संस्कृति आधारित शासन मॉडल की जरूरत: राष्ट्रपति

By: | Last Updated: Thursday, 14 August 2014 2:17 PM

नई दिल्ली: राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गुरुवार को कहा कि आकार, विविधताओं तथा जटिलताओं वाले हमारे देश के लिए शासन के संस्कृति आधारित मॉडलों की जरूरत है. इसमें शक्ति के प्रयोग तथा उत्तरदायित्व के वहन में सभी भागीदारों का सहयोग अपेक्षित होता है.

 

मुखर्जी ने स्वतंत्रता की 67वीं वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में कहा कि लोकतंत्र में, जनता के कल्याण हेतु हमारे आर्थिक एवं सामाजिक संसाधनों के दक्षतापूर्ण एवं कारगर प्रबंधन के लिए शक्तियों का प्रयोग ही सुशासन कहलाता है.

 

उन्होंने कहा कि इस शक्ति का प्रयोग, राज्य की संस्थाओं के माध्यम से संविधान के ढांचे के तहत किया जाना होता है. समय के बीतने तथा परितंत्र में बदलाव के साथ कुछ विकृतियां भी सामने आती हैं जिससे कुछ संस्थाएं शिथिल पड़ने लगती हैं. जब कोई संस्था उस ढंग से कार्य नहीं करती जैसी उससे अपेक्षा होती है तो हस्तक्षेप की घटनाएं दिखाई देती हैं.

 

उन्होंने कहा कि यद्यपि कुछ नई संस्थाओं की आवश्यकता हो सकती है परंतु इसका वास्तविक समाधान, प्रभावी सरकार के उद्देश्य को पूरा करने के लिए मौजूदा संस्थाओं को नया स्वरूप देने और उनका पुनरुद्धार करने में निहित है.

 

उन्होंने कहा कि सुशासन वास्तव में, विधि के शासन, सहभागितापूर्ण निर्णयन, पारदर्शिता, तत्परता, जवाबदेही, साम्यता तथा समावेशिता पर पूरी तरह निर्भर होता है.

 

मुखर्जी ने कहा कि इसके तहत राजनीतिक प्रक्रिया में सिविल समाज की व्यापक भागीदारी की अपेक्षा होती है. इसमें युवाओं की लोकतंत्र की संस्थाओं में सघन सहभागिता जरूरी होती है. इसमें जनता को तुरंत न्याय प्रदान करने की अपेक्षा की जाती है. मीडिया से नैतिक तथा उत्तरदायित्वपूर्ण व्यवहार की अपेक्षा होती है.

 

उन्होंने कहा कि तंत्र में बदलाव के साथ कुछ विकृतियां भी सामने आती हैं जिससे कुछ संस्थाएं शिथिल पड़ने लगती हैं. उन्होंने कहा कि शिथिल मस्तिष्क गतिविहीन प्रणालियों का सृजन करते हैं जो विकास के लिए अड़चन बन जाती हैं.

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