ABP न्यूज स्पेशल: यहां पढ़ें दुनिया में कहां और कैसे है 'रामराज्य'?

By: | Last Updated: Saturday, 18 July 2015 5:29 PM
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टेलीविजन इतिहास की सबसे बड़ी सीरीज रामराज्य के शुरुआत में हमने आपको कहा था कि रामराज्य है. भारत में ना सही कहीं तो है. अरसे से हम सुनते आ रहे हैं कि ऐसा संभव नहीं है. लेकिन हमने आपको दिखाया की ये सबकुछ संभव है. क्यूबा में रामराज्य है स्वास्थ्य का. फिनलैंड में शिक्षा का. इजरायल में सुरक्षा का और डेनमार्क एक ऐसा देश जहां लोगों से जब पूछा गया कि क्या कभी आपको रिश्वत देनी पड़ी है तो वहां के लोगों ने पूछा भई रिश्वत, घूस ब्राइब होती क्या है? क्या वो सबकुछ भारत में संभव नहीं है? क्या भारत में रामराज्य नहीं आ सकता?

MUST WATCH: यहां पढ़ें दुनिया में कहां और कैसे है ‘रामराज्य’? 

रामराज्य की तलाश का सफर शुरु हुआ क्यूबा से. भारत की तरह ही एक विकासशील देश क्यूबा. आबादी और आकार में भारत से बहुत छोटा है लेकिन आर्थिक मामलों में भारत से भी पीछे हैं लेकिन कमाल ये कि यहां के लोग सड़कों पर बगैर इलाज के मरने को मजबूर नहीं होते. 

 

एकेडमिक सर्विसेस डायरेक्टर डॉ तोमास रेइनोसो मेदरानो बताते हैं कि मैं विदेशियों को कहता हूं कि आप देख सकते हैं यहां दीवारें पर रंग नहीं हुआ है, सड़कों को मरम्मत की जरूरत है, स्ट्रिट्स लाइट्स कम हैं, यहां पुराने मॉडल की कारें हैं, आप देख सकते हैं यहां बड़ी बड़ी शानदार दुकानें नहीं हैं, यहां बहुत सी ऐसी चीजें हैं जो आपको अपने देश में नहीं दिखतीं लेकिन आपको यहां कभी भी कोई बच्चा सड़क पर खाना मांगता हुआ नहीं दिखेगा या कोई लाचार या बीमार सड़क पर मरता हुआ, मदद की गुहार लगाता हुआ नहीं दिखेगा. आपको यहां सड़क पर कोई ऐसा बच्चा नहीं दिखेगा जिसे पढ़ने का हक ना हो.

 

हम गरीब हैं. हमारे यहां चमचमाती कारें नहीं दिखेंगी सड़कों पर स्ट्रीट भी कम हैं लेकिन आपको यहां कभी भी कोई बच्चा सड़क पर खाना मांगता हुआ नहीं दिखेगा या कोई लाचार या बीमार सड़क पर मरता हुआ, मदद की गुहार लगाता हुआ नहीं दिखेगा. जी ये क्यूबा और ये है क्यूबा की भावना. इस बात की गवाही देता है माइकल क्रूज. जो सेरब्रल पॉल्ज़ी से पीड़ित है. एक ऐसी बीमारी जिसकी वजह से न वो चल पाता था न बोल पाता था न सुन पाता था. लेकिन वेदादो पॉलीक्लिन में लगातार तीन साल से उसका इलाज चल रहा था.

 

आखिरकार माइकल चला. तीन साल की मेहनत और मन्नतों के बाद माइकल बिना किसी के सहारे चला. और वो तब चला जब हमारी कैमरा टीम क्यूबा की राजधानी हवाना में थी. हवाना के वेडाडो पॉलीक्लीनिक में थी जहां उसका इलाज चल रहा है . हमने क्यों कहा कि क्यूबा में सेहत के क्षेत्र में रामराज्य समझे आप. वो इसलिए की बच्चा चाहे माइकल की तरह बीमार हो या स्वस्थ्य, क्यूबा में जन्म लेने वाले हर एक बच्चे को ताउम्र मुफ्त इलाज मिलेगा. 

 

क्यूबा का हर नागरिक चाहे वो गांव में हो शहर में हो कहीं भी हो, मुफ्त सरकारी डॉक्टरी मदद उससे ज्यादा से ज्यादा 20 मिनट की दूरी पर मौजूद है.

