प्रेंस कॉन्फ्रेंस में अन्ना बोले- गांधी के साथ बिरला थे मेरे साथ कोई नहीं

By: | Last Updated: Saturday, 15 August 2015 2:32 PM

एबीपी न्यूज के खास कार्यक्रम प्रेंस कॉन्फ्रेंस में अन्ना हजारे ने तीखे सवालों के जवाब दिए.

दिबांग- मैं आप से ये पूछ रहा हूं कि 15 अगस्त यानि आज से करीब 4 साल पहले आपने बहुत बड़ा आंदोलन किया दिल्ली में क्या बदला इन 4 सालों में?

 

जवाब अन्ना- अभी तक कोई बदलाव नहीं आया है. ऐसा लगा था कि आंदोलन से पूरा देश जाग गया है. वो क्यों जगा था क्योंकि जो पिछली सरकार थी उसमें भ्रष्टाचार बढ़ गया था, मंत्री भी भ्रष्टाचारी बन गए थे. उसके कारण हर आदमी को जीना मुश्किल हो रहा था. भ्रष्टाचार के कारण मंहगाई बढ़ रही थी, पारिवारिक लोगों का भी जीना मुश्किल हो रहा था. तो लोग चाहते थे कि कोई इसको पर्याय में ले और उसके बाद जो इलेक्शन हुआ उसमें बदलाव का कारण ये है कि पिछली सरकार में लोगों की आशाएं समाप्त हो गई थी, कि अब कुछ होगा नहीं. कुछ ना कुछ तो अच्छा पर्याय देना चाहिए. और ये नई सरकार जो आई तो उन्होंने बहुत आश्वासन दिया और लोगों को लगा कि अभी परिवर्तन आएगा. उन्होंने ये भी कहा कि हम अच्छे दिन लाएंगे. लेकिन चार साल बीत गए परिवर्तन के बाद और ये एक साल दो महीने बीत गए नई सरकार को बने, कोई अभी तक परिवर्तन नहीं आया.

 

दिबांग- अन्ना एक परिवर्तन ये भी आया कि पहले जब आप यहां आते थे तो बहुत बड़ी भीड़ रहती थी, बड़े-बड़े नारे रहते थे. अब वो नारे नहीं दिखाई दे रहे, उतनी भीड़ भी नहीं दिखाई देती है आपके आने से, अब आप खुद को किसके सहारे पाते हैं?

 

जवाब अन्ना- भीड़ और नारे से देश नहीं बनेगा. हम तो ये भीड़ और नारे सालों से सुन रहे हैं. हर इलेक्शन में जिला स्तर पर, ब्लाक स्तर पर इतनी भीड़ आती है कि पूरे ग्राउंड के ग्राउंड भर जाते हैं, नारे लगते हैं लेकिन हुआ क्या देश में. सिर्फ भीड़ बढ़ा कर काम नहीं होगा, गर्दी बनकर काम नहीं होगा, दर्दी लोगों की जरुरत है और उसके खोज में हम लोग लगे हैं. अभी जैसे कि मैंने एक संगठन बनाया था, उसमें भी मुझे मेरे नाम का दुरुपयोग करने वाले नजर आ गए. 252 तहसील की पूरी कमेटी बर्खास्त कर दी, ऐसी भीड़ मुझे नहीं चाहिए. अभी जो नया संगठन खड़ा हो रहा है उसमें स्टांप पेपर पर एफिडेविट करके देना कि मैं किसी राजनीति में नहीं जाउंगा, मैं मेरे चरित्र को संभालूंगा, मैं अपने देश के लिए सब कुछ करुंगा, मैं समाज और देश की सेवा करुंगा.

 

दिबांग-आपको क्या लगता है नरेंद्र मोदी जो प्रधानमंत्री बने हैं कुछ नहीं बदला.

अन्ना- अभी तो कुछ दिखाई नहीं देता. अभी मैं घुमता हूं देश में हर कोई बोलता है कि आशा बड़ी रखी थी कि अच्छे दिन आएंगे लेकिन कुछ आया नहीं. पहले तो ये आश्वासन दिया था कि विदेश काला धन 100 दिन के अंदर लाएंगे. वो पैसा हम लाएंगे और हर आदमी के बैंक अकांउट में 15 लाख रुपए इकट्ठा करेंगे. सामान्य लोगों को लगा 15 लाख रुपया! तो उन्होंने वोटिंग कर दिया. अभी 15 रुपया भी जमा नहीं हुआ.

 

वही बात हुई वन रैंक वन पेंशन में, जब इलेक्शन चल रहा था कि तब आश्वासन दिया कि हम सत्ता में आते हैं तो जल्द से जल्द वन रैंक वन पेंशन लागू करेंगे, अभी तक नहीं हुआ. भूमि अधिग्रहण बिल, ये आश्वासन दिया कि हम सत्ता में आ गए तो जो किसान पैदावारी करता है तो अगर उसकी लागत एक रुपया आती  है तो हम ढेड़ रुपए देंगे, अभी तक नहीं हुआ. भ्रष्टाचार की लड़ाई को हम प्राथमिकता देंगे कुछ नहीं हुआ, लोकपाल बिल पड़ा है अभी तक अमल नहीं हुआ.

 

दिबांग- भ्रष्टाचार पर लोग इस्तीफा मांग रहे हैं वसुंधरा राजे का, शिवराज सिंह चौहान का, सुषमा स्वराज का, प्रधानमंत्री कुछ बोल नहीं रहे. मैं आप से सीधा सवाल पूछ रहा हूं आपकी क्या राय है कि इन  लोगों को इस्तीफा दे देना चाहिए और जांच होनी चाहिए?

 

अन्ना-  जांच होनी जरुरी है लेकिन इस्तीफा के बारे में मैं नहीं कहूंगा. मैं तो ये कहूंगा कि शासकीय जांच नहीं न्यायालय की जांच होनी चाहिए. तब सही जांच होगी और दोषियों को सजा मिलेगी.

 

दिबांग- तो आप इस्तीफे की मांग का समर्थन नहीं करते.

अन्ना- मुझे पता नहीं है ना कि दोषी हैं या नहीं. जब ये जांच होगी तो उसमें साबित होगा.

 

दिबांग-अन्ना जी लोग कह रहे हैं कि आप राजस्थान की मुख्यमंत्री है, आप मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री है, आप केंद्र में नेता हैं आप पद पर बने रहेंगे तो जांच पर असर पड़ेगा इसलिए आप इस्तीफा दीजिए, साफ होते हैं तो लौट कर आइए बाइज्जत.

 

अन्ना- न्याय व्यवस्था सर्वोच्च व्यवस्था है आज हमारा देश चल रहा है वो न्याय व्यवस्था के आधार पर चल रहा है। अगर न्याय व्यवस्था के माध्यम से जांच होगी तो काफी फर्क आ जाएगा.

 

दिबांग- अन्ना मुझे याद है जब आप रामलीला मैंदान में थे कि मैंने महाराष्ट्र में इतने विकेट ले लिए, इतने मंत्रियों को उड़ा दिया. अब आपने अपना सुर बदल दिया, अब आप नहीं चाहते कि इस्तीफा हो, चाहते हैं कि पहले जांच हो क्या आपने अपने आप को बदला है?

 

अन्ना- मैंने पहले इस्तीफा नहीं मांगा, पहले न्यायालय के माध्यम से जांच करवाई और दोषी साबित होने पर उनको इस्तीफा देना पड़ा.

 

सवाल अनिल- आप की जो मूल लड़ाई भ्रष्टाचार के विरुद्ध उससे जुड़ा हुआ मेरा सवाल है. आप जब भी इंडिया अगेंस्ट करप्शन की बात किया तो हमने देखा लोग जुटे आप की मुवमेंट आगे बढ़ी लेकिन फिर भी आप ने कहा कि भीड़ जुटने से कुछ नहीं होता.

