एबीपी न्यूज स्पेशल: जापान में है परिवहन में 'रामराज्य'

By: | Last Updated: Saturday, 4 July 2015 5:27 PM
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रामराज्य की यात्रा जारी है. रामराज्य की खोज जारी है. रामराज्य की अबतक की सबसे बड़ी सीख यही है कि रामराज्य है. भारत में ना सही इसी दुनिया में ऐसा देश है जहां लोगों ने रिश्वत, ब्राइब जैसे शब्द सुने ही नहीं है. रामराज्य वो जहां सबको बराबरी का हक मिले. बराबरी शिक्षा में बराबरी सेहत में बराबरी सुरक्षा में. ऐसे देश हैं जिन्होंने ये सब कर दिखाया है. लिहाजा रामराज्य की दूसरी बड़ी सीख ये कि रामराज्य भारत में भी संभव है. सवाल है कैसे?

 

क्या भारत में रामराज्य संभव है. इस सवाल का एक जवाब जापान देता है. भारत से तकरीबन 6 हजार किलोमीटर दूर जापान की राजधानी टोक्यो शहर देता है. टोक्यो एक मेगासिटी है. दुनिया का सबसे बड़ा शहर है. ग्रेटर टोक्यो यानी टोक्यो और उसके आसपास के इलाके को मिला दिया जाये उसकी आबादी होती है तीन करोड़ अस्सी लाख. जबकि दिल्ली नैशनल कैपिटल रिजन की आबादी 2 करोड़ 50 लाख है. मतलब टोक्यो और उसके आसपास दिल्ली से 1 करोड़ 30 लाख ज्यादा लोग रहते हैं. इतनी बड़ी आबादी एक जगह से दूसरी जगह आती जाती कैसे है?

इतनी आबादी होने के बाद भी टोक्यो दुनिया का सबसे अमीर शहर है. जापान, दुनिया के सबसे बड़े कार निर्माता देशों में से एक हौन्डा, सुजुकी, टोयोटा, निसान, यामाहा. ये कंपनी जापान की है. आप कहेंगे टोक्यो शहर के लोग जो दुनिया में सबसे अमीर शहरी हैं. अपनी मंहगी चमचमाती कारों से घर से ऑफिस से घर जाते होगें. लेकिन ऐसा नही हैं. क्यों ? कैसे टोक्यो दुनिया के समृद्ध शहरों में से एक बना.   

 

हौन्डा, निसान, टोयोटा, सुजुकी. ये सभी जापान की कार निर्माता कंपनी है. ये शहर लोकल ट्रेन का है. ये शहर है शिनकासेन यानी बुलेट ट्रेन का.

 

कहानी की शुरुआत वहां से जो जापान में सबसे तेज है. सुरक्षित है. भरोसेमंद है. ये शिनकानसेन है. जिसे बुलेट ट्रेन कहा जाता है. जापान की बुलेट ट्रेन 320 किलोमीटर प्रति घंटा की स्पीड से चलती है. 51 साल से शिनकासेन जापान में गोली की गति से चल रही है. लेकिन कभी भी दुर्घटना की शिकार नहीं हुई. और भरोसेमंद इतनी कि पिछले 51 साल में इन रेलगाड़ियों के लेट होने का औसत एक मिनट से भी कम का. वो भी तब जब जापान में भूकंप, सुनामी तुफान लगातार आते रहते हैं.

 

टोक्यो स्टेशन. दुनिया के व्यस्ततम स्टेशनों में से एक. इस स्टेशन का इस्तेमाल 5 लाख पचास हजार से ज्यादा लोग रोज करते हैं. टोक्यो शहर इतना बड़ा और समृद्द कैसे बना इसके पीछे की एक वजह इस स्टेशन पर समझ में आती है. जहां से जापान की सैकड़ो बुलेट ट्रेन आती जाती है.

 

जापान में बुलेट ट्रेन शिनकासेन की रफ्तार ही गोली जैसी नहीं होती है इससे जुड़ी हर बात हर चीज गोली जैसी होती है. रफ्तार बहुत तेज होती है. अब ये ट्रेन हाकुटाका 557 नौ बज कर 32 मिनट पर टोक्यो स्टेशन पर आई और इसे 9 बजकर 44 मिनट पर यहां से वापस रवाना होना है. इस 12 मिनट में क्या होता है.

