विश्लेषण: यूपी में नेताओं की राजनीति की लाठी बन गया है गन्ना

politics on Sugarcane in up

उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनावों की आहट के साथ ही गन्ने को लेकर राजनीति एक बार फिर शुरु गयी है . दरअसल किसान गुस्से में हैं . उनकी अगुवाई कर रहे हैं भारतीय किसान यूनियन के राकेश टिकैत . महेन्द्र सिंह टिकैत के बेटे जिनके समय में हाई वे पर खाट बिछा दी जाती थी और खेतों में गन्ना आग के हवाले कर दिया जाता था . किसानों का कहना है कि यूपी सरकार ने लगातार तीसरे साल भी गन्ने का दाम नहीं बढ़ाया है . इसके आलावा किसानों का चीनी मिल मालिकों पर करोड़ों रुपए बकाया है जिनकी वसूली के लिए न तो केन्द्र और न ही राज्य सरकार ही गंभीरता से कोशिश कर रही हैं . दरअसल पश्चिमी यूपी के मेरठ , बागपत , संभल , मुज्जफरनगर , मुरादाबाद , शामली , बिजनौर जैसे करीब एक दर्जन जिलों में गन्ना एक ऐसी नकदी फसल है जिसकी कमाई से गन्ना किसानों के यहां बेटियों की शादियां होती हैं , बच्चों की पढ़ाई लिखाई का खर्चा निकलता है . चीनी मिल मालिक अपनी मजबूरियां गिनाते हैं . तो उधर यूपी में विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही गन्ना नेताओं की राजनीति की लाठी बन गया है .

मुज्जफरनगर के पुन्हा गांव में मनीष कुमार गन्ने की खेती करते हैं . कुल चालीस बीघा जमीन है और करीब पचास से साठ क्विंटल गन्ना पैदा होता है . मनीष का दर्द है कि उनके तीन लाख रुपये चीनी मिल मालिकों के पास फंसे हुए हैं . यही हाल सोहन , महेश पाल , धर्मपाल जैसे किसानों का है . किसी के दो लाख बकाया है तो किसी के तीन लाख . यह सब छोटे किसान हैं जिनका गुजारा गन्ने की कमाई से ही होता है . अटाली गांव में तो हमें पढ़े लिखे नरेश कुमार नाम के किसान मिले जिन्होंने इस बार गन्ना बहुत कम उगाया . बाकी खते में गाजर और सब्जियां उगाई . इसी तरह मुरादाबाद में भी बहुत से गन्ना किसानों ने गन्ने से तौबा कर ली है और फूल उगाने लगे हैं . सरकारी आंकड़ा भी बताता है कि गन्ने का रकबा घटा है . 2013-14 में जहां 23 लाख साठ हजार हैक्टेयर में गन्ना हुआ था वहीं अगले साल 21 लाख तीस हजार हैक्टेयर में ही गन्ना उगाया गया .

गन्ने के कीमत की राजनीति समझने के लिए दो बातों को समझना जरुरी है . केन्द्र सरकार गन्मे का एफआरपी यानि उचित और लाभकारी मूल्य की घोषणा करती है . इस एफआरपी पर यूपी की सरकार एसएपी यानि राज्य परामर्श मूल्य तय करती है जो जाहिर है कि केन्द्र की घोषित कीमत से ज्यादा होता है . इस पेराई सत्र के लिए केन्द्र का एफआरपी 230 रुपये प्रति क्विंटल है और यूपी सरकार की एसएपी 280 रुपये प्रति क्विंटल . बीच के अंतर यानि पचास रुपये की पूर्ति राज्य सरकार करती है . पिछले साल यूपी सरकार ने 11 रुपये की सब्सिडी दी थी जिसे अब चालीस रुपये कर दिया गया है . समाजवादी पार्टी के नेताओं का कहना है कि यूपी में पश्चिमी यूपी के आलावा अन्य जिलों में भी गन्ना उगाया जा रहा है . करीब चालीस जिलों में कम ज्यादा गन्ना उगाया जाता है और पचास लाख से ज्यादा किसान सीधे तौर पर गन्ने की खेती से जुड़े हुए हैं . एक मोटे अनुमान के अनुसार पश्चिमी यूपी में करीब साठ से सत्तर और पूरे यूपी में करीब डेढ़ सौ विधानसभा सीटों पर हारजीत का विजय फैक्टर किसान ही साबित होते हैं . समजावादी पार्टी के नेता कहते हैं कि अगले साल यूपी में विधान सभा चुनाव होने हैं और मोदी सरकार का इरादा तो यही था कि गन्ना किसानों को आंदोलन के लिए उकसाया जाए ताकि वह मिलें चलने नहीं दे और सारी बदनामी अखिलेश सरकार पर आए . यही सोचकर केन्द्र सरकार ने साढे चार रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से सब्सिडी सीधे गन्ना किसानों के बैंक खाते में डालने की योजना शुरु की .

