तोगड़िया बोलते हैं , मोदी चुप्प रहते हैं . क्यों?

By: | Last Updated: Tuesday, 29 July 2014 9:52 AM

बहुत दिनों बाद आज , मंगलवार को ईद के दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दिखाई दिए . मौका था कृषि अनुसंधान परिषद के पुरस्कार समारोह का . वहां मोदी ने पानी बचाने , फसल का उत्पादन बढ़ाने , नीली क्रांति की बात की . ईद का मौका था . मोदी टवीट करके मुबारकबाद दे चुके थे . फिर भी लगा कि ईद के मौके का फायदा उठाते हुए मोदी पिछले दिनों देश के कुछ भागों में हुई सांप्रदायिक तनाव की घटनाओं और बयानों पर कुछ बोलेंगे . लग रहा था कि मोदी इसी बहाने भड़काने वाले बयान देने वालों से किनारा करेंगे और साथ ही उन्हे सख्त चेतावनी भी देंगे . ऐसा लग रहा था कि मोदी कथित स्वयंभू हिन्दुवादी ताकतों को करारा जवाब देंगे जो मोदी के नाम पर अपनी दुकानदारी कर रही हैं . इसी बहाने मोदी देश को भी आश्वस्त करेंगे . मोदी बताएंगे कि वो कितने सख्त नेता हैं और संविधान की शपथ लेने वाला प्रधानमंत्री पार्टी लाइन से उठकर बात करता है , काम करता है . लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं . सुना था कि गालिब के उड़ेगे परखच्चे , देखने हम भी गये पर तमाशा नहीं हुआ .

 

गोवा में बीजेपी की सरकार है . वहां के एक मंत्री कहते हैं कि मोदी हिन्दुस्तान को हिंदु राष्ट्र बना देंगे . अगले ही दिन गोवा के उप मुख्यमंत्री का बयान आता है कि हिन्दुस्तान तो पहले से ही हिन्दु राष्ट्र है . इस पर पार्टी के केन्द्रीय नेता या तो चुप्पी साधते हैं या फिर हिन्दुत्व को जीने की ढंग बताकर बहस करते हैं . बीजेपी के तेलंगाना राज्य के एक नेता के लक्ष्मण कहते हैं कि सानिया मिर्जा को उनके राज्य का ब्रांड एम्बेसडर नहीं बनाया जाना चाहिए . इस पर केन्द्रीय नेता बयान से किनारा करते हैं लेकिन उस नेता को कारण बताओ नोटिस जारी तक करने से परहेज करते हैं . कुछ बयान से किनारा करने के साथ ही सानिया पर लगे किसी पुराने आरोप को दोहरा देते हैं . शिवसेना के सांसद दिल्ली के महाराष्ट्र सदन में खाना परोसने वाले एक मामूली से कर्मचारी के मुंह में जबरन रोटी डालने की कोशिश करते हैं . इस पर बीजेपी सांसदों के आचरण को मर्यादा के खिलाफ तो बताती है लेकिन पूरे मामले को कानून व्यवस्था का बताकर संसद में सांसदों के खिलाफ कोई कार्यवाही की जरुरत तक महसूस नहीं करते .

 

विश्व हिन्दू परिषद के नेता प्रवीण तोगड़िया मुसलमानों को चेतावनी देते हैं कि वो गोधरा और मुज्जफरनगर को भूलें नहीं . विश्व हिन्दू परिषद के ही अशोक सिंघल मुसलमानों को धमकी देते हैं कि बहुसंख्यकों का विरोध करके वो अपने अस्तित्व को ही दांव पर लगा रहे हैं . इस पर बीजेपी के बड़े नेता टिप्पणी तक करने से खुद को रोकते हैं . पश्चिमी यूपी के कांड इलाके में एक मंदिर में लाउडस्पीकर लगाने को विवाद होता है तो आसपास के बीजेपी सांसदों , मंत्रियों समेत पूरा कुनबा ही वहां जुट जाता है . ईद से ठीक पहले पंचायत करने का ऐलान करते हैं . यहां बीजेपी आक्रामक अंदाज में पेश आती है . सवाल उठता है कि एनडीए की मोदी सरकार का गठन हुए अभी दो महीने ही हुए हैं और अभी से संघ परिवार आखिर ऐसे तेवर क्यों दिखा रहा है , इतना आक्रामक रुख क्यों अपना रहा है , मुसलमानों का नाम लेकर उन्हे अपने निशाने पर क्यों ले रहा है .