 

2 से ढ़ाई मिनट सवार यात्रियों के उतरने में गुजर गया. लेकिन कोई भी यात्री बाहर आता उससे पहले एक महिला पॉलिथिन बैग लेकर गेट पर खडी हो गई. लोग उसमें अखबार. खाली बॉटल जैसी चीजो को डालने लगे. उसके हर एक बॉगी में सफाई कर्मी दाखिल हुये. इन बॉगियों में 65 से लेकर 100 सीटें हो सकती हैं. एक सीट की सफाई हुई. फर्श की सफाई हुई. उपरी रैक का निरीक्षण हुआ. फिर सामने की ट्रै की सफाई हुई. उसके बाद सारे सफाई कर्मी बाहर निकले. और इंतजार कर रहे यात्रियों को धन्यवाद दिया और चल पड़े. अगली ट्रेन की सफाई के लिए. भारत की सबसे तेज ट्रेन भोपाल शताब्दी है. ये ट्रेन दिल्ली से भोपाल दिन के दो बजे पहुंचती है. और भोपाल से वापस रवाना होती है 3 बज कर 15 मिनट पर. यानी जो काम जापान में 12 मिनट में होता है वो भारत में 1 घंटा 15 मिनट में होता है.    

 

12 मिनट के लिए ट्रेन रुकती है. इसमें सात मिनट में ट्रेन की सफाई होनी है. सात मिनट में ट्रेन कैसे साफ होती है इसकी चर्चा सोशल साइट्स पर खूब हो रही है. इसका वीडियो तो वायरल भी हो गया है. दरअसल इसके पीछे की कहानी भी बहुत दिलचस्प है.

 

2020 में टोक्यो में ओलम्पिक होना है. टोक्यो मेट्रोपोलिटन गवर्नमेंट ने इसके लिए विदेशों से 6 पत्रकारों को आमंत्रित किया. उन पत्रकारों से ये कहा गया कि आप जापान की ऐसी बात बताइये जो हमारे लिए तो बहुत ही आम हो लेकिन बाहर के लोगों को अचंभित करे.

 

उन्हीं पत्रकारों में चार्ली जेम्स नाम की पत्रकार भी थीं. जिन्होंने 7 मिनट मिरेकल नाम की स्टोरी बनाई. और यू टूयब पार डाल दिया. उस विडियो को अब तक लगभग 40 लाख लोग देख चुके हैं.

 

बहरहाल, शिनकानसन से जुड़ी ये सात मिनट की कहानी जापान के रामराज्य के बहुत अहम पहलू की तरफ इशारा करती है. और वो है समय का पाबंद होना. जापान में शिनकासन पिछले 51 साल से चल रही है. रोज ऐसी 800 से ज्यादा ट्रेन चलती है पर लेट होने का औसत समय 1 मिनट से भी कम का है. ये कैसे मुमकिन हुआ?

 

समय पर रहना. समय पर पहुंचना जापान की फितरत का हिस्सा है. बुलेट ट्रेन या शिनकानसन जापान की इसी संस्कृति को आगे बढ़ा रही हैं. यहां यात्रियों के एक-एक सेकेण्ड को अहमियत दी जाती है. तभी पूरे 17 डिब्बे वाले ट्रेन को 7 मिनट में साफ कर दिया जाता है. और इतना ही नहीं यात्रियों का समय बचे और रेल के कंपनी के पैसे इसके ट्रेनों को बड़े हिसाब ये जोड़ कर चलाया जाता है.

 

अब हम टोक्यो से सीनदाई के लिए बुलेट ट्रेन से शिंकानसन से रवाना हुए लेकिन वो ट्रेन फुकिशिमा स्टेशन पर रुकी और फुकिशिमा में ये दो अलग अलग हिस्सों में चलने लगी और दो अलग अलग जगहों के लिए चलने लगी ये क्यों हुआ कैसे हुआ और इसके पीछे क्या महत्व है इसके बारे में जानना रोचक है?

