प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोले राम माधव, मोदी से सीबीआई ने 7 घंटे तक बैठाकर पूछताछ की, अब आप फेस करो

By: | Last Updated: Saturday, 12 December 2015 11:50 AM
ram madhav in press confrence

एबीपी न्यूज के खास कार्यक्रम प्रेस कॉन्फ्रेंस में आज भाजपा महासचिव राम माधव से तीखे और गंभीर सवाल पूछे गये. यहां पढ़ें पूरा सवाल-जवाब.

सवाल- आप के पिता जी भी जेल में रहे ये हम जानते हैं, माधव सदा शिव गोलवरक के नाम पर आप का नाम रखा गया, कितना भार पड़ता है जब ऐसे बड़े व्यक्तित्व के नाम पर नाम रखा जाता है.

जवाब- मैं जिस काम के लिए पिछले 30-35 साल से लगा हूं, उस पर समर्पित होकर काम करता हूं बाकी चीजें मैं ज्यादा सोचता नहीं हूं.

सवाल- ये जो राम मंदिर की बात अब जो हो रही है, लोग जोड़ रहे हैं कि बड़ा चुनाव एक आने वाला है, 2017 में यूपी में, उसकी तैयारी अभी से खासतौर पर जो बिहार और दिल्ली में झटके लगे हैं, उसके बाद एक तैयारी शुरू हो गई, क्या ये कहना सही है.

जवाब- राम मंदिर के विषय पर आरएसएस और संबंधित संगठनों की प्रतिबद्धता हमेशा रही है, जो आप आज आपने दिखाई, वो बात जब भी ऐसे प्रोग्राम होते हैं तो उसमें संघ का नेतृत्व दोहराता ही आया है. कोई नया विषय तो उसमें है नहीं, प्रारंभ से उनकी प्रतिबद्धता रही है. रही बात आदरणीय सरसंघचालक जी ने आदरणीय अशोक सिंघल जी की शोक सभा में बोली थी, वहां वो कॉन्टेक्स था, उसको चुनाव से जोड़ने का कोई कारण नहीं है. भारत में चुनाव कब नहीं होता, 2016 में 3 राज्य में चुनाव है, फिर 2017 में 5 राज्य हैं. भारत में चुनाव हमेशा होता उस बयान को राजनीति से जोड़ना नहीं चाहिए, संघ की प्रतिबद्धता है.

सवाल- पर असली महाभारत तो उत्तर प्रदेश में ही होगा.
जवाब- मैं ये मानता हूं कि राजनीतिक क्षेत्र में जो कार्यकर्ता हम सब हैं, हमारे लिए हर चुनाव महत्व का होता है. राजनीति में चुनाव जीतने के लिए हम राजनीति करते हैं, चैरिटी ऑर्गनाइजेशन नहीं होती पॉलिटिक्स. इसलिए कोई एक चुनाव महत्व का है और बाकी, नहीं ऐसा नहीं होता है. यूपी के चुनाव हमारे लिए महत्व रखता है लेकिन उससे पहले होने वाले चुनाव भी महत्व रखते हैं, बीते हुए चुनाव भी महत्व के थे.

सवाल- दो बार इन्होंने कहा, आप सही कह रहे हैं कि एक तो अशोक सिंघल जी बात थी, कोठारी बंधुओं की जब बात हो रही थी, तो उस फंक्शन में भी उन्होंने कहा. दो बार इसको दोहराना तो लोगों को लगा स्वाभाविक है कि अगला बड़ा चुनाव इन लोगों को वही दिख रहा है.

जवाब- आदरणीय अशोक सिंघल जी का बहुत बड़ा योगदान, राम मंदिर आंदोलन से जुड़ा रहा, उसी के संबध में सरसंघचालक जी वो विषय उठाए होंगे, ऐसा मैं मानता हूं, बाकी आप पत्रकार हैं तो आप की कल्पना होती है.

सवाल- आप 18 महीने से बीजेपी से जुड़े हैं और इसके पहले आप कई साल संघ में भी रह चुके हैं. ऐसी क्या बात है कि मोहन भागवत जी को सरकार और बीजेपी को दुविधा में डालना पड़ रहा है, हाल ही में उन्होंने आरक्षण के मुद्दे पर काफी विवादित बयान दिया. एक बार नहीं तीन बार, आखिरी बार गोरखपुर में कहा वो भी तब जब बिहार के अहम क्षेत्रों में चुनाव होने थे और राम मंदिर का मुद्दा उठाया जो ऐसा सिक्का है, जिसका कोई फायदा नहीं दिखाई दे रहा है यूपी के चुनाव में. क्या कारण है कि भागवत जी बार-बार सरकार को मुश्किल में डाल रहे हैं.

जवाब- आरएसएस इस देश का बहुत बड़ा सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन है, इतना बड़ा संगठन और एक विचारधारा से प्रेरित प्रतिबद्ध संगठन होने के नाते, अपने विचारों को व्यक्त करने और उसके लिए उन्हें जो भी समय लगता हो, वो तय करने का पूरा अधिकार उनको है. किसको सुविधा होगी, किसको असुविधा होगी, ये सब सोचने का उनकी कोई मजबूरी नहीं है. लोकतांत्रिक देश है, उनका एक विचार है, स्वतंत्रता से रखेंगे और अपने विचार स्पष्ट रखेंगे. जहां तक सरकार और भाजपा का प्रश्न है तो कई विषय ऐसे हैं जिस पर हमारे विचार एक होते हैं. लेकिन कहीं हमको कुछ भिन्न विचार रखना पड़ता है तो हम रखते हैं. उसमें कोई हमको बहुत तकलीफ हो ऐसी कोई बात नहीं है. कई बिंदु ऐसे होते हैं जिसपर हमारा भिन्न विचार होता है. हम सरकार में हैं इसलिए आरएसएस को जाकर ऑर्डर दे दो ये हम नहीं करेंगे.

PC ram madhav 3

सवाल- असल सवाल ये था कि क्या आरएसएस जानबूझ कर सरकार की टांग खींचता है. उनको लगा कि अगर बिहार जीत गए तो नरेंद्र मोदी और अमित शाह बहुत ज्यादा ताकतवर हो जाएंगे. आरएसएस की न सुनेंगे और समझेंगे इसलिए उनकी कोशिश थी कि इनको जरा जमीन पर लाया जाए.

जवाब- आरएसएस की बात पूरा देश सुने इसके लिए काम करता है, दो नेता सुने, तीन नेता सुने इसके लिए आरएसएस काम नहीं करता. इसलिए मैंने कहा कि संघ को अपने विचार रखने के लिए पूरी आजादी है. उस विचार की अपने ढंग से व्याख्या करने की आजादी आप सबको है. संधसरचालक जी भाजपा के अंदरूनी राजनीति को ध्यान में रख कर दूर-दूर तक कतई कुछ बोले नहीं है. मैं आरएसएस का होकर मैं कह रहा हूं, कभी नहीं बोलेंगे. पर देश हित में जो अच्छा लगता है वो बोलेंगे.

सवाल- पर आरएसएस के हित में तो बोलेंगे
जवाब- आरएसएस का अपना निजी हित होता हो ऐसा मुझे मालूम नहीं है, मैं 40 साल से संघ में रहा हूं, निजी हित संघ का नहीं होता है, देश हित में बोलेंगे.
सवाल- तो ये कहना गलत है कि वो चाहते थे कि ये दोनों कमजोर हों, आप के प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष ऐसा ना हो कि ये हाथ से निकल जाए.
जवाब- सरासर गलत है, पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री की तरफ से बोलने का अधिकार मुझे नहीं है, पर मैं इतना समझता हूं कि वो कोई हाथ से निकल जाने वाले लोग नहीं है. वो अच्छे विचारधारा को समझने वाले लोग हैं, आप निश्चिंत रहिए.

सवाल- आप ने छवि बनाने का काम किया है. आप मोदी जी के विदेश दौरों पर हुए आयोजन की तैयारी से जुड़े रहे हैं. अभी जो सवाल रामजन्म भूमि का आया है कि वहां राम मंदिर बनाएंगे तो अगर मैं इसके लिेए सीधे-सीधे पूछूं कि बीजेपी इसके लिए प्रतिबद्ध रही है. बीजेपी बोलती रही है कि वो राम मंदिर निर्माण के पक्ष में है, तो क्या हम ये माने कि आप के साथ वो भी आर्टिटेक्ट होंगे कि प्रधानमंत्री मोदी के साथ आप कब राम मंदिर निर्माण का एक नया अभियान शुरू करेगें. कब देश की राजनीति में ये मोड़ आएगा, क्योंकि कई मोड़ जब बीजेपी में आए हैं तो आप उसके अभियंता रहे हैं.

जवाब- राम मंदिर का जहां तक प्रश्न है कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर बने जो राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक है, एक राष्ट्रीय व्यापक सहमति से बने. इस मुद्दे पर मैं मानता हूं कि बहुत बड़ा वर्ग इसके साथ है. मैं व्यक्तिगत जानता हूं, नाम नहीं लूंगा लेकिन अन्य दलों के लोगों के मन में ये बात तो जरूर है कि एक अच्छा भव्य मंदिर बने पर व्यापक सहमति से बने. आज की समय में सारा मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने है. हम थोड़ी प्रतीक्षा करें, आज कोई आंदोलन लॉंच नहीं कर रहा है, जिनकी प्रतिबद्धता है वो अपनी प्रतिबद्धता दोहराएंगे. उसमें हम क्यों इतना चिंतिंत हो रहे हैं?

