MUST READ | 'मेड इन मुंबई' राकेश मारिया

By: | Last Updated: Tuesday, 8 September 2015 5:03 PM

नई दिल्लीः राकेश मारिया फिर चर्चा में हैं. अभी तक वो मुंबई के हाई प्रोफाइल शीना बोरा हत्याकांड की गंभीर जांच की वजह से चर्चा में थे और अब उन्हें अचानक प्रमोशन और नए विभाग में भेजे जाने का फैसला हो गया. हालांकि बाद में महाराष्ट्र सरकार सरकार ने उन्हें केस से जुड़े रहने की इजाजत दे दी है. ये खबर भी सुर्खी बनी हुई है. मुंबई के इस तेजतर्रार पुलिसवाले से जुड़ी हर खबर सुर्खी बन जाती है. ऐसा क्या है मुंबई के मारिया में

 

ए वेन्सडे में अभिनेता अनुपम खेर का किरदार या फिर ब्लैक फ्राईडे में के के मेनन का किरदार इनमें से एक भी गढ़ा नहीं जा सकता था अगर मुंबई पुलिस के पास राकेश मारिया जैसा पुलिस अफसर ना होता.

 

यूं तो ये उन्हीं राकेश मारिया की कहानी है जो मुंबई के पुलिस कमिश्नर रहने के बाद प्रमोशन पा चुके हैं और डीजी होमगार्ड्स बनने जा रहे हैं लेकिन आपकी मुलाकात इस नाम के पीछे छिपे उस बांद्रा बॉय से होगी जिसने अपनी 58 साल की जिंदगी में से 34 बरस अपनी इस खाकी वर्दी के नाम कर दिए.

 

जासूस शरलॉक होम्स की किताबें पढ़ी हैं आपने? मुंबई के आंतक निरोधी दस्ते के असिस्टेंट कमिश्नर संजय कदम ने ये सवाल पत्रकारों से पूछा था. पत्रकार चौंक गए थे और तब उन्होंने कहा था राकेश मारिया ही हमारे शरलॉक होम्स हैं. राकेश मारिया ने 34 साल के करियर में कुछ ऐसी ही छाप छोड़ी है.

 

डॉ जलीस अंसारी को 1994 में सीबीआई ने गिरफ्तार किया था लेकिन थर्ड डिग्री के इस्तेमाल के बावजूद उसने गुनाह नहीं कबूला था. राकेश मारिया की पहचान बन चुकी थी वो गुनहगारों से सच उगलवा लेते हैं वो भी बिना किसी थर्ड डिग्री के. सीबीआई ने राकेश मारिया की मदद ली. जलीस अंसारी ने सिर्फ 30 मिनट में 60 धमाके करने का गुनाह कबूल कर लिया. राकेश मारिया ने एक थप्पड़ भी नहीं मारा. पूछताछ का ये तरीका राकेश मारिया की पहचान बन गया. 

 

सीबीआई ने राकेश मारिया को इसलिए चुना था क्योंकि राकेश मारिया 1993 के सीरियल बम धमाकों की जांच में अपना करिश्मा दिखा चुके थे. 12 मार्च 1993 को एक के बाद एक 12 धमाकों से मुंबई दहल उठी. लेकिन मुंबई के गुनहगारों का कोई सुराग नहीं मिल रहा था. मामला क्राइम ब्रांच और मुंबई पुलिस का था और राकेश मारिया तब ट्रैफिक पुलिस में ज्वाइंट कमिश्नर थे यानी इस जांच में उनकी कोई भूमिका नहीं हो सकती थी.

 

तब ट्रैफिक पुलिस के ज्वाइंट सीपी राकेश मारिया को एक डॉक्टर का फोन आया कि माटुंगा में उनकी क्लीनिक के बाहर एक लावारिस स्कूटर खड़ा है. मारिया वहां पहुंचे तो स्कूटर में विस्फोटक बरामद हुए. चंद घंटे ही बीते थे कि वर्ली पुलिस को एक लावारिस मारुति वैन भी मिली. राकेश मारिया ने जांच की तो वैन टाइगर मेमन की पत्नी रुबीना मेमन के नाम पर दर्ज थी. ये पहला सुराग था जो वो क्राइम ब्रांच को सौंप सकते थे.