 

दरअसल टोक्यो से सिनदाई जाने वाली ट्रेन के साथ एक और ट्रेन को जोड़ दिया गया था. इसे कपुलिंग कहा जाता है. दोनों ही ट्रेन का रास्ता फुकिशिमा तक एक ही था. इसलिए फुकिशिमा तक दोनों ट्रेन ने साथ-साथ सफर किया और फुकिशिमा से दोनों दोनों के रास्ते अलग हो गये. एक ट्रेन सिनदाई जायेगी और दूसरी यामागाटा. और ये सब कुछ हुआ सिर्फ दो मिनट में. इतना ही नहीं यामागाटा जाने वाली बुलेट ट्रेन ऐसी लाइन पर चलेगी जहां आम ट्रेन भी चल रही है. ऐसा दुनिया में कहीं और नहीं हो रहा है.

 

कैसे एक एक मिनट बचा कर जापान विकास के रास्ते में आगे बढ़ा है. वर्ल्ड वार टू के बाद ये देश बिल्कुल बर्बाद हो गया था. कहते हैं उस महायुद्ध के बाद टोक्यों में एक भी इमारत सही हालत में खड़ी नहीं थी. और उसके सिर्फ 20 साल के भीतर जापान पहला ऐसा देश बना जिसने बुलेट ट्रेन चला दी. जापान में पहली बुलेट ट्रेन को शिनकानसेन कहते हैं. इसकी शुरुआत हुई टोक्यो और ओसाका के बीच. दिन था 1 अक्टूबर 1964. और अधिकतम स्पीड दो सौ के उपर थी.

 

जापान के इन दो शहर, टोक्यों और ओसाका के बीच की दूरी है 515 किलोमीटर. शिनकानसेन के चलने से पहले इस दूरी को तय करने में 6 घंटे 30 मिनट का समय लगता था. टोक्यो और ओसाका के बीच बुलेट ट्रेन के चलने के बाद सीधे ढाई घंटे की बचत होने लगी. और अब तो इसी रुट पर लोगों को महज दो घंटा 25 मिनट ही लगता है.

 

वहीं भारत में मुंबई और अहमदाबाद के बीच की रेल से दूरी है तकरीबन 491 किलोमीटर. और इस रास्ते चलने वाली जो सबसे तेज ट्रेन है उससे भी अगर आप सफर करें तो उसमें कम से कम 6 घंटे 25 मिनट लग जाते हैं. एक बात और टोक्यो और ओसाका के बीच पर जब 1964 में बुलेट ट्रेन की शुरुआत हुई तब रोज 60 ट्रेन चला करती थी आज उसी रुट पर रोज 333 चलती है. यानी ट्रेन की फ्रिक्वेंशी इतनी है कि आप जब चाहें टिकट लेकर जा सकते हैं.

जापान ने बुलेट ट्रेन के लिए 2 हजार 200 किलोमीटर लंबी लाइन बिछाई है. इन लाइनों पर रोज 841 ट्रेन चलती हैं. 1964 में जब बुलेट ट्रेन की शुरुआत हुई तब से लेकर अब तक पूरी दुनिया की आबादी से ज्यादा लोग इस ट्रेन का इस्तेमाल कर चुके है.

इस पूरी दुनिया की जो आबादी है उससे ज्यादा लोग. जापान में बुलेट ट्रेन का इस्तेमाल कर चुके हैं. 2005 तक का जो आंकड़ा हमारे पास उपलब्ध है उसके मुताबिक जब दुनिया की आबादी 6 सौ पचास करोड़ थी तब आठ सौ बीस करोड़ लोगों ने इस ट्रेनों का इस्तेमाल कर लिया था. जापान में हर साल इन गाड़ियों का इस्तेमाल 33 करोड़ लोग करते हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि इस ट्रेन व्यवस्था में सिर्फ रफ्तार ही नहीं सुरक्षा भी है. जापान में बुलेट ट्रेन में दुर्घटना की वजह से आजतक एक की भी व्यक्ति की मौत नहीं हुई है.