सवाल- कब हम देखेंगे कि राम मंदिर के निर्माण के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सामने आएंगे.
जवाब- प्रधानमंत्री के आगे क्या क्या योजना है, इसकी जानकारी मेरे पास तो होगी नहीं. जब होगी तब आप सब को पता चलेगा.

सवाल- तो क्या सरकार को सुप्रीम कोर्ट से कहना चाहिए हर रोज सुनवाई करे और इस मामले का निपटारा करे
जवाब- वैसे तो सुप्रीम कोर्ट के सामने कोई विषय बहुत लंबे समय तक लंबित नहीं रहता है. कई दस्तावेजों को भाषांतरित करने की एक प्रक्रिया है, अपने समय पर सुप्रीम कोर्ट उस विषय को उठाएगी.
सवाल- इसमें एक बात जो आप के सहयोगी और विपक्षी करीब-करीब एक स्वर में बोल रहे हैं. नीतीश कुमार और शिवसेना की बात कर रहा हूं. वो ये कहते हैं कि बार-बार कहेंगे कि मंदिर बनाएंगे पर तारीख नहीं बताएंगे. क्या जवाब देंगे आप उनको.
जवाब- मामला अदालत के सामने है, अदालत इस पर एक निर्णय ले उसके बाद आगे की कार्रवाई पर विचार हो सकता है. आगे क्या होगा, जब होगा आप को पता चलेगा.
सवाल- पर एक तरीके से आरएसएस प्रमुख ने एक तारीख तो दे ही दी है, उन्होंने कहा मेरे जीवन काल में बन जाएगा.
जवाब- ऐसा उन्होंने जो सामने बैठे थे सबके लिए कहा था, अगर कोई 10 साल का बच्चा हो तो उसका जीवनकाल तो 70 साल और है ना.
सवाल- उन्होंने अपने जीवनकाल के लिए कहा
जवाब- नहीं ऐसा उन्होंने सब के लिए कहा है. मेरे जीवन काल में हो ऐसा सब लोग संकल्प लें. तो आप भी ले सकते हैं, मैं भी ले सकता हूं.

सवाल- ये बताइये आरक्षण के मुद्दे पर उनके बयान से बिहार में बीजेपी को नुकसान हुआ
जवाब- बिहार में इस प्रकार के परिणाम आने के पीछे क्या-क्या कारण थे, इसमें हमारी पार्टी में विभिन्न स्तरों पर पर्याप्त विश्लेषण हुआ है. मैं इतना जरूर कहता हूं कि कोई अकेला कारण नहीं होता है, जीत के पीछे भी और हार के पीछे भी कोई एक कारण नहीं होता है. ये हमारी पहले से मान्यता रही है. इस बार कई कारण रहे हैं. भागवत जी के बयान से हमें नुकसान हुआ हो ये बात तो मैं नहीं कहता लेकिन एक बात जरूर कहता हूं कि उस बयान को तोड़ मरोड़ के, गलत तरीके से पेश कर एक चुनावी फायदा लेने का प्रयास विपक्ष ने किया है, उसकी कितनी सफलता मिली इस पर मैं नहीं कह सकता हूं लेकिन प्रयास जरूर किया गया है.

सवाल- आप की पार्टी के ही बिहार के सांसदों ने इस पर बयान दिए हैं और उन्होंने कहा कि ये एक प्रमुख वजह रही
जवाब- एक-दो सांसद ने ये बात कही थी, उनका विश्लेषण सही नहीं ये बात भी बाकी सांसदो ने कह दिया था.
सवाल- आप ये मानते हैं कि इसकी वजह से जो विपक्षी है उनके हमलों में पैनापन आया, तेजी आई औऱ एक मुद्दा मिला उन्हें.
जवाब- अनेक मुद्दों को उठाया गया उस समय, प्रधानमंत्री ने जब ढेढ़ लाख करोड़ का पैकेज दिया, उसको भी नीतीश कुमार ने एक विवादित मुद्दा बनाने का प्रयास किया, ये विपक्ष का काम होता है, मैं उनको दोष नहीं देता, जो भी मुद्दा मिलता है, उससे चुनावी फायदा लेने की कोशिश की जाती है.

सवाल- क्या आप को नहीं लगता कि आप भागवत जी के बयान को लोगों तक सही रूप में पहुंचाने में फेल हो गए.
जवाब- हमने तो उस बयान पर अपना पक्ष लोगों के सामने रखा है, पार्टी अध्यक्ष ने स्वयं रखा है.

सवाल- दुनिया का हर देश किन्हीं मूल्यों पर अपनी परिकल्पना करता है, अपना संदर्भ तय करता है. भारत जहां आज है वहां भारत को आधारित होना चाहिए कि हिंदू धर्म के मूल्यों पर चलना चाहिए या संविधान जो कहता है, उन मूल्यों पर चलना चाहिए.
जवाब- मैं इन दोनों में कोई विरोधाभास है, ये मैं मानता नहीं. हम एक राजनैतिक दल के नाते एक देश, एक जन, एक संस्कृति यह नारा लेकर निकले हैं, हमारा एक देश, एक जन, एक समाज है, एक ही संस्कृति है. हमारा संविधान, हमारे लिए सर्वोपरि है. प्रधानमंत्री बार-बार कह रहे हैं कि संविधान सर्वोपरि है. एक जन हमारी धारणा है इसके आधार पर देश चले.

सवाल- ये जो पर्दे के पीछे वाली बात है RSS की, मैं आप से पूछना चाह रहा हूं कि क्या ये वजह है कि आप ने कह रखा है कि आप सांस्कृतिक संगठन रहेंगे इसलिए सामने नहीं आते, क्यों नहीं सामने आ जाते, ये गुपचुप क्यों है और अब तो आप की केंद्र में सरकार भी है. अगर आप ने ऐसा कुछ लिख के दिया है तो दोबारा चिट्ठी लिख दीजिए, समय बदल चुका है. इस पर पारदर्शिता क्यों नहीं है.

जवाब- पारदर्शिता मतलब क्या होता है. इस देश के प्रधानमंत्री RSS के स्वयंसेवक रहे हैं, पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी जी RSS के स्वयंसेवक रहे हैं. पार्टी में, संगठन में, सरकार में कई लोग ऐसे हैं जो संघ के स्वयंसेवक रहे हैं और क्या पारदर्शिता चाहिए. RSS एक संगठन की तरह अपने विचार रखेगा, संध के विचारों से प्रेरित हम सब लोग हैं. जिस क्षेत्र में हैं उसके अनुरूप हम काम करेंगे. पारदर्शिता क्या होती है?

सवाल- आप नहीं चाहते है कि संघ आकर ये कहे कि हमारा ये कार्यक्रम है और इस तारीख तक लागू होना चाहिए
जवाब- सामान्यत: आप लोग सुबह उठते नहीं हैं, सुबह 6 बजे से सामने खड़ा रहता है संघ. उनको जो चाहिए वो सार्वजनिक बोलते हैं. संघ पर्दे के पीछे एजेंडा चलाने वाला संगठन है ही नहीं. आप ही स्वयं कह रहे हैं कि सरसंधचालक स्वयं पब्लिक मीटिंग में बोल रहे थे. संघ पीछे से सरकार को प्रभावित करने का काम संघ का नहीं है, संघ जनता के सामने अपने विचार खुलकर रखेगा.
सवाल- संघ सांस्कृतिक संगठन है क्यों नहीं संघ सामने आकर कहता कि जो सांस्कृतिक वाला लेबल है उसको छोड़ दीजिए आप, अब संघ सीधे अपनी बात कहेगा और देखेगा कि सरकार वो काम करे.
जवाब- संघ तो अपनी बात सीधी रखता है ना, आपका पहला सवाल क्या था कि संघ क्यों सरकार को प्रभावित करता है. सरकार का एजेंडा संघ क्यों सेट करता है. मैं कह रहा हूं संघ अपने विचार रखता है. अब संघ क्या करे मैं सरसंघचालक जी को दिबांग जी का ये सुझाव है कि ऐसे आप सार्वजनिक आकर कह दो, मैं कह सकता हूं लेकिन संघ क्या करेगा ये संघ तय करेगा ना.

