व्यक्ति विशेष: कभी सिलाई करके पेट पालती थी 'राधे मां'!

By: | Last Updated: Saturday, 8 August 2015 4:38 PM
radhe maa

शाही अंदाज और शाही तख्तों ताज के साथ राधे मां का दरबार सजता है. झिलमिलाते लाल कपड़े, हाथों में लाल चूड़ियां, माथे पर लाल तिलक और होठों पर सुर्ख लाल लिपिस्टिक. लेकिन लाल रंग का ये सिलसिला यहीं नहीं रुकता बल्कि पूरे माहौल को ही लाल रोशनी के जरिए और भी लाल बना दिया जाता है और ऐसे लाली भरे उत्तेजक माहौल के बीच सजता है राधे मां का दरबार.

 

मां दुर्गा का अवतार होने का दावा करने वाली गुरु राधे मां के दर्शन के लिए लोगों की भीड़ उमड़ती है, उनके सैकड़ों भक्त भी बताए जाते हैं और वो मुंबई के जिस अमीर कारोबारी गुप्ता परिवार के साथ रहती थीं उसी घर में उनका ऐसा दरबार भी लगता था. लेकिन राधे मां के खिलाफ आरोपों का जो सिलसिला शुरु हुआ है उसकी शुरुआत भी गुप्ता परिवार से ही हुई है.

 

गुरु राधे मां पर दहेज प्रताड़ना का आरोप लगाने वाली निक्की गुप्ता मुंबई के उसी एम एम गुप्ता परिवार की रिश्तेदार है जिसने मुंबई में राधे मां को रहने के लिए ना सिर्फ अपना आशियाना दे दिया बल्कि अपने कंधों पर बिठाकर उन्हें लोकप्रियता की बुलंदियों तक भी पहुंचा दिया लेकिन राधे मां पर आरोप ये भी लगे है कि उन्होंने उसी गुप्ता परिवार में उन्होंने दरार डाल दी है.

 

मनमोहन ने कहा कि गुरु मां को बच्चों को नहीं तोड़ना चाहिए था. इसलिए मैं ज्यादा आहत हूं. मुंबई के एम एम मिठाईवाला ग्रुप के चेयरमैन मनमोहन गुप्ता के इस बयान के पीछे राधे मां से जुड़ी वो रहस्यमयी कहानी छिपी है. जिसमें उनको लेकर उठ रहे तमाम सवालों के जवाब भी मौजूद है. आखिर कौन है ये राधे मां. और क्यों पुलिस उनसे दहेज उत्पीड़ने के मामले में कर रही है पूछताछ. इन सारे सवालों के जवाब आपको भी मिलेंगे लेकिन इसके लिए राधे मां के अतीत के उस तिलिस्मी संसार में झांकना होगा जिसके दरवाजे पर लिखा है सुखविंद कौर का नाम.

 

राधे मां ने कहा था कि मेरी सारी गलतियां, फगवाड़े वाले मुझे माफ कर दें. दरअसल ये उन दिनों की बात है जब राधे मां को चमत्कारी देवी के तौर पर प्रचारित करने की शुरुआत भर हुई थी. लेकिन फगवाड़ा शहर राधे मां की जिंदगी का एक पड़ाव भर था दरअसल तीस साल पहले उनकी जिंदगी की शुरुआत पंजाब के ही गुरुदासपुर जिले से हुई थी जहां उनका जन्म हुआ था.

 

दिल्ली से करीब 460 किलोमीटर दूर ये है पंजाब का शहर गुरुदासपुर. इस शहर से गुरु राधे मां के सफर के शुरुआत की वो कहानी जुड़ी है जो खुद किसी चमत्कार से कम नहीं है क्योंकि आज भक्तों की नजर में वो खुद एक चमत्कार बन चुकी है.

 

राधे मां खुद को दुर्गा देवी का अवतार बताती है और उनके भक्तों की नजर में वो भगवान भी बन चुकी है लेकिन एक संन्यासिन का ऐसा शाही अंदाज आम लोगों को हैरानी में डाल देता है. इस कथित देवी ने भले ही अपने भक्तों की जिंदगी में चमत्कार किए हो या ना किए हो लेकिन खुद राधे मां की जिंदगी किसी चमत्कार से कम नहीं है. 43 साल की जिंदगी में फर्श से अर्श तक का सफर तय करने वाली राधे मां की जिंदगी में आखिर कैसे हुआ ये चमत्कार?