 

बुलेट ट्रेन कहीं चले उससे पहले उसके लिए खास तरह की पटरियां बिछाई जाती है. इस ट्रेक पर आम रेल गाड़ियां नहीं चलती है. इन पटरियों पर किसी भी व्यक्ति को आने जाने की अनुमति नहीं होती है. कोई रेलवे क्रासिंग नहीं होती है. आटोमेटिक ट्रेन कंट्रोल सिस्टम से ट्रेन चलती है. इसका मतलब ये होता है कि ड्राइवर अगर कोई गलती कर रहा हो तो कंट्रोल रुम में बैठे अधिकारी ट्रेन की कमान अपने हाथों में ले सकते हैं.

 

दरअसल इन ट्रेनों में दो तरह के लगाम होते हैं. एक लगाम कंट्रोल रुम में होती है और दूसरी ड्राइवर के हाथों में होती है. जिसे लंबी ट्रेनिंग के बाद ट्रेन चलाने का मौका दिया जाता है. इस ट्रेन के ड्राइवर एक दिन में 7 घंटे 10 मिनट ही ट्रेन चलाते हैं. लेकिन एक बार में 3 घंटे बीस मिनट से ज्यादा कभी नहीं.

 

बुलेट ट्रेन अपनी नियत स्पीड पर ही चलती है. ड्राइवर के सामने लगे तीन मॉनिटर में से एक में तय स्पीड और मौजूदा स्पीड दिखाया जाता है. दूसरे में सभी डिब्बों की मौजूदा परिस्थिति दर्ज होती रहती है. जापान में भूकंप और तेज आंधी की आंशका हमेशा बनी रहती है. इसलिए रेल ट्रैक, भूकंप का पता लगाने वाला यंत्र से जुड़ा होता है. भूंकंप में पहले शुरुआती हलचल होती है. जिसे प्राइमरी वेब कहते हैं. प्राइमरी वेब के आते ही ट्रैक से जुड़ा यंत्र अर्लट जारी करता है जिसके बाद ट्रेन का बिजली कनेक्शन खुद ब खुद कट जाता है. और ट्रैक पर चल रही ट्रैन रुक जाती है. इससे जानमाल का नुकसान नहीं होता है.

 

जापान ने बुलेट ट्रेन को अपने देश के अलग-अलग इलाके को जोड़ने का जरिया बनाया. इससे रेल यात्रा तेज हो गई. लोगों के समय का सही इस्तेमाल होने लगा है. 2009 में एक आंकड़ा निकला. उसके मुताबिक शिनकानसेन में जितने लोग यात्रा करते हैं. उनका जितना वक्त बचता है उसे अगर जोड़ दिया जाये तो साल में 4000 लाख घंटे की बचत होती है. इसका मतलब काम के लिए लोगों के पास ज्यादा वक्त. ज्यादा वक्त मतलब ज्यादा प्रोडक्शन उत्पादन.

 

जापान की शिनकानसेन ट्रेन ने ना सिर्फ दूरियों को कम की है बल्कि वहां की अर्थव्यवस्था को भी सुधारने में मदद की है. अध्ययन के बाद ये पाया गया है कि जैसे-जैसे बुलेट ट्रेन में यात्रियों की संख्या बढ़ी है जापान की अर्थव्यवस्था भी सुधरती गई है. यानी जापान की ट्रेन व्यवस्था ना सिर्फ समय की पाबंद है. सुरक्षित है बल्कि अर्थव्यवस्था को सुधारने में भी मदद कर रही है.

 

टोक्यो स्टेशन से आने जाने वाले लोगों की भीड़ यहां की यातायात व्यवस्था में ट्रेन की अहमियत दिखाती है. टोक्यो स्टेशन से सिर्फ ओसाका के लिए रोज 333 बुलेट ट्रेन जाती है. लेकिन बुलेट ट्रेन या शिनकानसेन से ही आवाजाही के लिए लोग टोक्यो स्टेशन नही आते. स्टेशन के एक तल से बुलेट ट्रेन रवाना होती है तो दूसरे तीसरे तल से मेट्रो ट्रेन.

 

दुनिया की सबसे बड़ी मेगासिटी, टोक्यो और उसके आसपास के शहर को व्यापक रेल व्यवस्था से जोड़ दिया गया है. और इस सिस्टम का रोज तकरीबन 4 करोड़ लोग इस्तेमाल करते हैं. यहां के स्टेशनों पर अमीर गरीब का फर्क नहीं होता. दिल्ली के डॉ रामप्रकाश द्विवेदी, जापान के टोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडिज में पिछले 4 साल से पढ़ा रहे हैं. टोक्यो में दिल्ली शहर से उनका अनुभव बिल्कुल अलग रहा है.