 

मेरा मूल प्रश्न ये है कि कुछ लोग आपसे जुड़ते हैं, आप उनपर भरोसा भी कर लेते हैं आप उनको अपनी सेना का सिपहसलार भी बना लेते हैं और खुद पीछे हो जाते हैं. अचानक कुछ महत्वाकांक्षा जाग जाती है, उनके राजनीतिक नए-नए सपने आते हैं और वो भाग जाते हैं तो क्या आप को लगा कि ये विश्वासघात हुआ है? क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ आपकी लड़ाई कमजोर हुई? मुझे वो कमजोरी नजर आ रही है कि तभी आपने एफिडेविट लेने की बात कही तो मुझे लगता है जुबान से ज्यादा तो कोई चीज है नहीं तो कोई एफिडेविट देने के बाद भी मुकर जाए तो फिर आप के मुवमेंट का क्या होगा? फिर कोई अरविंद केजरीवाल पैदा हो गया, किरन बेदी पैदा हो गई तब क्या होगा.

 

जवाब अन्ना- मैं कोर्ट में जाउंगा और उनको खींचूगा कोर्ट में, दो चार को कोर्ट में खींचा तो बाकी का दिमाग ठीक हो जाएगा.

अनिल- अन्ना आपने बहुत दिन किनारा रखा हुआ था आप केजरीवाल से नहीं मिल रहे थे अचानक आप मिलते हैं, कहा जाता है कि बड़ी सौहाद्रपूर्ण मीटिंग रही तो ये सब क्या दर्शाता है?

 

अन्ना- मैं यहां आने के बाद महाराष्ट्र सदन में रुकता हूं और मिलने वालों की बड़ी भीड़ होती है. उसमें अलग-अलग प्रकार के लोग होते हैं तो इनका भी मुझे फोन आ गया कि मुझे मिलना है तो मैं कैसे इन्कार कर सकता हूं. हमारी कोई पॉलिटिक्स वगैरह की बात नहीं हुई.

 

अनिल- उनका कहना था कि उन्होंने अपनी सरकार का लेखा-जोखा आपको बताया कि क्या काम अच्छे कर रहे हैं. क्या उन्होंने बताया और क्या आप सहमत हैं ?

अन्ना- मैंने उनसे पूछा कि आज जो उनके बारे में चर्चा चल रही है कि आपके मंत्री और आप के विधायक ये करप्ट बन गए हैं ऐसी ऐसी बात हो रही है. लेकिन वो बोला कि जैसे मोहल्ला सभा उसमें मैं सब पावर जनता को दे रहा हूं. वो बोला कि जो वार्ड में डिस्पेंसरी होगी लोग उसका नियोजन करेंगे. उन्होंने बताया और मैं सुना. मैं बोला ये तो अच्छी बात है. मैं कौन होता हूं उनका लेखा लेने वाला, मुझे कोई अधिकार नहीं है.

 

सवाल दिबांग- अन्ना आप पार्टी बनाने की बात पर तैयार हो गए थे फिर आप पलटे क्यों अपनी बात से?

जवाब अन्ना-  उसका कारण हुआ ना. मैंने एक सवाल पूछा अरविंद से कि आप पार्टी निकाल रहे हो निकालो. पार्टी में आने वाले लोग शुद्धआचार, शुद्धविचार, निष्कलंक जीवन, त्याग ये गुण उसमें है ये चेक करने का आपके पास क्या डिग्री है? जवाब नहीं था. आज मुझे दिखाई दिया कि वही सवाल कि पार्टी में लोग गलती कर रहे हैं क्यों सरंक्षण ठीक नहीं हुआ. तो और पार्टी और आप में क्या फर्क हुआ फिर. पार्टी ऐसी हो जिसका चरित्र शुद्ध है, आचार, विचार शुद्ध है, जीवन निष्कलंक है, जीवन में त्याग है और समाज और देश की भलाई के लिए वो मोमबत्ती के मुताबिक जलता है. तब कुछ बदलाव आएगा वो मुझे दिखाई नहीं दिया.

 

दिबांग- अगर अब कोई ऐसी पार्टी बने तो आप तैयार हैं?

अन्ना- पार्टी में नहीं जाउंगा लेकिन सपोर्ट करुंगा, जनता को बताउंगा कि देश की भलाई के लिए ये पर्याय हैं.

सवाल ओम थानवी- मैं ये समझना चाहता हूं कि आपका आंदोलन, आप ये मानेंगे कि आंदोलन आप के अकेले का नहीं था. आप के साथ में अरविंद भी थे, किरन भी थी, मनीष थे, बहुत से लोग थे. अब आने वाले वक्त में कोई नई टीम उसका आपके दिमाग में कोई खाका है क्या या अब आप सोचते हैं कि एकला चलो रे अकेले लड़ेंगे?

जवाब अन्ना- मैं आज कोई भी पार्टी के बारे में नहीं सोच रहा ना सोचूंगा. मैंने अपने जीवन में किसी पार्टी या पक्ष के बारे में सोचा ही नहीं. मेरा रास्ता है आंदोलन जो महात्मा गांधी में आजादी से पहले अपनाया. और मेरी ऐसी धारणा है कि जो परिवर्तन आंदोलन से आएगा वो पक्ष और पार्टी से नहीं आएगा. आज की पक्ष और पार्टी क्यों कि आज की पक्ष और पार्टी सत्ता से पैसा,पैसा से सत्ता इसके पीछे घूम रही हैं. तो आज मैं इसके बारे में कुछ नहीं सोच रहा.

 

ओम थानवी- आपका आंदोलन जो था वो लोग अब सरकार बनाकर आप से अलग हो गए, अब आप की जो नई आंदोलन की टीम होगी उसमें कुछ जोशीले लोग जुड़ेंगे, उस टीम की आप कुछ कल्पना कर रहे हैं.

अन्ना-  भगवान ने एक बात बहुत अच्छी बनाई कि आप के दिल में क्या है मुझे समझ में नहीं आता और मेरे दिल में क्या है आपको समझ में नहीं आता है. उनके दिल में क्या था वो मेरे समझ में नहीं आया. और इसके कारण आगे ये फिर गड़बड़ी रहती है. ये भगवान ने अच्छी बात बनाई, अगर एक दूसरे के अंदर की बात जान लेते तो फिर सब गड़बड़ हो जाता.

सवाल दिबांग- अन्ना आप संविधान में विश्वास करते हैं. उसमें तो ये है कि भई आप आइए पार्टी बनाइए और अगर आप की पार्टी जीत कर आती है तो आप नया कानून बनाइए. आप आंदोलन करते रहेंगे लोग नेता बनते रहेंगे, पैसे कमाते रहेंगे. लोग अलग-अलग पार्टी बनाते रहेंगे तो आप का सार प्रयत्न व्यर्थ जाएगा.

 

जवाब अन्ना-  मैं तो विनती करुंगा सबसे कि हमारा संविधान है उसमें पक्ष और पार्टी का नाम कहां पर है? मैंने खोजा पूरा संविधान उसमें पक्ष और पार्टी का नाम कहीं पर भी नहीं है. संविधान ये कहता है कि भारत का कोई भी अकेला आदमी चुनाव लड़ सकता है. और वो खुद खड़ा हो सकता है या जनता उसे खड़ा कर सकती है.

 

दिबांग- पर आपने व्यवस्था देखी है. व्यवस्था तो ये है कि पार्टी बनती है, वो जीत कर आती है और कानून बनाती है. 62 सालों से यही व्यवस्था है आपकी.

अन्ना- मेरी ये धारणा आप मुझे पागल भी कह सकते हैं कि ये आज को जो भी इलेक्शन चल रहे हैं ये संविधान के विरुद्ध चल रहे हैं. 1952 में पहला चुनाव हो गया उसी समय सभी पक्ष और पार्टियां बर्खास्त होनी चाहिए थी, नहीं हुई. जो पहला इलेक्शन कमीशन था उसे आब्जेक्शन लेना चाहिए था कि संविधान में पक्ष और पार्टी का नाम नहीं है.

