MUST READ | एबीपी न्यूज स्पेशल | चीन में कैसे आया विकास का 'रामराज्य'

By: | Last Updated: Saturday, 11 July 2015 5:21 PM
Ramrajya – Episode 7 : China has Ramrajya in terms of Development and India needs to learn from it

बहुत बड़ा, इतना बड़ा कि दूर अंतरिक्ष से भी नजर आये. ये है ग्रेट वाल आफ चाइना. चीन की दिवार. बतातें हैं कि ये अंतरिक्ष से भी नजर आती है. इस दीवार को बनाने में कई सौ साल लगे. कहते हैं तब चीन का स्वर्णिम युग था. कहते हैं आज फिर चीन का स्वर्णिम युग है. चीन ने पिछले 30-35 साल में इस गति से विकास की है कि पूरी दुनिया अचंभित है. हैरान है. जैसे ग्रेट वाल आफ चाइना को देख कर 2 हजार साल से लोग होते आ रहे हैं.

 

रामराज्य में इस बार चीन के विकास की कहानी. 1947 में भारत आजाद हुआ. 1949 में पीपुल्स रिपब्लिक आफ चाइना बना . 1980 में आर्थिक विकास के महत्वपूर्ण पैमाने, ग्रास डोमेस्टिक प्रोडक्ट पर चीन और भारत एक ही पायदान पर थे. प्रति व्यक्ति आमदनी में भारत आगे था. आज लगभग 34 साल बाद हम कहां और चीन कहां.

 

भारत की तरह ही चीन एक बहुत पुरानी और महान सभ्यता है. संस्कृति है भारत की तरह ही चीन ने विदेशी ताकतों की मार सही है. सालों तक दबाये जाने के बाद चीन अब दुनिया के नक्शे पर अपनी चमक दिखा रहा है. भारत की अर्थव्यवस्था पौने पांच लाख करोड़ डॉलर की है और चीन की 12 लाख 61 हजार करोड़ डालर की है. चीन दुनिया का सबसे बड़ा एक्सपोर्टर है. एक आर्थिक महाशक्ति है. दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. सबसे बड़ी बात, 1981 से 2013 के बीच 68 करोड़ लोगों गरीबी से बाहर निकाला. मानव इतिहास में इतनी तेजी से इतनी बड़ी संख्या में लोगों ने कभी गरीबी से अमीरी का सफर तय नहीं किया है .

 

हमारे पड़ोसी देश चीन ने पिछले 30 साल में जो हासिल किया है. मानव इतिहास में उस जैसी मिसाल और कहीं नहीं मिलती है. कहां क्या अच्छा है, यह दिखाने के लिए हमने आपको दुनिया के कई देशों की झलक दिखाई. जैसे क्यूबा का हेल्थ सिस्टम, फिनलैंड का एडुकेशन सिस्टम या फिर डेनमार्क की भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था. भारत की तुलना में यह देश काफी छोटे हैं इसलिए यह कहा जा सकता है कि उन देशों में वैसी व्यवस्थाओं को लागू करना आसान है. और चूंकि भारत एक बड़ा देश है, यहां की आबादी बहुत ज्यादा है इसलिए यहां वैसा कर पाना इतना आसान नहीं है. लेकिन चीन की आबादी तो भारत से कहीं ज्यादा है.

ये आज का चीन है. बिल्कुल नया चमचमाता हुआ. आत्मविश्वास से लबालब. एक ऐसा देश जिसका नाम लगभग हर उस सामान पर लिखा मिलता है जिसका इस्तेमाल हम और आप अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में करते हैं. Made in China – न जाने कितनी बार, कितनी चीजों पर आप यह लिखा हुआ देख चुके होंगे. हो सकता है आपके सामने जो टीवी चल रहा है वो भी चीन में ही बना हो.

 

हमारे प्रधानमंत्री, नरेन्द्र मोदी ने मेक इन इंडिया का नारा बुलंद किया है. लेकिन फिलहाल सच्चाई ये है कि पूरी दुनिया में Made in China का बोलबाला है. कभी सोचा है आपने आखिर इसकी वजह क्या है? आखिर चीन ने ऐसा क्या किया कि दुनिया भर के बाजार उसके सामान से पटे पड़े हैं? पहले बड़ी बात चीन ने जो किया उसे बड़े स्तर पर किया.