 

राधे मां की बुआ के बेटे रंजीत सिंह बताते हैं कि मैंने कभी ऐसी बात नहीं देखी. भगवान आदमी में प्रवेश कर जाए. आज तक मैंने ऐसा सुना नहीं. तो मेरे ख्याल में ये सब कुछ प्लान है. मेकअप करा के किसी के हाथ में ऐसे त्रिशूल पकड़ा कर आप आगे कर दीजिए लोगों का क्या है लोग पीछे लग जाते हैं.

 

राधे मां के बारे में उनके करीबी रिश्तेदार का ये बयान ही राधे मां के मायाजाल को समझने के लिए काफी है लेकिन राधे मां का पूरा सच जानने के लिए गुरुदासपुर जिले के उस दोरांगला गांव में जाना होगा जहां 45 साल पहले एक बच्ची गुड़िया ने जन्म लिया था. 

 

राधे मां के पिता अजीत सिंह बताते हैं कि जब वो छोटी थी तब हम उन्हें गुड़िया कह कर बुलाते थे. जब वो स्कूल चली गई तो हमने उसका नाम सुखविंदर कौर रख दिया. दसवीं की पढाई उन्होंने हमारे साथ रहकर की.

 

पंजाब के बिजली विभाग में काम करने वाले सरदार अजित सिंह के घर तीन मार्च 1969 को राधे मां का जन्म हुआ था. बचपन में राधे मां को घर वाले प्यार से गुड़िया बुलाया करते थे लेकिन जब उनका दाखिला गांव के ही स्कूल में करवाया गया तो उनका नाम बदलकर सुखविंदर कौर रख दिया गया था. दोरांगला के गवर्मेंट एल एस एम सीनियर सेकेंडरी स्कूल से राधे मां ने दसवीं तक की पढ़ाई की है. राधे मां को बचपन के दिनों से जानने वाले उनके भक्त विवेक पाठक उनके स्कूल की ये कहानी कुछ इस तरह बयान करते हैं.

 

राधे मां के भक्त विवेक पाठक बताते हैं कि नार्मल स्कूल था देवी मां का. सीनियर सेकेंड्री स्कूल था. उनके टीचर भी उनको साधारण बच्चों की तरह न लेकर इनको एक्ट्रा रुप में लेते थे. किसी बच्चे के पास खाना नहीं होता था उसे अपना खाना दे देते थे. अपनी पॉकेट मनी किसी जरुरत मंद बच्चे को दे देते थे. प्रिंसिपल और टीचर बताते थे कि हमें लगता था कि स्कूल में कोई सच्ची आत्मा है. इसीलिए इनको वो अलग ट्रीट करते थे.

 

दोरांगला के मोहल्ले की गलियों में राधे मां उर्फ सुखविंदर कौर का बचपन खेलते कूदते हुए गुजरा है. राधे मां को करीब से जानने वाले बताते हैं कि बचपन से ही उनका मन धार्मिक कामों में ज्यादा लगता था. राधे मां के पिता का ये दावा भी है कि बचपन में राधे मां उनके घर के सामने बने मंदिर में अपना ज्यादातर वक्त गुजारा करती थी. राधे मां के परिवार के करीबी रहे विवेक पाठक बचपन के अपने दिनों को याद कर बताते हैं कि सुखविंदर कौर उर्फ राधे मां कम उम्र से ही भविष्यवाणियां भी करने लगी थी.

 

राधे मां के भक्त विवेक पाठक बताते हैं कि देवी मां के पिता और मेरे पिता दोस्त थे. बचपन से जानते है हम. तब हमें पता नहीं था कि देवी मां में माता की ज्योत है. तब उन्होंने मेरे फादर के लिए 2-3 भविष्यवाणी की थी. तब हमें पता चला कि इनके अंदर कोई नेचुरल पावर है. मेरे फादर बहुत शॉक्ड थे कि इतनी सी भविष्यवाणियां कर रहा है और वो सच हो रही हैं क्योंकि हमारा परिवार शुरु से माता चिंतपुर्णी के भक्त रहे हैं औऱ ये उसी मां चिंतपूर्णी की कृपा है कि देवी मां हमें इस कलयुग में मिले तो. बचपन में जब उन्होंने चोला नहीं पहना था तब वो कोई भी बात मुंह से निकालती थी और वो सच हो जाती थी.

 

मुकेरिया डेरा के महंत बलदेव बताते हैं कि लोग कहते थे कि इनको पहले से ऐसी चौकी जैसी आती थी. बचपन से ही जैसे कोई सामान के पास में होती थी तो उसको बांधने लगती थी. मतलब किसी गरीब की मदद करने लगती थी. और अद्भुत काम करती थी जैसे आम आदमी मानेगा कि जैसे पागल है. तो कभी कभी किसी डॉक्टर को या बाबा को दिखाते थे तो ऐसा करते करते उनके पिता ने मुकेरिया में शादी किया था.