 

सवाल संगीता तिवारी- मेरा सवाल ये है कि क्या आपके साथ जो लोग भी जुड़े उन सब की अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा थी. चाहे वो अरविंद केजरीवाल हों, मनीष सिसोदिया हों, जनरल वीके सिंह हों या किरन बेदी हों. आप को लगता है इन सभी लोगों ने अपनी राजनीतिक महत्वाकाक्षां के लिए आपका इस्तेमाल किया. और दूसरी चीज क्या आपका जो आंदोलन का मंच था वो बस नए नेताओं को बनाने का मंच बन कर रह गया?

 

जवाब अन्ना- अब ये मैं कैसे कहूं कि उन्होंने मेरा दुरुपयोग कर लिया है इलेक्शन के लिए मैंने बताया ना कि उनके दिल में क्या था पता नहीं. अभी वो मुझे महसूस हो रहा है, इसके कारण मैंने नया रास्ता ढूंढा कि पक्ष और पार्टी नहीं निकालूंगा.

 

संगीता- अभी आप को क्या लग रहा है कि इन्होंने आपका इस्तेमाल किया.

अन्ना- नहीं मैं ये नहीं कह सकता. मैं कैसे कह सकता हूं कि मेरा इस्तेमाल हुआ, मैं तो फकीर आदमी हूं, मंदीर में रहता हूं ना धन ना दौलत ना सत्ता ना पैसा और ये तो बड़े लोग हैं तो मेरे जैसे सामान्य आदमी का इस्तेमाल किया ये मैं कैसे कह सकता हूं.

 

सवाल अनिल पाण्डेय- अभी जब योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण ये सब लोग आम आदमी पार्टी से अलग हुए तो प्रशांत भूषण ने ये आरोप लगाया कि अरविंद केजरीवाल तानाशाह की तरह व्यवहार करते हैं आपका इस बारे में क्या कहना है?

अन्ना- आप देख रहे हैं ना कि 15 दिन से हमारी संसद नहीं चल रही है. पक्ष और पार्टी आ गए तो ये चलता ही रहेगा. ये आरोप प्रत्यारोप चलता रहेगा.

सवाल अनिल पाण्डेय- जिस प्रकार केंद्र में नई सरकार आने से कोई बदलाव नहीं हुआ है वैसे ही आप ही के करीबी लोग, सहयोगी लोगों की दिल्ली में सरकार बनी है. क्या आप को दिल्ली में कोई परिवर्तन दिखाई दे रहा है.

अन्ना- ये पहले मेरे सहयोगी थे, पार्टी में जाने से मेरे सहयोगी नहीं हैं वो तो पार्टी के लोग बन गए. मेरा उनका क्या ताल्लुकात है. ना मैं उनसे मिलता हूं, ना फोन करता हूं.

 

अनिल- ये कहा गया कि आप दिल्ली सचिवालय जाने वाले हैं, दिल्ली सरकार के काम की समीक्षा करने वाले हैं.

अन्ना- ना ना ये गलत है. मैं क्यों जाउंगा.

सवाल रिफत जावेद- अन्ना 2013 में आप जनलोकपाल को लेकर रालेगण सिद्धी में आंदोलन कर रहे थे, अनशन पर बैठे तो वीके सिंह और गोपाल राय मंच पर थे और गोपाल राय को आपने जाने को कह दिया. अच्छा वीके सिंह केन्द्र में मंत्री हैं और गोपाल राय दिल्ली में. केंद्र की सरकार ने जनलोकपाल पर अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया है लेकिन दिल्ली सरकार ने जनलोकपाल पर काम शुरु कर दिया है. तो जो 2013 में हुआ था उस संदर्भ में वीके सिंह और गोपाल राय के बारे में आपकी क्या राय है?

जवाब अन्ना- उसमें मेरी राय ये है गोपाल राय पार्टी में गए थे और वीके सिंह पार्टी में नहीं गए थे उस समय. ये पार्टी में चले गए थे इसलिए मैं बोला कि भाई इधर क्यों आ रहे हो अब, उधर जाओ दिल्ली में बैठो. जनरल वीके सिंह थे, वो हमारे साथ उधर आंदोलन में आ गए. उस टाइम पर उन्होंने कहा कि मैं किसी पार्टी में नहीं जाउंगा, मैं आंदोलन में रहूंगा. मुझे क्या पता था कि ये कल किसी पार्टी में जाने वाले हैं. अगर मुझे पता होता तो जैसे गोपाल राय को कहा वैसे उन्हें भी कहता आप जाओ.

सवाल दिबांग- ये लोग जो छोड़-छोड़ के जाते हैं और जो आम लोग समर्थन में आते हैं तो उनके साथ तो धोखा होता है ना. उनके तो लगता है कि अन्ना हजारे के साथ खड़े हुए थे और ये आज हट गए. अन्ना हजारे के साथ जाना ही नहीं है क्योंकि जो इसके साथ आता है वो छोड़ कर चला जाता है, ये फिर रालेगण सिद्धी चले जाते हैं. आप उन लोगों को क्या कहेंगे?

 

जवाब अन्ना- पहली बात ये है कि मैंने कोई ऐसा खड़ा नहीं किया. जैसे इंडिया अगेंस्ट करप्शन, मैं कोई विश्वस्त नहीं, मैं ट्रस्टी नहीं, मैं मेंबर नहीं. उस पर जो लोगों ने पैसा दिया उस पर मैंने पांच रुपए को भी हाथ नहीं लगाया. उस पर लोग आते गए, जुड़ते गए, मैं नहीं बनाया ये. मेरा केवल एक ही आंदोलन था भ्रष्टाचार विरोधी जन आंदोलन महाराष्ट्र में.

 

दिबांग- अन्ना आप का ये कहना ठीक नहीं है क्योंकि जब लोग आ रहे हैं तो वो सिर्फ आपका चेहरा जानते हैं. इंडिया अगेंस्ट करप्शन का मतलब आम आदमी के लिए था अन्ना हजारे. तब आप ये नहीं कह सकते कि मेरा इनसे कोई लेना-देना नहीं है, तब आप खड़े हुए झंडा लहराया, नारे लगाए. अगर आप ऐसे कह रहे हैं तो आपने भी धोखा किया आम लोगों के साथ ?

अन्ना- मुझे ये आशा की किरण दिखाई दे रही थी उस समय. मैं उनके कमेटी या ट्रस्ट में नहीं था लेकिन मुझे एक आशा की किरण दिखाई दे रही थी कि अभी कुछ नया होने जा रहा है और इस कारण में उनके साथ में आंदोलन में दिखाई दिया. मेरी कोई अपेक्षा नहीं थी और अभी कल भी कई लोगों में गलतफहमी कि अन्ना के साथ जाने से कोई फायदा नहीं होगा तो अन्ना का क्या बिगड़ने वाला है.

 

दिबांग- अगर अन्ना आप ऐसे कहेंगे तो लोग इस फकीर का विश्वास कैसे करेंगे जिसको हर बार लोग ठग लेते हैं.

अन्ना- अगर विश्वास नहीं होता तो अरविंद भी बाजू में चला गया, किरन बेदी, जनरल वीके सिंह भी चले गए. और लोगों का कहना था कि अभी अन्ना के साथ कौन है? तो आपने देखा कि 23 फरवरी को जंतर मंतर पर मैंने को विज्ञापन नहीं किया, किसी को निमंत्रण नहीं भेजा, सिर्फ प्रेस वालों को बताया कि मैं 23 तारीख को जंतर मंतर पर बैठने वाला हूं, हजारों लोग पहुंच गए. वही बात वन रैंक वन पेंशन के आंदोलन में देश भर के जवान आ गए. तो जिनको लगता है कि ये सही चल रहे हैं तो वो तो आने वाले हैं. वो समाज और देश के भले के लिए जुड़ते रहेंगे.

