षा दी. राजगीर जहां वो रहे और भिक्षाटन करते रहे. नालंदा जहां बौद्ध साहित्य का भंडार था. कुशीनगर जहां उन्होंने अपना आखिरी वक्त बिताये. कपिलवस्तु जहां भगवान बुद्ध ने बचपन बिताया. वैशाली जहां उन्होंने अपना आखिरी प्रवचन दिया. श्रावस्ती जहां उन्होंने 24 बरस बिताए थे.

 

ऐसी 10 अहम जगहों पर मोदी सरकार अब दुनिया भर के बौद्ध सैलानियों को बुलाना चाहती है और इसके लिए बाकायदा बजट के जरिए 500 करोड़ रुपये भी दिए गए हैं. मोदी अपनी इस अहम योजना को परवान चढ़ाने के लिए निजी साझेदारी को भी न्योता दे रहे हैं. इसके बाद मोदी फेज टू भी शुरू करेंगे जिसमें 17 राज्यों के बौद्ध स्मारकों को जोड़ा जाएगा.

 

अब आप सोच रहे होंगे कि पर्यटन विभाग के इस काम को मोदी ने अपने कंधों पर क्यों ले लिया है? तो आपको कुछ आंकड़े दिखाते हैं. चीन में साल 2013 के मुकाबले साल 2014 में सैलानियों से होने वाली कमाई में 14 फीसदी से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है. दूसरी तरफ भारत में साल 2010 से 2015 के बीच सैलानियों से होने वाली कमाई में सिर्फ 8 फीसदी का इजाफा होने का अनुमान है. यानी चीन के मुकाबले आधी कमाई.

 

दक्षिणी एशिया के दोनों देश यानी भारत और चीन के बीच बड़ी ताकत बनने की होड़ में इस मोर्चे पर भारत पीछे दिख रहा है. और बौद्ध टूरिस्टों के जरिए भारत ये लड़ाई जीतना चाहता है. लेकिन बौद्ध सैलानी ही क्यों?

 

एक और आंकड़ा भी देखिए. अगर दूसरे देशों की बात करें तो बौद्द सैलानियों के मामले में भारत बेहद पिछड़ा नजर आता है. बौद्ध स्मारकों पर जाने वाले सैलानियों में सबसे ज्यादा . थाईलैंड यानी 33 फीसदी, नेपाल और चीन में 13 – 13 फीसदी, जापान में 10 फीसदी और कंबोडिया में 7 फीसदी लोग पहुंचते हैं. भारत में आंकड़ा इससे भी कम है.

 

पिछले साल के आंकडों के मुताबिक करीब 10 करोड़ चीनी सैलानी दुनिया भर के देशों में गए थे. दरअसल चीन में आमदनी बढ़ी है और वो ज्यादा पैसा खर्च कर रहे हैं. दूसरी तरफ बौद्ध सैलानी भी भारत का रुख कम करते हैं. बौद्ध धर्म मानने वाले चीनी सैलानियों को लुभाने की कोशिश इसी का नतीजा है.

 

मोदी सरकार को सिर्फ सैलानी ही नहीं चाहिए उन्हें एशिया के उन देशों से भी रिश्तों का नया दौर शुरू करना है जहां की सबसे ज्यादा आबादी बौद्ध धर्म को मानती है.

 

जापान

भूटान

बांग्लादेश

म्यांमार

श्रीलंका

और थाईलैंड

 

जैसे देश नरेंद्र मोदी की लुक ईस्ट नीति का हिस्सा हैं. साझा सांस्कृतिक विरासत की डोर से बंधी मोदी की अब तक की विदेश नीति भी इशारा करती है कि उन देशों से रिश्ता बनाना है तो बौद्ध धर्म जैसी साझा विरासत की बात तो करनी ही पड़ेगी.

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