रोजों में रखें सेहत का खयाल

By: | Last Updated: Tuesday, 23 June 2015 10:56 AM

लखनऊ: रमजान के मुकद्दस महीने में रोजे रखने वालों को सेहत पर खास ध्यान देने की जरूरत है. डायबिटीज और दिल की बीमारी से पीड़ित लोगों को चिकित्सक रोजे रखने से मना कर रहे हैं.

 

चिकित्सकों का कहना है कि गर्मी के मौसम में मरीजों को लगातार कुछ खाने और पानी की जरूरत पड़ती है. ऐसे में रोजे रखने से दिक्कत बढ़ेगी. वरिष्ठ फिजीशियन डॉ. अजय मोहन अग्रवाल का कहना है कि डायबिटीज से पीड़ित व्यक्ति को रोजे नहीं रखने चाहिए. शरीर में शुगर का स्तर बढ़ने और घटने से स्थिति गंभीर हो सकती है.

 

उन्होंने कहा कि डायबिटीज के मरीजों को बीच-बीच में कुछ न कुछ खाना पड़ता है, लेकिन रोजे के दौरान संभव नहीं हो पाता है. साथ ही दिल के मरीजों को भी काफी सावधान रहने की जरूरत है. उन्हें चिकनी और मसालेदार चीजों से दूर रहना चाहिए.

 

डायटीशियन रोजी जैदी का भी कहना है कि डायबिटीज और दिल के मरीज रमजान में खास ध्यान रखें. डायबिटीज के मरीज रोजा न रखें तो ही बेहतर.

 

गर्मी इतनी है कि थोड़ी-थोड़ी देर में गला सूख रहा है. पानी की कमी से डिहाइड्रेशन तक हो जाता है. डायटीशियन रोजी जैदी कहती हैं कि रोजे के दौरान ऐसी चीजों का सेवन करना चाहिए, जिससे शरीर में पानी की कमी न होने पाए. पानीदार फल और सब्जियों का सेवन अधिक करें. तला, भुना और मसालेदार पकवान कम खाएं.

 

उन्होंने कहा कि इफ्तारी के बाद एक साथ कुछ भी भारी भोजन न करें, बल्कि कुछ समय के अंतराल पर खाते-पीते रहें. ज्यादा नमक वाले खाने से दूर रहें, वरना प्यास ज्यादा लगेगी. कम से कम आठ गिलास पानी जरूर पीएं. रोजे के दौरान भी प्रोटीन के लिए मांस, मछली व सब्जी का सेवन करें.

 

सहरी का खानपान : पानी, सूप, सलाद, ओट्स, ब्रेड, अंकुरित दालें, दूध, फलों का जूस, पोहा, फल, अंडा, हलवा.

 

इफ्तारी का खानपान : सलाद, चपाती, एक कटोरी दाल, फल, चावल, आलू, सब्जियों का सूप, अंडा, नॉनवेज (ज्यादा तला व मसालेदार न हो).

 

मदद की प्रेरणा देता है रमजान

 

इस्लाम में रमजान का महीना दुनियाभर के मुसलमानों के लिए अदब और अकीदत का महीना है. यह महीना कई मायने में इंसान को बेहतर बनाने और उसमे खामियों को कम करके खूबियां बढ़ाने का एक बड़ा जरिया है. इस पाक माह में कोई भी रोजेदार छोटी-छोटी बुराइयों से बचने की कोशिश करता है और कमजोर लोगों की बेहतरी के लिए कोशिश करता है. इफ्तार के जरिए भाईचारे को बढ़ावा दिया जाता है तो जकात के जरिए लोग जरूरतमंदों की मदद करते हैं.

 

मौलाना सलमान हुसैन नदवी ने फरमाया कि मजहबी दायरे से बाहर देखें तो रमजान इंसान को बेहतर बनाने का बड़ा जरिया है. इस माह में लोग अच्छाई की ओर बढ़ने और बुराई से दूर भागने की कोशिश करते हैं. यही कोशिश उन्हें बतौर इंसार बेहतर बनाती है.

 

उन्होंने कहा कि आमतौर पर लोग इस माह में ईद से पहले जकात निकालते हैं. इससे जरूरतमंदों को मदद मिलती है. रमजान में कोशिश रहती है कि लोगांे की ज्यादा से ज्यादा मदद की जाए. इस माह में सवाब का दायरा भी 70 गुना अधिक हो जाता है.

 

मौलाना ने कहा कि पैगम्बर सल्लाहो अलैहेवसल्लम ने भी यही फरमाया था कि लोगांे की किसी न किसी सूरत में मदद करने की कोशिश करो. रमजान में रोजेदार दिन में कई बुनियादी बातों का एहतराम करता है. मसलन, वह खाने-पीने और बुराइयों से दूर रहने के साथ-साथ इबादत पर जोर देता है.

 

उन्होंने का कि रमजान सिर्फ खाने-पीने से दूर रहने का नाम नहीं है. इसमें तमाम बुराइयों से दूर रहकर अच्छाइयों की ओर रुख बनाए रखना पड़ता है. नबी करीम ने इसी पहलू को सबसे अहम बताया है. रमजान में इंसान सब्र करता है और उसके भीतर चीजों को सहने की कूबत बढ़ती है.

 

मौला ने का कि बेहतर इंसान बनना और लोगों को बेहतरी और जनकल्याण के लिए प्रेरित करना रमजान का असली संदेश है. यह सेहत के लिए भी फायदेमंद है.

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