 

सवाल अभय कुमार दुबे- जब आपने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की शुरुआत की थी और आप उस आंदोलन के प्रतीक पुरुष भी बन गए. आंदोलन ऐतिहासिक रहा, जनचेतना जगी लेकिन आंदोलन को जो शुरुआती उछाल मिली उसके पीछे अघोषित रुप से आरएसएस और बीजेपी का बड़ा हाथ था. उनके कार्यकर्ता आपके कार्यक्रम में आते थे, समर्थन देते थे. उनकी एक पूरी योजना थी आप आंदोलन के साथ जुड़ने की, इरादा उनका जो भी रहा हो. अब जब आप आंदोलन करेंगे वन रैंक वन पेंशन पर आंदोलन करेंगे या भ्रटाचार के खिलाफ आंदोलन करेंगे तो उस वक्त आपका निशाना वही पार्टी होगी. आरएसएस समर्थित सरकार ही होगी तब आप के आंदोलन को शुरुआती उछाल कहां से आएगी?

 

जवाब अन्ना- मैं ये कहना चाहता हूं कि मैं भगवान को मानता हूं और भगवान को साक्षी रख कर मैं कहूंगा कि अगर हमारे आंदोलन में बीजेपी का कोई कार्यकर्ता आया और मैं देखते हुए भी चुप रहा तो ऐसा कभी हुआ नहीं और होगा भी नहीं. अगर मुझे पता होता तो जैसे बाकी लोगों को निकाल दिया तो उन्हे भी निकाल देता.

 

अभय- मैं आपके ऊपर इल्जाम नहीं लगा रहा कि आपने उन्हें नहीं निकाला. मैं ये कह रहा हूं कि कोई भी आंदोलन जब चलता है तो उसमें जनता की भागीदारी जरुरत होती है. कुछ राजनैतिक शक्तियों की घोषित-अघोषित आवश्यकता होती है. भले ही वो अपने झंडे के साथ ना आएं तो उस वक्त उन लोगों ने वो भूमिका अदा की थी.

 

अन्ना- हो सकता है मेरे में वो कमी हो, इसको मैं इन्कार नहीं कर सकता. मेरे पास कोई धन नहीं, कोई बैंक बैलेंस नहीं है. एक मंदीर में सोने का बिस्तर और खाने का प्लेट है. तो उसमें कमियां रह सकती है और आज भी मैं घूमता हूं, जब मुझे कोई टिकट भेजता है तब मैं जाता हूं. ऐसी स्थिति है लेकिन लोगों को पता नहीं है. तो कुछ कमी रह भी सकती है.

 

अभय- मैं कह रहा हूं कि जब आप नया आंदोलन शुरु करेंगे. अभी तो वन रैंक वन पेंशन पर फौजी लोग आ जाएंगे. लेकिन जब आप भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन शुरु करेंगे, जिसकी जमीन बन रही है उसमें शुरुआत में जनता कहां से आएगी?

अन्ना- अभी आप ने देखा ना 23 फरवरी को हम आंदोलन किया भूमि अधिग्रहण बिल पर हजारों किसान आ गए. मैंने कोई निमंत्रण नहीं दिया था लेकिन आ गए. वैसे ही 26 तारीख को जो जंतर मंतर पर रैली हुआ, हजारो लोग आ गए.

दिबांग- आप कह रहे हैं कि बीजेपी, आरएसएस से मदद नहीं लेंगे. अगर वो कहते हैं कि हम आपके समर्थन में आ रहे हैं तो क्यों उनका समर्थन लेना चाहते?

अन्ना- मोहर है ना बीजेपी का, मोहर है पार्टी का जहां पार्टी का मोहर है मैं उसके अंदर नहीं जाना चाहता.

दिबांग- अन्ना जब कोई मुद्दा उठाते हैं तो आप चुनते कैसे हैं? क्योंकि महाराष्ट्र में एक बहुत बड़ा मुद्दा है कि पिछले 20 सालों में 63 हजार किसानों ने आत्महत्या की. पूरे देश में 20 सालों में 3 लाख किसानों ने आत्महत्या की. आपने कभी इसपर आंदोलन नहीं किया, कभी बड़ा आंदोलन नहीं खड़ा किया इसकी क्या वजह रही?

 

अन्ना- आज कमी इसी बात की है जैसे आपने सवाल किया वैसे लोगों को लगता है जो करना है वो अन्ना हजारे को ही करना है. मेरा सवाल है कि और अन्ना हजारे क्यों नहीं खड़े हो जाते लड़ने के लिए. एक अन्ना हजारे पूरे देश को कैसे पूरा करेगा. ये मेरा सवाल है. आज दुर्भाग्य ये है कि जो करना है वो अन्ना हजारे को ही करना है.

सवाल अशोक वानखेड़े- आप कह रहे हैं कि परिवर्तन नहीं हुआ. मुझे लगता है परिवर्तन हुआ है और अन्ना हजारे में हुआ है. वो परिवर्तन ये हुआ कि पिछली बार एनडीए की सरकार जो महाराष्ट्र में थी तो छोटे-छोटे भ्रष्टाचार आरोपों पर आपने कई मंत्रियों को घर भेज दिया और अभी महाराष्ट्र में कई मंत्रियों पर भ्रष्टाचार पर आरोप लगे हैं. चाहे चिक्की खरीदी हो या कोई और हो उस पर अन्ना चुप हैं. अन्ना ने महाराष्ट्र को छोड़ दिया, अन्ना राष्ट्रीय स्तर पर निकल गए. क्या अन्ना को पब्लिसिटी चाहिए या उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ना महाराष्ट्र में बंद कर दिया?

 

अन्ना- पब्लिसिटी से अन्ना हजारे को क्या हासिल करना है.

अशोक- महाराष्ट्र के भ्रष्टाचार के ऊपर आप क्यों नहीं बोल रहे हैं?

अन्ना- यही तो मेरा सवाल भी है कि सब काम अन्ना हजारे को ही करना है लोग क्यों नहीं खड़े होते. जैसे मैंने मौत को हाथ में लिया और भ्रष्टाचार के विरुद्ध मैं लड़ रहा हूं ऐसे और लोग क्यों नहीं खड़े होते.

 

अशोक- अभी दिबांग ने बात कही किसानों की आत्महत्या की. किसान इसलिए आत्महत्या करता है क्योंकि उसके खेतों में पानी नहीं पहुंचता, पूरा विदर्भ सूखा पड़ा है. आपने रालेगण सिद्धी के लिए स्टाक डैम बनाकर एक नई परिपाटी स्थापित की और जहां पानी नहीं वहां पानी दिखाया लोगों को. मुझे लगता है कि आंदोलन करने के बजाय यदि आप विदर्भ के गांव गांव घूमते तो शायद किसानों की आत्महत्या रुक जाती. इस पर आप क्या कहेंगे.

अन्ना- वो बात बराबर है. अभी जब पिछली सरकार थी तब मैंने बार-बार कहा कि ये आत्महत्या रोकनी है तो उसकी खेती की पैदावार बढ़ाना जरुरी है और उस पैदावार पर सही दाम मिलना जरुरी है. ये दो बातें जब होगी तब आत्महत्या रुकेगी. पिछली सरकार को मैं कहता रहा उनके दिमाग में नहीं बैठी ये बात, अब नई सरकार आ गई, उसको भी मैं बोला हूं मुख्यमंत्री को. तो मुख्यमंत्री ने मेरे साथ बात रखी. मैंने उनको बताया कि ये रास्ता है, अभी उसने शुरु किया.

 

अशोक- महाराष्ट्र के सभी मुख्यमंत्री आपके चरणों में बैठते हैं ये बात तो सभी को पता है. चाहे विलासराव देशमुख थे या कोई थे. सभी आप को हैंडल करते थे.