 

जापान की मसाको ने दिल्ली में 5 साल रह कर कथक सीखा है. और अब टोक्यो में कथक नृत्य सीखा रहीं हैं. दिल्ली में इनके लिए सबसे बड़ी समस्या आवाजाही की थी. दिल्ली में रह कर इन्होंने बिरले ही पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल किया और इन्हें अक्सर आटो रिक्शा से सफर करना पड़ता था.    

 

दूसरी तरफ किसी को अगर टोक्यो में सफर करना हो तो उनके लिए सुबह पांच बजे से लेकर रात के दो बजे तक मेट्रो रेल की सेवा उपलब्ध है. कावागोई, टोक्यो शहर के बाहर का इलाका है जैसे दिल्ली के पास गुड़गांव. किसी को जाना हो तो उसे मोबाइल पर ही सारी जानकारी मिल जायेगी कि अगली ट्रेन कब है? इतना ही नहीं शहर के बाहर जाने के लिए भी स्टेशन से बाहर निकलने की जरुरत नहीं पड़ेगी. मेट्रो स्टेशन से ही सबअर्बन यानी शहर के बाहर की ट्रेन भी मिलेगी. और हो सकता है कि उसे सीधी ट्रेन मिल जाये.

 

टोक्यो में यानी समय और सुविधा का ध्यान सिर्फ बुलेट ट्रेन के लिए ही नहीं रखा जाता है. लोकल ट्रेन और मेट्रो पर चलने वाले यात्रियों के लिए भी एक एक सेकेण्ड का ध्यान दिया जाता है. लेकिन दुर्घटना या मेकैनिकल फेलियर की वजह से ट्रेन लेट हो जाये तो क्या होगा. इसका जवाब प्रोफेसर राम प्रकाश द्विवेदी को अपनी क्लास में मिला.   

 

प्रोफेसर डॉ राम प्रकाश द्विवेदी ने बताया कि जब मैं शुरु-शुरु में आया तो यहां पर स्कूलों में उतनी सख्ती नहीं है परिक्षा भी हम लोग लेते है और प्रश्नपत्र भी टीचर ही बना देते हैं तो उस वक्त एक बच्चा 2-3 मिनट लेट आया था उसने मुझे एक स्लिप दी तो वो जापानी भाषा में लिखी थी तो मैंने उससे पूछा कि ये क्या है तो उसने बोला कि मैं लेट हूं इसके लिए स्लिप है.

 

टोक्यो में ट्रेन लेट नहीं होती पर अगर हो जाए तो 30 सेकेंड एक मिनट दो मिनट 5 मिनट 10 मिनट तो इसके लिए जिम्मेदार कौन होगा? आप अपने काम पर लेट हो जाएंगे इससे नुकसान हो सकता है जिम्मेदार आप नहीं होगें रेल कंपनी होगी. लेट होने पर रेल कंपनी आपको एक कार्डीस्लीप देगी जिसे आप अपने स्कूल कालेज या फिर दफ्तर में दिखा सकते हैं और लेट होने के नुकसान और जिम्मेदारी से मुक्त हो सकते हैं.

  

टोक्यो के हर स्टेशन पर टार्डी स्लीप मिल जाती है. पांच मिनट से ज्यादा देरी पर इसे आम तौर पर दिया जाता है. लेकिन अगर कोई चाहे तो उसे 30 सेकेण्ड लेट होने पर भी इसे मांग सकता है. यूनिवर्सिटी में पढने वाली मेरिको का कहना है कि ट्रेन अगर दो तीन मिनट से ज्यादा लेट हो जायें तो घबराहट फैल जाती है.

 

अप्रैल 25 2005 इस दिन टोक्यो में एक ट्रेन हादसा हुआ एक लोकल मेट्रो अपनी पटरी से उतर गई डीरेल हो गई. इस हादसे में एक सौ सात लोगों की मौत हो गई और 500 से ज्यादा लोग घायल हुए जानते हैं ये ट्रेन हादसा क्यों हुआ ये हादसा इसलिए हुआ क्योंकि ड्राईवर तनाव में था और वो तनाव में इसलिए था क्योंकि उसकी ट्रेन 90 सेकेंड से लेट चल रही थी.