 

क्यूबा आने वाले पर्यटकों के लिये यहां का संगीत बड़ा आकर्षण होता है. कुछ लोगों के लिये यहां का डांस तो कुछ लोगों को यहां का समुद्री किनारा अपनी ओर खींचता है. डॉक्टर का घर है. नर्स का घर है और यहां के आस-पास के तकरीबन 150 परिवारों की अच्छी सेहत के पीछे यह एक बड़ा काऱण है. इसे यहां कंसलटोरियो (Consultorio) कहते हैं. क्यूबा में औसतन हर 500 से 600 व्यक्ति पर एक कंसलटोरियो है. जहां एक डॉक्टर और एक रेजिडेंट नर्स 24 घंटे मौजूद रहते हैं . और एक बड़ी ये सर्विस बिल्कुल मुफ्त होती है.

 

मुफ्त इलाज के साथ ही क्यूबा में इलाज आसानी से उपलब्ध है. और ये मुमकिन हुआ है कंसल्टोरियो के लंबे चौड़े जाल की वजह से. क्यूबा में हर मोहल्ले में एक तरह से कंसल्टोरियो है इससे एक और बड़ा फायदा हुआ है . वो ये कि बीमारी को होने में रोकने में क्यूबा को सफलता मिली है. इसके लिए भी क्यूबा ने बहुत नायाब कदम उठाये हैं . डॉक्टरों के होम वीजिट का.  

 

क्यूबा के कंसलटोरियो में काम करने वाले डॉक्टर और नर्स की जोड़ी रोज अपने इलाके के लोगों के घर जाती हैं. 

 

क्यूबा में फैमिली डॉक्टर, जन्म के पहले दो महीने में हर 15 दिन बच्चे को देखता है. उसके बाद हर महिने एक बार डॉक्टर घर आकर बच्चे को देखते हैं. चाहे बच्चा हो या नौजवान. स्त्री हो या पुरुष. कंसल्टोरियों में मौजूद डॉक्टर उनसे साल में एक बार मिलता जरुर है. घर में नवजात बच्चा हो होम विजिट की संख्या बढ़ जाती है.

 

क्यूबा की स्वास्थ व्यवस्था को देखकर एक बात समझ में आती है कि कंसल्टोरिया उनकी बुनियाद में है, कंसल्टोरिया उनकी बुनियाद में है जो बच्चों को, उनके मां बाप को स्वस्थ्य रखती है. इसका अगला पायदान होता है Polyclinic.

 

पॉलीक्लिनिक एक ऐसा अस्पताल कहा जा सकता है जहां कई बीमारियों के विशेषज्ञ एक साथ एक जगह पर मिल जाते हैं. आमतौर पर कंसल्टोरियो के फैमिली डॉक्टर जरुरत होने पर ही स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की राय और सलाह के लिए अपने इलाके के मरीज को पॉलीक्लिनिक भेजते हैं. क्यूबा के पॉलिक्लिनिक में सभी सेवा बिल्कुल मुफ्त मिलती है. और ये सुविधा भी चौबिसों घंटे उपलब्ध रहती है.

 

क्यूबा में दरअसल, हर 30 से 40 कंसल्टोरियो के उपर एक पॉलीक्लिनिक मौजूद है. इसका मतलब ये है कि क्यूबा में लगभग हर 450 से 600 परिवार की देखरेख के लिए पहले कंसल्टोरियों का जाल फैला है और उसके उपर पॉलीक्लिनिक मौजूद है. क्यूबा में इस तरह के लगभग 500 पॉलिक्लिनिक हैं. यानी क्यूबा के हर पच्चीस हजार लोगों की आबादी पर एक पॉलिक्लिनिक मौजूद है. और यहां आपरेशन छोड़ कर ज्यादातर डॉक्टरी मदद मौजूद हैं. पॉलिक्लिनिक के उपर बड़े और स्पेश्लिष्ट अस्पताल हैं. जहां जटिल बीमारी और ऑपरेशन किए जाते हैं. जैसे हवाना का आमेहेइरास क्लिनिकल सर्जरी हॉस्पीटल जहां क्यूबा ही नहीं विदेशों से भी लोग इलाज के लिए आते हैं.

 

यानी क्यूबा के हेल्थ सिस्टम की मुख्य बातें क्या है. यहां मुफ्त इलाज है. ये एसेसिबल है मतलब मुफ्त इलाज के लिए आपको इधर उधर भटकना नहीं पड़ा. घर के पास पहले आपको कसलटोरियो मिलेगा. फिर पॉलीक्लिनिक. बात अगर और भी जटिल हो तो बड़े स्पेश्लिष्ट अस्पताल हैं. तीसरी बड़ी बात ये कि यहां सरकार का पूरा जोर बीमारियों के प्रिवेन्शन पर है. रोकथाम पर है . इसके लिए डॉक्टर होम विजीट करते हैं. 