अन्ना- मेरे पास क्या है. ये है कि वो कभी-कभी आंदोलन से डरते हैं इसके कारण होता है.

दिबांग- अन्ना मेरा आपसे सवाल है कि रालेगांव सिद्धी आपका गांव है, आदर्श गांव आपने बनाया. महाराष्ट्र में और सैकड़ों गांव ऐसे क्यों नहीं बने. एक ही गांव तक क्यों रुक गया आपका एक्सपेरिमेंट.

अन्ना- यही मेरा कहना था और भारत सरकार को भी कह रहा हूं कि आदर्श गांव सिर्फ पैसे से नहीं बनेगा. और आदर्श गांव की जो संकल्पना है कि सिर्फ पक्के रोड बनाना और भवन खड़ा करना और तीन मंजिल की पंचायत भवन बनाना ये आदर्श नहीं है. बिल्डिंग की ऊंचाई बढ़ते समय इंसान की विचारधारा नीचे आनी चाहिए. आज रालेगण सिद्धी में क्या हुआ. गांधी जी कहते थे देश बदलने के लिए गांव बदलना है और गांव बदलने के लिए गांव का आदमी लेकिन वो आदमी कैसे बदलता है ये हम लोगों ने कर के दिखाया. इरिगेशन है, एजुकेशन है, एग्रीकल्चर है. सभी डिपार्टमेंट का ट्रेनिंग सेंटर है लेकिन लीडरशिप ट्रेनिंग कहां है देश में. और जब तक लीडरशिप ट्रेनिंग खड़ी नहीं होगी तब तक आदर्श गांव नहीं बनेंगे.

 

सवाल शीला रावल- अन्ना आपने बातचीत में बार-बार कहा कि आप फकीर हैं, आप मंदीर में रहते हैं,आप के पास पैसे नहीं हैं क्या आप को अंदाजा नहीं है कि जब आप आंदोलन करते हैं तो आप के पास कितनी ताकत और पावर है. अगर वो पावर या ताकत आपकी सच्चाई और सादगी की नहीं होती तो रामलीला मैदान में इतनी भीड़ ना जुटती. और जब आपको पता है कि आप के नाम में पावर है तो ये जो भीड़ जुटी थी वो तो आम आदमी थे जो लीडर बन गए हैं उनको छोड़ कर बाकी तो आम आदमी हैं वो आपसे क्या उम्मीद लगाए,आपने उस आंदोलन को छोड़ क्यों दिया? आपने बीच में भ्रष्टाचार के आंदोलन को छोड़ कर नया आंदोलन शुरु करने की बात कर रहे हैं ऐसे क्यों अन्ना?

 

अन्ना- भ्रष्टाचार का आंदोलन छुटा नहीं है, अभी भी जारी है. अभी भी सरकार के पीछे मैं पड़ा रहता हूं. जैसे देश में लोकपाल और लोकायुक्त कानून बना है उसको लागू करो. ये आंदोलन हम छोड़ा नहीं. 2 अक्टूबर को मैं बैठूंगा तो भूमि अधिग्रहण उसके साथ-साथ वन रैंक वन पेंशन और तीसरा मुद्दा है लोकपाल और लोकायुक्त को लागू करो.

 

शीला- आपने नए-नए आंदोलन शुरु कर दिए लेकिन जो आपका मूल आंदोलन था भ्रष्टाचार का क्या आपको लगता है कि भारत में भ्रष्टाचार नहीं है.

अन्ना- वो आंदोलन हमारा छूटेगा नहीं शरीर में प्राण है तब तक नहीं छूटेगा.

शीला- जिसका मतलब होता है वो आपके पास आंदोलन करवाने आते हैं और अगर आप मुद्दे पर सहमत हो गए तो आंदोलन हो जाता है. जिसका स्वार्थ होता है वो अन्ना के नाम का उपयोग करने आप के पास आ जाता है. अभी आर्मी वाले आए हैं, फिर किसान आएंगे फिर कोई कोई और आएगा.

 

अन्ना- मैंने पहले बताया कि अगर मेरा फायदा उठाने के लिए मेरे पास वो आए तो मुझे क्या पता था कि ये पार्टी निकालेंगे और मेरे नाम का दुरुपयोग करेंगे. अगर मुझे पता होता तो मैं चार कदम दूर रहता.

शीला- क्या आपको लगता है कि जो आंदोलन में जुड़ जाते हैं वो आप के नाम का सदुपयोग तो नहीं करते लेकिन विश्वासघात करते हैं ?

अन्ना- विश्वासघात किसका होता है जिसका नुकसान होता है, कोई लूट होता है.

शीला- ऐसा होता रहा तो जनता का तो विश्वास उठ जाएगा ये सारे आंदोलनों से.

अन्ना- मेरे नाम का दुरुपयोग ये तो जनता को तय करना है. अभी जनता अभी बोल रही है कि इन लोगों ने जनता के नाम का फायदा उठाया है. मैं नहीं बोल सकता, मैं क्यों बोलूं की ये ऐसे इरादे के साथ मेरे पास आए थे.

सवाल उर्मीलेश- जब गांधी जी का नाम आता है और आप से जोड़ा जाता है तो आप बहुत खुश होते हैं. कई लोग आप को दूसरा गांधी कहते थे तब आप बहुत खुश होते थे रामलीला मैदान में. गांधी जी ने बहुत सारे मुद्दे जो देश को बदलने वाले हैं, समाज को बदलने वाले हैं उनको लेकर लड़ाई लड़ी. एक मुद्दा जो मैंने कभी नहीं देखा आपको लड़ते हुए. जो कि गांधी जी मानते थे कि बिना उस मुद्दे को लड़े बिना को देश को एक नहीं किया जा सकता, देश को सुंदर नहीं बनाया जा सकता, वो था कम्यूननिज्म का. यानि सेक्यूलर इंडिया को बिल्ड करने का. इस देश में करप्शन है, कम्यूनिज्म बहुत है और हाल के दिनों में बहुत बढ़ा है. मैंने आपको कम्यूनिज्म को कभी मुद्द बनाते नहीं देखा. आंदोलन की बात छोड़िए, अभियान तक चलाने तक नहीं देखा. तो क्या आपको थोड़ा सा हिंदूत्व से नजदीकी है. ऐसा है क्या कि आप थोड़ा हिंदूवादी भी हैं?

 

जवाब अन्ना- इसके बारें में मैं कहना चाहता हूं कि लोगों ने मुझे गांधी जी के साथ जोड़ा, यही मैं बहुत बड़ा दोष मानता हूं. कहां गांधी जी और कहां एक अन्ना हजारे. गांधी जी के पैर के पास बैठने की मेरी पात्रता नहीं है. कहां गांधी जी के विचार थे, वो विचार मेरे पास नहीं है. इसके कारण कुछ कमियां मेरे में रह भी सकती है. लेकिन गांधी जी के साथ जोड़ना ये मेरे साथ ठीक नहीं होगा. मैं तो एक सामान्य आदमी हूं और कहां गांधी जी के विचार थे. वो तो गांधी जी के विचारों का थोड़ा सा प्रभाव मेरे जीवन में पड़ गया. गांधी जी कहते थे देश बदलने के लिए गांव बदलना जरुरी है, क्यों तो गांधी जी के ये विचार थे कि प्रकृति और मानवता का दोहन करके विकास सही बात नहीं, वो बात मेरे दिमाग में बैठ गई. आज जो हम सब पेट्रोल, डीजल, कोयला जला रहे हैं उससे प्रदुषण बढ़ रहा है. इसके कारण मैंने पहले गांव को हाथ में लिया.

 

उर्मिलेश- अन्ना मेरा सवाल है कि जो दंगा फसाद की पॉलिटिक्स है. एक धर्म के लोगों को दूसरे धर्म के लोगों को लड़ाने की, इसके खिलाफ आप खड़े नहीं होते.