 

ट्रेन एक्सीडेंट की एक वजह ये कि ड्राइवर तनाव में था. तनाव ये कि उसकी ट्रेन 90 सेकेण्ड से लेट चल रही थी. समय का इतना पाबंद होना अच्छा है या बुरा. इस पर बहुत बहस की जा सकती है लेकिन सच्चाई ये है कि समय की पाबंदी की वजह से टोक्यो की पब्लिक ट्रांसपोर्ट व्यवस्था ने बहुत कुछ अर्जित किया है. उन्ही में सबसे अहम बात है भरोसा. और इसी भरोसे की वजह से लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं. दूसरी बात ये है टोक्यो ने मेट्रो और लोकल ट्रेन का बहुत ही व्यापक जाल फैलाया है. आप इस उम्मीद से घर से निकल सकते हैं कि थोड़ी दूरी पर ही कोई न कोई मेट्रो स्टेशन मिल ही जायेगा.

 

टोक्यो में आम हो या खास सभी रेल नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं तो इसके पीछे की वजह भी साफ है. टोक्यो शहर के लगभग ढेढ से 2 किलोमीटर स्वेयर एरिया में एक रेलवे स्टेशन मौजूद है. ग्रेटर टोक्यो में कुल मिलाकर 158 लाइन है जिस पर 48 अलग अलग रेल कपंनियां, ट्रेन चलाती हैं. 4714 किलोमीटर की लाइन बिछी है. इससे टोक्यो और उसके आस पास के इलाके को बहुत फायदा हुआ है. मसलन, ट्रफिक जाम कम हो गया है. क्योंकि रेल 60 हजार से भी लोगों को प्रति घंटा प्रति किलोमीटर ले जा सकती है. जबकि बस 5000 से भी कम यात्रियों को. शहरी रेलवे की स्पीड औसतन 33 किलोमीटर प्रतिघंटा होती है जबकि बस की 11, और कार की 23 किलोमीटर. टोक्यों में प्रदुषण कम होने की वजह भी रेल है. जो एक पैसेंजेर को एक किलोमीटर ले जाने में महज 21 ग्राम कार्बन डायोकसाइड छोड़ती है जबकि इसी दूरी के लिए बस 51 और कार  170 ग्राम, कार्बन डायोकसाइड हवा में छोड़ती है.

 

और ये सब करने के लिए रेलवे, कार या बस से बहुत कम जगह लेती है. और एक एक इंच का इस्तेमाल होता है. जैसे टोक्यो का जो स्टेशन है. वो सिर्फ स्टेशन नहीं है. वो एक बहुत बड़ा शापिंग मॉल भी है. इतना ही नहीं टोक्यो स्टेशन आस पास के ज्यादातर शापिंग माल, आफिस और होटल अंडरग्राउंड रास्ते से जुड़े है.

 

यातायात की व्यवस्था है जापान की वो यहां की संस्कृति में यहां के रोजमर्रा की जिंदगी में घुली मिली है दरअसल जो जगह हमारे यहां चौपाल में हुआ करती थी वो जगह यहां के स्टेशन की है. पहले हर स्टेशन पर चॉकबोर्ड हुआ करता था जिसपर लोग अपना संदेश लिखा करते थे इस उम्मीद में कि जिनके लिए संदेश लिखा गया है वो संदेश उनतक पहुंच ही जाएगा अब वो चॉकबोर्ड का जमाना नहीं है लेकिन स्टेशन अभी भी लोगों के मिलने जुलने के लिए मौजमस्ती के लिए और खरीददारी के लिए एक मुख्य आकर्षण का केंद्र बना हुआ है जैसे ये टोक्यो के नजदीक का शिबुएआ स्टेशन.

 

शिबुएआ स्टेशन के अंदर और उसके आस पास दिन हो या रात चकौचौंध रहती है. शिबुएआ स्टेशन को नौजवान लोगों का अड्डा माना जाता है. लेकिन यही आलम दूसरे स्टेशनों का भी है. स्टेशन अंडर ग्राउंड होता है और उपरी माले पर एक से एक दुकाने होती हैं.