 

हर दस हजार व्यक्ति पर 67.2 फिजिशियन मौजूद हैं. क्यूबा अपनी सकल घरेलू उत्पाद का 8.6 फीसद हेल्थ पर खर्च करता है. भारत 3.8 फीसद. क्यूबा में जब कोई बच्चा जन्म लेता है तो औसतन उसकी उम्र 78 मानी जाती है और भारत में 66. क्यूबा में जन्म लेने वाले प्रति एक हजार बच्चों में 5 बच्चे एक साल की उम्र पाने से पहले मर जाते हैं, अमेरिका में ये संख्या 6 है, जबकि भारत में ये संख्या 41 बच्चों की है. क्यूबा अगर अपने बच्चों की जिंदगी बचा सकता है तो हम क्यों नहीं ऐसा कर सकते हैं? अगर क्यूबा में ऐसी व्यवस्था बन सकती है, चल सकती है तो क्या ये भारत में मुमकिन नहीं है. ये सवाल हमने भारत के हेल्थ मिनिस्टर जे पी नड्डा के सामने रखा.

 

जे पी नड्डा ने कहा कि क्यूबा और भारत का डेमोग्राफिक दृष्टि से मुकाबला नहीं किया जा सकता है. हम अपनी स्ट्रेंथ और कमजोरी पर काम कर रहे हैं.

 

भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की जिम्मेदारी राज्यों की है. भारत की आबादी क्यूबा से ज्यादा है. लेकिन कई राज्य है जहां की हेल्थ व्यवस्था दूसरों से बेहतर है जैसे तमिलनाडू.  

 

चेन्नई के मल्टी सुपर स्पेशिलिटी हॉस्पिटल की तरह तमिलनाडु में आधुनिक सुविधाओँ वाले 43 बड़े सरकारी अस्पताल हैं. 20 मेडिकल कॉलेज हैं. और इनके अलावा पूरे राज्य में गांव – ब्लॉक और जिला स्तर पर स्वास्थ्य केंद्र और अस्पतालों का जाल फैला है. इस तरह के सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के अलावा तमिलनाडु में हर 3-4 किलोमीटर पर एक स्वास्थ्य उपकेन्द्र हैं और हर 15 किलोमीटर पर अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है.

 

स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए राज्य सरकार ने कई ऐसी योजनाएं भी शुरू की है जो दूसरे राज्यों को भी रास्ता दिखा सकती है. दिल्ली में राज्य सरकार ने मोहल्ला क्लिनिक खोलने की योजना बनाई है. इसी तरह यूपी में सरकारी एम्बूलेंस सेवा को काफी सराहना मिल रही है.

 

अब तमिलनाडु भारत का ही एक राज्य है. और बाकी के राज्यों से बेहतर स्वास्थ्य सेवा यहां मौजूह है . प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र काम कर रहे हैं. बड़े सरकारी अस्पताल काम कर रहे हैं. और आम लोगों को इसका फायदा मिल रहा है. एक बात और तमिलनाडु की आबादी भी क्यूबा से 6 गुनी ज्यादा है. अगर आबादी ही समस्या होती तो तमिलनाडु की हेल्थ व्यवस्था कैसे बेहतर होती? मतलब क्यूबा कर सकता है. कुछ हद कर तमिलनाडु राज्य कर सकता है. तो बाकी का भारत भी सकता है.

अब बात शिक्षा की .

 

फिनलैंड भारत के मुकावले छोटा देश हैं लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में इस देश ने पिछले 40 साल में जो कुछ अचीव किया है वैसी मिसाल दुनिया में और कहीं नहीं मिलती.

 

वहां क्लास में बच्चे बांसुरी, फ्लूट बजाने की प्रैक्टिस कर रहे हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि टीचर ना हो और बच्चों की मस्ती चल रही हो. बच्चों पर किसी की नजर ही ना हो. जल्दी ही पता चला ऐसा नहीं है. क्लास टीचर भी वहीं मौजूद थे.