लेकिन इसका तोड़ निकालते हुए अखिलेश सरकार ने किसानों की सब्सिडी ग्यारह रुपये से बढ़ाकर चालीस रुपये प्रति क्विंटल कर दी है . लेकिन राकेश टिकैत इसे नाकाफी बताते हैं . उनका कहना है कि खुद सरकार ही कह चुकी है कि गन्ने की लागत 325 रुपये प्रति क्विंटल आती है ऐसे में 280 रुपये देना कहां का न्याय है . उसके आलावा 14 दिनों में भुगतान जरुरी करने की बात भी कागजों में ही रह गयी है . यूपी सरकार में राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त कुलदीव उज्जवल का कहना है कि अखिलेश सरकार के समय ही समय पर भुगतान नहीं करने वाली करीब पचास मिलों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गयी है और अधिकारियों से कहा गया है कि वह किसी तरह की रियायत न बरतें . उधर चीनी मिल मालिकों का कहना है कि 2001 में जो एसएपी सौ रुपये था वह अब बढ़कर 280 रुपये प्रति क्विंटल हो गया है . एक किलों चीनी बनाने में जितना खर्च आता है उससे कम दाम पर बाजार में चीनी बिकती रही है . मौटे तौर पर एक किलों चीनी बनाने में तीस रुपये का खर्च आता है लेकिन बाजार में दो साल पहले तो दाम 28 रुपए तक आ गये थे . रही सही कसर ब्राजील की चीनी ने पूरी कर दी है . वहां की चीनी तमाम तरह के शुल्क चुकाने के बाद 26 रुपये के करीब बैठती है .

मिल मालिकों की दिक्कतों को देखते हुए उन्हे पिछले तीन सालों में दस हजार करोड़ का ब्याज मुक्त कर्ज दिया गया है . चीनी के निर्यात पर चार हजार रुपये की सब्सिडी दी जा रही है और आयातित चीनी पर सीमा शुल्क भी 15 फीसद से बढ़ाकर 40 प्रतिशत कर दिया गया है . सरकार का दावा है कि इन प्रयासों के कारण ही पूरे देश में जहां गन्ना किसानों के पिछले साल करीब 21 हजार करोड़ बकाया थे वही अब यह घटकर तीन हजार करोड़ के आसपास ही बकाया रह गया है . लेकिन यूपी के किसानों का दावा है कि इसके बावजूद उनके पिछले सत्र के ही ब्याज सहित करीब ढाई हजार करोड़ रुपये बकाया थे और इस सत्र के 6000 हजार करोड़ . हालांकि यूपी सरकार का कहना है कि पिछले पेराई सत्र के 1200 करोड़ रुपये बकाया थे जिसमें से मिल मालिकों ने 700 करोड़ का भुगतान कर किया है . गन्ना किसानों पर काम कर रहे धर्मेन्द्र मल्लिक का कहना है कि चीनी मिल मालिक सिर्फ चीनी की ही बात करते हैं . वह बाई प्रोडेक्ट की बात नहीं करते . उनके अनुसार एक क्विंटल चीनी से करीब दस किलो चीनी होती है करीब तीन सौ रुपये की . इसके आलावा पांच किलो शीरा होता है जिसकी कीमत साठ रुपये है . बैगास तीस किलो निकलती है जो दो रुपये प्रति किलो की दर से बिकता है यानि साठ रुपये . मैली पांच किलो निकलती है . सबसे बड़ी बात है कि खोई से बिजली बनती है और करोड़ों की बिजली बेची जाती है . लेकिन मिल मालिकों का कहना है कि यह आंकड़ा बढ़ा चढ़ा कर बताया जा रहा है . उन्हे प्रति किलो एक डेढ़ रुपये से ज्यादा नहीं मिलते हैं . उनका यह भी कहना है कि एक क्विटल गन्ने से दस किलो के लगभग चीनी निकलने पर ही वह किसानों को 280 रुपए का भाव दे सकते हैं लेकिन चीनी की मात्रा इससे कहीं कम होती है .

सवाल उठता है कि आखिर इस समस्या का समाधान क्या है . कुलदीप उज्जवल का कहना है कि भारत सरकार को ब्राजील की नीति अपनानी चाहिए . ब्राजील में गन्ने से इथोनल तैयार होता है जिसे पेट्रोल में चालीस फीसद तक मिलाया जाता है . लेकिन भारत में इसे हाल ही में बढ़ाकर दस फीसद किया गया है . ब्राजील में हर साल इस का अध्धयन किया जाता है कि दुनिया में कितनी चीनी पैदा होगी और उसके संभावित दाम क्या होंगे . अगर चीनी बहुतायत में होती है तो इथोनल की मात्रा बढ़ा दी जाती है . कुलदीप के अनुसार अगर भारत में इसे लागू किया जाए तो गन्ने के दाम पांच सौ रुपये क्विंटल तक जा सकते हैं . लेकिन फिलहाल तो समस्य़ा की जड़ गन्ने का मूल्य है . यह मूल्य क्या हो इसका कोई ऐसा फार्मूला नहीं निकाला जा सका है जो सबको मंजूर हो . कुछ का कहना है कि रंगराजन कमेटी की सिफारिशों में बहुत दम है . नमोहनसिंह सरकार ने 2012 में रिजर्व बैंक के पूर्व गर्वनर सी रंगराजन की अध्यक्षता में चीनी उदयोग पर कमेटी गठित की थी . कमेटी की सिफारिश पर ही चीनी को डी कंट्रोल किया गया और लेवी चीनी यानि कुल चीनी का दस फीसद राशन की दुकानों के लिए सस्ते दाम पर खरीद पर रोक लगाई गयी . रंगराजन कमेटी ने राज्यों की तरफ से घोषित होने वाले एसएपी यानि राज्य परामर्श मूल्य को खत्म कर सिर्फ केन्द्र के एफ आर पी मूल्य को ही लागू करने की सिफारिश की थी . यूपी सरकार ने इसे मानने से इनकार कर दिया है . यहीं से गन्ने की राजनीति भी शुरु होती है .

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