 

बिना वक्त गंवाए राकेश मारिया माहिम की अल हुसैनी बिल्डिंग पहुंचे जो टाइगर मेमन का घर हुआ करता था. उन्होंने दरवाजे पर ताला देखा और ताला तोड़़ दिया. अंदर से लावारिस स्कूटर की चाभी भी मिल गई. ये 14 मार्च 1993 की तारीख थी. महज 48 घंटे के भीतर राकेश मारिया मुंबई के गुनहगारों का कच्चा चिट्ठा दुनिया के सामने रख चुके थे.

 

सच उगलवाने का तरीका हो या फिर गुनाह की उलझी हुई गुत्थियों को सुलझाना राकेश मारिया को हर बात में महारत हासिल थी. साल 2008 के ब्लाइंड केस नीरज ग्रोवर हत्याकांड की गुत्थी भी राकेश मारिया ने ही खोली थी.

 

26/11 के हमलों पर किताब लिखने वाले एस हुसैन जैदी राकेश मारिया के बारे में एक किस्सा लिखते हैं

 

”कन्नड फिल्म इंडस्ट्री की हीरोइन मारिया सुसईराज मारिया से मिलने आया करती थीं जो उस वक्त मुंबई के ज्वाइंट कमिश्नर क्राइम थे और नीरज ग्रोवर हत्याकांड की जांच कर रहे थे. एक बार सुसईराज ने पूछा था कि इस केस में आपको किस पर शक है तो मारिया ने जवाब दिया की सबसे ज्यादा शक आप पर है. ये जवाब सुनकर सुसईराज की हवाइयां उड़ गईं. राकेश मारिया के लिए इतना सुराग काफी था. उन्होंने मारिया सुसईराज को गिरफ्तार कर लिया.

 

राकेश मारिया गुनहगारों की मनोस्थिति को भांपते हैं और फिर उन्हें उन्हीं के जाल में उलझा देते हैं. मारिया सुसईराज ने ना सिर्फ अपना गुनाह कबूला बल्कि हत्या में अपने प्रेमी जेरोम मैथ्यू की भूमिका का सच भी उगल दिया. आपको बता दें कि मारिया सुसईराज ने खुद ही नीरज ग्रोवर के गायब होने की शिकायत दर्ज करवाई थी लेकिन राकेश में छिपे जासूस की नजर से वो ज्यादा देर छिप नहीं पाईं.

 

गुनाह की गुत्थियां सुलझाने में माहिर राकेश मारिया के करियर में ऐसी कहानियों की कमी नहीं है. 26/11 हमले में जिंदा गिरफ्तार हुए इकलौते आतंकी अजमल आमिर कसाब का कुबूलनामा भी राकेश का ही कमाल था. कसाब उर्दू और पंजाबी बोलता था और राकेश मारिया को भी उर्दू और पंजाबी में महारत हासिल थी. राकेश मारिया ने ही कसाब से पूछताछ में पाकिस्तान के खिलाफ उगले सबूतों का ढेर लगा दिया था.

 

राकेश मारिया की कुछ और खूबियां भी बताते हैं. पहली तो ये कि राकेश मुंबई के उन चंद पुलिसवालों में से हैं जो राजनीति से दूरी बनाए रखते हैं और राजनीतिक दबाव उनके फैसले नहीं बदल पाते. राकेश मारिया की दूसरी खूबी है नेटवर्किंग. राकेश मारिया ने भरोसेमंद खबरियों की ऐसी फौज खड़ी की है जो शायद ही किसी दूसरे पुलिसवाले के पास हो. उनके साथ काम करने वाले उनकी याददाश्त का भी लोहा मानते हैं .

 

एक पुलिस अधिकारी ने खुद बताया कि, वो अंडरवर्ल्ड के छोटे से छोटे खिलाड़ी के बारे में जानते हैं. हम भले ही भूल जाएं लेकिन सर हमें अपराधी की मौजूदा स्थिति से लेकर पूरी जानकारी दे देते हैं. वो अपराधियों के नाम, उनकी उम्र, पता और हिस्ट्रीशीट सब याद रखते हैं और इसके लिए उन्हें कोई फाइल या कागज नहीं देखना पड़ता.’

 

मुंबई पुलिस के लिए हीरो क्यों हैं राकेश मारिया ये तो आप समझ गए होंगे लेकिन राकेश मारिया की वो कहानी जिसमें वो बांद्रा बॉय हैं. बांद्रा बॉय के मुंबई पुलिस के आला अधिकारी बनने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है. जरा नीलकमल फिल्म दरअसल राकेश मारिया के बचपन का हिस्सा हैं और इन्हें राकेश मारिया के पिता विजय माडिया ने बनाया था.