अन्ना- बात वही है कि सबके साथ में आप अन्ना हजारे को जोड़ेंगे तो ठीक नहीं है. जिसके पास कुछ नहीं है वो कैसे कर सकता है ये.

उर्मिलेश– गांधी जी के पास तो कुछ नहीं था वो नोवा खाली चले गए थे 1947 में.

अन्ना- गांधी जी के पास कुछ नहीं था लेकिन उनके पीछे बिरला जैसे लोग थे.

उर्मिलेश- आपके पीछे कोई नहीं है.

अन्ना- कोई नहीं है.

उर्मिलेश- इतनी बड़ी जो आपको पब्लिसिटी मिली आपके करप्शन के खिलाफ आंदोलन में तो क्या ये इशू इसलिए उठाते हैं कि ये अपील करता है मीडिल क्लास को. व्हाइट कॉलर वालों को,बहुत सारे टीवी वालों पंसद है ये मुद्दा.

 

अन्ना- ये बात बराबर है कि हमारा आंदोलन और अन्ना हजारे को आप लोगों ने बड़ा किया.

दिबांग- अन्ना आप भी भीड़ देखते हैं. क्योंकि घोषणा हुई कि आप रामलीला मैदान में एक बड़ी रैली करेंगे ममता बनर्जी के साथ पर भीड़ नहीं आई तो आप गए नहीं उसमें.

अन्ना- मैं ये कहा था कि ममता बनर्जी इंडिविजुअल, उसका चरित्र, उसका त्याग ये बहुत अच्छा है. ये मुझे पसंद आया था मुझे क्या पता था कि उसी के नाम पर मेरा फायदा उठाने के लिए और भी आ जाएंगे. जैसे दिल्ली में रैली रखी और मुझे लेटर लिखा कि ममता जी आ रही हैं आप रैली में आना और ममता जी को लिखा कि अन्ना हजारे आ रहे हैं आप रैली में आना. दोनो को अलग-अलग और उस दिन रैली रखी और देखा कि उधर 3 हजार लोग भी नहीं थे, चेयर पूरी खाली पड़ी है. मैंने अपने लोगों को भेजा कहा कि पता करो कि कितने लोग हैं, मुझे बताया कि ग्राउंड भर जाएगा. इसलिए मैं गया नहीं और तब से मैंने साथ छोड़ दिया उनका.

 

दिबांग- आप का ये कहना है कि अगर ममता बनर्जी अन्ना हजारे को कलकत्ता बुलाएंगी तो भरी रैली में जाएंगे.

अन्ना- अब नहीं जाउंगा क्योंकि उनके भी एमपी फंस गए हैं, दाग लग गया.

सवाल वर्तिका नंदा- अन्ना जी आप चाहे जो भी कहें लेकिन हिंदूस्तान की एक बड़ी आबादी आप में हिंदूस्तान और ऐसा ही लगता है कि महात्मा गांधी की छवि को आपने खुद एक तरफ से खुद अपनी तरफ से गढ़ने का प्रयास किया है. अगर आपको एक पूरे पैकेज के रुप में देखा जाए कि जिस पीढ़ी ने गांधी जी को नहीं देखा उसे भी ऐसा लगता है कि आप के जैसी ही छवि रही होगी महात्मा गांधी की. आपने कहा कि ममता बनर्जी की रैली में भीड़ नहीं थे इसलिए आप वहां नहीं गए. एक महात्मा भीड़ को कब से तौलने लगा? और दूसरा सवाल कि एक फकीर के तौर पर भी जो छवि आपकी महात्मा गांधी के साथ जुड़ी. उस छवि का आपको फायदा ज़्यादा हुआ या उस छवि का आपको खामियाजा उठाना पड़ा? क्योंकि आप कहते हैं कि एक अकेला अन्ना क्या क्या करे तो गांधी जी भी अकेले ही थे और अकेले ही उन्होंने बहुत किया. इस देश को एक ही महात्मा गांधी मिला और शायद इस देश को एक ही अन्ना हजारे भी मिले.

 

अन्ना-  मैंने पहले ही बताया कि गांधी जी के पैर के पास बैठने की मेरी पात्रता नहीं है. मैं गांधी जी को जब अब भी पढ़ता हूं तो और भी मुझे प्रेरणा मिलती रहती है तो कहां गांधी जी के विचार और कहां अन्ना हजारे. हां ये हुआ कि गांधी जी के विचारों का प्रभाव थोड़ा सा मेरे जीवन में हो गया. उससे एक सात्विक छवि थोड़ी सी बन गई और उसका गलत फायदा कई लोगों ने उठाया. एक बात अच्छी हुई कि सोने का एक बिस्तर है, खाने की एक प्लेट है लेकिन लखपति, करोड़पति को जो आनंद नहीं मिलता होगा हो मैं अनुभव करता हूं जीवन में.

 

दिबांग- अन्ना जो आप भाषण देते हैं जो आप बात कहते हैं लोगों को क्या आप खुद भी पालन करते हैं? आप कहते हैं कि राजनैतिक दल बने तो सब की जांच हो, अरविंद ने जांच नहीं की और लोग पकड़े जा रहे हैं. जब आप आंदोलन करते हैं तो क्यों नहीं जांच करते है अपने थर्मामीटर से कि ये अरविंद है ये पार्टी बनाएगा, ये किरन बेदी है ये बीजेपी में जाएगी. आप वो जांच क्यों नहीं करते जो जांच आप पार्टियों को करने के लिए करते हैं.

 

अन्ना- सब सवालों का जवाब तो मैं नहीं दे सकता क्योंकि मैंने पहले ही बताया है कि मैं कहीं बैंक बैलेंस नहीं रखता. अभी किसी प्रोग्राम में जाता हूं तो वो मुझे टिकट भेज देते हैं तो मैं जाता हूं. अभी सब पक्ष और पार्टी को चेक करना है तो कहां से मैं पैसा लाउं कैसे करुं उसे. 2011 का जब आंदोलन शुरु हुआ था तो अगर मुझे ये साथ मिलती तो तब से मुझे संगठन खड़ा करना शुरु करना था. पूरा देश खड़ा हो गया था. और उस टाइम पर लोगों का विश्वास भी बढ़ गया था. अगर मैं कोशिश करता और हर राज्य में जाता, सभा करता और लोगों को बताता कि भई देश को बचाने के लिए देश में एक बड़ा संगठन खड़ा करना जरुरी है तो आज देश में एक बड़ा संगठन खड़ा हो सकता था लेकिन मेरी इस कमजोरी के कारण, कहीं बैंक बैलेंस ना होने के कारण मैं कर नहीं पाया.

 

दिबांग- अन्ना आप को अफसोस होता है कि एक बहुत अच्छा मौका था आपके पास जो हाथ से निकल गया.

अन्ना- जी हां मुझे महसूस होता है. लाखों युवा रास्ते पर उतर गए. युवा शक्ति राष्ट्र शक्ति है. युवा शक्ति अगर जाग जाए तो कल का भविष्य बदल जाएगा. मैं एक युवा था 25 सालों का तो गांधी जी के विचारों का, विवेकानंद जी के विचारों का प्रभाव पड़ा तो आज कुछ कर पाया.

 

दिबांग- आप जब रालेगण सिद्धी में अकेले बैठकर सोचते होंगे तो आपको क्या लगता है कि आप के अंदर भी कोई कमजोरी रही कि इतने जो युवा सड़क पर उतरे, इतनी उम्मीद से आपके साथ उतरे और उसको सही जगह नहीं ले जा पाए.

 

अन्ना- क्या है कि मेरे में कमजोरी होगी मैं इंकार नहीं कर सकता लेकिन मेरी कमजोरी मुझे नजर नहीं आती, दूसरों को बताना चाहिए कि आप की ये कमजोरी है तब समझ में आती और दूसरे भी नहीं बता रहे हैं. इसके कारण भी थोड़ी सी गड़बड़ी हो सकती है.