राजधानी पेइचिंग का मुख्य रेलवे स्टेशन. क्या आप यहां आकर इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि ये चीन की राजधानी का स्टेशन है. यहां आप इस बात का भी अंदाजा नहीं लगा सकते कि ये उस देश का रेलवे स्टेशन है जहां 1 अरब 40 करोड़ से भी ज्यादा लोग. यानी दुनिया की कुल आबादी के करीब 20 फीसदी लोग इस देश में रहते हैं. आखिर वो कौन सी व्यवस्था है जिसने चीन की सूरत ही बदल दी है. पेइचिंग शहर की खूबसूरती चीन के विकास की कहानी कह रही है. चीन ने अपने आर्थिक विकास के इस सफर में न अपनी आबादी को बाधा बनने दिया, न कम्यूनिस्ट शासन को. चीन की तरक्की की इस कहानी की शुरूआत हुई 1978 में. 

 

उस वक्त पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को अपने पैरों पर खड़े हुए बस 30 साल ही हुए थे. चीन की पहचान एक कम्यूनिस्ट मुल्क के तौर पर थी. यानी एक ऐसा देश जहां निजी संपत्ति का अधिकार किसी को नहीं था जो था वो स्टेट का था. वहां माओ त्से तुंग की साम्यवादी विचारधारा और नीतियां सबसे ऊपर थी. माओ की इसी विचारधारा की उपज थी चीन का कल्चरल रिवॉल्यूोशन. पूंजीवादी सोच को जड़ से खत्म करने के लिए 1966 से 1976 तक माओ ने यह आंदोलन चलाया. जिसका नतीजा यह हुआ कि देश की राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई. तंग श्याओ पिंग तब कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ चीन के अहम सदस्य थे. लेकिन माओ की उस विचारधारा के विरोधी थे.

 

1976 में माओ की मृत्यु हो गई. उसके बाद तंग श्याओ पिंग का कद बढ़ने लगा. हालांकि औपाचारिक तौर पर उन्होंने चीन की कमान नहीं संभाली लेकिन कम्यूनिस्ट पार्टी पर उनका नियंत्रण मजबूत होता गया. तंग श्याओ पिंग ने अर्थव्यवस्था को कम्यूनिस्ट नीतियों से अलग करने की शुरुआत की. इस दौर को पीरियड ऑफ रिडजस्टमेंट कहा. इसके तहत विदेश से निवेश होना था. विदेश से तकनीति मदद लेनी थी. जिसमें माओ की नीतियों के उलट निजी, प्राइवेट प्रॅापर्टी रखने की आजादी भी शामिल थी.  

 

चीन की आंतरिक उठा पठक पर काबू पाने के बाद तंग श्याओ पिंग ने दुनिया के दूसरे देशों के साथ चीन के संबंध सुधारने की शुरूआत की. इसका सबसे बड़ा सबूत था 1979 में अमेरिका का चीन की कम्यूनिस्ट सरकार को मान्यता देना. इसके साथ ही ब्रिटेन और जापान से भी चीन ने बेहतर रिश्तों की शुरूआत की.

 

चीन की विदेश नीति में इस बड़े बदलाव की वजह थी तंग श्याओ पिंग की आर्थिक सोच. उनका मानना था कि चीन को पूरी तरह सोशलिस्ट बनाने के लिए पहले उसकी अर्थव्यवस्था का मजबूत होना जरूरी है. और इसकी शुरूआत तभी हो सकती है जब चीन की बंद आर्थिक व्यवस्था के दरवाजे पूरी दुनिया के लिए खोल दिए जाएं. तंग श्याओ पिंग ने कहा कि पीपुल्स रिपब्लिक आफ चाइना के नींव पड़ने के साथ हमारी सबसे बड़ी कमजोरी ये रही है कि हम हमने उत्पादन बढ़ाने वाले काम पर ध्यान नहीं दिया. समाजवाद का मतलब गरीबी खत्म करना है. कंगाली में जीना समाजवाद नहीं है. कम्यूनिज्म तो बिल्कुल भी नहीं.

 

इसका मतलब था पहले गरीबी खत्म करो. सबको समान रुप से गरीब रखना समाजवाद नहीं है. सबको समान रुप से समृद्दि देने से भी समाजवाद आ सकता था. इसके लिए आर्थिक नीतियों में जो बदलाव लाने हों वो लायें जायें. तंग श्याओ पिंग इसी सोच ने चीन को दुनिया की आर्थिक महाशक्ति बना दिया.

