सामने आई राम मंदिर की तारीख, दिसंबर तक बनने लगेगा अयोध्या में राम मंदिर

By: | Last Updated: Thursday, 7 January 2016 11:43 AM
Ram Mandir work to start this year end, says Subramanian Swamy

नई दिल्ली: 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव के पहले अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा फिर गर्म है. बीजेपी की तरफ से अयोध्या में राम मंदिर बनाने की तारीख पहली बार सामने आई है. दिल्ली में विश्व हिंदू परिषद के बड़े नेताओं के साथ बैठक के बाद बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा है कि इस साल दिसंबर तक अयोध्या में राम मंदिर बनाने का काम शुरू हो जाएगा.

अयोध्या का मामला अभी कोर्ट में है. स्वामी ने ये भी कहा कि उन्हें कोर्ट केस का स्टेटस मालूम है. अगस्त सितंबर तक कोर्ट का फैसला आ जाएगा और दिसंबर से राम मंदिर का काम शुरू हो जाएगा. विपक्ष अभी तक बीजेपी पर आरोप लगाता था कि बीजेपी वाले राजनीतिक फायदे के लिए राम मंदिर का मुद्दा उठाते हैं लेकिन ये मंदिर बनने की तारीख नहीं बताते हैं. 9-10 जनवरी को दिल्ली में वीएचपी के नेता मंदिर बनाने के प्लान पर विचार करने वाले हैं.

राम मंदिर का मुद्दा पिछले महीने उस वक्त गर्म हुआ जब वीएचपी ने अयोध्या में शिला पूजन किया और मंदिर के लिए और पत्थऱ मंगाकर तराशना शुरू किया. ABP न्यूज ने आपको सबसे पहले ये खबर दिखाई थी. संसद में भी विपक्ष ने हंगामा हुआ था तब सरकार ने कहा था कि मंदिर कोर्ट के फैसले के बाद ही बनेगा लेकिन पत्थर तराशने पर कोई रोक नहीं है.

ram mandir kaam suru

आखिर क्या है अयोध्या भूमि विवाद?

सन् 1526 में मुगल बादशाह बाबर ने दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को जंग में हराकर दिल्ली की गद्दी पर अपना कब्जा जमा लिया था और इसी के बाद भारत में मुगलिया साम्राज्य फैलता चला गया था. बाबर की इसी मुहिम के तहत उसके ख़ास सिपहसालार मीर बाक़ी ने अवध के इलाके को अपने कब्ज़े में ले लिया था, जिसके बाद मीर बाक़ी ने 1528 में अयोध्या के रामकोट में एक मस्जिद का निर्माण करवाया जिसे मस्जिद-ए-जन्मस्थान और बाबरी मस्जिद के नाम से पुकारा गया.

बाबरी मस्जिद के निर्माण के बाद से ही आस-पास के हिन्दू उसे भगवान राम का जन्मस्थान बता कर उसे अपने कब्ज़े में लेने की कोशिश करते रहे और इसीलिए जहां मस्जिद के बाहरी हिस्से में हिन्दू पूजा-अर्चना करते रहे वही मस्जिद के अंदर मुसलामानों ने नमाज पढ़ना जारी रखा.

अंग्रेजों के दौर में भी हिन्दू पक्ष की तरफ से कई बार मस्जिद को अपने कब्ज़े में दिए जाने की गुहार लगायी गयी. लेकिन फैज़ाबाद के कमिश्नर ने इसे ये कहते हुए ठुकरा दिया कि भले ही मस्जिद की जगह पर पहले मंदिर रहा हो लेकिन अब सैंकड़ों साल के बाद इस स्थिति में बदलाव नहीं किया जा सकता. देश की आजादी के साथ ही अयोध्या भूमि विवाद ने नए मोड़ लेने शुरू किये.

अयोध्या मुद्दे ने पहली साल 1949 में आग पकड़ी थी. इसी साल दिसंबर महीने में एक दिन अचानक किसी ने मस्जिद के अंदर और मुख्य गुम्बद के नीचे रात के वक्त भगवान राम और सीता की मूर्तियां रख दी. इसके बाद जनवरी 1950 में गोपाल सिंह विशारद नाम के शख्स ने फैजाबाद की अदालत में पहला मुकदमा दाखिल करके इस जगह पर पूजा करने की इजाजत मांगी थी.

दिसंबर 1950 में दूसरा मुकदमा दाखिल हुआ और इस बार राम जन्मभूमि न्यास की तरफ से महंत परमहंस रामचंद्र दास ने भी कोर्ट से पूजा की करने की अनुमति मांगी.

