BLOG: 7 मिनट मिरैकल | ये जादू नहीं तो क्या है?

By: | Last Updated: Sunday, 12 July 2015 8:23 AM
ramrajya_seven minutes miracle

नई दिल्ली: कल मैं लिफ्ट से उतर रहा था कि एक सज्जन मिले. उनसे पहले मेरी बातचीत कभी नहीं हुई थी. उन्होंने मुझे देखते ही कहा ,  भाई, आप तो जादू दिखा रहे हो.  

 

मैंने कहा,  “नहीं फिलहाल तो मैं  “रामराज्य” सीरीज दिखा रहा हूं. सज्जन ने कहा , हां  उसी में तो आपने जादू दिखाया. तब तक लिफ्ट नीचे आ गई और हम दोनों की बात वहीं खत्म हो गई.  लेकिन , मैं समझ गया बात क्या है. हो न हो वो 7 मिनट मिरैकल की बात कर रहे होंगे. जी सचमुच मैंने जादू दिखाया था. बस नजर नजर का फर्क है.

 

बात कुछ यूं थी. हम सुबह के 9 टोक्यो स्टेशन पहुंचे थे. टोक्यो स्टेशन से हमें दस बजे शिनकानसेन यानी जापान की बुलेट ट्रेन से शिनादाई जाना था. बीच के एक घंटे हमें स्टेशन पर शूटिंग की अनुमति मिली थी. आधे घंटे मैं और मेरे कैमरामैन मुकेश कुमार यादव स्टेशन के बाहर और यात्रियों की आवाजाही , टिकट की खरीद बिक्री जैसी बातों को शूट करते रहे.

 

तकरीबन 9 बज कर 25 मिनट पर हम प्लैटफार्म पर पहुंचे. हमारे सामने एक बुलेट ट्रेन आकर रुकी. बुलेट ट्रेन रुकी..हमने उसके प्लैटफार्म पर रुकने और यात्रियों के चढने उतरने के शाट्स बनाये. लेकिन दस मिनट ही हुये थे कि ट्रेन वापस चली गई. करीब पांच सौ किलोमीटर का सफर कर ट्रेन अपने आखिरी स्टेशन पर आई थी और बस दस मिनट में ही वापस कैसे चली गई. मैंने ये सवाल जापान रेलवे के अधिकारी से पूछा. उन्होंने मुझे बताया कि दस मिनट नहीं बारह मिनट के लिए ट्रेन टोक्यो में रुकती है. और फिर वापस चली जाती है.

 

मैंने पूछा फिर सफाई वगैरह कैसे होती है. अधिकारी ने बताया, सफाई, स्टाफ चेंज, टेक्निकल जांच सबकुछ इसी दौरान होता है. 17 बॉगियों वाली ट्रेन जो 200 किलोमीटर प्रतिघंटा से चलती है उसे 12 मिनट में तैयार कर वापस भेज दिया जाता है. ये कैसे ?  तभी फ्लैटफार्म पर दूसरी बुलेट ट्रेन आई. और आगे जो हुआ उसे देख कर पता चला कि वो क्या चीज जिसे लोग “7 मिनट मिरैकल” ( सात मिनट में होने वाला चमत्कार) कहते हैं.

 

जापाना में बुलेट ट्रेन शिनकासेन की रफ्तार ही गोली जैसी नहीं होती है इससे जुड़ी हर बात हर चीज गोली जैसी होती है ..रफ्तार बहुत तेज होती है..जैसे मेरे सामने  ट्रेन हाकुटाका 557 9 बज कर 32 मिनट पर टोक्यो स्टेशन पर आई और इसे 9-44 मिनट पर यहां से वापस रवाना होना है.