 

चीन के महान विचारक लाओत्सू ने कहा था कि हजारों मील की यात्रा के लिए भी पहला कदम रखना जरूरी होता है. 1978 में चीन ने वो पहला कदम उठाया. विदेशी निवेश के लिए अपने दरवाजे खोल दिए. जिस आबादी को विकास में बाधक माना जाता है उसे चीन ने अपनी ताकत बनाया. सस्ते मजदूरों का लालच देकर विदेशी निवेशकों को लुभाया. जब चीन यह सब कर रहा था तब भारत की क्या स्थिति थी? 1980 में आर्थिक विकास के महत्वपूर्ण पैमाने, gross domestic product पर चीन और भारत एक ही पायदान पर थे. 1978 में चीन की प्रति व्यक्ति आमदनी 227 डॉलर की थी और भारत की 209 . फर्क सिर्फ 18 डॉलर का था. और 2013 में चीन की प्रति व्यक्ति आय 6626 डॉलर था. पिछले 35 सालों में ऐसा क्या हुआ कि चीन इतना आगे निकल गया.

 

इस सवाल का जवाब दक्षिणी चीन दक्षिणी चीन का शहर शेन चेन. आसमान छूती इमारतों से भरा शेनचेन चीन का सबसे युवा शहर है. आर्थिक स्तर पर यह देश में चौथे स्थान पर रहा है. लेकिन शेन चेन के विकास की यह कहानी बस उतनी ही पुरानी है जितनी चीन के आर्थिक सुधार की. 1979 तक यह शहर नहीं बल्कि एक छोटा सा गांव था, जहां सिर्फ मछुआरे रहा करते थे. तंग श्याओ पिंग ने आर्थिक सुधारों की शुरूआत के लिए स्पेशल इकोनॉमिक जोन बनाने का फैसला किया. हांग कांग के सबसे नजदीक होने की वजह से शेन चेन को सबसे पहले इस प्रयोग के लिए चुना गया.

 

तंग श्याओ पिंग ने यहां एसईजेड शुरू किया. यहां जो चाइनीज प्रीमियर थे उन्होंने पहली जगह ये चुनी जहां पर ये कांसेप्ट शुरू किया और यहां उन्होंने एक्सपेरिमेंटल बेसिस पर कई सारी सुविधाएं देनी शुरू की. जो टॉप क्लास मैन पावर थी द बेस्ट ब्रेन्स इन चाइना वो लोग शेनचेन आना शुरू हुए.   

 

शेनचेन आज चीन की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा और सबसे मजबूत इंजन है. एक अनुमान के मुताबिक जल्द ही शेन चेन की अर्थव्यवस्था हांगकांग से भी बड़ी हो जाएगी. चीन को आज दुनिया की फैक्ट्री कहा जाता है. इसमें एक बड़ा योगदान शेनचेन का है.

 

ये शहर दिस इस बेस्ट फॉर टेक्नॉलॉजी इन चाइना. चाइना में जो भी टेक्नॉलाजी का डेवलेपमेंट हुआ है वो शेनचेन से शुरू हुआ है. जैसे हम चाइना को सस्ती चीजों के लिए मशहूर समझते हैं पर शेनचेन एक ऐसी जगह है जहां पर टेक्नॉलॉजी है.

 

दुनिया भर में 1 अरब 10 करोड़ मोबाइल फोन हर साल बनाये जाते हैं. एक अनुमान के मुताबिक इनमें से 50 फीसदी से ज्यादा शेनचेन में बनते हैं. शेन चेन की हाईपैड टेलिकॉम कंपनी. यहां अलग अलग कंपनियों के लिए मोबाइल फोन तैयार किए जाते हैं. यहां तैयार किए जाने वाले हर फोन की बारीकी से जांच की जाती है. अभी फोन के कैमरे की जांच हो रही है. इसके बाद फोन को एक ऐसी मशीन में रखा जाता है जहां उसकी मजबूती चेक की जा सके. इस मशीन से फोन को अलग अलग उंचाइयों से गिराया जाता है. इतना ही नहीं फोन के बटन कब तक और कितना दबाव बर्दाश्त कर सकते हैं इसे भी मशीन से चेक किया जाता है.