 

दोरांगला में राधे मां ने अपनी जिंदगी के शुरुआती 17 साल गुजारे हैं लेकिन सत्रह साल की इस उम्र तक राधे मां की जिंदगी में कोई चमत्कार नहीं हुआ था और ना ही उन्होंने किसी की जिंदगी में कोई चमत्कार किया था. साल 1986 में राधे मां ने जब दसवीं की परीक्षा पास कर ली तो उनके पिता ने उनकी शादी तय कर दी थी. गुरुदासपुर से करीब 25 किलोमीटर दूर मुकेरियां के मोहनलाल के साथ राधे मां की शादी हुई थी और इसीलिए वह शादी के बाद दोरांगला से अपने ससुराल मुकेरियां चली आई जहां उनकी जिंदगी में पहली बार अहम बदलाव आए.

 

मुकेरिया में सुखविंदर कौर उर्फ राधे मां अपने ससुराल में रहा करती थी. राधे मां को ससुराल में एक नया नाम भी मिला था लोग उन्हें बब्बू के नाम से भी पुकारा करते थे. राधे मां के करीबी रिश्तेदार बताते हैं कि शादी के बाद से ही उनकी जिंदगी में एक संघर्ष की शुरुआत हो गई थी. दरअसल राधे मां के घर की माली हालत ठीक नहीं थी और इसीलिए घर खर्च चलाने के लिए उन्होंने लोगों के कपड़े सीने का काम भी शुरु कर दिया था.

 

राधे मां की बुआ के बेटे रंजीत सिंह बताते हैं कि इनके हालात तक खराब हो गए तो मायूस रहने लगी लेकिन तब राधे मां ने मेहनत जरुर की. कपड़े जींस सीकर इन्होंने मेहनत की. तो ये अच्छी बात है अपने परिवार को पालने के लिए ये सब.

 

महंत बलदेव बताते हैं कि टेलरिंग का काम करती थी. उनके पिता और भाई भी अच्छे पद पर थे. उनके ससुराल वालों का मिठाई का काम था वो हलवाई थे. हलवाई का काम उनका मुकेरिया में काफी मशहूर है. हलवाई के नाम से उनके जेठ काम करते है तीन चार भाई थे हलाई का काम करते थे.

 

बब्बू के राधे मां बनने की शुरुआत मुकेरिया के इसी घर से हुई थी. गुरदासपुर के रांगला गांव की बब्बू को ब्याह कर सबसे पहले यहीं लाया गया था. उनके पति मोहन लाल अपने परिवार के साथ इसी घर में रहते थे. काफी समय तक बब्बू ने सिलाई की काम किया, और उनके पति अपने भाई के साथ मिठाई की दुकान पर काम करते थे. उस वक्त घर की माली हालत अच्छी नहीं थी. फिर धीरे धीरे हालात बदले और मोहनलाल काम करने के लिए विदेश चले गए और फिर वो कई सालों तक दोहा और कतर में एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में काम करने लगे.

 

संघर्ष के उन दिनों में राधे मां अपने मोहल्ले और बुटीक से काम लाकर घर पर ही सिलाई किया करती थीं. खास तौर पर वो लड़कियों की सलवार के पायचें सिला करती थी. करीब चार साल सिलाई का काम करते हुए इसी तरह गुजर गए, अब राधे मां 21 बरस की हो चुकी थी. इसी बीच वो दो बेटों की मां भी बनी लेकिन पति के विदेश चले जाने के बाद वो अपने बच्चों के साथ मुकेरिया में अकेली रह गई थी. इसी दौरान उनका मुकेरिया के ही परमहंस डेरा में आना-जाना शुरु हुआ था. दरअसल शादी के बाद बब्बू का बुरा वक्त ही उसे इस परमहंस डेरे तक खींच लाया था. परमहंस डेरे के महंत बलदेव का भी ये कहना है कि उन दिनों बब्बू उर्फ राधे मां मानसिक तौर पर भी बेहद परेशान रहा करती थीं.

