कैदियों के भी हैं मानवीय अधिकार

By: | Last Updated: Saturday, 20 September 2014 7:29 AM
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प्रतीकात्मक तस्वीर

नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत की ओर से विचाराधीन कैदियों पर आया फैसला अहम है. कोई भी विचाराधीन कैदी अगर अपनी सजा का आधा समय जेल की सलाखों में गुजार चुका है तो अब उसे जेल की अंतहीन यातना नहीं सहनी पड़ेगी. सरकार ने इस फैसले पर गंभीरता से विचार किया तो इसका लाभ जल्द जेलों में बंद मानसिक पीड़ा झेल रहे कैदियों को मिलेगा.

 

धारा 336ए के तहत अदालत का यह आदेश मानवीय हितों और जेल की तकनीकी समस्याओं को देखते हुए आया है. बदलते वक्त के साथ अपराध की गति भी तीव्र होती दिखती है.

 

इससे अदालतों और जेलों पर जहां फैसलों और कैदियों को बोझ बढ़ रहा है, वहीं सामाजिक ढांचा भी दरक रहा है, जेलों की सुरक्षा पर भी सवाल उठते हैं.

 

निर्भया और उत्तर प्रदेश के एनआरएचएम घोटाले में आरोपियों की मौत जेल की सलाखों में हो गई. इस फैसले से जेलों में कैदियों की बाढ़ को कम किया जा सकता है.

 

मानवीय अधिकारों और संवेदना के संदर्भ में इसका दूरगामी प्रभाव पड़ेगा. आम तौर यह देखा गया है कि मामूली जुर्म में भी लोगों को जेलों में ठूंस दिया जाता है.

 

जेल अपराराधी प्रवृत्ति के लोगों और दुर्दात अपराधियों के लिए पनाहगार हो सकती है लेकिन आम कैदियों और साधारण जुर्म के आरोपियों के लिए जेलें किसी नारकीय यातना गृह से कम नहीं होती हैं.

 

आम तौर पर देखा गया है कि पुलिस असीमित अधिकार वाली आईपीसी की धारा 151 का भी दुरपयोग करती है. इस धारा में पुलिस निजी मुचलके पर भी आरोपियों को छोड़ सकती है लेकिन वह ऐसा नहीं करती है.

 

समाज के प्रभावशाली लोगों की जमानत तो इस धारा में तत्काल हो जाती है. लेकिन गरीब तबके के लोग कई महीने झेलने के बाद बाहर आते हैं उनकी कोई जमानत तक लेने को तैयार नहीं होता है. यह पुलिस और काननू का दोहरा नजरिया है जिससे जेलों पर अनावश्यक भार बढ़ता है.

 

देश में पुलिस के मामले की बढ़ती संख्या से कैदियों की आमद से जेल की व्यवस्था चरमराने लगी है. इसका नतीजा है कि आए दिन जेलों में आरक्षियों की गैर मानवीय हरकतों, मारपीट, घटिया भोजन और जेलब्रेक की घटनाएं मीडिया की सुर्खियां बनती हैं. इसका असर कानून-व्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ता है.

 

देश की 13 हजार से अधिक जेलों में 3 लाख 81 हजार कैदी बंद हैं. इसमें सजायाफता और विचाराधीन दोनों श्रेणियों के कैदी हैं, जबकि विचाराधीन कैदियों की संख्या 2 लाख 54 हजार है.

 

वहीं उत्तर प्रदेश में कुल 37 हजार 827 कैदी हैं. सर्वोच्च न्यायालय के हाल में आए आदेश में कहा गया है कि जेलों में बंद जिन विचाराधीन कैदियों ने अपनी सजा का आधा वक्त काट लिया है, उन्हें रिहा कर दिया जाए.

 

इस फैसले से उत्तर प्रदेश की जेलों में बंद 20 हजार से अधिक कैदियों को लाभ मिलेगा. अदालती फैसले के बाद अगर केंद्र सरकार इस पर गंभीरता से विचार करती है तो एक लाख से अधिक कैदियों को जेल की जिल्लत से मुक्ति मिल जाएगी. अगर ऐसा संभव हुआ और सरकार की संवेदना जागी तो निश्चित तौर पर यह एक उचित फैसला साबित होगा.

 

इससे जहां लंबे वक्त से जेलों में बंद कैदियों को अपने गुनाह को सुधारने का वक्त मिलेगा. वहीं बाकि बची जिंदगी को वे अपनों के साथ खुशहाल बना सकते हैं.

 

किसी कारणवश अगर उनके कदम अपराध की दुनिया की ओर बहक गए होंगे तो वे इस फैसले से वापस लौट सकते हैं. आम तौर पर देखा गया है कि देश की अदालतों और जेलों में ऐसे हजारों बेगुनाह हैं जिनका कोई जुर्म नहीं है, लेकिन वे साक्ष्य के अभाव में सजा काट रहे हैं. यह फैसला उनकी जिंदगी में नयी सुबह लेकर आएगा.

 

न जाने कितने ऐसे बेगुनाह कैदी होंगे जिनके सपने ही टूट गए होंगे. किसी की पूरी की पूरी जिंदगी जेल की सलाखों में खप जाती है. लेकिन अदालत का यह फैसला हजारों परिवारों के लिए सुकून देने वाला है. इस फैसले पर सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए, ताकि पुलिस का कानूनी डंडा किसी बेगुनाह पर न बरसे.

 

अदालतों पर अनावश्यक बोझ न बढ़े इसके लिए पुलिस, अदालतों और सरकारों को मिलकर काम करना होगा. आमतौर पर देखा गया है कि किसी हाईप्रोफाइल मामले में पुलिस राजनीतिक दबाव के चलते निर्दोष व्यक्ति को जेल की सलाखों तक पहुंचा देती है.

 

अदालत भी आईपीसी की धाराओं की संगीनता को देखते हुए उसे अदालती पेशी के बाद जेल में भेज देती है. अगर पहली पेशी के दौरान अदालत गंभीरता से विचार करे तो अधिकांश बेगुनाह जेल की अंतहीन यातना और जिल्लत से बच सकते हैं.

 

जेलों में कैदियों के अधिकारों के लिए जेल सुधार व निगरानी आयोग का भी गठन होना चाहिए जो कैदियों के मानवीय अधिकारों की समय-सयम पर समीक्षा करे. अगर खामिया मिलती हैं तो इसके लिए जेल अफसरों को दंडित किया जाना चाहिए.

 

गरीब और पीड़ित लोगों के लिए अदालतों में कानूनी सेल की स्थापना भी की गई है लेकिन किसी को यह सहायता नहीं मिल पाती है. अधिकांश गरीब व पीड़ित व्यक्तियों को यह पता ही नहीं होता है कि उनकी कानूनी सहायता के लिए अदालतों में सेल भी गठित है. इसका बेजा लाभ कालीकोट वाले उठाते हैं.

 

फिलहाल अदालत की ओर से आए इस फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए. इस पर सरकार को संवेदनशीलता से सोचना चाहिए. जिससे आम कैदियों और दूसरे लोगों के अधिकारों की रक्षा हो सके.

 

आधी सजा काट चुके लोगों की अगर रिहाई होती है तो इससे देश की जेलों में बंद एक लाख से अधिक लोगों को लाभ मिलेगा. वहीं उत्तर प्रदेश की जेलों में बंद कम से कम 20 हजार विचाराधीन कैदी जेल की जिल्लत भरी चाहारदीवारी से बाहर आकर खुली हवा में शेष जिंदगी गुजार सकेंगे और उनके मानवीय अधिकारों की रक्षा हो सकेगी.

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