सवाल- जो गृहमंत्रालय की परिभाषा है संघ की 1966 से संघ के बारे में एक परिभाषा है कि संघ एक राजनीतिक संगठन है और इसमें कोई भी सरकारी कर्मचारी भाग नहीं ले सकता है. तो आप कह रहे हैं कि पीएम भी स्वयंसेवक हैं, गृहमंत्री जी भी स्वयंसेवक हैं, लगभग सारी सरकार ही स्वयंसेवक है तो क्या गृहमंत्रालय को वो परिभाषा बदला चाहिए क्योंकि आप के हिसाब से सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन है.
जवाब- ये मेरी जानकारी में नहीं है कि इस समय वो लागू है
सवाल- मुझे आरटीआई में लिख के दिया है कि ये अब भी लागू है
जवाब- इस पर हमने कई अदालतों में उस समय में, कई हाईकोर्ट ने कहा था कि संघ राजनैतिक संगठन नहीं है इसलिए इसमें कोई भी व्यक्ति भाग ले सकता है, ये जजमेंट उपलब्ध है.
सवाल- तो क्या आप चाहते हैं कि इस तरह का जो जजमेंट है वो बदला जाना चाहिए कि संघ एक राजनैतिक संगठन है, ये फैसला अब बदल दिया जाना चाहिए.
जवाब- अदालतों ने कई बार ये स्पष्ट किया है कि संघ एक सामाजिक, सांस्कृतिक संगठन है, इसमें सब लोग भाग ले सकते हैं. बाकी प्रश्न जब उठेगा तब उसका भी जवाब दिया जाएगा.
सवाल- आप की क्या राय है
जवाब- हमारी राय ही है कि संघ सामाजिक, सांस्कृतिक संगठन है.

सवाल- बीजेपी की और संघ की एक नीति हमेशा से रही है अल्पसंख्यकों को लेकर के, अब आप की पार्टी पावर में है तो क्या इसमें कोई बदलाव आएगा. या वही नीति रहेगी जो पहले से चलती चली आ रही है.
जवाब- सरकार की सबका साथ, सबका विकास की नीति है. इसी नीति पर हमारी सरकार चलेगी और बाकी संगठनों का अपना-अपना विचार हो सकता है.

सवाल- नेशनल हेरल्ड केस पर बड़ी गर्मी है, आप देख रहे हैं कि कानून बनाने चाहिए, बैठकर बात करनी चाहिए, किस तरह का अच्छा कानून बने लेकिन संसद ठप पड़ी है. कैसे देखते हैं आप, दूसरी बड़ी बात कि आगे हल कैसे निकलेगा, रास्ता क्या है.
जवाब- जिस बात को लेकर इतना उद्वलित हो रहा है कांग्रेस का नेतृत्व, यह हमारे समझ के परे है, मामला कोर्ट का. कोर्ट से नहीं डरुंगी, ये बात कहने की आवश्यकता क्या थी. मैं किसी से नहीं डरूंगी, मतलब क्या है, किससे डरना है. मामला तो कोर्ट के सामने है. या तो आप कोर्ट को चैलेंज करती हो कि मैं कोर्ट से नहीं डरूंगी, मैं किसी की बहू हूं. अब ये व्यक्तिगत बात क्यों लानी है. सोशल मीडिया में कोई पूछे कि आप किसकी बेटी हो तो आप को आपत्ति हो जाती है. भाई आप क्यों इसे पर्सनल इश्यू बना रही हो. ये तो एक केस है, हमारे नेताओं ने सामना किया है. कितने पॉलिटकली मोटिवेड कैंपेन मोदी जी के खिलाफ हुए जब वो मुख्यमंत्री थे, कितने झूठे मामले सुप्रीम कोर्ट तक लाए गए. 7 घंटे सीबीआई ने पूछताछ की थी, सबने फेस किया है, आप भी फेस करो ना. संसद को ना चलने देना, सड़क पर प्रदर्शन करना, ये शोभा नहीं देता है. सही मुद्दों पर रोको ना, इस केस में ना सरकार का संबंध है ना किसी का संबंध है, एक केस अदालत के सामने है आप उसका सामना कीजिए.

सवाल- मैं पूछ रहा हूं कि आगे रास्ता कैसे निकलेगा, जीएसटी बिल फंसा हुआ है उस पर कुछ कोशिश हुई थी, वित्त मंत्री भी लगे हुए थे, बाकी लोग भी लगे हुए थे. वो तो सब रुक गया तो आप इसको कैसे देखते हैं?
जवाब- उनका इस मुद्दे पर सदन रोकना सही बात नहीं है, बिल हो या ना हो किस मुद्दे पर आप सदन को रोकेंगे, इस पर विपक्ष को सोचना है, पिछला पूरा सत्र बेकार गया था.

सवाल- राममाधव जी बीजेपी को कांग्रेस से किस तरह की उम्मीदें है, चुनाव से पहले कांग्रेस मुक्त भारत की कल्पना की गई थी, चुनाव के बाद में चाय पर बुलाकर के जीएसटी बिल में उनका समर्थन मांगा जाता है एक रचनात्मक विपक्ष की भूमिका के रूप में आप उन्हें देखते हैं, तो आप का कांग्रेस के प्रति क्या नजरिया है?

जवाब- कांग्रेस इस देश का विपक्षी दल है, भले ही लोगों ने प्रमुख विपक्षी दल नहीं बनाया हो, हमारी सरकार ने तो उन्हें प्रमुख विपक्षी दल बनाया है, और विपक्षी दल के नाते उनका रोल सकारात्मक होना चाहिए. जीएसटी जैसे मुद्दे किसी दल विशेष के मुद्दे हैं ही नहीं, इस देश की अर्थव्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण कदम हैं. इनके पारित होने से देश को बहुत फायदा होगा. उससे सभी राज्यों को फायदा मिलेगा, इस पर कांग्रेस को सकारात्मक सोचना चाहिए. इस सत्र में ये बिल रोकना सही नहीं होगा.
सवाल- ये माना जाता है कि आप रास्ता निकालते हैं, फिलहाल तो आप हाथ खड़े कर रहे हैं अपने, कह रहे हैं कि अब इस हालत में रास्ता निकलना मुश्किल है.
जवाब- बिलकुल ऐसा नहीं है. जो लोग इन चीजों को हैंडल करते हैं, वो लोग इस विषय पर बात करेंगे क्योंकि सदन अभी 10-15 दिन और चलना है.

सवाल- आपका सपना था कांग्रेस मुक्त भारत, अब है कि नहीं
जवाब- कांग्रेस मुक्त भारत का जो हमारा नारा है वह हर चुनाव के समय हमारे लिए जीवंत होगा, जहां-जहां हमको कांग्रेस को हराना है. अभी आगे आने वाले चुनाव में असम में जा रहे हैं. वहां कांग्रेस शासन से असम को मुक्ति दिलाना है, वहां हमारा नारा होगा, पर वो नारा लेकर हम बंगाल में नहीं जाएंगे. बंगाल में तो तृणमूल कांग्रेस से हमारी टक्कर है. जहां-जहां काग्रेस सरकार से राज्य को मुक्ति देना है वहां हमारे ये नारा बरकरार रहेगा.
सवाल- मतलब ये नारा अब भी है, वो 15 लाख की तरह जुमला नहीं है.
जवाब- बिलकुल जुमला नहीं है भईया, ये तो हम असम चुनाव में जाएंगे तो वहां हमारा यही नारा होगा.

सवाल- जीएसटी को लेकर आप के पार्टी के अंदर ही काफी विरोध रहा है, गुजरात का सीएम रहते हुए नरेंद्र मोदी ने भी जीएसटी बिल का विरोध किया था. तो अचनाक क्या नौबत आ गई कि आप की पार्टी में इतनी जोरों-शोरों से इसको पास करने में लगे हैं.
जवाब- ऐसा है जब किसी भी ऐसे बिल का विरोध होता है, तो उसके कुछ विषयों को लेकर होता है, हमारा विरोध रहा है कुछ मुद्दों को लेकर, उस पर हमारी बात-चीत हुई. सरकार में आने के बाद जो संबंधित परिवर्तन लाना था वो हम ले आए, अब कांग्रेस को तीन मुद्दों पर कांग्रेस को आपत्ति है, तो बातचीत हो सकती है, उन तीन मुद्दों को हम चर्चा कर के सुलझा सकते हैं. लेकिन जब संसद चलने ही नहीं देंगे तो कैसे होगा. जीएसटी देश के हित में है ये बात लगभग सभी राज्यों के मुख्यमंत्री मान चुके हैं.

सवाल- अचानक क्या हो गया सरकार को हनीमून मना बैंकॉक में.
जवाब- भारत-पाकिस्तान के रिश्ते एक गंभीर विषय है, हंसी-मजाक ना बनाएं. इस रिश्ते में उतार-चढ़ाव नई नहीं है. अगर पीछे की बात करें तो 2008 मुंबई अटैक के बाद हमने 1 साल बात नहीं की थी. लेकिन फिर हमने शुरू किया सिलसिला क्योंकि आखिर हम दो पड़ोसी हैं. हमारे बीच अच्छे संबंध हो ये प्रयास होना चाहिए. उसकी थोड़ी बहुत पहल कभी यूएन में हो जाती है तो कभी पेरिस में हो जाती है तो स्वागत करिए, महत्वपूर्ण बात ये है कि बाइलिट्रल रहना चाहिए. इसमें तीसरे का हस्तक्षेप नहीं चाहेंगे, हम आपस में बातचीत करेंगे. आगे इस विषय को सुलझाने का प्रयास करेंगे.