 

ऐसा लगता है कि सभ्यता के केंद्र में वो मेट्रो स्टेशन है और मेट्रो के आस पास ही संस्कृति है स्टेशन के आसपास खाने पीने की चीजें अच्छी है. शापिंग की सुविधा भी उपलब्ध है और तमाम तरह के लोग वहां इक्ट्ठा होकर आपस में बातचीत करते हैं इसलिए हर स्टेशन एक मीटिंग का प्वाइंट है.

 

टोक्यो का गिंनजा ड्रिस्ट्रिक्ट है दुनिया में जो कुछ भी फैशनेबल है मंहगा है वो यहां जरूर मिलती है लेकिन एक चीज है जो टोक्यों में फैशन से कभी बाहर नहीं हुआ वो है यहां का पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम 1903 में पहली बार इलेक्ट्रिक स्ट्रीट कार यानि ट्रैम जैसी चीज यहां चली थी लेकिन उन्हीं रास्तों पर चली थी जहां पर पहले कभी घोड़ा गाड़ी चला करती थी उन गाड़ियों में कई कोच हुआ करते थे वैसे जापान के टोक्यो से पहले क्वोटो और नगोया ड्रिस्ट्रिक्ट में ऐसी कार चल चुकी थी.

 

टोक्यो में सवारी यातायात के लिए 1927 से ही अंडरग्राउण्ड मेट्रो रेल की शुरुआत हो गई थी. टोक्यो के उनियो स्टेशन पर उसका प्रतीक आज भी रखा गया है. तब मेट्रो लाइन की लंबाई 2 किलोमीटर ही हुआ करती थी. ये लाइन इतनी लोकप्रिय थी कि इस अंडरग्राउंड मेट्रो की सवारी के लिए ,लोगों की कतार 2 किलोमीटर लंबी हो जाती थी.

 

मतलब ये कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर जापान की सरकार का हमेशा ध्यान रहा. दूसरी बात ये कि जैसे जैसे जरुरत बदली वैसे वैसे इस व्यवस्था को विस्तार दिया गया. तीसरी बात पब्लिक ट्रांसपोर्ट को भरोसे मंद बनाये रखने के लिए इसे समय का पाबंद बनाया गया. ट्रेन आयेगी और समय पर आयेगी. और चौथी बात जो काफी अहम है वो ये कि ट्रेन बस या यातायात के दूसरे साधनों को अलग –अलग कर के नहीं देखा जाता.

 

बस, लोकल ट्रेन और दूर तक जाने वाली ट्रेन के इंटीग्रेशन का क्या मतलब है? इसे दिल्ली के पास बसे गाजियाबाद से जयपुर की यात्रा अगर आप पब्लिक ट्रांसपोर्ट से करें तो समझ सकते हैं. फर्ज कीजिए आप गाजियाबाद के किसी सेक्टर में रहते हों वहां से निकलने के लिए आप पहले ऑटो रिक्शा लेंगे. ऑटो रिक्शा से आप बस स्टाप पर आयेंगे. बस आपको नजदिक के मेट्रो स्टेशन तक ले जायेगी. जहां से आप अपना सामान उठा कर मेट्रो स्टेशन तक जायेंगे. मेट्रो आपको राजीव चौक छोड़ेगी. राजीव चौक से आप नई दिल्ली के लिए दूसरी मेट्रो लेंगे जो आपको नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन छोड़ेगी. उस मेट्रो स्टेशन से आ्रप अपने सामान के साथ बाहर निकलेंगे. फिर सामान उठा कर रेलवे प्लैटफार्म तक पहुंचेगे. इस दौरान ऑटो के लिए अलग किराया देंगे. बस के लिए अलग लोकल मेट्रो के लिए अलग और दिल्ली जयपुर ट्रेन के लिए अलग. अब जरा जापान में यातायात का तरीका देखिए.