 

दरअसल जब हम स्कूल की इस तीसरी क्लास में दाखिल हुये तब म्यूजिक क्लास चल रही थी . बच्चे अंग्रेजी का मशहूर गाना डॉन्ट वरी बी हैपी गाने को म्यूजिक में ढाल रहे थे. क्लास में ड्रम गिटार सिंथेसाइजर मौजूद है. पूरा का पूरा म्यूजिक बैंड गांव के इस स्कूल के इस क्लास में तैयार हो सकता है. लेकिन फिलहाल बच्चे बांसुरी बजाने और गाने की प्रैक्टिस में लगे हैं. इसके पीछे दो मकसद हैं .

 

बच्चे अंग्रेजी गाना गा तो रहे थे लेकिन गौर करने वाली बात ये है कि अंग्रेजी इनकी मातृभाषा नहीं है. फिनलैंड में फिनिश और स्वीडिश भाषा बोली जाती है. इसलिये क्लास टीचर इंग्लिश गाने जरीये अंग्रेजी भाषा सिखाने की कोशिश भी कर रहे हैं. साथ-साथ गाना बजाना सीख रहे हैं वो अलग.

 

फिनलैंड में बच्चे सातवें साल में जाकर स्कूल में दाखिल होते हैं और ऐसा इसलिये होता है क्योंकि टीचर बनकर नहीं बल्कि दोस्त बनकर सहपाठी बनकर क्लास में आते हैं.

 

फिनलैंड और भारत की शिक्षा व्यवस्था के बुनियादी फर्क पर गौर कीजिए. फिनलैंड में रामराज्य इसलिए है क्योंकि वहां में इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि स्कूल किसी दूरदराज गांव में है या शहर में. और दोनों ही जगह पढ़ाई एक जैसी और वो भी बिल्कुल मुफ्त बिल्कुल फ्री. आप कह सकते हैं कि भारत में भी सरकारी स्कूल में पढ़ाई बिल्कुल फ्री है ये बात सही है. लेकिन क्या सरकारी स्कूल और प्राइवेट स्कूल की पढ़ाई एक जैसी है? क्या गांव के सरकारी स्कूल और शहर के सरकारी स्कूल की पढ़ाई एक जैसी है . नहीं ना यही फर्क है .

 

फिनलैंड की सभी के लिये मुफ्त और एक जैसी शिक्षा व्यवस्था का नतीजा है यहां के 99 फीसद से ज्यादा बच्चे सरकारी स्कूलों में ही पढते हैं. लेकिन यहां एक बड़ा सवाल खड़ा होता है.  सवाल ये कि एक जैसे स्कूल एक जैसी सुविधायें दे देने से क्या बच्चे दुनिया भर में अव्वल हो जाते हैं. अगर ऐसा नहीं है तो एक जैसे स्कूल एक सुविधाओं के अलावा वो कौन सी बातें हैं जो फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था को दुनिया में बेहतरीन बना देती है. 

 

यहां के टीचर, स्कूल के फोकस में वो बच्चे नहीं होते जो तेज और मेधावी होते हैं. फोकस उन पर होता है जिनको पढ़ाई में मन नहीं लगता. गणित से डर लगता है. पूरी कोशिश ये होती है कि सभी बच्चों को जानकारी, कुशलता और कंपीटेंस के समान स्तर पर ले आया जाता है.

 

फिनलैंड में छात्र अपनी गति से पढ़ते हैं. अपनी सहूलियत से पढ़ते हैं. उन पर कभी दवाब नहीं डाला जाता. पूरा का पूरा शिक्षा तंत्र सरकारी है . फिर भी जब दुनिया भर के 15 साल के युवकों की परीक्षा हुई तब यहां के छात्र कई पैमानों पर सबसे उपर रहे हैं. इस टेस्ट को प्रोग्राम फॉर इंटरनैशनल स्टूडेंट एसेसमेंट यानी पीसा कहते हैं. पीसा 15 साल के छात्र को मैथ्स, साइंस और रिडिंग लिटरेसी के पैमानों पर जांचती है.

 

फिनलैंड की सफलता में बड़ी भूमिका शिक्षकों की रही है. इसलिए टीचर्स ट्रेनिंग पर फिनलैंड में बहुत जोर दिया जाता रहा है. फिनलैंड में चाहे आप पहली क्लास में पढ़ातें हो या 12वीं में, टीचर्स ट्रेनिंग में मास्टर्स डिग्री होना जरुरी है. 

 

फिनलैंड में टीचर बनना मुश्किल तो है लेकिन इस पेशे से काफी मान-सम्मान जुड़ा हुआ है. टीचर को फिनलैंड में काफी आदर के भाव से देखा जाता है.

 

डॉक्टर, पुलिस, टीचर 2104 में 1600 स्टूंडेंट टीचर बनने आये. इनमें से 160 बच्चों का एडमिशन हुआ.  