 

सवाल निलांजन- अन्ना जी 2011 से जो भ्रष्टाचार के खिलाफ जो आंदोलन हुआ. उसमें बहुत लोग जुड़े और बहुतों ने बहुत कुछ गलत किया. शायद आपने भी बहुत कुछ गलत किया हो. दो महीने बाद आप एक और बहुत बड़ा जन आंदोलन छेड़ने वाले हैं वन रैंक वन पेंशन पर तो जनता हिंदूस्तान की ये कैसे यकीन करेगी कि पिछली गलतियों से आप क्या सीखे हैं और उसको किस तरह से सुधारने की कोशिश करेंगे.

 

अन्ना- मैंने एक चीज बहुत अच्छे से सीखी है कि गलती हुई होगी वो मैं इन्कार नहीं कर सकता लेकिन उस आंदोलन के बाद देश में जो जागृति आ गई करोड़ों रुपया खर्च करके भी नहीं आनी थी. लोग खड़े होने लगे, बोलने लगे, रास्ते पर निकलने लगे. ये क्या कम नहीं है. तो ये मैं उस आंदोलन की सफलता मानता हूं कि आज लोग खड़े होकर बोल रहे हैं.

 

निलांजन- गांधी जी की बात आप जो बार-बार बोल रहे हैं आजादी के बाद से अगर हम आप से पूछे कि गांधी जी, नेहरु जो आजादी के आंदोलन के नेता थे, उसके बाद जो नेता हिंदूस्तान में पैदा हुए जो लोग सत्ता चलाते हैं इनमें से आप किसी को अच्छा आदर्श नेता मानते हैं या सारी पार्टी के नेता एक ही रंग में रगें नजर आते हैं आपको कि किसी पर कोई भरोसा नहीं किया जा सकता.

 

अन्ना- मेरे सामने आदर्श लाल बहादुर शास्त्री जी का है. मंत्री होते हुए रेल का एक्सीडेट होता है और इस्तीफा दे दिया.

निलांजन- तो आपने मांग नहीं की उन मंत्रियों के इस्तीफे की जिनके खिलाफ अभी करप्शन के चार्जेज हैं. अगर लाल बहादुर शास्त्री ने एक रेल एक्सीडेंट पर इस्तीफा दिया तो उन मंत्रियों क्यों नहीं देना चाहिए इस्तीफा.

अन्ना- आप का प्रश्न है कि आज के लीडर में कौन है तो उसका जवाब मैं दे रहा हूं कि उनका चरित्र, आचार, विचार उनका त्याग, अपमान करने की शक्ति तो ये जब मैं देखता हूं तो सही नेता लाल बहादुर शास्त्री हैं. ऐसे नेता देश में होते तो ये देश बहुत आगे जाता.

 

सवाल दिबांग- आप लाल बहादुर शास्त्री को आदर्श मान रहे हैं तो क्या ये जो नेता हैं उन्हें आरोप लगने पर ही इस्तीफा नहीं दे देना चाहिए.

अन्ना- नैतिक मूल्यों को संभालते हुए अगर आरोप होता है तो इस्तीफा दे देना चाहिए.

दिबांग- सुषमा स्वराज को इस्तीफा देना चाहिए.

अन्ना- जिन पर भी आरोप है अगर नैतिक मूल्य संभालना चाहते हैं तो देना चाहिए अगर नहीं तो ठीक है.

दिबांग- तो आप ये कह रहे हैं कि ये जो तीन लोग चाहे शिवराज सिंह चौहन हों, वसुंधरा राजे सिंधिया हों या सुषमा स्वराज. ये आप के नैतिकता के पैमाने पर जीरो हैं.

अन्ना- नहीं-नहीं मैं ऐसा कैसे कह सकता हूं. मेरे सामने आदर्श हैं लाल बहादुर शास्त्री. अगर नैतिक मूल्यों को संभालते हुए ऐसा किया तो आपकी इमेज बढ़ती है, कम नहीं होती.

सवाल दिबांग- मैं आप से पूछ रहा हूं अन्ना आपने जो आंदोलन खड़ा किया उसका सीधा फायदा नरेंद्र मोदी को हुआ. लोगों में जो गुस्सा था वो आप सामने लाए. नरेंद्र मोदी ने उसका लाभ उठाया, नरेंद्र मोदी को आप कैसे आंकते हैं, कैसा काम कर रहे हैं नरेंद्र मोदी?

 

अन्ना- मैं नहीं कह सकता लेकिन जब मैं घूमता हूं तो लोग बताते हैं कि आपका फायदा नरेंद्र मोदी को मिल गया है ऐसा लोग कहते हैं, मुझे क्या पता. मैं तो शुरु-शुरु में अपेक्षा से देख रहा था और ये लोग भी सब बोल रहे थे कि अच्छे दिन आएंगे तो मैं भी 8 महीना कुछ बोला नहीं. मैं बोला अच्छे दिन आने वाले हैं तो कुछ बोलना नहीं. लेकिन अभी एक साल दो महीना बीत गए, वो अच्छे दिन दिखाई नहीं दे रहे.

दिबांग- तो आपने नुकसान करवा दिया मनमोहन सिंह का और नरेंद्र मोदी का फायदा करवा दिया.

अन्ना- मनमोहन सिंह का नुकसान नहीं करवाया. वो लोग हारे अच्छा हुआ मैं ऐसा मानता हूं. इतना करप्शन बढ़ गया फिर भी लोग चुप बैठे हैं. बलिदान की आग रखेंगे या नहीं हम. और ये भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु जा रहे हैं फांसी का तख्ता देख रहे हैं फिर भी घोषणा जारी है. इंकलाब जिंदाबाद, वंदे मातरम, भारत माता की जय और अंग्रेजों को कह रहे थे कि इस जन्म की क्या अगले जन्म की फांसी दे दो. किसलिए हमारी आजादी के लिए. उनको याद रखेंगे या नहीं.

दिबांग- अन्ना जो आप बात कह रहे हैं तो मौन तो हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी भी हैं उनको भी लोग कह रहे हैं कि ये तो मौन मोदी हैं.

अन्ना- वो जब मौन रहते हैं तो वो भाषा जनता को समझ में आती है. मैं आंदोलन में कई बार मौन रहा, जब मैं मौन हो जाता था तो मेरी भाषा सरकार को समझ में आ जाती थी और कई प्रश्न उठा देते थे. कभी-कभी मौन की भाषा कई लोगों को समझ में आती है.

दिबांग- तो आप को लगता है कि नरेंद्र मोदी को मौन रखना चाहिए.

अन्ना- मन की बात कहते हैं ना ऐसे ही जन की बात भी कहो.

सवाल आनंद प्रधान- अन्ना जब इंडिया अगेंस्ट करप्शन का आंदोलन चल रहा था और उस आंदोलन में आपके कई साथी थे. अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, गोपाल राय, किरन बेदी थीं और दूसरी तरफ प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव भी थे और उनके साथ प्रोफेसर आंनद थे. अब इनमें भी बंटवारा हो गया दोनों दो रास्ते पर चले गए. अब प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, आंनद कुमार किसानों के सवाल को लेकर देश में स्वराज आंदोलन चलाने की तैयारी कर रहे हैं. वो कह रहे हैं कि हम आंदोलन में जाना चाहते हैं. आप आंदोलन के साथी के तौर पर आप किसके ज्यादा करीब आप अपने आप को पाते हैं?

 

जवाब अन्ना- ये लोग मेरे पास आए थे. स्वराज वाले जो अभी आंदोलन कर रहे हैं ना वो मिट्टी के घड़े लेकर जाने वाले हैं संसद के सामने कि आप इसी मिट्टी से आए हैं याद रखना.

आनंद प्रधान- वो आप ही के आंदोलन की टैक्टिस इस्तेमाल कर रहे हैं. जैसे आप करते थे.