 

परमहंस डेरा के महंत बलदेव बताते हैं कि यहां पर मुकेरिया में स्टैट बैक के सात उनकी ससुराल थी. तो कहते हैं कि उनके पति विदेश में गए थे और मतलब वो काफी परेशान थी तो इसी परेशान के बीचे में वो गुरुजी की शरण में आईं और वो पिता के पास गयीं तो उन्होंने गुरुजी का नाम बताया कि गुरुजी उनके मन को शांत करेंगे. तो वो गुरुजी के पास में आईं फिर गुरुजी ने उनको मंत्र दिया. मंत्र देने के बाद में अनुष्ठान कराया फिर यहां से वो हरिद्वार में गए.

 

मुकेरिया में परमहंस डेरा की स्थापना महामंडलेश्वर महंत रामाधीन दास परमहंस ने की थी. बिहार के सीतामढ़ी जिले में पैदा हुए रामाधीन ने देश भर में पैदल यात्राएं की थी और आखिर में आकर उन्होंने मुकेरिया में अपना डेरा बना लिया था. लेकिन बेहद सादा जिंदगी जीने वाले रामाधीन के संपर्क में जब मुकेरिया की बब्बू आई तो वो एक ऐसी गुरु राधे मां में तब्दील हो गईं जिनके ग्लैमर के आगे बॉलीवुड की चमक दमक भी फीकी पड़ जाए.

 

मुकेरिया के परमहंस डेरा में करीब छह महीने धार्मिक मामलों की ट्रेनिंग लेने के बाद महंत रामधीन के हाथों ही राधे मां ने दीक्षा ले ली थी और इस तरह मुकेरिया की सुखविदर कौर उर्फ बब्बू को नया नाम मिला और वो नाम था राधे मां.

 

महंत बलदेव बताते हैं कि नाम तो गुरुजी ने दिया है उनको. उन्होंने बोला कि सबका भला चाहती है सबको प्रेम का आशीर्वाद देना चाहती है तो उनको राधे नाम गुरुजी ने दिए हैं.

 

परमंहस डेरा के मंहत बलदेव का ये भी कहना है कि राधे मां उन्हीं के सामने डेरे में आई थीं और करीब छह महीने तक डेरा में गुरु रामाधीन परमहंस के सानिध्य में रही थी. खास बात ये है कि राधे मां के संन्यास के साथ उनके चमत्कार करने की कहानी भी इसी डेरे से शुरु हुई थी और फिर ये कहानी आस – पास के इलाकों में भी तेजी से फैलती चली गई. कहा ये भी जाता है कि परमहंस डेरे में ही राधे मां ने काला जादू भी सीखा था और वो लोगों की व्यक्तिगत, पारिवारिक और व्यवसायिक परेशानियों से उन्हें छुटकारा दिलाने का दावा भी करने लगी थी.  

 

परमहंस डेरा के महंत बलदेव बताते हैं कि शादी के बाद गुरुजी के पास आईं तो गुरुजी ने उनको जो भी मंत्र बताया. तो गुरुजी ने भी कहा कि जब इस लाइन में आ गई तो इनका नाम बढ़ना चाहिए. तो कोई भी भक्त आता था तो उनके सामने भेज देते थे कि वो ही ठीक करेगी. ऐसा करते करते वो आगे लोगों से ठीक होने लगे. ऐसे ऐसा करते वो आगे बढती गई काम होते गए. तो उनका नाम चलता गया. तो हरिद्वार से जैसे पांजाब में जालंधर में गए वहां से फिर दिल्ली गए.

 

19 पंजाब के मुकेरिया में हाईवे के किनारे राधे मां का मंदिर है. साल में एक बार राधे मां यहां आती हैं और रुकती है. बाकायदा मुकेरियां में उनकी शोभा यात्रा निकाली जाती है. और उस शोभा यात्रा के दौरान उनके भक्त यहां उमड़ पड़ते हैं. अगर मुकेरिया में उनके भक्तों की संख्या बात करे तो उनके भक्तों की कमी नहीं है. लेकिन पंजाब के दूसरे राज्यों जैसे लुधियाना और जालंधर में भी कई ब़डे बिजनेस घराने राधे मां के फोलोअर हैं और अक्सर वो भी जब राधे मां पंजाब आती है तो अपने घर या फार्म हाउस पर चौकी और कीर्तन के लिए बुलाते हैं. यही वजह है कि पंजाब के मुकेरिया से लेकर दिल्ली तक हर जगह देवी मां के भक्त हैं.

 

साल 2001 के आस- पास राधे मां की चमत्कारी देवी के तौर पर चर्चे होने लगे थे और यही वजह थी कि पंजाब और हरियाणा में लोग उन्हें अपने घर भी बुलाने लगे थे दरअसल राधे मां के भक्तों की ऐसी आस्था थी कि उनके पांव पड़ते ही घरों से दुख दूर हो जाते हैं. भक्तों के इसी विश्वास के पंखों के सहारे राधे मां की शोहरत इस पूरे इलाके में ऊंची उडान भरने लगी थी.