 

टीचर बनने के इच्छुक छात्रो की यूनिवर्सिटी में दाखिले के बाद ट्रेनिंग की लंबी प्रक्रिया चलती है . इसमें पढ़ाई लिखाई से जुड़े सिद्दांतों के अलावा क्लास रुम में ट्रेनिंग की लंबी प्रक्रिया चलती है.

 

तो इस तरह से फिनलैंड का भविष्य तैयार करने वाले, टीचर, शिक्षक, गुरु तैयार किये जा रहे हैं. अब टीचर बनना इतना मुश्किल हैं तो नतीजे बेहतर होंगे ही. टीचरों का इतना सम्मान है तो इस सम्मान की लाज भी रखी जाती है. इमानदारी से काम कर के पढा कर ये मान सम्मान फिनलैंड के शिक्षकों ने अर्जित किया है.

 

फिनलैंड में हर 14 बच्चे पर एक टीचर हैं भारत में 35. वहां का हर टीचर कम से कम ग्रैजुएट है भारत में 8वीं पास शिक्षक भी हैं. बिना टीचर ट्रैनिंग के फिनलैंड में बच्चों को कोई पढ़ा नहीं सकता. भारत में सरकारी स्कूलों में भी बिना टीचर्स ट्रेनिंग के शिक्षक मौजूद हैं. फिनलैंड में 99 फीसद बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं भारत में चलन प्राइवेट स्कूलों का है .

 

फिनलैंड पर बने रामराज्य के एपिसोड को देखकर, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट किया और कहा कि एक ऐसा प्रोग्रोम है जिसे देखना चाहिए. जिससे सीखना चाहिए. और राज्य उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया कार्यक्रम के बाद होने वाली चर्चा में शामिल हुए और बड़ी घोषणा की.

 

फिनलैंड के पास ही एक देश है डेनमार्क. और उसकी राजधानी है कोपेनहेगन. कोपनहेगन के एक व्यस्त चौराहे पर हमारे साथी संजय नंदन ने लोगों से एक सवाल पूछना शुरु किया . क्या आपको कभी रिश्वत देनी पड़ी है?

 

आश्चर्यजनक लेकिन सच. लोगों ने पूछा वॉट इस ए ब्राइब . रिश्वत क्या चीज है भाई . जी हां डेनमार्क वो देश है जहां दुनिया में सबसे कम भ्रष्टाचार है. यहां आपको हर मोड़ पर आश्चर्यचकित होना पड़ सकता है . जैसे  सरकारी अधिकारी Susan Praestegaard की बात सुनकर .

 

एक दिन सुजैन अपने आफिस में थीं. उनके सामने चॉकलेट का डब्बा लेकर एक शक्स आया. वह परेशान हो गईं. डेनमार्क की अधिकारी Susan Praestegaard ने कहा वो इस ख्याल के साथ जीना नहीं चाहती कि उन्होंने कुछ ऐसा किया जिसे लोग भ्रष्टाचार कहें करप्शन कहें. इसीलिए फूलों का गुलदस्ता चॉकलेट का पैकेट लेना भी उनकी नजर में भ्रष्टाचार है. डेनमार्क में इन छोटी- छोटी बातों पर लोग ध्यान देते है. ये है भारत और डेनमार्क के बीच का पहला बड़ा फर्क. भारत में तो आम आदमी इन बातों को करप्शन मानेगा ही नहीं.

 

दुनिया भर में भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाली संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनैशनल हर साल एक लिस्ट जारी करता है जिससे पता चलता है कि कौन सा देश कम करप्ट है और कौन ज्यादा . 2014 की रिपोर्ट के मुताबिक, 175 देशों की लिस्ट में भारत 85वें स्थान पर था और डेनमार्क पहले. डेनमार्क में पुलिस को लोग ईमानदारी में न्यायपालिका के समकक्ष माने जाते हैं ..जबकि भारत में उन्हें सबसे ज्यादा करप्ट पुलिस को ही मानते हैं . अंतरराष्ट्रीय संगठन ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल 1995 से लगातार हर साल इस तरह की सूची जारी कर रही है. इस सूची में डेनमार्क ईमानदारी के पायदान पर 9 बार नंबर 1 और 8 बार नंबर 2 पर रहा है. आखिर वो कौन सी व्यवस्था है जो डेनमार्क में  भ्रष्टाचार को बढ़ने से रोकती है. आखिर वो कौन लोग हैं जो भ्रष्टाचार पर इतनी मजबूती के साथ लगाम लगाये हुए है.