सवाल- पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद है वो इस देश में प्रमुख मुद्दा रहा है और जब से मोदी सरकार बनी है, हमने देखा है कि सीमा पर तनाव बढ़ गया है, गोलीबारी बढ़ गई है. किसी भी दिन ऐसा नहीं है कि बार्डर पर गोलियां ना चली हों और हत्याएं ना हुई हो. इसके बाद अचानक ऐसा क्या हुआ कि एनएसए की मीटिंग चुपचाप हो जाती है. उससे पहले सुषमा स्वराज कहती हैं कि बात या तो हिंदुस्तान में होगी या पाकिस्तान में होगी तो ऐसी क्या मजबूरी थी सरकार के सामने.

जवाब- चुपचाप तो हुई नहीं थी आप को मालूम हैं कि मॉस्को में ब्रिस्क समिट के समय प्रधानमंत्री जब मिले थे तभी तय हुआ था कि आतंकवाद वाले मुख्य मुद्दे को लेकर हम दोनों देशों में तीन लेवल पर पहले बात हो. विदेश सचिव, एनएसए, मंत्रालय के स्तर पर वो प्रक्रिया प्रारंभ होना था एक बहुत बड़ी आतंकवादी घटना हुई जिसके कारण वो प्रकिया आगे नहीं बढ़ पायी. विदेश सचिव गए थे इस्लामाबाद और आतंकी घटना हुई और प्रक्रिया रूकी. इसकी शुरुआत होनी थी जो एनएसए लेवल पर शुरुआत हुई. हालांकि विदेश मंत्री इस समय पाकिस्तान में दूसरे कार्यक्रम के नाते हैं. क्या आप का ये कहना है कि हम बातचीत बिलकुल ना करें.

सवाल- सरकार की तरफ से कहा गया था कि बोली और गोली साथ-साथ नहीं चलेगी.
जवाब- हां ये बात हम बैंकॉक, इस्लामाबाद और मॉस्को में बताए हैं और बताते रहेंगे.

सवाल- बातचीत तो होगी लेकिन क्या आगे कंपोजिट डायलॉग या किसी किस्म की चीज आगे बढ़ेगी.
जवाब- अपेक्षा करते हैं कि ये प्रक्रिया अच्छी तरह आगे बढ़े, उधर नवाज शरीफ साहब भी इसको आगे बढ़ाने के लिए कुछ अच्छे बयान दे रहे हैं. इस समय मामला एकदम एक्टिव है तो ज्यादा नहीं बोलूंगा पर प्रक्रिया आगे बढ़े यही हमारी अपेक्षा होगी.
सवाल- बातचीत के लिेए भारत सरकार कितना पीछे हटने के लिए तैयार है. आप ने कहा गोलीबारी जब तक होती रहेगी, बातचीत नहीं होगी और हम सब जान रहे हैं कि वो आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं. कितनी दूर तक हम जाने को तैयार हैं बातचीत के लिए.
जवाब- बातचीत अगर गोलीबारी पर ही करना हो, आतंकवाद पर ही बातचीत करना हो तो करने में कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन हमारे जो निश्चित लक्ष्य है, कोई बीजेपी की सरकार का लक्ष्य नहीं है. भारत का पाकिस्तान पॉलिसी है, पिछली सरकार ने भी एक नीति अपनाई है, थोड़ा बहुत अंतर हो सकता है, वही नीति है, उस नीति को हम आगे बढ़ाएंगे. उसमें बिना देश के सहमति के उसमें किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं होगा. अनुकूल परिस्थिति देखकर बातचीत करते रहना आवश्यक है.

सवाल- बीजेपी का एक राजनैतिक दल के रूप में एक स्टैंड रहा है कि अगर आंतकवाद को शह मिलेगी तो बातचीत और क्रिकेट और ये सब चीजें नहीं चल सकती हैं, अब क्या है कि सत्ता में आने के बाद उसका दूसरा पैमाना ले लिया गया है.
जवाब- आतंकवाद के संदर्भ में बातचीत करना पड़े, करना है कि नहीं करना है प्रश्न ये है. मॉस्को में यह तय हुआ कि ये जो हमारे बीच में आतंकवाद की समस्या है इसको लेकर हम बातचीत करें. इस पर पहले भी सरकार करती रही है और देश की सहमति है तो सरकार कर रही है. बाकी क्रिकेट के विषय पर सरकार ने स्पष्ट किया है कि कोई निर्णय अभी नहीं हुआ है.
सवाल- राम माधव जी आप की निजी राय क्या है, क्या भारत को क्रिकेट खेलना चाहिए पाकिस्तान के साथ.
जवाब- निजी राय का तो कोई मतलब नहीं होता है जब आप एक पद पर हो, एक जिम्मेदारी पर हो. जो सरकार की राय है वो सही राय है.

सवाल- जब आडवानी जी रूठे हुए थे तब मोहन भागवत जी उनसे मिलने गए थे. RSS वाले आते-जाते रहते हैं नेताओं को मनाते रहते हैं.
जवाब- तो आप इस बयान को दिखाने के बाद तो ये बात तो छोड़ दीजिए कि कोई पर्दे के पीछे से कर लेता है, वगैरह- वगैरह. जो है आप के सामने है, बातचीत होती है तो बताया, कोई सरकार का विषय नहीं है भईया, पार्टी का अपना विषय है. हमारे पार्टी के नेता किससे मिले क्या इस पर भी हमको आजादी नहीं है. आडवानी जी पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं उनको भागवत जी से मिलना था मिले हैं, बातचीत हुई है, अपना एक मत बताया है. वही बात राजनाथ जी ने बताया. इसमें किसी को क्यों आपत्ति होना है.

सवाल- जनसंघ से लेकर आज तक बीजेपी ये बड़ा संवेदनशील मुद्दा रहा है जम्मू कश्मीर का. पीडीपी और बीजेपी के सामने आने से बहुत बार चर्चा होती है. सवाल ये है कि कितना चैलेंजिंग था कि आप ने सारे पक्षों को और बिंदुओं को बोर्ड पर लाने का काम किया. क्या बीजेपी को कुछ विषयों पर बीजेपी को कॉप्रोमाइज करना पड़ा सरकार में रहने के लिए.
जवाब- एक बहुत ही जटिल जनादेश जम्मू कश्मीर की जनता ने दिया था. उस जनादेश को सफल बनाने के लिए एक ही रास्ता था कि घाटी का बड़ा दल और जम्मू के बड़े दल को साथ आना, उसके अलावा कोई विकल्प नहीं था. बाकी कोई भी जुगाड़ हम लोग करते वो जनता के जनादेश के खिलाफ जाता. जनादेश के अनुसार जितना अच्छा हम लोग कर सकते थे हमने किया, उस एलाइंस को हमने नाम भी दिया गवर्नेंस एलाइंस. ये कोई विचारधारा का गठबंधन नहीं है, लोग जानते हैं, देश जानता है कि हमारे विचार भिन्न थे. अच्छा गवर्नेंस देने के लिए हमने गठबंधन किया और सरकार वही काम कर रही है. काफी चैलेंजिंग रहा, लगभग दो महीने लगे, और अगर कॉम्प्रोमाइज करना होता तो दो दिन में गठबंधन हो जाता. हम दोनों को अपने-अपने विचारों को ध्यान में रखकर गवर्नेंस की दृष्टि से साथ आना था, कहीं कॉम्प्रोमाइज नहीं करना था, इसलिए थोड़ा समय लगा. बिना कॉम्प्रोमाइज करते हुए हमने एक अच्छी सरकार देने का प्रयास हमने किया.

सवाल- आप उसमें उमर अब्दुलाह से भी मिले, वो बात कहां रह गई, उसमें कहां कमी रह गई, अब तो बताया जा सकता है
जवाब- ऐसा है ना जी जब गठबंधन की सरकार बनानी होती है तो अनेक प्रकार की बातचीत होती है. वो एक फेस था, हमने बातचीत की, मैं मना नहीं करूंगा. एक्सप्लोर कर रहे थे कि क्या क्या विकल्प हो सकते हैं.
सवाल- कुछ इशारा कर सकते हैं कि किस बात पर टूटी वो बातचीत
जवाब- मैं अब इस पर नहीं बोलूंगा, कभी इस सीट पर उमर अब्दुलाह साहब बैठेंगे तो पूछ लीजिएगा.
सवाल- आप नहीं बताना चाहते
जवाब- नहीं अब वो विषय प्रासंगिक नहीं है.
सवाल- इसीलिए तो उस विषय पर बातचीत हो सकती है
जवाब- अरे 40 मिनट के शो में प्रासंगिक विषयों पर बात करें.
सवाल- ये बताइए अगर वहां महबूबा मुफ्ती को मुख्यमंत्री बनाने की बात होती है तो आप इस निर्णय के साथ रहेंगे.
जवाब- इस समय हमारे सामने इस प्रकार का कोई प्रस्ताव नहीं है, मैं जानता हूं मीडिया में इसकी चर्चा है, इस प्रकार का कोई प्रस्ताव हमारे सामने नहीं है. गठबंधन हुआ था तो उस समय ये हुआ था कि हमारे मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद होंगे और उपमुख्यमंत्री निर्मल सिंह रहेंगे. इसमें कोई परिवर्तन करना हो, ऐसा किसी एक साइड को लगता है तो बातचीत के बाद इसके बारे में विचार करेंगे.
सवाल- आप कैसे आंकते हैं महबूबा मुफ्ती को
जवाब- एक सासंद के नाते उन्होंने अपना दायित्व अच्छा निभाया है. पीडीपी की अध्यक्ष हैं, हमने गठबंधन के समय उनसे बात की, हम दोनों के अच्छे तालमेल के बाद ही ये गठबंधन संभव हो पाया.
सवाल- एक जो बात उनके बारे में कही जाती है कि वो हुर्रियत पर थोड़ा नरम हैं, हुर्रियत की पक्षधर हैं, उस पर क्या
जवाब- जैसे मैंने कहा कि बाकी अपनी-अपनी विचारधारा, संबंध सब के हैं. जैसे आप कहते हैं ना कि हम सभी का संबंध RSS से है, विश्व हिंदू परिषद से है. उनके भी की लोगों से संबंध हो सकते हैं. सरकार का एक एजेंडा है, उस एजेंडे तक ही हमारा संबंध सीमित है. बाकी विषय हमारे लिए कोई विषय नहीं है. हमारे कामन मिनिमम प्रोग्राम में हमने कहा है कि हुर्रियत के लोग वो जब चाहें राज्य सरकार से बात कर सकते हैं.