 

एक भक्त बताते हैं कि जो भी पूरे दिल से देवी मां को मानता है वो उनकी बहुत मदद करती है. उनमें भगवान का अंश दिखता है.  सभी वर्ग के लोग उनकी पूजा करते है. बहुत से रईस लोग और फिल्म स्टार भी उनकी यात्रा में शामिल होते है.

 

राधे मां की भक्त संदीप बताते हैं कि देवी मां जी नीचे आए और बोले कि रज्जी मुझे तेरे घर पर जाना है चरण डालने. मम्मी ने उस रुम की शीट चेंज कर दी कि देवी मां जी घर पर आ रही हैं. तो देवी मां जी वहां पर विराजमान हो गईं, फिर देवी मां उस रुम में गई. वहीं बेड शीट फिर से किसी ने उस पर बाथरुम किया हुआ था. देवी मां उसी एरिए में जाकर विराजमान हुईं. उस दिन घर में कुछ नहीं था उनके भोग के लिए देवी मां जी खुद किचन में गए. देवी मां ने एक बिस्किट निकाला और खुद भोग लगा लिया. इससे बड़ा मेरे लिए कुछ नहीं हो सकता कि देवी मां बच्चों की पल पल की सुनती हैं.

 

सन्यास के अपने शुरुआती दिनों में राधे मां बेहद सादगी के साथ रहती थी. वो सफेद कपड़े पहनती थी और आज की ग्लैमरस राधे मां की एक दम उलट नजर आती थी. उनकी सादगी, बातचीत करने के ढ़ग और उनके रहन-सहन के तौर तरीकों ने भी उनके भक्तों की तादाद में इजाफा होता चला गया.

 

 

गुरुदासपुर में जन्म लेने वाली राधे मां का सफर मुकेरिया में संन्यास के पड़ाव से गुजरते हुए और पंजाब के दूसरे शहर जालंधर से होते हुए अब फगवाड़ा तक जा पहुंचा था. लेकिन राधे मां की जिंदगी में फगवाडा भी एक दूसरा अहम टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ.

 

दरअसल मुकेरिया में संन्यास की दीक्षा लेने के बाद राधे मां की शोहरत को पहली बार उस वक्त ग्रहण लगा जब वो साल 2002 में पंजाब के फगवाडा में अपने नाम का जागरण करने पहुंची थी. 30 मार्च 2002 जब जागरण के बाद अरुण नंदा नाम के एक कारोबारी के घर में राधे मां ठहरी हुई थीं. तभी अचानक घर के बाहर उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरु हो गया. शाम 4 बजे शुरू हुआ ये विरोध प्रदर्शन करीब तीन घंटे बाद उस वक्त खत्म हुआ था जब राधे मां ने मीडिया के सामने लोगों से हाथ जोड़कर माफी मांगी.

 

पंजाब के फगवाड़ा शहर में पहली बार राधे मां के खिलाफ ऐसा विरोध प्रदर्शन हुआ था. इस प्रदर्शन की अगुवाई विश्व हिंदू परिषद के पूर्व नेता सुरिंदर मित्तल ने की थी. राधे मां के इस पहले विरोध की ये पूरी कहानी भी आप सुरिंदर मित्तल की जुबानी ही सुनिए. 

 

पूर्व वीएचपी नेता सुरेंद्र मित्तल बताते हैं कि जितने भी हिन्दू संगठन थे उन्होंने जागरण के ऑरगनाइजर से बात की कि ये सब तो हिन्दू रीति रिवाजों से नहीं हो रहा. हमने कहा कि हमारी बात राधे गुरु मां से कराई जाए. लेकिन किसी ने नहीं कराई तो सब विरोध करने 2000 लोग उस घर से बाहर चले गए जहां इसने अपना आसन लगाया हुआ था. बात करने की कोशिश की लेकिन इसके भक्त नीचे आ गए और इसके नारे लगाने शुरु कर दिए. जिससे तनावपूर्ण स्थिति बन गई, फिर झगड़ा भी हुआ. तब इसने माता का लिबास भी बदला औऱ साधारण कपड़े पहनकर हाथ जोड़कर मीडिया के सामने माफी मांगी कि मैं कोई माता नहीं हूं न कोई शक्ति है मैं लोगों को धर्म के नाम पर ठगती हूं.