 

आज चीन का सामान लगभग हर देश में बिकता है. वो दुनिया का सबसे बड़ा एक्सपोर्टर है. इसी एक्सपोर्ट की वजह से चीन के पास सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार भी है. चीन के विकास की कहानी लिखने वालों ने इसी मकसद से वहां की आर्थिक नीतियां बनाईं. एक ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें ज्यादा से ज्यादा विदेशी निवेश हो और जिसमें कमाई का मुख्य जरिया एक्सपोर्ट से होने वाली आमदनी हो. चीन के विकास के इस मॉडल में शेनचेन जैसे एसईजेड यानी  Special economic zones की अहम भूमिका रही है.

 

शेनचेन स्पेशल इकनॉमिक जोन इलेक्ट्रॉनिक सामानों के लिए जाना जाता है. मोबाइल से लेकर टीवी तक इसी शहर में बनते हैं. हेयर, तोशिबा और जेबीसी जैसी कंपनियों के एलईडी टीवी शेनचेन की इस फैक्ट्री में तैयार हो रहे हैं.

 

शेनचेन की तरह चीन में कुल 6 स्पेशल इकनॉमिक जोन हैं. यहां के SEZ काफी बड़े होते हैं. अगर भारत से तुलना की जाए तो जहां भारत में सिर्फ 10 हेक्टेयर जमीन पर भी SEZ बनाया जाता है वहीं चीन का कोई भी स्पेशल इकॉनोमिक जोन 30 हजार हेक्टेयर से छोटा नहीं है.

 

यहां पर बिजली सड़क पानी ये सब कोई इशू नहीं हैं. स्पेशल इकोनॉमनिक जोन के बाद चीन ने अपने राज्यों में स्पेशल डेवेलपमेंट जोन बनाये. एक डेवेलपमेंट जोन में एक तरह के उत्पाद बनाने वाली फैक्टरी होती है. इसलिये अगर चीन का एक राज्य सिर्फ खिलौने बनाने के लिये मशहूर है तो दूसरा होजियरी. कई भारतीए कंपनियों ने भी चीन में इनवेस्ट किया है. जैसे महिन्द्रा एंड महिन्द्रा की ट्रैक्टर बनाने की फैक्टरी. महिन्द्रा ट्रैक्टर ने चीन के यांग चेन में फैक्ट्री लगाने का बड़ा फैसला किया. आखिर किसकी क्या वजह थी.

 

महिन्द्रा एंड महिन्द्रा एक बड़ी कंपनी है . लेकिन कई छोटे निवेशक भी हैं जिन्होंने भारत की बजाये चीन में फैक्टरी लगाने का फैसला किया है. इन्ही में यांगचेन में फैक्ट्री लगाने वाले जैकी भगनानी भी हैं .

 

जैकी भगनानी बताते हैं कि इंफ्रास्ट्रकचर बहुत अच्छा है वहां, हर चीज आसानी से उपलब्ध है लोकल बिजनेस इनवायरमेंट है. फ्रेंडली है वहां की जो गवर्नमेंट है. किसी इंवेस्टर को अगर चाइना में जाना है तो उसे जाकर किसी को ढ़ूढ़ना नहीं होता , चाइनीज गवर्नमेंट में कुछ डिपार्टमेंट है वो उनको अपने आप अप्रोच करते हैं, इनवाइट करते हैं कन्टिनिवस चेज करते हैं तो वो वहां कम्फर्टेबल महसूस करते हैं.

 

जयकिशन भगवानी और महिन्द्रा ग्रुप का अनुभव ये बताता है कि चीन में फैसले जल्दी लिये जाते हैं. और ज्यादतर फैसले स्थानीय लेवल पर ही ले लिये जाते हैं. चाहे मामला जमीन अधिग्रहण का हो या सड़क बिजली पानी का. भारत में जमीन अधिग्रहण को एक कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. विस्थापित होने वालों के पुनर्वास पर ध्यान देना पड़ता है. साफ है कि लोकतांत्रिक देश होने की वजह से जमीन अधिग्रहण और पुनर्वास भारत की सरकार के लिये बड़ा मुद्दा होता है. जबकि विकास के शुरुआती दौर में चीन की सरकार की नजर आर्थिक विकास पर रही. उसके सामने किसी भी तरह के विरोध को जगह नहीं दी गई.