 

पहला दो – ढ़ाई मिनट सवार यात्रियों के उतरने में गुजर गया . लेकिन कोई भी यात्री बाहर आता उससे पहले एक महिला पॉलिथिन बैग लेकर गेट पर खडी हो गई. लोग उसमें अखबार…खाली बॉटल जैसी चीजों को डालने लगे. उसके हर एक बॉगी में सफाई कर्मी दाखिल हुए. इन बागियों में 65 से लेकर 100 सीटें हो सकती हैं . एक सीट की सफाई हुई . फर्श की सफाई हुई . उपरी रैक का निरीक्षण हुआ . फिर सामने की ट्रै की सफाई हुई ..उसके बाद सारे सफाई कर्मी बाहर निकले …और इंतजार कर रहे यात्रियों को झुक कर धन्यवाद दिया और चल पड़े ..अगली ट्रेन की सफाई के लिए.

 

यही जादू था. 12 मिनट के टर्न आराउण्ड टाइम. सात मिनट में पूरी की पूरी ट्रेन साफ. और इस ट्रेन को साफ करने वालों में ज्यादातर महिलायें थी. और हमें बताया गया कि इनकी औसत उम्र 52 साल है. और इस तरह से बरसों से टोक्यों स्टेशन ही नहीं जापान के सभी स्टेशनों पर काम हो रहा हैं.

 

सात मिनट में पूरी ट्रेन की सफाई को ही सेवन मिनट मिरैकल कहा गया. लेकिन दुनिया जिसे जादू कह रही है उसके बारे में जापान के लोगो को पता ही नहीं था. इससे जुड़ा एक वीडियो वायरल हो चुका है और अब तक चालिस लाख से ज्यादा लोग उसे देख चुके हैं.

 

देखें वीडियो  Episode 6: जापान में है परिवहन में ‘रामराज्य’

 

दरअसल  इसके पीछे की कहानी  भी बहुत दिलचस्प है.

 

2020 में टोक्यो में ओलम्पिक होना है. टोक्यो मेट्रोपोलिटन गवर्नमेंट ने इसके लिए विदेशों से 6 पत्रकारों को आमंत्रित किया. उन पत्रकारों से ये कहा गया कि आप जापान की ऐसी बात बताइये जो हमारे लिए तो बहुत ही आम हो लेकिन बाहर के लोगों को अचंभित करे. उन्हीं पत्रकारों में ABC News  चैनल में काम करने वाली पत्रकार चार्ली जेम्स नाम की पत्रकार भी थीं. जिन्होंने 7 मिनट मिरैकल नाम की स्टोरी बनाई ..और  टूयब पार डाल दिया .

 

बहरहाल , शिनकानसन से जुड़ी ये सात मिनट की कहानी जापान के ‘रामराज्य’ के बहुत अहम पहलू की तरफ इशारा करती है . और वो है समय का पाबंद होना . जापान में शिनकासन पिछले 51 साल से चल रही है . रोज ऐसी 800 से ज्यादा ट्रेन चलती है पर लेट होने का औसत समय 1 मिनट से भी कम का है . ये कैसे मुमकिन हुआ .

 

इस काम में रेलवे के साथ –साथ जापान के लोग भी शामिल हैं . मेरे साथ इनटरप्रेटर के तौर पर टीना सयूरी थी . मैंने उन्हें देखा कि एक खाली बॉटल को  पूरे दिन अपने साथ लेकर घूमती रहीं थी क्योंकि उन्हें डस्टबीन नहीं मिला. ट्रेन से उतरने वाला हर यात्री अपने साथ खाली बोतल और अखबार लेकर उतरता है. और उसे उचित जगह पर डालता है . अगर यात्री ऐसा नहीं करेंते तो मुमकिन है कि बुलेट ट्रेन की सफाई करने वालों को सात मिनट में ट्रेन को साफ करने में बड़ी दिक्तत होगी .

 

जापान के लोगों के लिए ये सबकुछ उनके आचार व्यवहार का हिस्सा है . इसलिए विदेश से गये पत्रकारों को जो बात जादू लगता है ..उनके लिए बेहद आम बात है .

 

पढ़ें, जापान में कैसे आया परिवहन के क्षेत्र में | और क्या है “7 मिनट मिरैकल”  की पूरी कहानी

एबीपी न्यूज स्पेशल: जापान में है परिवहन में ‘रामराज्य’ 

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