सवाल- समान नागरिक सहिंता और धारा 370 इन मामलों को भी मंदिर की तरह अदालत में उलझाने की कोशिश की गई और दोनो ही लोग बीजेपी से जुड़े हुए हैं जो लेकर गए और कोर्ट ने कह दिया कि जो करना है सरकार ही करेगी. तो सरकार इसको ऐसे क्यों छोड़ रही है, पहली बार पूर्ण बहुमत में आए हैं तो सरकार अपने कोर इश्यू को क्यों छोड़ रही है.
जवाब- पहली बात तो ये कि बीजेपी के केवल तीन ही कोर इश्यू हैं. हम इस देश विकास और प्रगति से संबंधित हर मुद्दे को अपना कोर इश्यू मानते हैं, इस देश में महंगाई कम करना हमारा कोर इश्यू है, इस देश में भ्रष्टाचार समाप्त करना हमारा कोर इश्यू है. हर मुद्दे का एक समय होता है जिन मुद्दों का आप ने उल्लेख किया, उसका समय आएगा तो व्यापक राष्ट्रीय सहमति का प्रयास किया जाएगा.

सवाल- असम में हमने सुना की बिहार के मुख्यमंत्री ने असम गण परिषद से बात की, कांग्रेस से वो एक तालमेल बनाना चाह रहे हैं, जैसे बिहार में किया यहां भी एक महागठबंधन बनाने की बात, बदरुद्दीन अजमल की पार्टी आलइंडिया युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट से भी बात चल रही है. और आप के साथ जो हैं वो कुछ अलगाव वादी हैं, कुछ उधार के सिपाही हैं, कैसे लड़ेंगे आप वहां पर क्या रणनीति है.
जवाब- दिबांग जी एआईयूडीएफ और कांग्रेस की सांठ-गांठ बहुत महीने पहले हो चुका है. अब अपने-अपने राजनीति के चलते जो थोड़ा-बहुत नाटकबाजी चल रही है, चलने दीजिए. अब इस सांठ-गांठ से ही असम को बचाना है. और वहां जितने दल हैं महागठबंधन का प्रयास करें, गोगोई साहब बार-बार कह रहे हैं कि मैं अकेला बीजेपी को हरा नहीं सकता. इसलिए मेरे साथ वामपंथी भी आ जाएं. असम में वामपंथी कितने ताकतवर हैं आप जानते होंगे, लेकिन वो कह रहे है कि वामपंथी भी मेरे साथ आ जाएं. यानि किसी भी हद तक वो प्रयास कर रहे हैं, उनको शुभकामनाएं, जितना सफल होंगे, होने दीजिेए. असम के भविष्य को जो दल अपने दिल में रखते हैं उन सब को हम साथ लेकर वहां सरकार बनाने में कामयाब होंगे.

सवाल- क्या इस पर चर्चा हुई कि जिस तरह से हमने दिल्ली में देखा, बिहार में देखा क्या प्रधानमंत्री जी उसी तरीके से सघन प्रचार करेंगे असम में. क्योंकि एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा है.
जवाब- चुनाव को हम गंभीरता से लेते हैं, मैंने पहले ही कहा. असम चुनाव भी हमारे लिए महत्वपूर्ण है. इसलिए हम उसमें अपना शत प्रतिशत प्रदर्शन करने की कोशिश करेंगे. कैसे होगा आने वाले समय में देखिए. रणनीति की चर्चा कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं करता.
सवाल- प्रचार करेंगे या नहीं करेंगे
जवाब- सब लोग करेंगे.
सवाल- सघन प्रचार करेंगे
जवाब- सब लोग सघन प्रचार करेंगे, भाई चुनाव जीतने के लिए लड़ते, हारने के लिए कोई नहीं लड़ता है. सघन प्रचार करना पड़ता है. कितना करना है, क्या करना है, अनेक राज्य का चुनाव अलग होता है, उस राज्य के हिसाब से हम तय करेंगे.
सवाल- आप दिल्ली देख लीजिए, बिहार देख लीजिए, जहां जो आप के विरोधी थे, यानि अरविंद केजरीवाल का लोग नाम सुनना नहीं चाहते थे, लालू-नीतीश का बिहार में ये था कि हुआ करते थे. आप लोग कैसा प्रचार करते हैं, किस तरह की रणनीति बनाते हैं, न केवल ये उभर कर आते हैं बल्कि इतना ताकतवर कर देते हैं. अप्रत्याशित परिणाम दिल्ली के, आप ने सोचा भी नहीं होगा कि इतनी कम सीटें आ जाएंगी. क्या इस पर चर्चा हुई. क्या पार्टी के अंदर रणनीति में कहीं कमी रह जाती है कि जो लोग चूके हुए माने जाते थे, वो खड़े ही नहीं होते, पटक देते हैं हम लोगों को.

जवाब- देखिए उससे पहले हम 7 विधानसभा चुनाव हम लगातार जीते थे, तब तो आप को रणनीति का महत्व तो लगा नहीं. अब दो हारे तो लग रहा है रणनीति हार गई है. भाई ऐसा नहीं होता. सभी चुनाव एक ही दल जीतेगा ऐसा कोई भरोसा नहीं होता, कभी आप हार सकते हैं. लोकतंत्र में इसको उसी स्पिरिट में लेना है. उदाहरण के लिए आप दिल्ली और बिहार की तुलना कर रहे हैं. दोनों राज्य अलग है, दिल्ली में हमें मुख्यमंत्री का एलान करना ही चाहिए, इस उद्देश्य से थो तो मुख्यमंत्री का एलान किया, हार गए तो कई विश्लेषकों ने कहा मुख्यमंत्री का एलान किया इसलिए हार गए. बिहार में एलान नहीं किया तो अब कह रहे हैं कि आपने नहीं एलान किया इसलिए हार गए. ये जो पोस्टमार्टम है ना अपने मन से कर लेते हैं, हम जानते हैं क्या कमी है. उस कमी को ध्यान में रखकर आगे बढ़ेंगे लेकिन हर चुनाव अलग है. असम अलग है, बंगाल अलग है, तमिलनाडु अलग है.

सवाल- आप को कतई ये नहीं लगता कि जो दो चुनाव आप हारे हैं, इसको गंभीरता से सोचना चाहिए, उसको समझना चाहिए कि हुआ क्या कि और खासकर कि वो ताकतें जो बहुत कमजोर मानी जा रही थी, वो खुद नहीं मान रहे थे कि हम लोग इतनी सीटें जीतेंगे. अचानक इतनी बड़ी जीत का हो जाना आप इसका कोई महत्व नहीं समझते.
जवाब- शुरू से मैं क्या कह रहा हूं कि चुनाव हम लड़ते हैं जीतने के लिए, जब हारते हैं तो जरूर गंभीरता से उसका कारण खोजते हैं. दूसरा मैं आप की बात से सहमत नहीं हू कि किसी अपने प्रतिद्वंदी को ये माने कि ये फालतू है. हम ऐसा नहीं करते हैं. ऐसा नहीं है वो भी राजनीति कर रहे हैं, उनको हराने का हमने पूरा प्रयास किया, हमको हराने का उन्होंने प्रयास किया, वो सफल हुए हैं. इसलिए किसी भी प्रत्याशी को हम लोग बहुत कमजोर मानेंगे, गंभीरता से लड़ेंगे.