दिसंबर 1959 में निर्मोही अखाड़े ने भी रामजन्मभूमि पर अपना दावा ठोक दिया. अखाड़े ने कहा कि ऐतिहासिक रूप से वही अयोध्या में राम मंदिर की देखभाल करता रहा है और इस आधार पर अखाड़े ने विवादित जगह को अपने कब्जे में दिए जाने की कोर्ट से मांग की थी.
मस्जिद में मूर्तियां रखे जाने के 12 साल बाद दिसंबर 1961 में सुन्नी सेन्ट्रल वक़्फ बोर्ड ने फैज़ाबाद की कोर्ट में अर्ज़ी लगाई. बोर्ड ने मूर्तियों को हटाने और मस्जिद पर कब्ज़े की मांग की. अप्रैल 1964 में फैजाबाद कोर्ट ने सभी 4 अर्जियों पर एक साथ सुनवाई का फैसला लिया.

हालांकि मंदिर मुद्दे का ये पूरा मामला फैजाबाद कोर्ट में भी टलता रहा. इस बीच 1989 में इलाहबाद हाइकोर्ट के रिटायर्ड जज देवकी नंदन अग्रवाल ने रामलला विराजमान की तरफ से कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी. दरअसल जो लोग खुद मुकदमा दाखिल नहीं कर सकते उनके लिए कानून में दिए गए प्रावधान के मुताबिक अग्रवाल ने खुद को भगवान राम का प्रतिनिधि बताया और सारी जमीन रामलला को सौंपने की मांग की.

देवकी नंदन अग्रवाल की अर्ज़ी पर 1989 में इलाहबाद हाईकोर्ट ने अब तक दाखिल सभी 5 दावों पर खुद सुनवाई करने का फैसला किया और सुनवाई के लिए तीन जजों की विशेष बेंच का गठन भी किया गया.

2002 में हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई शुरू की. हाईकोर्ट ने हिन्दू पक्ष के दावे की पुष्टि के लिए विवादित जगह पर खुदाई कराने का फैसला लिया. खुदाई का जिम्मा आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया को सौंपा गया.

एएसआई की टीम ने यहां कई दिनों तक खुदाई की. इसके बाद उसने जो रिपोर्ट सौंपी उसमें बाबरी मस्जिद वाली जगह पर भव्य हिन्दू मंदिर होने की बात कही गई.

साल 2010 में हाई कोर्ट के तीन जजों की बेंच ने सभी दावों पर सुनवाई पूरी की. और आखिरकार 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस सुधीर अग्रवाल, एस यू खान और डी.वी. शर्मा की बेंच ने मंदिर मुद्दे पर अपना फैसला भी सुना दिया.

हाईकोर्ट के तीन जजों की बेंच ने आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया की तरफ से विवादित जमीन पर कराई गई खुदाई के नतीजों के आधार पर ये भी माना कि बाबरी मस्जिद से पहले वहां पर एक भव्य हिन्दू मंदिर था. रामलला के वर्षों से मुख्य गुम्बद के नीचे स्थापित होने और उस स्थान पर ही भगवान राम का जन्म होने की मान्यता को भी फैसले में तरजीह दी गई.

हालांकि कोर्ट ने ये भी माना कि इस ऐतिहासिक तथ्य की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि वहां साढ़े चार सौ सालों तक एक ऐसी इमारत थी जिसे मस्जिद के रूप में बनाया गया था. बाबरी मस्जिद के बनने के पहले वहां मौजूद मंदिर पर अपना हक बताने वाले निर्मोही अखाड़े के दावे को भी अदालत ने मान्यता दी.

तमाम तथ्यों और बातों को देखते हुए जजों की बेंच ने अयोध्या की विवादित 2.77 एकड़ जमीन को तीन बराबर हिस्सों में बांटने का आदेश दिया था बेंच ने ये तय किया कि जिस जगह पर रामलला की मूर्ति स्थापित है उसे रामलला विराजमान को दे दिया जाए. राम चबूतरा और सीता रसोई वाली जगह निर्मोही अखाड़े को दिया जाए. और बचा हुआ एक तिहाई हिस्सा सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को दिया जाए.

हालांकि, हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सभी पक्षों के दावों में संतुलन बनाने की कोशिश की लेकिन कोई भी पक्ष इस आदेश से संतुष्ट नहीं हुआ.

हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अयोध्या की विवादित जमीन पर दावा जताते हुए रामलला विराजमान की तरफ से हिन्दू महासभा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. दूसरी तरफ सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने भी हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. और इसके बाद कई और पक्षों की तरफ से भी सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की गई है. इन सभी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 9 मई 2011 को हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी और अब ये पूरा मामला देश की सर्वोच्च अदालत में लंबित है.

माना जा रहा है कि अयोध्या मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट में काफी समय लग सकता है. केस से जुड़े हजारों कागजात हैं. इनमें अरबी, फारसी और संस्कृत के कागजात भी शामिल हैं. इनका अनुवाद भी किया जाना है. कागजातों के डिजिटलाइजेशन में भी लंबा वक्त लगता है.

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Web Title: Ram Mandir work to start this year end, says Subramanian Swamy
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