 

टोक्यो स्टेशन का साउदर्न एग्जिट यानी निकास. चाहे यात्री बुलेट ट्रेन से यात्रा कर रहे हों या लोकल मेट्रो से स्टेशन के ठीक बाहर उन्हे शहर के अंदर या शहर से बाहर जाने के लिए बस मिल जाती है. यानी बस अड्डा कहीं रेलवे स्टेशन कहीं वाले हालात जापान में नहीं है. शहर के अंदर बस भी तयशुदा टाइमटेबल के मुताबिक ही चलती हैं.

 

लोकेल मेट्रो सब वे का या फिर लोकल कहें मेट्रो कहें या फिर सबवे कहें इसका टोक्यो के अंदर बहुत बड़ा तंत्र है लेकिन लास्ट माइल कनैक्टविटी यानि स्टेशन से लेकर ऑफिस तक या फिर स्टेशन से घर जाने तक के लिए यहां बस की सुविधा भी उपलब्ध है.

 

टोक्यो में रेलवे की तरह ही प्राइवेट बस आपरेटर हैं. स्थानिय सरकारी निकाय, टोक्यो मेट्रोपोलिटन गवर्नमेंट की भी अपनी बसें हैं. इनकी तकरीबन 15सौ बसें है जो जीपीएस और बस लोकेशन सिस्टम से लैस है. बस स्टाप पर खड़े यात्री को पता होता है कि अगली बस कितनी देर में आयेगी और रुट क्या होगा. और ऐसी टिकट और पास भी होते हैं जो ट्रेन और बस दोनों में ही मान्य होते हैं.

 

अब जरा गाजियाबाद से जयपुर जैसा सफर अगर आपको जापान में करना हो तो उस पर गौर कीजिए. घर से लोकल मेट्रो स्टेशन छोड़ने के लिए आपके पास बस की सुविधा है. एक बार आप मेट्रो स्टेशन में दाखिल हुए तो टोक्य़ो जैसे स्टेशन से आपको ट्रेन पकड़ने के लिए बाहर निकलने की जरुरत ही नहीं पड़ेगी. एक प्लैटफार्म से दूसरे प्लैटफॉर्म तक जा कर आप सीधे लंबी दूरी की ट्रेन पकड़ सकते हैं. और एक ही पास या टिकट के सहारे आप अपनी यात्रा पूरी कर सकते हैं.

 

ध्यान देने वाली बात ये है कि जापान में दोनों, रोड और रेल यातायात प्राइवेट हाथों में है लेकिन दोनों के लिए नियम और नीति बनाने के लिए एक ही मंत्रालय है. इस मंत्रालय को Ministry of land INFRASTRUCTURE, transport and Tourism कहते हैं.

 

यानी नीति नियम सरकार बनाती है. ट्रेन और बस प्राइवेट कपंनियां चला रही है. वैसे यातायात व्यवस्था की खासियत भी बिल्कुल साफ है. वो तेज है सुरक्षित है. जापान की यातायात व्यवस्था बहुत तेजी से बहुत बड़ी संख्या में लोगों को एक जगह से दूसरी जगह ले जा सकती है. ये समय की पाबंद है. कम इंधन पर काम करती है.

 

भारत में भी मेट्रो रेल की शुरुआत हुई है. लेकिन पूरे भारत में फिलहाल 277 किलोमीटर है. जबकि सिर्फ टोक्यो शहर में अंडरग्राउण्ड मेट्रो की लंबाई ही 310 किलोमीटर है. जापान की सबसे तेज व्यावसायिक बुलेट ट्रेन फिलहाल 320 किलोमीटर प्रतिघंटा की अधिकतम स्पीड से चलती है. जबकि भारत की सबसे तेज भोपाल शताब्दी है जो 150 किलोमीटर प्रति घंटा की अधिकतम स्पीड से चलती है. भारत में बुलेटे ट्रेन पर अभी बहस चल रही है जबकि 1964 से ही जापान में बुलेट ट्रेन चल रही है.

Episode 6: जापान में है परिवहन में ‘रामराज्य’ 

इन बातों का असर ये है कि जापान आज दुनिया के सबसे बड़ी आर्थिक शक्तियों में से एक है. उसकी यातायात व्यवस्था ने उनके विकास की गति को कभी कम नहीं होने दिया. और इस विकास के बगैर रामराज्य कैसे मुमकिन है.

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