 

चीन की राजनीति ने विकास के आगे विरोध और बहस को दरकिनार कर दिया. आर्थिक निवेश को विचारधारा और राजनीति के चश्मे से नहीं देखा. गौर कीजिए ये देश में हो रहा है जो कहने को कम्यूनिस्ट देश है जहां कुछ दशक पहले तक निजी संपत्ति का भी हक लोगों को नहीं था. दरअसल आर्थिक सुधार के शुरुआती दिनों में तंग श्याओ पिंग ने एक बड़ा कदम उठाया था. वो था लैंड रिफॉर्म का. उस समय तक जमीन किसी एक व्यक्ति या परिवार की सपंत्ति नहीं होती थी. कम्यून यानी पूरा समाज उस पर मिल जुल कर खेती करता था. लैंड रिफार्म के तहत जमीन किसानों को दे दी गई. जमीन एक हाथ से दी गयी और दूसरे हाथ से ले ली गयी. जैसे ही बिजली घर, बांध, स्पेशल इकोनामिक जोन और फैक्टरी लगाने की बात शुरु हुई तो सरकार ने बड़े पैमाने पर जमीन वापस लेकर निजी हाथों में दे दी.

 

लगातार तीन दशक का चीन का ग्रोथ रेट 10 फीसद से ज्यादा का रहा है. इसमें चीन की कम्यूनिस्ट सरकार की इन नीतियों का बड़ा हाथ रहा है. नीतियों में फेरबदल ना के बराबर हुआ है. इतना ही नहीं हाई एंड टेक्नालाजी जिस पर कभी अमेरिका, जर्मनी और जापान जैसे देशों का कब्जा था उसमें भी चीन ने महारत हासिल कर ली. इसी की एक मिसाल चीन की बुलेट ट्रेन है.  

 

हाई स्पीड ट्रेन को चीन सरकार अपनी एक बड़ी उपलब्धी बताती रही है. इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि पूर्व चीनी राष्ट्रपति हू जीन ताओ ने अपनी तीन उपलब्धि बताई तो उसमें चन्द्रमा पर चीन का यान अंतरिक्ष में मानव रहित यान और बुलेट ट्रेन. बुलेट ट्रेन या हाई स्पीड ट्रेन नेटवर्क फैलाने में चीन आज नंबर वन है. वो भी तब जब चीन इस रेस में बहुत बाद में आया.

 

हाई स्पीड ट्रेन या बुलेट ट्रेन को सबसे पहले जापान ने चलाया था 1964 में. इसके बाद फ्रांस जर्मनी जैसे कई यूरोपीय देशों ने रफ्तार के रिकॉर्ड बनाये. चीन ने तेज रफ्तार बुलेट ट्रेन चलाने की बात शुरु की 1990 में औपचारिक घोषणा की 1995 में . काम शुरु हुआ सन 2000 के बाद. लेकिन काम की रफ्तार देखिये 2011 आते आते दुनिया का सबसे लंबा हाई स्पीड ट्रेन नेटवर्क चीन में हैं. चीन में फिलहाल 9 हजार 904 किलोमीटर लंबा बुलेट ट्रेन नेटवर्क मौजूद है जबकि जापान में 2388 किलोमीटर की लाइन है. 

 

चीन में काम का ये है रफ्तार. नीति बनी उसके बाद पूरी ताकत झोंक दी जाती है उसे पूरा करने में. चीन के इस तेज रफ्तार विकास का दूसरा पहलू भी है कि नीति बनने के बाद वहां विरोध और बहस की कोई गुंजाइश नहीं है. लेकिन चीन ने जहां एक तरफ लोगों की समस्याओं को विकास के रास्ते पर नहीं आने दिया वहीं दूसरी तरफ ऐसे लोग तैयार किए जो चीन के विकास की सीढ़ी बने – यानी स्किल्ड लेबर या फिर ह्यूमन कैपिटल.  

 

चीन में आर्थिक सुधारों की शुरूआत के साथ ही इस बात पर खास ध्यान दिया गया कि लोगों को ऐसी ट्रेनिंग दी जाए जिससे ज्यादा से ज्यादा कुशल कारीगर तैयार हो सकें. इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि चीन में 13 हजार से भी ज्यादा वोकेशनल इंस्टीट्यूट्स हैं, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है. स्किल्ड लेबर तैयार करने के साथ साथ चीन लघु और मध्यम उद्योगों को बढ़ावा देता है. इसीलिए चीन के निर्यात में करीब 68 फीसदी योगदान लघु और मध्यम उद्योगों का है.