 

राजनीति से जुड़ा एक सवाल राजनीतिक चंदे का है . डेनमार्क में राजनीतिक दलों को 20 हजार क्रोन यानी करीब दो लाख रुपये से ज्यादा के चंदे की पूरी जानकारी देनी होती है लेकिन अगर वही रकम 20 हजार क्रोन से कम है तो इसकी जानकारी देनी जरूरी नही है. यही हाल भारत में हैं जहां राजनीतिक दल को एक बार में 20 हजार या उससे ऊपर के चंदे को, उसे देने वाले के नाम के साथ घोषित करना होता है. भारत और डेनमार्क की तुलना करें तो फर्क सिर्फ इतना है कि डेनमार्क में राजनीतिक पार्टियों को सरकारी बजट से पैसा मिलता है. सरकार से मिलने वाले पैसे का इस्तेमाल पार्टियां अपनी नीतियों के प्रचार प्रसार पर कर सकती है. लेकिन चुनाव लड़ने में नहीं कर सकती.

 

कहते हैं भारत और डेनमार्क में बड़ा अंतर सोच का भी है. भारत में रिश्वत लेना या देना इतना आम हो चुका है कि इसे रोकने के लिए कानून और व्यवस्था से ज्यादा सोच बदलने की जरूरत है. ये बात आपने कई बार सुनी होगी. लेकिन सवाल ये है कि ये सोच बनती कैसे है. आपके हमारे अनुभवों से. बहरहाल अगर कानूनों की बात की जाये तो डेनमार्क में सिर्फ भ्रष्टाचार संबंधी कोई कानून अलग से नहीं है जबकि भारत में बाकायदा anti corruption law भ्रष्टाचार निरोधक कानून बना हुआ है.

 

भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत भारत में किसी सरकारी कर्मचारी को रिश्वत लेने पर 3साल से 7 साल तक की सजा का नियम है. अब सवाल ये है कि भारत में करप्शन को पूरी तरह से खत्म करना मुमकिन है . क्या महज कानून बना देने से बदलाव मुमकिन है . देश में पहली बार पब्लिक सर्विस गारंटी यानी तय समय में काम करने की गारंटी देने का वादा करने वाले मध्य प्रदेश में इस कानून का क्या हाल है. ये कानून भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी लड़ाई का जरिया बताया जाता है. लेकिन भोपाल के हजारी लाल का बिल्कुल अलग रहा है. हजारीलाल छह महीने से राशन कार्ड बनवाने के लिए भोपाल में सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं. लेकिन अफसर हर बार टाल देते हैं.

 

मध्य प्रदेश में पांच साल से लोक सेवा गारंटी कानून लागू है. कई राज्यों में ये कानून अलग अलग नामों से मौजूद है. कहीं पब्लिक सर्विस गारंटी एक्ट है तो कहीं सिटीजन चार्टर नाम है.

 

इन राज्यों में लोगों की सहूलियत के लिए कानून तो बनाए गए हैं लेकिन सच ये भी है कि अब भी मध्य प्रदेश की तरह कई राज्यों में लोगों का काम समय पर पूरा नहीं हो रहा है. देश में कानून तो बहुत हैं लेकिन फिर भी भ्रष्टाचार मुक्त भारत अब तक संभव नहीं हो पाया है. समस्या क्या है.

 

देश में नियम भी हैं और कानून भी. अगर कमी है तो इनके सही अमल की. भारत को अगर डेनमार्क बनाना है, करप्शन फ्री देश बनाना है तो आम लोगों के साथ साथ सरकारों को इच्छा शक्ति दिखानी होगी. कुछ ऐसी इच्छा शक्ति इजरायल ने दिखाई है अपने लोगों की सुरक्षा के मसले में. इजरायल जिस तरह से अपने लोगों पर होने वाले हमलों और हमलावरों के खिलाफ कार्रवाई करता है उसकी निंदा भी हुई है. लेकिन सच्चाई ये है कि इजरायल के ज्यादतर लोग इसे जरुरी मानते हैं .

 

इजराइल की काउंटर टेरेरिस्म स्ट्रैटेजी यानि कि आतंकवाद विरोधी रणनिती का एक मुख्य लक्ष्य एक मुख्य मकसद ये है कि किसी भी हाल मे यहां के लोगों को भयमुक्त रखा जाए क्या इजराइल अपनी इस रणनीति में सफल हुआ है?