 

इससे बड़ी बात है कि इतना सब होने पर भी बीजेपी के बड़े नेता या तो रहस्यमयी चुप्पी की ढाल लेते हैं या फिर संकेतों ही संकेतों में बयान का समर्थन भी कर जाते हैं . बात बात पर ट्वीट करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सार्वजनिक खामोशी भी कई सवाल खड़े कर रही है . हो सकता है कि संघ परिवार के साथ साथ बीजेपी के भी एक धड़े को लगता हो कि इस देश में धारा 370 से लेकर समान नागरिक संहिता पर बहस क्यों नहीं होनी चाहिए , यूपी में अगर सपा कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीतिक करते हैं तो बीजेपी को क्यों नहीं बहुसंख्यकों की राजनीति के उस सिलसिलो को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए जिसकी शुरुआत उसने लोकसभा चुनावों में की थी . लेकिन संघ परिवार को समझना चाहिए कि विपक्ष में रहते हुए जिन मुद्दों पर आसानी से बोला जा सकता है उन्ही मुद्दों पर सत्ता में आने के बाद उतना खुला नहीं जाता जितना कि खुला जा रहा है . सरकार बने जुम्मा जुम्मा दो महीने हुए हैं . अभी इन मसलों को उठाना जल्दबाजी है और अगर बुनियादी मसले नहीं सुलझे तो इन बयानों का उल्टा भी असर हो सकता है .

 

बीजेपी का चुनाव जीतना , मोदी का प्रधानमंत्री बनना , संघ का यूं खुलकर बीजेपी का साथ देना और यहां तक कि आने वाले विधान सभा चुनावों में भी अपने कार्यकर्ता को साथ लगाने की बात करना , बीजेपी मंत्रियों और नेताओं का धारा 370 से लेकर समान आचार संहिता को बार बार उठाना और इन पर बहस की जरुरत को रेखांकित करना , फर्जी एनकाउंटरों में मुकदमेबाजी में फंसे अमित शाह को बीजेपी का अध्यक्ष बनाना , संघ के कार्यकर्ताओं को बीजेपी संगठन में भेजना, बीजेपी की प्रदेश इकाईयों में भी संघ के सीधे दखल को बढ़ाना …आखिर इन सब कड़ियों को जोड़कर देखा जाए तो विपक्ष के आरोपों में दम नजर आता है कि क्या वास्त्व में संघ परिवार एक सोची समझी रणनीति के तहत अपने एजेंडे को फिर से राष्ट्रीय बहस की परिधि में ला रहा है .

 

या कहीं ऐसा तो नहीं कि बुनियादी मुद्दों से ध्यान बटांने के लिए सारा खेल खेला जाता रहा हो . कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि प्रवीण तोगड़िया जैसे नेता को ऐसे बयान देकर मोदी को ही जानबूझकर सकंट में डाल रहे हैं . ( गुजरात में अपने अपमान का यूं बदला लिया जा रहा है ) . महंगाई कम करने , भ्रष्टाचार दूर करने और रोजगार देने के मुद्दों पर सत्ता में आई थी मोदी सरकार . दो महीनों के कार्यकाल में बहुत कुछ हुआ है लेकिन बहुत कुछ नहीं भी हुआ है . जिस तरह मनमोहन सिंह के राज मे प्याज , टमाटर , आलू के दाम सीढ़ी चढ़ते थे ठीक वैसा ही हो रहा है . उस समय कांग्रेस के नेता अपने बचाव में जो कुछ कहते थे ठीक वैसा ही बीजेपी के नेता बोल रहे हैं . सरकार का यह कहना अपनी जगह ठीक हो सकता है कि महंगाई रातोंरात कम नहीं होगी , अभी जो कदम उठाए जा रहे हैं उनका असर आने वाले कुछ महीनों बाद ही दिखेगा . लेकिन वोटर बड़ा बेसब्र होता है . बीजेपी को उतराखण्ड में तीन विधानसभा सीटों के उपचुनाव और पंचायत चुनावों के नतीजों को देखना चाहिए . दोनों ही चुनाव मोदी की तस्वीर को आगे रखकर लड़े गये थे . लेकिन पार्टी पीट गयी .

 

ऐसा नहीं है कि जनता यह नहीं समझती कि मोदी कोई जादूगर नहीं है जो रातोंरात अच्छे दिन ले आएंगे . भले ही चुनावों के दौरान मोदी ने ऐसे सब्जबाग दिखाए हों लेकिन जनता यहां भी माफ कर देगी बशर्ते सरकार काम करती दिखे और संघ परिवार हिन्दुत्व को हाशिए पर रखे . मोदी सरकार को ध्यान रखना चाहिए कि ऐसे बयानों से संघ परिवार निशाने पर नहीं आता . ऐसे बयानों से अंगुलियां मोदी पर ही उठती हैं . अभी तो केवल विपक्षी दल ही ऐसा कर रहे हैं और जनता हारी हुई कांग्रेस की खिसियानी हरकत के तौर पर ही इसे ले रही हैं लेकिन जिस जनता ने बड़ी उम्मीद से वोट दिया उसकी उम्मीदों की भ्रूण हत्या रोकने की जिम्मेदारी तो आखिरकार मोदी की ही बनती हैं . गालिब होते तो यही कहते ….या इलाही ये माजरा क्या है .

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