 

राधे मां के भक्त अरुण नंदा बताते हैं कि 2002 में किसी भक्त ने यहां जागरण कराया. शाम को देवी मां हमारे घर आ गए और शाम को फिर देवी मां की चौकी थी. अचानक से लोग इकट्ठा होकर हमारे घर के सामने आ गए. झगड़ा हुआ, बाद में मैंने सुना भी कि उन भक्तों में आपस में कुछ मनमुटाव था देवी मां से कोई मतलब नहीं था. वो तो ऐसे ही बीच में आ गए, आखिर में देवी मां ने स्थिति को संभालते हुए ये डिसाईड किया कि इससे पहले कि भक्तों और भीड़ का माहौल और खराब हो मेरा यहां से जाना ही ठीक होगा.

 

फगवाड़ा की घटना के बाद राधे मां ने अपना शहर भी छोड़ दिया. मुकेरिया से करीब 450 किलोमीटर दूर देश की राजधानी दिल्ली के दरवाजे पर उन्होंने साल 2002 मे पहली बार दस्तक दी थी लेकिन दिल्ली में राधे मां के कदम ज्यादा दिनों तक टिक नहीं सके और वो भक्तों के कहने पर दिल्ली से मुंबई चली आई. राधे मां की शोहरत अब पंजाब की सीमाएं पार कर चुकी थी. इस वक्त तक उनके गुरु महंत रामाधीन भी जीवित थे इसीलिए राधे मां जहां भी जाती उन्हें भी अपने पास ही बुला लिया करती थी. 

 

परमहंस डेरा के महंत बलदेव बताते हैं कि डेरा में छह महीने रही वो उसके बाद वो जहां भी रहती थी गुरुजी को बुला लेती थी. वो जब मुंबई में रहने लगी तो गुरुजी भी जाते रहते थे उनके साथ मेरा भी जाना हुआ. जब वो पंजाब में या दिल्ली में थी तो उस वक्त तो काफी आते थे.

 

पंजाब के गुरुदासपुर जिले फिर मुकेरिया और पंजाब के दूसरे शहरों से होते हुए राधे मां की भक्ति के इस काफिले ने पहले दिल्ली में पड़ाव डाला और फिर उन्होंने मुंबई में अपना स्थायी ठिकाना बना लिया था. 13 साल पहले जब राधे मां अपनी किस्मत आजमाने मुंबई आई थीं उस वक्त एक बार फिर उनका कनेक्शन हलवाई और मिठाई से जुड़ गया था. दरअसल राधे मां साल 2003 में जब दिल्ली से मुंबई आईं थी तब वो यहां के मशहूर गुप्ता परिवार की मेहमान बनी थी. मुंबई में एम एम गुप्ता एक मशहूर कारोबारी परिवार है जिनकी मिठाई की दुकानों की चेन है. गुप्ता परिवार प्रापर्टी के धंधे के अलावा ग्लोबल एडवर्टाइजिंग के नाम से अपनी एजेंसी भी चलाता है.

 

एम एम मिठाईवाला ग्रुप के चेयरमैन मनमोहन गुप्ता से पूछा गया कि आपका परिवार राधे मां को 13 साल पहले पंजाब से मुंबई लाया. आपने मुंबई में उन्हें अपने घर की दो मंजिले दी आपने आपके परिवार ने उन्हें करीब से देखा है. क्या हकीकत है राधे गुरु मां की. जवाब – राधे गुरु मां को हम पंजाब से नहीं लाए हमारा बेटा संजीव गुप्ता कभी उनकी चौकी में गया और किसी कारण से उनसे अटैच हो गया और उन्होंने एक चौकी हमारे यहां की थी. स्टार्टिंग में उसके बाद में. हमारी बिल्डिंग बन ही रही थी. तो उन्होंने कुछ समय वहां रही और उसके बाद में हमारे बेटे संजीव गुप्ता और भाई जगमोहन गुप्ता ने उन्हें उपर स्थान दिया. और धीरे धीरे वो गुफा का एक स्वरुप बनता चला गया.

 

करोड़ों का कारोबार करने वाले एम एम गुप्ता के चार भाई और दो बेटे तब राधे मां के भक्त बन गए थे खास बात ये है कि गुप्ता परिवार की ये भक्ति सिर्फ देवी दर्शन करने तक ही सीमित नहीं थी बल्कि गुप्ता परिवार राधे मां को मुंबई के बोरीवली इलाके के अपने छह मंजिला मकान में ले आया था और इसी के बाद से इस मकान की ऊपरी दो मंजिलें राधे मां का स्थायी ठिकाना बन गई थी.