 

बंटवारे के बाद पाकिस्तान से भारत आने वाले पंजाबी परिवारों में था राकेश मारिया के पिता विजय मारिया का परिवार. विजय मारिया ने मुंबई को चुना था ताकि वो हीरो बन सकें लेकिन ऐसा नहीं हुआ. लेकिन फिल्मों का प्यार नहीं छूटा. राकेश मारिया के पिता पहले डिस्ट्रीब्यूटर बने, फिर फाइनेंसर और फिर प्रोड्यूसर. मुंबई के बांद्रा इलाके में उन्होंने एक बंगला भी खरीदा और इस तरह राकेश मारिया बन गए बांद्रा बॉय.

 

बांद्रा बॉय राकेश मारिया 1957 में मुंबई में जन्मे और मुंबई के ही होकर रह गए. पिता ने उनका दाखिला सेंट जेवियर्स कॉलेज मे करवा दिया. 6 फुट लंबे मारिया ने ना सिर्फ पढ़ाई में नाम कमाया बल्कि वो वॉलीबॉल और बास्केटबॉल जैसे खेलों में भी महाराष्ट्र की ओर से खेलने लगे. दूसरी तरफ घर पर फिल्मी दुनिया की बड़ी हस्तियों का मेला लगता था.

 

गुलाम अली जैसे गजलकार राकेश मारिया के पिता के दोस्त हुआ करते थे तो खुद राकेश ने भी कतील शिफाई, कैफी आजमी और मजरूह सुल्तानपुरी और अली सरदार जाफरी जैसे शायरों से दोस्ती की. राकेश मारिया के दो और दोस्त बने – किताबें और कव्वालियां.

 

लेकिन अगर आप ये सोच रहे हैं कि ये रंगीन दुनिया उन्हें अपनी ओर खींच रही थी तो ये गलत है. राकेश की पत्नी प्रीती मारिया बताती हैं कि उन दिनों में भी राकेश को वर्दी की ख्वाहिश थी. कॉलेज, यूनिवर्सिटी और महाराष्ट्र के तमाम रंग उन्होंने पहने थे यहां तक कि कराटे वाली ड्रेस भी उनका शौक था. वो हर शाम वानखेड़े स्टेडियम में परवेज मिस्त्री से कराटे सीखने जाते थे लेकिन एक शौक जो बेहद गंभीर था वो था पुलिस की यूनीफॉर्म. उन्हें नेवी या आर्मी की वर्दी नहीं चाहिए थी.

 

शायद यही वजह थी कि राकेश मारिया ने सिविल सर्विसेज के फॉर्म में मांगे गए पांच सेवाओं के नामों के लिए हर जगह सिर्फ आईपीएस ही लिख दिया था.

 

एक अंग्रेजी पत्रिका को इंटरव्यू देते हुए प्रीती ने बताया था कि सेंट जेवियर्स कॉलेज में ही उनकी राकेश से मुलाकात हुई थी जो एक साल सीनियर थे. दोनों खेलों के दीवाने थे और यही बात उन्हें करीब लाई थी. बॉस्केट बॉल के कोर्ट पर प्यार परवान चढ़ा और दोनों ने शादी कर ली थी.  राकेश मारिया ने 1981 में आईपीएस की परीक्षा पास की थी और फरवरी, 2014 में मुंबई के पुलिस कमिश्नर के पद पर जा पहुंचे. 

 

राकेश मारिया ने कमिश्नर का पद संभालने के बाद मुंबई पुलिस के कामकाज में बड़े बदलाव किए. कमिश्नर बनने के बाद राकेश ने एक अंग्रेजी पत्रिका को दिए इंटरव्यू में कहा था कि

 

”अगर कोई महिला देर रात परेशानी में पड़ जाती है तो मैं नहीं चाहता मेरे अफसर उससे ये पूछें कि वो इतनी रात में बाहर क्यों थी बल्कि उन्हें उसकी परेशानी दूर करनी चाहिए. इसके लिए हमने पूरी मुंबई में 500 बॉक्स रखवाए हैं जिसमें बिना पहचान बताए शिकायत डाली जा सकती है. हमने 103 हेल्पलाइन खोली हैं और छह बड़े लोकल स्टेशनों पर हेल्प डेस्क बनाए हैं जिसमें पुलिस नहीं बल्कि कॉलेज के छात्र मदद कर रहे हैं. मैंने खुद 40 कॉलेजों के छात्रों से बात करके उन्हें तैयार किया है.”

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Web Title: Rakesh Maria’s journey
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