पोर्नोग्राफी पर रोक के लिए तकनीक के साथ चले कानून: न्यायालय

By: | Last Updated: Friday, 29 August 2014 2:59 PM

नई दिल्ली: सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को इस बात को रेखांकित किया कि प्रौद्योगिकी हमेशा कानून से तेज गति से विकास कर रही है जबकि कानून और प्रशासन के बीच इस तरह का तालमेल होना चाहिए कि वह तकनीक का मुकाबला कर सके जिससे पोर्नोग्राफी वेबसाइट्स पर रोक लगाई जा सके.

 

सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश आर.एम. लोढ़ा, न्यायमूर्ति कुरियन जोसफ और न्यायमूर्ति रोहिंटन फली नरीमन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी की.

 

सर्वोच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी तब की जब सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता एल. नागेश्वर राव ने न्यायालय को बताया कि देशभर में करीब चार करोड़ पोर्नोग्राफी वेबसाइट्स हैं. इसके अलावा इसके अन्य लिंक भी हैं. एक को बंद किया जाता है तो दूसरी नई वेबसाइट आ जाती है और ऐसे में इन पर रोक लगाना आसान नहीं है.

 

इस मामले में कानून के असहाय होने को देखते हुए न्यायाधीश जोसफ ने कहा कि पोर्नोग्राफी कामुकता को बढ़ावा देती है और इससे देखने वाले की मनोवृत्ति और मनोबल को प्रभावित होता है.

 

वरिष्ठ वकील विजय पंजवानी ने कहा कि पोर्नोग्राफी वेबसाइट को बंद करने के लिए 18 महीने पहले जनहित याचिका दायर की गई थी लेकिन तब से लेकर अब तक एक भी साइट बंद नहीं हो सकी है.

 

इस पर नागेश्वर राव ने कहा कि सरकार ने एक सलाहकार समिति गठित की है जो इन साइटों को बंद करने के संबंध में सलाह देगी. उन्होंने कहा कि सरकार सोशल मीडिया संगठनों से भी कह रही है कि वे अपना सर्वर भारत में स्थित करें जिससे वेबसाइट को बंद करने के निर्णय को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके.

 

इस मामले में जनहित याचिका दायर करने वाले कमलेश वासवानी ने अदालत से आग्रह किया है कि पोर्नोग्राफी वेबसाइट, लिंक, डाउनलोडिंग को प्रभावी तरीके बंद करवाया जाए.

 

पंजवानी ने अदालत को बताया कि ब्रिटेन ने वेबसाइट पर 12 तरह की गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया है.

 

वासवानी ने इन वेबसाइटों को बंद करने के पक्ष में अपना तर्क रखते हुए कहा कि हाल के दुष्कर्म के मामले में एक आरोपी ने पुलिस को बताया कि उसने मोबाइल पर पोर्नोग्राफी देखने के बाद ही दुष्कर्म के कृत्य को अंजाम दिया.

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