 

इस सवाल का जवाब इजरायल के तेल अवीव शहर में मिल जाता है. एक के बाद एक आंतकवादी हमलों के बावजूद इस शहर को पुलिस छावनी में नहीं बदला गया है. सड़कों पर ना पुलिस नहीं दिखाई देती है ना कोई बैरिकेड. ना कोई छानबीन ना कोई पूछताछ ना कोई तनाव. ऐसा कैसे संभव है?

 

दरअसल, पूरे तेल –अवीव शहर को शक्तिशाली कैमरों से पाट दिया गया है. हर एक गली –हर एक मुहल्ला कैमरे की हद में है . ये कैमरे इतने शक्तिशाली हैं इनकी मदद से कार के नंबर प्लेट को भी पढ़ा जा सकता है. इन कैमरों के जरिये पूरे शहर की लाइव, रियल टाइम तस्वीर यहां बैठे लोग देखते रहते हैं.

 

6/11 मुंबइ पर पाकिस्तान से आए आतंकियों ने हमला किया काफी देर तक वहां के अफसरों को राजनेताओं को ये पता हीं नही चला कि आतंकी है कितने हमलावर कौन है और वे क्या कर रहे हैं. इस परिस्थिति से निपटने के लिए तेलहबीब जैसे शहरों मे एक कंट्रोल एंड कमांड सेंटर है जहां से पूरे शहर पर नजर रखी जाती है पूरे शहर को क्या करना है किस महकमें को क्या करना है, कहां जाना है, कितनी शक्ति से जाना है, कितने लोगों को जाना है, सारे फैसले एक जगह बैठकर किया जा सकता है.

 

इजरायल की भौगोलिक स्थिति कुछ ऐसी है कि उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम एक ही दिन में आया-जाया जा सकता है. ये फिलिस्तिन और इजरायल के बीच का एक बार्डर क्रासिंग है Eliyahu check point/ Nordia. यहां इजरायल के अंदर आने वाली हर गाड़ी की जांच होती है. जांच इस बात की कहीं गांड़ी या ट्रक में बैठे लोगों, आंतकवादी संगठन से तो नहीं जुड़े हैं. कहीं वो अपने साथ हथियार तो अंदर नहीं ले जा रहे हैं.

 

कार के ड्राइवर उसे पार्किंग स्लाट में खड़ी करते हैं. गाड़ी में सवार सभी लोग गाड़ी से निकल जाते हैं. इसके बाद गाड़ी के अंदर एक पाइप डाला जाता है. पाइप के दूसरे कोने में फिल्टर लगा दिया जाता है. इसके बाद मशीन चालू किया जाता है. मशीन के चालू होने पर कार के अंदर हवा पाइप से कुछ देर के लिए खींची जाती है. उसके बाद उस फिल्टर को डब्बे में बंद कर पास एक कमरे में दे दिया जाता है. फिल्टर को कमरे में बने होल्डर में रख दिया जाता है . इसके बाद दूसरे कमरे से  बेल्जियन शेफर्ड कुत्ते को कमरे में भेजा जाता है. वो सेकेण्ड भर में वहां रखे सभी फिल्टरों को सूंघ कर आल किल्यर का संकेत अपने हैंडलर को दे देता है. 

 

बेल्जियन शेफर्ड्स को विस्फोटकों को पकड़ने का अब तक का सबसे सफल तरीका माना जा रहा है. लेकिन इजरायल के अंदर हमला करने की नीयत से आने वाले लोग बार्डर क्रॉसिंग से आयें ये जरुरी नहीं है. फिलिस्तीन प्रशासित इलाके या दूसरे देशों से लगने वाली अंतरराष्ट्रीय सीमा के रास्ते आंतकवादी इजरायल में दाखिल होते रहे हैं. इजरायल ने अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए ऐसे बाड़ लगाये हैं जिनको पार करना बेहद मुश्किल है और इससे आतंकवादी हमलों की संख्या काफी घटी है. सीमा पर लगे बाड़ या फेनसिंग काम कैसे करती है. दरअसल ये तकनीक का कमाल है . ये फेंनसिंग छोटे –छोटे सेक्शन में बंटे हैं . और हर सेक्शन का एक नंबर है. दरअसल इन कटीले तारों में हर दो से तीन मीटर पर गेंद की शक्ल वाले सेंसर लगे हैं. ये खास तरह के एलेक्ट्रो मैग्नेटिक सेंसर हैं. जैसे ही कोई बाड़ को काटने या दबाने की कोशिश करेगा बॉल के अंदर का सेंसर सक्रिय हो जाता है.     