 

चीन में मीडियम और स्मॉल सेकल इंडस्ट्रीस, प्रॉविन्सेस में बहुत स्ट्रांग है. वो देखते हैं कि अपने प्रॉविन्स में स्मॉल स्केल इंडस्ट्री को ज्यादा से ज्यादा लोन कैसे दिया जा सकता है. टैक्स बेनिफिट सब्सिडी कैसे दी जा सकती है. लघु और मध्यम उद्योगों को जिस तरह से लैंड और बिजली दी जाती है. जो माहौल और सुविधाएं दी जाती हैं वो यहां नहीं होता.

 

किसी भी विदेशी के लिए चीन में कंपनी बनाना और बिजनेस शुरू करना बेहद आसान होता है. यही नहीं कम्यूनिस्ट देश होने के बावजूद चीन में भारत की तरह कड़े लेबर कानून नहीं है. हालांकि इसकी वजह से कई बार चीन की निंदा भी होती है लेकिन कारोबारी इसे चीन के विकास की एक बड़ी वजह मानते हैं. चीन के कानून के मुताबिक अगर एक प्रांत का मजदूर किसी दूसरे प्रांत में काम करता है तो वो अपने परिवार को साथ नहीं रख सकता. और अगर कोई ऐसा करता है तो उसके बच्चे को किसी स्कूल में दाखिला नहीं मिलेगा. स्वास्थ्य सेवाएं नहीं मिलेंगी.

क्या आप भारत में ऐसे कानून की कल्पना कर सकते हैं? खैर, चीन अगर आज दुनिया में एक आर्थिक महाशक्ति के तौर पर जाना जाता है तो उसकी वजह और भी हैं. सबसे बड़ी बात – विदेशी निवेशकों के लिए अनुकूल माहौल बनाना, अपने यहां स्किल्ड लेबर तैयार करना, ऐसी नीतियां बनाना जो कारोबार बढ़ाने में मददगार हों और इन सब की मदद से दुनिया की हर वो चीज बनाना जिसकी जरूरत लोगों को रोजमर्रा की जिंदगी में पड़ती है. यही वजह है कि दुनिया के बाजार made in china प्रोडक्ट्स से भरे पड़े हैं. यही नहीं चीन में इम्पोर्टर की सुविधा का भी खास ख्याल रखा जाता है. इसकी मिसाल है शंघाई से 300 किलोमीटर दूर बसा एक शहर– ईवू.

 

दुकानें ही दुकानें. य़हां क्या नहीं मिलता. बच्चों के खिलौनों से लेकर लक्ष्मी गणेश तक सबकुछ. – ये है दुनिया का सबसे बड़ा होलसेल मार्केट. ईवू शहर के इस मार्केट में करीब 7.50 लाख दुकानें हैं. मतलब इतनी दुकानें कि अगर आप हर दुकान में जाकर सामान देखना चाहें तो आपको एक साल का वक्त लग सकता है.

 

दुकानों में गणेश जी …लक्ष्मी जी ….शिव जी की मूर्तियां कैलेण्डर और आरती संग्रह मिलते हैं. यहीं गुरु ग्रंथ साहिब के शबद की किताब मिल जाती हैं. और कुरान शरीफ की आयतें भी मिलती हैं. यहां सैंटा क्लाज मिल जायेंगें. हर क्वालिटी के सैंटाक्लाज मिल जायेंगे. और ऐसी सैंकड़ों दुकाने हैं. दीवाली और क्रिसमस अभी दूर है लेकिन चीन के कारखानों में क्रिसमस और दीपावाली का काम चल रहा है. इस होल सेल मार्केट से चीन की फैक्ट्रियों में बन रहे सैंटा क्लाज और क्रिसमस ट्री को दुनिया भर में भेजा जा रहा हैं. दरअसल, ईवू का ये होलसेल मार्केट, फैक्ट्री और दुनिया भर के इंपोरटरों के बीच की कड़ी है. इंपोरटर यहां आर्डर देते हैं. आर्डर फैक्ट्रियों में बढ़ा दिया जाता है और फैक्टरी से माल सीधे खरीददार के पास एक्सपोर्ट हो जाता है.

 

चीन में बिजनेस का एक फार्मूला है. वहां कोई भी सौदा छोड़ा नहीं जाता और किसी भी सौदे में नुकसान नहीं उठाया जाता. ईवू में इसकी कई मिसाल आपको मिल जायेंगी. भारत के खरीददारों को ध्यान में रख कर व्यवसायी वहां कम रेट में माल खरीदने के लिए जाते हैं. चूंकि वहां कोई सौदा छोड़ा नहीं जाता है और किसी भी सौदे में नुकसान नहीं उठाया जाता इसलिये चीनी फैक्ट्री मालिक हल्की क्वालिटी की चीजें उन्हें बेच देते हैं. कम दाम और ज्यादा मुनाफे की चाहत में भारत के थोक व्यापारी बड़ी संख्या में चीन के ईवू शहर में पहुंचते हैं.

