एबीपी न्यूज स्पेशल: रेलवे की सेहत कैसी है?

By: | Last Updated: Thursday, 26 February 2015 1:03 AM
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नई दिल्ली: मोदी सरकार का पहला पूरा रेल बजट 26 फरवरी को पेश होना है. क्या रेलवे के खजाने की हालत में सुधार आया है? क्या रेलवे की झोली में देश में बुलेट ट्रेन ला पाने तक का पैसा है? क्या 100 फीसदी एफडीआई से रेलवे को कुछ फर्क पड़ा है या फिर रेलवे का खजाना अब भी खाली ही है? आइये जानते हैं कैसी है रेलवे की सेहत?

 

हर दिन करीब 19 हजार ट्रेनों के फेरे, करीब 64 हजार किलोमीटर लंबी पटरियां, रोजाना दो करोड़ से ज्यादा यात्री, दुनिया की सबसे बड़ी रेल सेवा होने का गौरव लेकिन फिर भी रेलवे का खजाना खाली.

 

जुलाई में पेश किए गए सरकार के अंतरिम बजट में रेलवे का opearating ratio 94 फीसदी बताया गया था. यानी रेलवे को 100 रुपए कमाने के लिए 94 रुपए खर्च करने पड़ते हैं. और बचे हुए 6 रुपए में ही रेलवे को अपनी देख रेख और बाकी जिम्मेदारी उठानी पड़ती है, जो कि रेलवे के नेटवर्क के हिसाब से कुछ भी नहीं है. इसी से उबरने के लिए रेल मंत्री ने जुलाई के अपने बजट में दो बाते रखी थीं.

 

रेलवे की सेहत सुधारने का पहला तरीका-

 

रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर में 100 फीसदी एफडीआई लाने की बात. इसे कैबिनेट से मंजूरी मिले कई महीने बीत गए है, लेकिन अभी तक कोई बड़ा FDI किसी बड़ी परियोजना में नहीं आया है.

 

रेलवे की सेहत सुधारने का दूसरा तरीका-

 

दूसरा तरीका रेल मंत्री ने पीपीपी यानि पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप का सुझाया. वो तरीका रेल मंत्री ममता बनर्जी और लालू यादव भी अपने कार्यकाल में आजमाने की बात करते आए थे लेकिन रेलवे परियोजनाओं के लिए किसी को public private partner नहीं मिला.

 

ऐसे में रेलवे के खजाने का हाल उतना ही खस्ताहाल है जितना कि यूपीए 2 के कार्यकाल में रहा.

 

गौरतलब है कि जुलाई के बजट के समय रेलवे के पास महज 4160 रुपए मुनाफे के तौर पर बताए गए थे.

 

इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन के मुताबिक साल 2012-13 में रेलवे ने एक लाख 21 हजार 831 करोड़ की कमाई की थी जबकि 2012-13 में भारतीय रेल को 24 हजार 915 करोड़ का घाटा हुआ था.

 

बजट अनुमान के मुताबिक रेलवे की कमाई  साल 2013-14 में 1लाख 64,374 करोड़  के आस पास रही.

 

जिसमें मालभाड़े से तकरीबन 1 लाख 5 हजार 770 करोड़, यात्री भाड़े से 44 हजार 645 करोड़ और 5 हजार करोड़ कबाड़ से आया.

 

रेलवे का खर्च कितना?

 

करीब 65 हजार करोड़ रेलवे कर्मचारियों की तनख्वाह पर खर्च होता है, 28 हजार 850 करोड़ पेंशन पर, 28 हजार करोड़ ईंधन पर, 3 हजार करोड़ सुरक्षा पर और सालाना रखरखाव पर 5 हजार करोड़.

 

इसके आलावा नई परियोजनाओं और सरकार को डिविडेंड देने का भी खर्चा है रेलवे के पास. वो तो अंतराराष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतों ने इस बार ज्यादा साथ दिया इसलिए रेलवे का किराया ना बढ़ने की संभावना है.

 

इडियन एक्सप्रेस के मुताबिक भारतीय रेलवे के 38 फीसदी यानि 24 हजार 800 किमी लंबे ट्रैक का इलेक्ट्रीफिकेशन हुआ है. यानि इस ट्रैक पर ट्रेन बिजली से चलती है जबकि बाकी डीजल से. रेलवे का बिजली का खर्चा बिल10 हजार 880 करोड़ है जबकि डीजल का बिल करीब 22 हजार करोड़ दोगुने से भी ज्यादा.

 

यानी आजादी के 6 दशक बाद भी हम अपने सारे ट्रैक को बिजली से चला पाने की हालत में नहीं हैं ऐसे में बुलेट ट्रेन का सपना दूर की कौड़ी नजर आता है. इलेक्ट्रीफिकेशन की रफ्तार धीमी होने के पीछे खर्च भी एक बड़ी वजह है. एक किलोमीटर की दूरी तक इलेक्ट्रीफिकेशन पर करीब 1.5 करोड़ का खर्च बैठता है.

 

पिछले 10 साल में 99 नई लाइन परियोजनाओं पर रेलवे ने 60000 करोड़ खर्च किया लेकिन 1 परियोजना ही पूरी हो पाई. रेलवे के पास 4 परियोजनाएं ऐसी हैं जो 30 साल से ज्यादा पुरानी है लेकिन आज तक पूरी नहीं हो पाई है. इन आकड़ो से सबक लेते हुए और रेलवे के खजाने की खस्ता हाल के मद्देनजर इस बार के बजट में सासंद सुभावन परियोजनाए कम देखने को मिलेगी.

 

लेकिन अगर रेलवे FDI और PPP से पैसा परियोजना के लिए नहीं ला पाएगी तो भारतीय रेल का विस्तार आने वाले दिनों के लिए मुश्किल भरा होगा. क्योंकि भारतीय रेल का विकास सीधे देश के विकास से जुड़ा है.

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