सवाल- क्या आप ये मानते हैं कि इतने महीने हो गए हैं और काम कुछ हुआ नहीं है. तो हवा बदल रही है. 18 महीने हो गए और जो लोग पार्टी के इतर हमारे समर्थन में थे वो भी अब हटते चले जा रहे हैं. एक हवा बदल रही है और उसको समझने की जरूरत है.
जवाब- हमने इन दो चुनावों का विश्लेषण जरूर किया है. मैं गंभीरता से कह रहा हूं जिस समय हम विधानसभा में हम हार रहे थे, अनेक राज्यों के नगर निगम चुनाव में हम जीत रहे थे. जब दिल्ली हार रहे तो राजस्थान, मध्य प्रदेश में हम लोकल बॉडी के चुनाव हम जीत रहे थे. बिहार में हम हारे तो गुजरात के शहरी इलाकों में अच्छा जीते, गांवों में थोड़ा कमजोर जीते, उसी समय मणीपुर में हम दो विधानसभा जीत गए. अलग-अलग कारण होते हैं चुनाव में, देश की सरकार ठीक नहीं कर रही है इसलिए चुनाव हार गए ऐसा नहीं है. वैसे भी मैं मानता हूं कि देश की सरकार ठीक कर रही है. उसके कारण लोकल चुनाव हार रहे हैं, ऐसा मैं नहीं मानता

सवाल- असम में क्या सर्बानंद सोनेवाल जी को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित करेंगे, असम गण परिषद के साथ कोई तालमेल की बात चल रही है. क्योंकि आप की पार्टी में एक वर्ग है जो चाह रहा है कि असम गण परिषद के साथ तालमेल हो जाए ताकि हिंदू वोट ना बंटे.
जवाब- हमारे पार्टी के अंदर के सभी लोग और आप सबके सुझाव लेकर अच्छी रणनीति बनाएंगे, जो भी बनाएंगे आप को तो बताएंगे ही. आप के माध्यम से ही जनता के पास जाएगा. सभी विषय पर सबकी राय लेकर रणनीति बनाएंगे, अभी समय है, 4 महीना है चुनाव के लिए.

सवाल- असम गण परिषद के साथ गठबंधन हो सकता है
जवाब- गठबंधन होंगे लेकिन क्या- क्या होंगे ये होने पर बताएंगे.

सवाल- अभी तक आपने जितनी बातें की उसमें बड़ा कनफ्यूज उभर कर सामने आता है. जब आप से निजी राय पूछी तो आप ने कहा मैं पद पर बैठा हूं निजी राय होती नहीं लेकिन आप के मंत्री से लेकर सांसद तक उलूल-जूलूल बयान देते हैं और फिर पार्टी कहती है कि उनका निजी वक्तव्य था. इसको दरकिनार किया जाए. दूसरी बात आप ने कहा कोर इश्यू नहीं होते हैं चुनाव में लेकिन जब चुनाव में लोगों को लुभाना होता है तो काला धन हो गया, दूसरी चीजें हो गई और चुनाव जीतने के बाद बाकी चीजें महत्वपूर्ण हो जाती है. ये विसंगति है. आप ने कहा आप विरोधियों को बहुत ही गंभीरता से लेते हैं. आप ही के गडकरी जब अरविंद केजरीवाल के बारे में बात करते हैं तो कहते हैं वो चिल्लर है. उसके बारे में बात नहीं करना है. तो ये बहुत सारी विसंगतियां हैं. क्या संघ वाकई बीजेपी चलाता है, क्या वाकई बीजेपी संघ के भरोसे चलती है. जब भागवत जी कहते हैं कि आरक्षण में परिवर्तन जरूरी तो मोदी जी क्यों कहते हैं कि मैं जान की बाजी लगा दूंगा लेकिन आरक्षण में जरा भी बदलाव नहीं होने दूंगा, ये इतनी सारी विसंगतियां क्यों, क्या सत्ता में रहने की मजबूरी है ?

जवाब- जो मुद्दे आप को बहुत कनफ्यूजन लग रहा है, आप जैसा देख रहे हैं, जनता भी देखेगी, जनता थोड़ी बुद्धिमान है वो समझती है सारा कुछ, ये जो बीजेपी और आरएसएस के संबंध है शायद आप को कनफ्यूजन होगा, जनता सब समझती है. जहां तक आप आरएसएस और बीजेपी की बात कर रहे हैं, हम हमेशा से कह रहे हैं, मैं दोहराता हूं, ये एक समान विचार के संबंध हम दोनों के बीच में है. दो स्वतंत्र संगठन अपने-अपने क्षेत्र में काम कर रहे हैं. हमारे विचारों में समानता है तो हम बातचीत करेंगे. हम एक दूसरे से मिलेंगे, हमारे यहां विचारों का एक्सचेंज होता है. निर्णय जिसको करना है, वो करते हैं.
सवाल- ये कनफ्यूजन दिल्ली की जनता को था, बिहार की जनता को था
जवाब- आप पूरे जनता की तरफ से मत बोलिए, अपनी तरफ से बोलिए बस वही पर्याप्त है
सवाल- मैंने वही पूछा, आप ने कह दिया कि जनाता होशियार है, मैं मुर्ख हूं मुझे नहीं समझ में आ रहा है
जवाब- बिलकुल होशियार है जनता, इसी ने हमको 280 सीट दिया है, आप को कनफ्यूजन है आप संघ के पास आइए दूर हो जाएगा.
सवाल- आप बताईए ना, आप बताईए ना
जवाब- 50 साल से बता रहे हैं समझ में नहीं आ रहा है.

सवाल- नेपाल में प्रधानमंत्री शुरुआत मे दो बार गए, पहली बार हुआ है कि यूएन एचआरसी में सवाल उठाया नेपाल का जिस तरह की हिंसा वहां पर हो रही है, नवंबर 2015 की बात कर रहा हूं . आप युनाइटेड नेशन की एक बॉडी में जाकर नेपाल के बारे में जिससे कहा जाता है कि यहां रोटी और बेटी का रिश्ता है, जिसे कहा जाता है कि भई ये बिग ब्रदर नहीं है, ईल्डर ब्रदर हैं वहां इस तरह की बात हो तो क्या ये आप इसे एक तरह का फेलियर मानते हैं सरकार की, एक तरीके से बातचीत में कमी मानते हैं, डिप्लोमेसी की कमी मानते हैं.

जवाब- ना कोई फेलियर, ना कोई डिप्लोमेसी में कमी है. नेपाल एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू से गुजर रहा है. नेपाल एक फुल फ्लेज्ड डेमोक्रेटिक रिपब्लिक की तरह उभर रहा है. उनका एक बड़ा अच्छा संविधान बनाने की प्रक्रिया है. इसमें नेपाल के अंदर ही कुछ मतभिन्नता चल रही है, वो एक गंभीर रूप धारण कर चुका है, हम मानते हैं. उसमें भारत जिम्मेदार बिलकुल नहीं है, ये उनका आंतरिक विषय है, ये बात हम बार-बार कह रहे हैं, हम पूरे नेपाली सरकार को, नेपाल की जनता को जैसे पहले सहयोग देते रहे हैं, वैसा ही सहयोग देना चाहेंगे क्योंकि उनका संविधान सफल हो, सर्वसम्मति बने, सब मिलकर अच्छे संविधान बनाकर अच्छे गणतंत्र के रूप में उभरें. हां इस समय तनाव है लेकिन जब कोई बहुत बड़ा परिवर्तन होता हो तो थोड़ा, बहुत उथल-पुथल होता है. थोड़ा सब्र रखिए, ये घोषणा कर देना राज्यसभा में कि ये मोदी की नीति है, देश की नीति नहीं है, ऐसा नहीं होता है सरकार की नीति हमारे देश की नीति होती है.

सवाल- ये आप मानते हैं कि आप यूएन एचआरसी में जाएं, नेपाल में जिस तरह से हत्याएं हो रही हैं उसके बारे में बात करें, ये पहली बार ऐसा हो रहा है. हम नेपाल के बारे में कभी इस तरह कभी सार्वजनिक मंचों पर बात नहीं करते हैं, हम आपस में बातचीत कर लेते हैं

जवाब- यही मैं कह रहा हूं ना कि एक बहुत ही महत्वपूर्ण परिवर्तन नेपाल में आ रहा है, नेपाल अभी तक पूर्ण रूप से लोकतंत्र नहीं बना है, पहली बार बनने का प्रयास कर रहा हैं, थोड़ा बहुत अगर कहीं गलतफहमी है तो उसको दूर करने का प्रयास होगा. हां आप सही कह रहे हैं कि उन्होंने यूनाइटेड नेशन में उन्होंने मुद्दा उठाया था

सवाल-भारत ने मुद्दा उठाया था
जवाब- उन्होंने पहले उठाया था, उनके उप प्रधानमंत्री जाकर के विषय उठाया था, फिर हमने अपना पक्ष रखा था.

सवाल- क्या आप को ऐसा लगता है कि नेपाल चाइना की तरफ चला गया है पूरी तरीके से इसलिए ये सवाल उठाया गया है.
जवाब- नेपाल का दूसरे देशों से किस प्रकार का संबंध रहे, इस पर भारत की ना कोई आपत्ति है और ना कोई राय हो सकती है. एक स्वतंत्र देश है, वो चीन के साथ संबंध रखना चाहते हैं तो रखना चाहिए, इसमें कोई आपत्ति नहीं है. हमारे बीच में एक अनावश्यक गलतफहमी निर्माण हुई है, वो भी वर्तमान नेपाल सरकार के कुछ लोगों के मन में है, उसको दूर करना होगा. नेपाल में जो क्राइसिस है वो उनकी आंतरिक क्राइसिस है. भारत से बनाई क्राइसिस है ऐसी गलत धारणा है.
सवाल- मैं आप से ये पूछ रहा हूं कि दो लोगों के बीच गलतफहमी हो जाती है तो क्या एक ही जिम्मेदार होता है या ताली दोनों हाथ से बजती है.
जवाब- इसलिए हमारा बार-बार प्रयास होता रहा है, हमारे विदेश सचिव नेपाल गए थे, उसके बाद उनकी तरफ से उनके उप प्रधानमंत्री दो बार भारत आए थे. अभी उनके मधेशी नेता भारत आए और सभी दलों के नेताओं से मिले वो. प्रयास हो रहा है जल्द ही गलतफहमी दूर हो जाएगी.