 

इवू आने वाले भारतीय व्यापारियों की संख्या इतनी ज्यादा है कि एक पूरी सड़क भारतीय रेस्टोरेन्ट और होटलों से भरा हुई है. इस शहर में 15 भारतीय रेस्टोरेन्ट हैं.

 

इवू में इतनी बड़ी मार्केट बनाने का काम करीब 12 साल पहले शुरू हुआ. इसके पीछे चीन का मकसद साफ था. चीन ने पहले फैक्ट्रियां बनाईं और फिर उनके उत्पाद को बेचने की व्यवस्था भी कर दी. इंपोर्टरों को इधर- उधर जाने की जरुरत नहीं और फैक्ट्री मालिकों को भी खरीददार ढूढ़ने की जरुरत नहीं है .

 

आज दुनिया भर में चीन के उत्पाद दिखाई देते हैं. उसकी एक वजह कई किलोमीटर तक फैले इस मार्केट के चार फ्लोर हैं. इन दुकानों में दुनिया भर की नकल की हुई चीज भी मिलती है और असल और क्वालिटी चीज भी. आप पैसे फेंकिये. चीज हाजिर है. चाहे वो खिलौने हो या कपड़े और कॉस्मेटिक्स हों या हार्ड वेयर के सामान. या फिर ज्वेलरी हो या लेदर गुड.

 

दरअसल, इवू चीन के बारे में एक बड़ी कहानी कहता है. चीन की सफलता के राज खोलता है. दुनिया में इंसानों की जरुरत की हर चीज बनाओ. खरीददार जैसा चाहे वैसा बनाओ और मुनाफा कमाओ.  

 

चीन किसी भी बड़ी योजना को लागू करने से पहले पॉयलेट प्रोजेक्ट चलाता है और पॉयलेट प्रोजेक्ट के सफल होने पर उसे दूसरी जगहों पर लागू किया जाता है. चीन ने कम्यूनिस्ट देश होने के बाद भी आर्थिक खुलेपन की वो सारी नीतियों को अपनाया जिसे अमेरिका और यूरोप के देश अरसे से लागू करते रहे हैं. जैसे खुदरा बाजार में विदेशी निवेश. चीन ने विदेशी निवेश के लिए 1992 में ही रिटेल में विदेशी कंपनियों को दुकान लगाने की अनुमति दे दी. तब सीमा थी 28 फीसदी की . इसके 12 साल बाद 51 फीसद निवेश की अनुमति दे दी गई .

 

इस दौरान चीन की रिटेल कंपनियों ने बड़ी विदेशियों कपंनियों से काम करने तौर -तरीका सीखा 12 साल में वो चीन की रिटेल कंपनी उस स्तर पर आ गई जहां वो विदेशी कंपनियों को चुनौती दे पाये. निवेश के इस तरीके का इस्तेमाल चीन ने ज्यादातर क्षेत्रों में किया और आज उसकी आर्थिक स्थिति उसकी नीतियों की सफलता की कहानी कह रही है.  

 

चीन की सफलता की इस कहानी में कई लूपहोल भी हैं. जिनका असर आनेवाले दिनों में दिख सकता है. जैसे चीन की वन चाइल्ड पॉलिसी की वजह से अगले कुछ सालों में चीन में लेबर यानी मजदूरों की काफी कमी हो सकती है. अगर ऐसा हुआ तो दुनिया की फैक्ट्री कहे जाने वाले चीन में उत्पादन की रफ्तार धीमी पड़ सकती है.

 

MUST WATCH | चीन में कैसे आया विकास का ‘रामराज्य’ 

लेकिन चीन ने आर्थिक क्षेत्र में पिछले 35 सालों में जो हासिल किया है वो दुनिया के किसी भी देश ने नहीं किया. आखिर चीन ने कैसे लगाई इतनी लंबी और ऊंची छलांग. क्या चीन के विकास मॉडल से भारत कुछ सीख सकता है? क्या भारत में भी आर्थिक विकास और खुशहाली का रामराज्य आ सकता है?

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