 

मनमोहन गुप्ता के भाई शिव चाचा बताते हैं कि दस सालों से देवी मां के चरणों से जुड़ा हूं मैं. हम पर हर वक्त कृपा बरसाई है. सब पर जो भी इन पर श्रद्धा रखते है सब पर कृपा बरसाई है.

 

मनमोहन गुप्ता के बेटे संजीव गुप्ता बताते हैं कि 10 साल पहले मेरे किसी दोस्त ने मुझे इंवाईट किया था देवी मां के दर्शन के लिए. पहली बार में ही देवी मां ने मुझे बता दिया था कि फैमली में क्या प्रोब्लम है और उन्होंने डेट टाइम सब बता दिया था कि तब तक सब ठीक हो जाएगा. मेरा काम पूरा हुआ तब मैंने देवी मां को विनती की थी कि आप सदा सदा के लिए मुंबई में ही विराजमान हो जाइए ये आपका ही भवन है. जहां हम रहते है बोरीवली में वहीं 5th 6th फ्लोर पर देवी मां का भवन है. हम 40 सदस्यों का परिवार नीचे रहता है. उनकी सेवा में सदा रहते है वहीं 15 दिन में देवी मां के दर्शन होते हैं. वहां नीचे देवी मां सतसंग करवाती हैं.

 

पंजाब के मुकेरिया से मुंबई आने के बाद राधे मां की किस्मत ने जैसे अचानक पलटी मार दी. उनकी जिंदगी में जैसे बड़ा चमत्कार हो गया. सड़कों पर जहां उनके बड़े- बड़े होर्डिंग्स नजर आने लगे वहीं उनके दरबार में भक्तों का रेला भी दिनों दिन बढता ही चला गया. क्या आम और क्या खास. उन दिनों नेताओं से लेकर अभिनेताओं तक हर वर्ग के लोग राधे मां के दरबार में हाजिरी लगाने लगे थे.

 

राधे मां की शोहरत रईसों और कारोबारियों से लेकर फिल्म सितारों तक जा पहुंच चुकी थी और उनकी इस आसमान चूमती शोहरत में सबसे बड़ा हाथ मुंबई में ग्लोबल एडवर्टाइजिंग एजेंसी चलाने वाले गुप्ता परिवार का ही था जो ना सिर्फ राधे मां का कट्टर भक्त बन गया था बल्कि उन्हीं के जरिए ब्रांडिग का वो काम भी शुरु हुआ था जिसने कुछ ही वक्त में मुकेरिया की सीधी-सादी बब्बू को मुंबई की ग्लैमरस राधे मां में तब्दील करके रख दिया.

 

राधे मां की ब्रांडिग का असर सबसे पहले उनकी कॉस्टयूम पर नजर आया. साधारण सफेद रंग के कपड़ें पहनने वाली राधे मां को लाल रंग के डिजाइनर लहंगे पहनाए गए. चूढ़ा, कलीरे और कंगनों ने जहां राधे मां के हाथों को नया लुक दिया वही उन्हें सोने और हीरे के बेशकीमती आभूषणों से भी लाद दिया गया. सन्यासी राधे मां की हर उंगली में अब हीरे की अंगूठियां चमकती नजर आने लगी थी. माथे पर लाल रंग का लंबा टीका और चेहरे पर हैवी मेकअप के साथ होठों पर लाल रंग की लिपिस्टिक राधे मां की सबसे बड़ी पहचान बन गई. दिलचस्प बात ये है कि सिर पर मुकुट और हाथों में त्रिशूल लेकर मां दुर्गा के अवतार का दावा करने वाली राधे मां का ये नया लुक जब तैयार हो गया तो फिर इस लुक के साथ उनके प्रचार प्रसार का काम तेज कर दिया गया था. मुंबई के गुप्ता परिवार की कंपनी ग्लोबल एडवर्टाइजर ने शहर में जगह – जगह राधे मां के बैनर पोस्टर और होर्डिंग्स टांग दिए.