सवाल- एक जो नए किस्म का प्रयोग प्रधानमंत्री मोदी के साथ देखा जा रहा है वो जिस तरह से विदेश जाते हैं, एक रॉकस्टार की तरह से पेश किया जाता है, हजारों लोग वहां पर जुटते हैं, उसमें सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होता है. इससे सरकार और देश को क्या फायदा होगा.
जवाब- इससे दो प्रकार के फायदे मुझ को दिखते हैं. एक डायमेंशन जो फॉरेन पॉलिसी में जुड़ा व्यापक संपर्क का, इससे पहले भी हमारे सीमित लोगों से मिलते थे 500-600 लोग से डिनर पर मिलना होता था. इसको बढ़ाने के दो फायदे मिले हैं, पहला कि पूरे भारतीय समुदाय में एकता स्थापित करने में कामयाबी हमको मिल रही है. ये इवेंट कोई पार्टी या संगठन की ओर से नहीं होते हैं. सारे संगठन साथ आते हैं, यूके में 400 संगठन आए, यूएस में 300 संगठन आए, ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर जैसे देश में 200 से 100 संगठन साथ आए और इवेंट करते हैं तो कम्यूनिटी में एक एकता स्थापित होती है. दूसरा मैं जो ज्यादा महत्व का मानता हूं वो कि भारतीय समुदाय का आज के भारत से इमोश्नल जुड़ाव 100 प्रतिशत और फीजिकल जुड़ाव भी काफी बड़े पैमाने पर बढ़ रहा है, ये देश के लिए अच्छा है. देश में अनेक कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए आज एनआरआई बहुत ज्यादा उत्साहित हो रहे हैं, ऐसा हमको लगता है.

सवाल- राम माधव जी क्योंकि इतने बड़े आयोजन होते हैं, सरकार लगातार एफडीआई की बात करती है, उद्योग लगाने की बात करती है. भाव जो निकलता है कुल मिलाकर आप, मैं राहुल गांधी की बात नहीं कर रहा हूं कि वो कहते हैं कि सूट-बूट की सरकार है पर किसानों की विरोधी सरकार दिखाई देती है. आपने अपने मेनीफेस्टो में कहा कि जो 50 फीसदी लागत है वो उसका एमएसपी होगा, आप गुजरात देख लीजिए, गुजरात में कॉटन के प्रति क्विंटल भाव 2001-12 में 7 हजार रुपए थे आज प्रति क्विंटल भाव 4 हजार 50 रुपये हैं. आप महाराष्ट्र देख लीजिए पिछले 1 हफ्ते में 28 किसानों ने आत्महत्या की. 1 छोटी लड़की जिसके पिता उसके बस का पास नहीं खरीद सका, उसने आत्महत्या की, एमपी में दीवाली के महीने से पहले 28 लोगों ने आत्महत्या की क्योंकि एमपी में सोयाबीन की फसल फेल हो गई. क्यों नहीं आप इस ओर भी ध्यान देते. क्या आप को लगता है कि इस पर जोर दिया जाना चाहिए, इस पर कुछ करना चाहिए, मैं बहुत ही सकारात्मक और गंभीरता से ये सवाल पूछ रहा हूं.

जवाब- मीडिया में दिखे या ना दिखे इसकी चिंता मुझे कतई नहीं है, लेकिन इस देश में यदि कोई भी किसान कृषि की वजह से आत्महत्या करे तो कोई भी सरकार रहे उसके लिए ये दुखद विषय होना चाहिए. हमारी सरकार है, खेती के क्षेत्र में राज्य सरकार का भी एक बहुत बड़ा भाग होता है. सबको इसकी गंभीर चिंता करनी चाहिए. जब से हमारी सरकार बनी तब से गरीबों के लिए अनेक प्रकल्प लिए हैं. वो प्रारंभ मे जनधन योजना से लेकर आज हेल्थकार्ड वाली योजना तक. मुख्य फ्लैगशिप जो योजना है वो इस देश के सामान्य गरीब किसान के हित में है. अब फिर भी इस देश में कुछ जगह पर ये परिस्थिति आज भी है. एमएसपी का विषय हो, या कुल मिलाकर सामान्य किसान की हालत हो, उसमें और प्रयास करने की जरूरत है. किसान आत्महत्या कर रहे हैं ये पहली बार नहीं हो रहा है, पहले भी ऐसा होता रहा है. ये सिलसिला रुकना चाहिए. इसको गंभीरता से लेना चाहिए, मैं आप की बात से बिलकुल सहमत हूं. हमारे बारे में शायद ये धारणा बनी हो कि शायद हम इस वर्ग कि चिंता कम कर रहे हैं और उद्योगपतियों की चिंता ज्यादा कर रहे हैं तो ये धारणा गलत है, इसको दूर करने की आवश्यकता है. हम सब को चिंता करनी चाहिए और हम सब करेंगे.

सवाल- महाराष्ट्र में वहां तो राज्य में भी आप की सरकार है 1024 किसानों ने सालभर में आत्महत्या की है. बहुत बड़ी संख्या है 1024. और आप ने कहा कि लागत का 50 प्रतिशत फायदा होगा वो एमएसपी होगी. गुजरात में जो किसान कपास उगाता है, उसकी लागत तक नहीं वसूल हो रही है, तो किसानी करेगा कैसे. वो दूसरी फसलों पर जा रहा है.
जवाब- बिलकुल ये गंभीर विषय है. मेरे पास तो इसका तुरंत उत्तर तो होना संभव नहीं है. सभी राज्यों में इस विषय पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है. ये कोई पार्टी का विषय नहीं है, मैं बिलकुल इसको महत्व का विषय मानता हूं.

सवाल- अगर आप को पीएम से इस बात पर कहना हो तो आप किस तरीके से उसको कहेंगे और कौन सा विभाग है और कहां आप चाहेंगे कि पोजिशन को थोड़ा सा ठीक किया जाए, ताकि ये स्थिति आगे और ना हो. कैसे आप इसको कहेंगे.
जवाब- देखिए मुझे का कोई जुर्रत है ना कोई उसका कोई एक्सपर्टीज मेरे पास है और जहां तक हमारे प्रधानमंत्री का प्रश्न है, राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में 14 साल काम किए हैं, इन सारी समस्याओं का पूरा आंकलन प्रधानमंत्री जी को है, मेरा पूरा विश्वास है कि इस स्थिति से देश को बाहर लाने में काम कर रहे हैं और करेंगे जरूर.
सवाल- पर स्थिति बदली नहीं है.
जवाब- नहीं कई चीजों में भारत सरकार ने पहल भी की है.

सवाल- हम बीजेपी पर वापस आएं 280 सांसद हैं, उनका संसदीय क्षेत्र में जो प्रदर्शन है उसका कोई मैकनिज्म नहीं बना है, उसको मॉनिटर करना है. 18 महीने में धीरे-धीरे जो संसदीय क्षेत्र लेवल पर जो विरोध की लहर आ जाती है, उसको भी मैनेज करना पड़ता है. 2004 में करीब 90 सांसद इस कारण से हारे थे. क्या इस बात पर भी गौर किया जा रहा है.
जवाब- बिलकुल यह विषय महत्व का है इसलिए सरकार के बनते ही प्रधानमंत्री ने एक कार्यक्रम भी दिया भले ही ये कार्यक्रम सभी अपनाएं. सासंद को अपने क्षेत्र के गांवों का विकास करना चाहिए. कार्यक्रम जो दिया गया उसके पीछे मकसद यही थी कि सासंदों को उनके क्षेत्र में काम करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके. ये थोड़ा बहुत हो रहा है, बाकी काफी व्यस्तताओं के कारण जितना ध्यान देना चाहिए नहीं दिया जा रहा है. आपने सचेत किया आपकी चेतावनी के लिए धन्यवाद. अब इस तरफ ध्यान देंगे.
सवाल- सांसद निधी में से बीजेपी के सांसदों ने सबसे कम खर्चा किया है.
जवाब- अभी जो व्यवस्था है उस पर चलें बाकी इसपर क्या करना है ये सरकार तय करेगी.