 

इजराइल एक लेबोरेट्री है प्रयोगशाला है उनके लिए जो लगातार आतंकवाद के खिलाफ रणनीति बनाते है और उनके लिए भी जो लगातार आतंकी हमलों की प्लानिंग करते है अब गौर कीजिए 1967 के बाद पहली बार इजराइली विमान के अपहरण का सिलसिला शुरू हुआ ये समस्या 2001 में अमेरिका ने झेला और 1980 के दशक मे भारत ने अब हेजबुल्ला नामक आतंकी संगठन ने इजराइल के अंदर सबसे पहले फिदायीन हमले की शुरूआत की यानि लगातार आतंकी संगठन नए-नए प्रयोग नई रणनीति के साथ घुसते हैं जबकि इजराइली सेना और इजराइली एडमिनस्ट्रेशन लगातार उन हमलों की काट ढूंढती रहती है. इन्हीं में देश की सीमा पार कर इजरायल की नीति भी है.

 

इजरायल के विरोधी कहते हैं कि अगर इजरायल के तौर तरीके इतने ही सही थे तो इजरायल अपने खिलाफ हो रहे हमलों को 6 दशक बाद भी क्यों नहीं रोक पाया समर्थक कहते हैं कि अगर इजरायल ने बाड़ लगाने से लेकर चुनचुन कर मारने का फैसला न करते तो उनका देश बचता ही नहीं. उनके देश के लोग निर्भीक हो कर. शांति से जिंदगी नहीं गुजार पाते. सुरक्षित महसूस नहीं करते. सच्चाई इन दोनों छोरो के बीच है. बहरहाल भारत जैसे देश में कइ बार एैसी चर्चा होती है कि क्यूं ना आंतककवाद से निपटने के लिए इजराइल मॅाडल का इस्तेमाल किया जाए.

 

हीरे और कपड़े के शहर के तौर पर दुनियाभर में मशहूर है सूरत.  अब शहर को सुरक्षा के लिहाज से हुए एक बेहतरीन प्रयोग के लिए भी जाना जा रहा है. सूरत पुलिस ने यहां के लोगों की मदद से. यानी पब्लिक-पाइवेट पार्टनरशीप के तहत एक खास सीसीटीवी योजना शुरू की है, जिससे अपराध और अपराधियों पर काबू पाया जा रहा है और शहर अब पहले से कहीं ज़्यादा सुरक्षित हो गया है. इस शहर को सेफ सीटी कॉनसेप्ट के तहत विकसित किया जा रहा है. 

 

पुलिस ने सेफ सिटी सूरत मुहिम के तहत 2012 में सीसीटीवी का नेटवर्क खड़ा करने की सोची. बड़ी संख्या में उद्योगपति और कारोबारी भी मदद को आगे आए. जनवरी 2013 में 23 जगहों पर 104 कैमरे लगाकर शुरुआत हुई. ढाई साल में ही 109 जगहों पर 604 कैमरे लग चुके हैं. सीसीटीवी नेटवर्क पर नजर के लिए कमांड और कंट्रोल सेंटर भी है. सूरत पुलिस के मुताबिक, सीसीटीवी वाले इलाकों में पहले के मुकाबले 27 फीसदी कम अपराध हुए.

 

सेफ सिटी सूरत प्रोजेक्ट पर 33 करोड़ रुपये खर्च किये जा चुके हैं. जिसका बड़ा हिस्सा सूरत के लोगों की तरफ से दिया गया है. अगले पांच साल में शहर में पांच हजार कैमरों का जाल बिछाने की योजना है.

 

देखिय सूरत इसी देश में है और वहां की पुलिस और व्यवसायियों ने मिल कर कानून व्यवस्था को सुधारा. चाहे स्वास्थ्य के क्षेत्र में तमिलनाडु हो या सुरक्षा के क्षेत्र में सूरत. इसी देश में प्रयोग हो रहे हैं. कोशिशें चल रही है. जरुरत है तो उसे बड़ा करने की .

 

फिलहाल रामराज्य का ये सफर फिलहाल खत्म करते हैं. रामराज्य की सफलता इसी बात में है हमने लोगों में ये उम्मीद जगाई है कि रामराज्य भारत में भी आ सकता है. गली चौराहों पर चर्चा हो रही है . बहस हो रही है. इन्हीं बहस और चर्चा से आगे का रास्ता भी निकेलगा. सोच बदलेगी तो हमारी दुनिया भी बदलेगी. कोशिश कर के तो देंखे रामराज्य आयेगा भारत में भी आयेगा.

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