क्या साहित्य अकादमी में राजनीति हो रही है?

By: | Last Updated: Monday, 12 October 2015 3:54 PM
politics on Sahitya Akademi awards

नई दिल्ली: एक के बाद एक लेखकों के पुरस्कार लौटाने के बाद से साहित्य अकादेमी विवादों में है. अब तक 13 साहित्यकार पुरस्कार लौटा चुके है. अब सवाल ये उठने लगे हैं कि क्या साहित्य अकादेमी में इस्तीफों के पीछे राजनीति है?

 

1986 में अंग्रेजी के उपन्यास रिच लाइक अस उपन्यास के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने वाली और देश के पहले पीएम जवाहर लाल नहेरू की भांजी नयनतारा सहगल ने साहित्य अकादेमी का अवॉर्ड लौटाकर सुर्खियों बनाईं. इनसे पहले साल 2010 में अपने लघु उपन्यास मोहन दास पर मिले साहित्य अकादेमी पुरस्कार को लौटा उदय प्रकाश ने विरोध की शुरूआत की थी. अब उनके पीछे कई और लेखक भी आ खड़े हुए हैं.

 

सरकार में मौजूद नेता इस विरोध को सही नहीं मानते. देश में साहित्य को लेकर दिया जाने वाला सबसे बड़ा सरकारी पुरस्कार है साहित्य अकादेमी अवॉर्ड. साहित्य अकादेमी का उद्घाटन साल 1954 में किया गया और साल 1955 से  साहित्य अकादमी भारतीय लेखकों को सम्मानित कर रही है.

 

साहित्य अकादेमी की परिभाषा के मुताबिक ‘भारतीय साहित्य के सक्रिय विकास के लिए काम करने वाली राष्ट्रीय संस्था है. जिसका मकसद उच्च साहित्यिक मानदंड स्थापित करना और भारतीय भाषाओं में साहित्य गतिविधियों का समन्वय और पोषण करना है. साहित्य अकादेमी का मकसद साहित्यिक गतिविधियों के माध्यम से देश की सांस्कृतिक एकता को आगे बढ़ाना होगा.’

 

सबसे सरल शब्दों में कहें तो साहित्य अकादेमी साहित्यिक हिंदी और अंग्रेजी समेत देश की 24 भाषाओं के साहित्य को आगे बढ़ाने का काम करती है. इस काम में किताबें छापना, साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित करना भी शामिल है. साहित्य अकादेमी अपनी जिम्मेदारियों में पढ़ने की आदत को प्रोत्साहित करना भी मानती है.

 

अकादेमी ने अब तक 6000 से ज़्यादा पुस्तकें प्रकाशित की हैं, अकादेमी हर 19 घंटे में एक पुस्तक का प्रकाशन कर रही है. प्रत्येक वर्ष अकादेमी क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्‍ट्रीय स्तर की कम से कम 50 संगोष्ठियों का आयोजन करती है. कार्यशालाओं और साहित्यिक सभाओं की संख्या प्रतिवर्ष लगभग 300 है.

 

साल 1954 में बनी साहित्य अकादेमी हर साल भारत की 24 भाषाओं में प्रकाशित सर्वोत्तम किताब के लिए पुरस्कार देती है. 1955 में पहला पुरस्कार माखनलाल चतुर्वेदी के कविता संग्रह हिमतरंगिनी को दिया गया था. पुरस्कार के साथ उन्हें 5000 की राशि मिली थी जो अब 2015 में एक लाख रुपये है.

 

1955 में 5000 रुपये

1983 में 10000 रुपये

1983खूंटियों पर टंगे लोग (कविता–संग्रह)*सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

1988 में ये रकम 25000 रुपये

1988अरण्या (कविता–संग्रह)नरेश मेहता

2001 में पुरस्कार राशि 40000

2001कलि–कथा : वाया बाइपास (उपन्यास)अलका सरावगी

 

2003 में ये राशि 50000

2003कितने पाकिस्तान (उपन्यास)कमलेश्वर

और 2010 से ये राशि एक लाख रूपये

2010मोहन दास (लघु उपन्यास)उदय प्रकाश

 

साहित्य अकादेमी पुरस्कार दिए जाते वक्त उस किताब या कृति का भाषा तथा साहित्य में योगदान देखा जाता है. कविता, कहानी या उपन्यास या फिर आलोचना की किताब पर विचार होता है. अनुवाद पर, संकलन या टीका पर नहीं.

परीक्षा के लिए तैयार शोधकार्य पर विचार नहीं होता. या फिर पहले पुरस्कार पाए लेखक की किताब पर विचार नहीं होता

साल के शुरू में साहित्यिक संस्थाओं से नाम मांगे जाते हैं. इन नामों की छंटनी परामर्श मंडल करता है. फिर हर भाषा के लिए बनी चयन समिति इनमें से एक कृति को चुनती है.

 

पिछले 60 सालों में साहित्य अकादेमी ने 24 भाषाओं में करीब साढ़े ग्यारह सौ से ज्यादा लेखकों को अवॉर्ड दिया है. इन्हीं मे से एक हैं पंजाबी लेखक गुरबचन सिंह भुल्लर. भुल्लर को साल 2005 में अगनी कलस कहानी संग्रह के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला था. भुल्लर ने ये अवॉर्ड अब लौटा दिया है.

 

नयनतारा ही नहीं बल्कि 1994 में अपने कविता संग्रह कहीं नहीं वहीं के लिए पुरस्कार से सम्मानित अशोक वाजपेयी भी अपना पुरस्कार वापिस कर चुके हैं.

1994 कहीं नहीं वहीं (कविता–संग्रह)अशोक वाजपेयी

साल 2002 में अपने कविता संग्रह दो पंक्तियों के बीच के लिए राजेश  जोशी को साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला था. अब राजेश जोशी भी विरोध के स्वर मुखर किए हुए हैं.

 

2002 दो पंक्तियों के बीच (कविता–संग्रह)राजेश जोशी

इसी तरह साल 2000 में कविता संग्रह हम जो देखते हैं के लिए मंगलेश डबराल को साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला था. अब वो भी पुरस्कार लौटा चुके हैं.

 

दरअसल साहित्यकारों का दर्द ये है कि लेखक कर्नाटक के चिंतक एमएम कलबुर्गी की हत्या और फिर अभिव्यक्ति की आजादी के खिलाफ बनने माहौल के खिलाफ साहित्य अकादेमी आवाज बुलंद नहीं कर पा रहा है.

 

साहित्य आकादेमी अध्यक्ष ने विरोध के इन तौर-तरीकों की आलोचना की है. साहित्य अकादेमी ने कार्यकारी मंडल की आपातकालीन बैठक बुलाई है. जिसमें इस मुद्दे पर विचार किया जाएगा.

 

हालांकि कुछ साहित्यकार इसे सरकार बदलने के बाद बदली हुई राजनीति से पैदा हुआ हालात बता रहे हैं. लेकिन इन सबसे बीच दांव पर लगी हुई है देश के साहित्य की सबसे बड़ी संस्था साहित्य अकादेमी की साख. सवाल ये है कि क्या ये साख राजनीति की भेंट चढ़ रही है?

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