सवाल- मंत्री रामजादे और आगे जोड़ लीजिए, पाकिस्तान भेजने की बात करते हैं, इस सब के बीच आपका एक ट्वीट देखते हैं उपराष्ट्रपति के ऊपर क्या इस सब रोक नहीं लगाई जा सकती है, खास तौर पर दोनों संगठन, चाहे बीजेपी हो या आरएसएस हो तो उनमें बड़ा अनुशासित कार्डर इनका माना जाता है.
जवाब- सफेद कमीज पहनकर जब हम लोग जाते हैं तो थोड़ी भी स्याही पेन से लीक होती है तो आप लोगों को बहुत दिखता है. हमारे विरोधी तो रंगीन वाले हैं, रोज कितना भी उल्टा-सीधा बयान दें आप को दिखेगा नहीं. क्योंकि हम सफेद कमीज वाले हैं, हमें ज्यादा ध्यान रखना है और हम रखेंगे.
सवाल- भगवा पहनते हैं आप
जवाब- उसमें भी अच्छा दिखता है. थोड़ा सावधान जरूर रहना चाहिए, मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूं. सरकार के मुखिया की जो नीति होती है वो पार्टी और सरकार की नीति होती है बाकि हम सब को सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदार रहना चाहिए. कभी गलती हो गई तो मांफी मांगने की उदारता होनी चाहिए, जैसे मैंने कहा है. अभी कितना दबाव था मेरे ऊपर, मुझ से उन को अपना बयान चाहिए था, कुछ लोग आ जाते हैं दबाव में, थोड़ा सावधान रहना चाहिए.

सवाल- क्या पार्टी इस बारे में कुछ करती नहीं है, एक जमाने में जनता पार्टी हुआ करती थी, उस तरीके की हो गई है. और इसका आप को नुकसान होता है, आप लोग सफाई देते फिरते हैं, बचते फिरते हैं. क्या अंदर इसपर कोई मंथन नहीं है, चर्चा नहीं है या ये कंट्रोल से बाहर लोग हैं.
जवाब- नहीं ऐसा नहीं है. आप देख रहे होंगे काफी हद तक इस प्रकार की जो परिस्थिति है उससे पार्टी बाहर आई है. जैसे आप ने कहा इतने सांसद किसी पार्टी के पार इतने वर्षों से कभी किसी पार्टी के पास थे ही नहीं तो कभी एक-आध जगह किसी के मुंह से गलत निकल जाता है. तो उससे बचना चाहिए आज तो मीडिया हर जगह है. जहां तक पार्टी में इस पर ध्यान देने की बात है, पूरा ध्यान दिया जाएगा, दिया जा रहा है. और जिनको जो कहना है वो कहा जाएगा. राजनीति में हर चीज का एक समय होता है. हम भी तो चिंतित होते हैं इन चीजों से.
सवाल- क्या इसपर चर्चा हुई कि इन बयानों की वजह से हम हार जाते हैं.
जवाब- बिलकुल होती है चर्चा इस पर. कोई बयान के कारण हार जाता है ऐसा नहीं है, हमने चुनाव का विश्लेषण किया है. हम जानते हैं किस कारण से हम हारे हैं. क्या गणित हमारे खिलाफ गया.

सवाल- एक तो ये बयान है और दूसरे बयान उन लोगों के हैं जो पार्टी के अंदर अब भी बने हुए हैं, उनका आप कुछ नहीं करते हैं. आप बिहार में देख लीजिए जिस तरह के बयान दिए शत्रुघ्न सिन्हा ने और दूसरे सीनियर नेता जो पार्टी के अंदर हैं उनके बयान देख लीजिए. चाहे पूर्व गृह सचिव जिस तरह के बयान दे रहे हैं, आप रह-रह कर सुब्रमण्यम स्वामी के बयान देख लीजिए, अरूण शौरी के बयान देख लीजिए.
जवाब- हमारी पार्टी की अंदरूनी अच्छाई की चिंता के लिए धन्यवाद, इन सारे विषयों की हम चिंता करते हैं. देखिए बदनामी करने का प्रयास कोई पार्टी नहीं करती है. ऐसा अगर हो रहा है तो कहां क्या करना है, उसपर हम जरूर प्रयास कर रहे हैं, हम प्रयास करेंगे कि ऐसे अवसर आप को ना मिले जिसको लेकर आप हमारे ऊपर हमला कर सके.
सवाल- क्या आप को लगता है कि इस चक्कर में अमित शाह को दूसरा कार्यकाल ना मिले
जवाब- हमारे संगठन के चुनाव बाकी रोजना होने वाली राजनीतिक गतिविधियों से संबंधित नहीं होते हैं. हमारी पार्टी मेच्योर पॉलिटिकल पार्टी है. इसकी एक प्रक्रिया होती है, जब होंगे तब आपको जानकारी मिलेगी.

सवाल- आप को क्या लग रहा है उनको दूसरा कार्यकाल मिलेगा
जवाब- हमारी एक प्रक्रिया है और जब होगा तब पता चल जाएगा.
सवाल- आप कोई पत्ते खोलते नहीं हैं.
जवाब- हम थोड़ी ना खोल देंगे.
सवाल- पर क्या इस पर कभी कोई अनुशासन वाली कार्रवाई पार्टी बात करती है.
जवाब- जिनको जिस जगह ठीक करना आवश्यक है, वहां बिलकुल पार्टी के अंदर करने का प्रयास होता है. कई लोग बुजुर्ग होते हैं जिनको स्वयं अनुशासित रहना चाहिए. मेरे कहने से क्या परिणाम होगा ये लोग सोचें. वो ज्यादा अच्छा अनुशासन की पद्दति है उसे लागू करने के लिए कहते हैं, वो बिलकुल नहीं हो रहा है, कोई सोचने के लिए तैयार ही नहीं है. जो करना है वो किया जाएगा.

सवाल- आप को लगता नहीं है कि सरकार आने के बाद मीडिया और सरकार में गैप बढ़ा है, एक कम्यूनिकेशन गैप है. पीएम भी पत्रकारों से कम बात करते हैं.
जवाब- पीएम बीच-बीच में पत्रकारों से मिलते रहे हैं, लेकिन मैं आपके बात से सहमत हूं. कुछ एक ऐसी भी धारणा है कि शायद कुछ और इन्ट्रैक्शन बढ़ना चाहिए. जब इन्ट्रैक्श का ध्यान आया तो देखने में आया कि सेल्फी के लिए काफी होड़ लगी थी, तो ध्यान में आया कि पत्रकार इन्ट्रैक्शन के लिए काफी उत्सुक हैं. शायद प्रदानमंत्री जी इस पर जरूर विचार करेंगे.
रैपिड फायर राउंड
सवाल नं.1- अगर बीजेपी और आरएसएस के रिश्तों की बात करें तो बेहतर प्रधानमंत्री कौन साबित हुए- अटल बिहारी वाजपेयी या नरेंद्र मोदी
जवाब- दोनों..आप पास समझ सकते हैं.
सवाल नं.2- आप खुद को किसके ज्यादा करीब पाते हैं- आरएसएस या बीजेपी
जवाब- आरएसएस
सवाल नं.3- नरेंद्र मोदी ने कहा हमें पहले शौचालय बनाने चाहिए, मंदिर बाद में क्या आप इस बात से सहमत हैं.
जवाब- उनका कहने का अर्थ ऐसा बिलकुल नहीं है, दोनों का अपना-अपना महत्व है. लेकिन आज देश में शौचालय बनाने की जरूरत है और 1 बिलियन शौचालय बनाए हैं स्कूल में.
सवाल- तो आप को क्या लगता है आज के दौर में आज जिस हालत में हैं हमारा देश उसमें ज्यादा महत्व शौचालय का या मंदिर का.
जवाब- दोनों की तुलना नहीं करनी चाहिए, दोनों अपनी-अपनी जगह है.
सवाल नं.4- भविष्य में आप खुद को कहां देखते हैं- पार्टी का अध्यक्ष या प्रधानमंत्री
जवाब- मेरी पार्टी आने वाले चुनाव में जीतते देखना चाहता हूं. मेरा कोई और इरादा नहीं है राजनीति में. मैं कहां अच्छा काम करूंगा ये पार्टी तय करेगी और मेरे ऊपर संघ का भी अधिकार है.
सवाल नं 5- संघ से आए दो व्यक्ति दो अलग-अलग राह पर चले- एक राह थी गोविंदाचार्य की, दूसरी राह थी नरेंद्र मोदी की आप किस पर चलना चाहेंगे.
जवाब- हम सभी की राह देश के विकास वाली राह होनी चाहिए, मैं उस राह पर हूं.
सवाल- तो इसमें कौन ज्यादा आपके आइडिया के पास है- नरेंद्र मोदी या गोविंदाचार्य
जवाब- उनके क्या आईडिया हैं ये मैं वाच नहीं कर सकता, मैं हमारे आईडिओलजी के पास हूं.
सवाल- इस सवाल का तो आप जवाब दे सकते हैं.
जवाब- क्यों मैं दो इंडिविजुअल पर क्यों च्वाइस लूं. मैं तो संगठन और पार्टी में विचारधारा के लिए हूं. मोदी जी देश के प्रधानमंत्री है पूरा सहयोग, सम्मान मोदी जी के साथ है. दो व्यक्तियों की तुलना आप को नहीं करनी चाहिए. आप कर रहे हैं तो मैं क्यों उसमें चुनूं.
सवाल- गोविंदाचार्य वाली राह पर मुश्किल मैं समझ सकता हूं. प्रधानमंत्री वाली राह चलने में क्या दिक्कत है?
जवाब- पीएम के साथ देश के 125 करोड़ की जनता है, हमारी पार्टी का हर एक कार्यकर्ता है, सिर्फ मैं ही नहीं.
सवाल-तो आप इसकी जवाब दे रहे हैं
जवाब- हां प्रधानमंत्री के साथ

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Web Title: ram madhav in press confrence
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