अन्ना- वो मेरे पास आए तो मैंने सबसे पूछा कि आप जो आंदोलन शुरु कर रहे हैं तो क्या अरविंद की नकल तो नहीं होगी.

आनंद प्रधान- वो कह रहे हैं कि आप की नकल कर रहे हैं.

अन्ना- वो कह रहे हैं लेकिन मैंने उनसे पूछा कि जैसे अरविंद ने पार्टी निकाली ऐसे आप लोग तो नहीं करेंगे.

आनंद प्रधान- क्या जवाब मिला आप को.

अन्ना- बोला कि हम नहीं करेंगे ऐसा.

आनंद प्रधान- तब आप जाएंगे उनके साथ.

अन्ना- जब तक यकीन नहीं हो जाता तब तक नहीं. हां एक बात है कि अभी पक्ष और पार्टी में नहीं है ना, समाज और देश के भले के लिए कुछ करते हैं ना तो मुझे लगता है कि तो कुछ मैं सपोर्ट कर सकता हूं. लेकिन उनके साथ मैं नहीं जाउंगा.

आनंद प्रधान- अगर वो आपके आंदोलन में आ जाए तो?

अन्ना- नहीं ऐसे लोगों तो फार्म भरना पड़ेगा ना, एफिडेविट कर के देना पड़ेगा.

दिबांग- और फार्म भर कर दे दें तो आप उनके साथ रहेंगे.

अन्ना- हां एफिडेविट करके अगर दिया तो करुंगा और अगर पक्ष और पार्टी में गए तो कोर्ट में खीचूंगा एक एक को.

सवाल संगीता तिवारी- अन्ना आपने कहा कि आपको इस बात का अफसोस है कि 2011 में जो आंदोलन खड़ा हुआ था, अगर वो जारी रहता तो बहुत बड़ा आंदोलन खड़ा हो सकता था, देश की सूरत बदल सकती थी. क्या आपको इस बात का अफसोस है कि केजरीवाल के पार्टी बनाने के चलते वो आंदोलन खत्म हो गया.

 

जवाब अन्ना- नहीं-नहीं ऐसा नहीं है. अरविंद भले गया आज भी आप देखेंगे कि रालेगण सिद्धी में डेली विभिन्न राज्यों से, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु अलग-अलग राज्यों से इतने लोग आते हैं.

संगीता- लेकिन वो आंदोलन अगर खत्म हुआ तो उसके लिए आप किसके जिम्मेदार मानते हैं.

अन्ना- इसका जिम्मेदार तो मैं हूं कि मैं सबके साथ संपर्क नहीं बना पाया, देश में घूम नहीं पाया तो जिम्मेदार मैं हूं. लेकिन मुझे आज भी विश्वास है कि अभी देखो आज भी मैं जाता हूं बाहर तो ये नवयुवक जब फोटो लेने के लिए धक्कामुक्की करते हैं. उनके दिल में आज भी आशा है.

दिबांग– सेल्फी खींचते हैं.

अन्ना- क्योंकि उनके अंदर एक आदर की भावना है.

दिबांग- अन्ना आपको क्या लगता है कि कौन ऐसे लोग थे जिन्होंने आप को घूमने नहीं दिया, आप क्यों नहीं उनको पीछे हटा कर घूमने निकले?

अन्ना- नहीं नहीं किसी ने रोका नहीं मैं घूम नहीं पाया ना मेरी आर्थिक स्थिति के कारण. कैसे घूम सकता हूं, पैसे के बिना तो कदम नहीं बढ़ा सकता हूं.

सवाल दिबांग- आप नया आंदोलन शुरु करने जा रहे हैं, नए मुद्दे उठाने वाले हैं 2 अक्टूबर से. आप लोगों को ये कैसे विश्वास दिला पाएंगे लोगों को कि भई मेरे साथ आओ इस बार हम लोग धोखा नहीं खाएंगे इस बार हम लोग आगे तक जाएंगे. क्या कहेंगे आप?

जवाब अन्ना- मेरे साथ आओ ये मैंने जीवन में किसी को कहा नहीं. मैंने हमेशा समाज और देश के बारे में सोचा है. अगर आप चाहते हैं कि समाज और देश का भला हो तो हम सब को ये लड़ाई मिल कर लड़ना होगा. मेरे साथ आओ ये मैंने नहीं कहा और ना कहूंगा. जिनको लगता है कि मुझे समाज और देश के बारे में कुछ करना है तो वो आ जाएंगे और जुड़ेंगे और हम सब मिलकर आगे बढ़ेंगे.

 

रैपिड फायर राउंड (पांच सवाल)

दिबांग- अन्ना अब मैं आप से पांच सवाल पूछूंगा और आप को दो ऑप्शन दूंगा उनमें से आप को एक जवाब चुनना होगा है और किसी सवाल का जवाब नहीं देना चाहें तो कह सकते हैं कि मुझे जवाब नहीं देना है. और अगर आप तीन सवालों का सही जवाब देते हैं तो मैं आपको ये गिफ्ट दूंगा.

 

सवाल दिबांग- आपके मुताबिक दिल्ली का बेहतर मुख्यमंत्री कौन हो सकता है.

1.अरविंद केजरीवाल  2.किरन बेदी

जवाब अन्ना- मेरे कहने से नहीं होगा. जनता का कबूल है.

दिबांग- अगर आपको इनमें से एक को वोट देना हो तो आप किसको देंगे.

अन्ना- अरविंद को जब जनता ने स्वीकार है तो उसको मानना पड़ेगा.

सवाल दिबांग- आपके लिए अच्छे दिन कब थे? जब आप फौज में थे या जब आप रामलीला मैदान में थे और युवा आप के सामने भरे थे.

जवाब अन्ना- ये जवाब देना मुश्किल है.

सवाल दिबांग- क्या आपके घरवालों ने कभी शादी के लिए किसी लड़की को तय किया था ? हां या ना में जवाब दीजिएगा

जवाब अन्ना- हां

सवाल दिबांग- क्या आप राष्ट्रपति बनना चाहते हैं? हां या ना में जवाब दीजिएगा

अन्ना- नहीं  

सवाल दिबांग- देश का नेता कैसा हो ? नरेंद्र मोदी जैसा या राहुल गांधी जैसा?

जवाब अन्ना- दोनो जैसा भी नहीं.

दिबांग- आपको राहुल गांधी से क्या परेशानी है?

अन्ना- उनको गुस्सा जल्दी आता है और गुस्सा जिसके दिल में है वो देश का भला नहीं कर पाएगा. अपमान पीने की शक्ति होना चाहिए तब समाज और देश की भलाई कर सकते हैं.

दिबांग- और नरेंद्र मोदी

अन्ना- वो सिर्फ आश्वासन देते हैं, करते कुछ नहीं हैं. इसके कारण ऐसा नेता ठीक नहीं है. कथनी और करनी में अंतर नहीं होना चाहिए. इसलिए मैंने एक पत्र लिखा था उनको. आप प्रभु रामचंद्र को मानते हैं. रामायण में एक दोहा है.

‘रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन ना जाए’  आप वचन देते हैं लेकिन पालन नहीं होता. ये बात ठीक नहीं है. आपके कथनी और करनी में अंतर है ये मैंने लिखा है.

 

दिबांग- अन्ना आप बुरा मत मानिए गुस्सा आप को भी बहुत आता है. पर आपने कहा कि गुस्सा नहीं आना चाहिए.

अन्ना- ऐसा है गुस्सा अलग-अलग प्रकार का होता है. स्वार्थ के लिए जो गुस्सा आता है वो समाज और देश की भलाई नहीं कर सकता. लेकिन समाज और देश की भलाई के लिए जो गुस्सा आता है वो सही गुस्सा है. और ऐसा गुस्सा आना चाहिए. जैसे भगत सिंह ने बम फोड़ा वो गुस्से के कारण फोड़ा और उससे देश की भलाई हुई.

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