संविधान की प्रस्तावना में समाजवाद और सेक्युलर शब्द पर विवाद, टेलीकॉम मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा-सरकार बहस के लिए तैयार

By: | Last Updated: Thursday, 29 January 2015 4:51 AM
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नई दिल्ली: संविधान की प्रस्तावना में समाजवाद औऱ सेक्युलर शब्दों के इस्तेमाल को लेकर विवाद चल रहा है और इस विवाद में सरकार की ओर से अहम बयान आया है. टेलीकॉम मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि सरकार इस बात पर बहस के लिए तैयार है कि संविधान की प्रस्तावना में समाजवाद औऱ सेक्युलर होना चाहिए या नहीं.

 

इस विवाद की शुरूआत हुई थी गणतंत्र दिवस पर सरकारी विज्ञापन से जिसमें सेक्युलर और समाजवाद शब्द नहीं थे. कांग्रेस ने इस पर आपत्ति जताई थी लेकिन शिवसेना ने इसका समर्थन किया था. अब सरकार की ओर से शिवसेना का समर्थन और बहस की पेशकश की गई है. कांग्रेस पर तंज कसते हुए रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस से पूछा-क्या नेहरू नहीं थे सेक्युलर?

 

‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को हटाने की शिवसेना की मांग में कुछ भी गलत नहीं :प्रसाद

गणतंत्र दिवस विज्ञापन विवाद पर कांग्रेस पर पलटवार करते हुए एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री ने बुधवार को कहा कि जवाहर लाल नेहरू और बी आर अंबेडकर जैसे नेता मौजूदा कांग्रेसी नेताओं से अधिक बुद्धिमान थे और उन्होंने संविधान की मूल प्रस्तावना में ‘‘धर्मनिरपेक्ष’’ और ‘‘समाजवादी’’ शब्दों को शामिल नहीं किया था.

 

मंत्रिमंडल की प्रेस ब्रीफिंग को संबोधित करते हुए दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि वह शिवसेना सांसद संजय राउत के कथित बयान में कुछ भी गलत नहीं पाते हैं कि इन दो शब्दों को स्थायी तौर पर प्रस्तावना से हटा दिया जाना चाहिए.

 

प्रसाद ने कहा, ‘‘ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में कुछ विचारों को रखने पर क्या आपत्ति है. प्रस्तावना जिसका विज्ञापन में इस्तेमाल किया गया वह मूल प्रस्तावना है और संविधान सभा ने इसे तैयार किया था जिसमें जवाहर लाल नेहरू, बी आर अंबेडकर और अन्य नेता थे. तब ये दोनों शब्द नहीं थे.’’ प्रसाद ने कहा, ‘‘क्या नेहरू को धर्मनिरपेक्षता की समझ नहीं थी. इन शब्दों को आपातकाल के दौरान जोड़ा गया. अगर अब इसपर चर्चा हो रही है तो इसमें क्या नुकसान है. हमने देश के समक्ष मूल प्रस्तावना को रखा है.’’

 

कांग्रेस नेता और पूर्व सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने कल इस मुद्दे पर सरकार पर हमला किया था और दावा किया था कि सरकारी विज्ञापन में इन दो शब्दों को ‘हटा’ दिया गया जिनके स्थान पर ‘सांप्रदायिक’ और ‘कॉरपोरेट’ शब्द को स्थापित करने के उनके प्रयासों का यह शुभारंभ है.

 

गणतंत्र दिवस: धर्मनिरपेक्ष शब्द के बगैर संविधान के विज्ञापन को लेकर विवाद

 

विज्ञापन में संविधान के प्रस्तावना की तस्वीर थी जो 42 वें संविधान संशोधन से पहले थी. इसमें ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्द नहीं था.

 

क्या है शिवसेना की मांग?

इससे पहले गणतंत्र दिवस पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के विज्ञापन पर उठे विवाद के बीच शिवसेना ने बुधावार को संविधान से ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्दों को ‘स्थायी तौर पर हटाने’ की मांग की.

 

कल सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ओर से जारी विज्ञापन के मुद्दे पर कल राजनीतिक दलों में कटुतापूर्ण वाकयुद्ध शुरू हो गया. इस विज्ञापन में संविधान की प्रस्तावना के चित्र पेश किये गए थे जो 42वें संशोधन से पहले के थे और जिसमें ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्द नहीं था.

 

शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा, ‘‘ हम गणतंत्र दिवस से जुड़े विज्ञापन से शब्दों (धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी) हटाने का स्वागत करते हैं. यह अनजाने में किया गया होगा, यह भारत के लोगों की भावना का सम्मान करने जैसा है.

 

अगर इन शब्दों को इस बार गलती से हटाया गया है, तब इन शब्दों को संविधान से स्थायी तौर पर हटाया जाए.’’ उन्होंने कहा, ‘‘ जब से इन्हें (शब्दों को) संविधान में शामिल किया गया, यह कहा जा रहा है कि यह देश कभी धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकता.

 

बाला साहब ठाकरे और उनसे पहले वीर सावरकर ने कहा था कि भारत को धर्म के आधार पर बांटा गया. पाकिस्तान मुसलमानों के लिए बनाया गया और जो बचा वह हिन्दू राष्ट्र है.’’

 

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