 

एम एम मिठाईवाला ग्रुप के चेयरमैन मनमोहन गुप्ता से जब पूछा गया कि आपकी ग्लोबल एडवर्टाइंजिग का उनको प्रमोट करने में बडा हाथ है. जवाब – उनकी श्रद्धा उनमें थी और उनको लगता था कि राधे गुरु मां की वजह से मेरा अपना बिजनेस जो ग्लोबल एडवर्टाइंजिंग है उसको एक सिंबल बना लिया था उन्होंने जैसे अपन गणपति का फोटो लगाते है या कोई भी आस्था का एक सिंबल बना लेते हैं. उस हिसाब से उस बच्चे ने उनको आगे बढाया. सवाल – आपकी वजह से ही एमएम मिठाई वाला का साथ पाकर ही वो राधे मां राधे मां बनी है पंजाब से आकर के. जवाब – वो सब बात सही है उन्होंने मेरे नाम का यूज किया है पर उनमें क्या शक्ति है. क्या वो आगे है वो अबी तक मुझे मालूम नहीं पडा. और क्यों और कैसे वो पब्लिक को अट्रेक्ट करती है ये वहीं जानती है. सवाल – आपने उनको करीब से देखा है कौन कौन उनके साथ है और कौन ये पूरा साम्राज्य चलाता है. जवाब – उनकी जो छोटी मां है वो सबको अपना ज्ञान बताती हैं. और जो हमारे दो भाई हैं वो उनके चमत्कार बताते हैं. और लोग उनको सुनकर समझकर अपनी समस्या बोलते हैं. अब जिनको लाभ हुआ वो तो राधे मां के भक्त बन जाते हैं. जिनको लाभ नहीं हुआ वो छोड़कर चले जाते हैं.

 

महज चंद सालों में ही राधे मां अपने दिव्य दर्शन के लिए भारी भीड़ जुटाने लगी. भक्तों को दिव्य दर्शन देने के लिए राधे मां की मंच पर एंट्री भी पूरी फिल्मी स्टाइल में होती थी. कभी क्रेन के सहारे वो मंच पर उतरती थी तो कभी पालकी पर बैठ कर स्टेज तक पहुंचती थी. राधे मां का मंच भी ऐसा होता है कि देखने वालों की आंखे खुली की खुली रह जाए. ये सारी कवायदें धीरे – धीरे भक्तों को लुभाने के लिए उनकी पैकेजिंग और प्रमोशन का एक हिस्सा बन गई.

 

कहा जाता है कि राधे मां भक्तों को दिव्य दर्शन देती हैं. वो चढावा भी स्वीकार करती हैं किसी देवी की तरह उनकी पूजा भी की जाती है. आमतौर पर राधे मां भक्तों से कुछ नहीं बोलती है औऱ ना ही वो प्रवचन ही देती हैं बावजूद इसके आस्था के आसमान पर उनका सितारा शिद्दत से चमकता रहा है. खास बात ये है कि राधे मां के इस ग्लैमरस अवतार ने जहां उनके भक्तों का मन मोह लिया है वहीं आम लोगों को एक संन्यासिन के ऐसे रुप ने हैरान कर दिया. यही वजह है कि राधे मां और उनके चमत्कारों को लेकर तरह- तरह की बातें भी होने लगी. उनके ऊपर बेशुमार इल्जाम भी लगे लेकिन तमाम आरोपों से बेपरवाह राधे मां अपनी ही धुन में कभी टीवी कैमरों पर तो कभी भक्तों के सामने थिरकती रही. वो अपने दरबार और चौकियों में मदमस्त होकर फिल्मी गानों पर डांस करती भी नजर आने लगी थीं.

 

एड गुरु प्रहलाद कक्कड़ बताते हैं कि कैसे मंच पर आती है तो उनका लंहगा पैर से हटाकर चलती है और ये उनका सिगनेचर स्टाइल बन गया राधे मां की स्टाइल के बारे में बता रहे हैं.

 

मायानगरी मुंबई में राधे मां का मायाजाल उनके अतीत और वर्तमान को लेकर सवाल खड़े करता रहा है बावजूद इसके उनकी शोहरत का ये सफर कामयाबी के साथ जारी है लेकिन राधे मां के इस सफर पर उस वक्त ब्रेक लगा जब गुप्ता परिवार की ही एक रिश्तेदार निक्की गुप्ता ने उनके खिलाफ देहज उत्पीड़न का केस पुलिस थाने में दर्ज करा दिया. निक्की गुप्ता का आरोप है कि राधे मां ने ना सिर्फ उनके ससुराल वालों को उनके खिलाफ बहकाया बल्कि दहेज के लिए उनका घर भी तुड़वा दिया. राधे मां पर उसी गुप्ता परिवार में फूट डालने का इल्जाम भी लगा है जिसने एकजुट होकर उनके लिए मुंबई में माहौल बनाया है. आरोप तमाम है लेकिन पहले की तरह ही राधे मां खामोश है और यही वजह है कि एक बार फिर विवादों में घिर गई है राधे मां की आस्था और इसीलिए चर्चा का केंद्र बन गई हैं खुद राधे मां.

 

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