renowned hindi writer doodhnath singh dies हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार दूधनाथ सिंह का निधन, साहित्य समाज में शोक

हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार दूधनाथ सिंह का निधन, साहित्य समाज में शोक

दूधनाथ सिंह ऐसे लेखकों में से जिनके जाने से पूरा साहित्य जगत अंधकार मय हो गया है, उनकी कमी को पूरा नहीं किया जा सकता है.

By: | Updated: 12 Jan 2018 10:09 AM
renowned hindi writer doodhnath singh dies

नई दिल्ली: हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार दूधनाथ सिंह नहीं रहे. उन्होंने ‘सभी मनुष्य हैं, ओ नारी, ख़ुश होना अनैतिक है, इस समाज में’ जैसी प्रसिद्ध रचनाएं लिखी हैं. उनके निधन से साहित्य समाज में शोक की लहर है. आज दोपहर दो बजे इलाहाबाद के रसूलाबाद घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा.


81 साल की उम्र में दूधनाथ सिंह ने अपने पैतृक शहर इलाहाबाद में देर रात 12 बजकर 6 मिनट पर आखिरी सांसें लीं. वो पिछले एक साल से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से लड़ रहे थे.


दूधनाथ सिंह इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे. रिटायर होने के बाद वो इलाहाबाद में ही रहते थे. दूधनाथ सिंह ने कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचना समेत लगभग सभी विधाओं में लेखन किया. उनके उपन्यास आखिरी कलाम, निष्कासन, नमो अंधकारम हैं. दूधनाथ सिंह भारतेंदु सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान से सम्मानित थे.


doodhnath singh


दूधनाथ सिंह ऐसे लेखकों में से जिनके जाने से पूरा साहित्य जगत अंधकार मय हो गया है, उनकी कमी को पूरा नहीं किया जा सकता है.


दूधनाथ सिंह के निधन पर साहित्य जगत में शोक की लहर है. वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने अपने शिक्षक दूधनाथ सिंह के निधन पर उन्हें याद किया है. उन्होंने फेसबुक पर लंबा पोस्ट किया.


उर्मिलेश लिखा, "अभी-अभी उदय प्रकाश, वीरेंद्र यादव और सुनील की पोस्ट से पता चला, हमारे प्रिय लेखक और अध्यापक दूधनाथ सिंह जी नहीं रहे! उनकेे स्वास्थ्य को लेकर पूरा हिंदी जगत चिंतित था। सभी शुभ कामना दे रहे थे कि वह सकुशल अस्पताल से लौटें। पर कैंसर ने देश के एक महान् साहित्यकार को हमसे छीन लिया।
वह मेरे शिक्षक थे, शुभचिंतक और दोस्त भी! इलाहाबाद छोड़ने के बाद मेरी उनसे ज्यादा मुलाकातें नहीं हुईं पर दिलो-दिमाग में हमारे रिश्ते कभी खत्म नहीं हुए। उनसे फोन पर आखिरी बातचीत संभवतः डेढ़-दो साल पहले तब हुई थी, जब लखनऊ से प्रकाशित 'तद्भव' पत्रिका में गोरख पाण्डेय पर मेरा एक संस्मरणातमक लेख छपा। उन्होंने कहीं से मेरा नंबर खोजकर फोन किया और उस लेख के लिए बहुत खुशी जताई। कहने लगे, 'तुम्हें टीवी पर देखते हुए अच्छा लगता है, समझ और प्रतिबद्धता का वही तेवर है। अब वह ज्यादा प्रौढ़ता के साथ नजर आता है। ठीक है कि तुम पत्रकारिता में हो और अपने काम में ज्यादा व्यस्त रहते हो पर तुम्हें गैर-पत्रकारीय लेखन भी जारी रखना चाहिए। तुम्हारा यह लेख पढ़कर बहुत अच्छा लगा। गोरख पर अब तक का यह श्रेष्ठ संस्मरण है! सुना, तुमने कश्मीर पर भी अच्छा लिखा है। पर वह पढ़ने को नहीं मिला!'
मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि छात्रजीवन में जिन कुछेक अधयापकों ने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया, उनमें दूधनाथ सिंह का नाम प्रमुख है। उन्होंने मुझे अपने लेखन और कर्म में 'पक्षधर' होने की प्रेरणा दी। गोरख ने इसे वैचारिक और दार्शनिक आधार देकर और मजबूत किया।
इस वक्त एक कार्यक्रम के सिलसिले में मैं महाराष्ट्र के नाशिक में हूं। दुख हो रहा है कि कि आज मैं अपने प्रिय शिक्षक और हिंदी के बेहद प्रतिभाशाली लेखक के अंतिम दर्शन से वंचित हो रहा हूं। पर मैं जब तक जीवित रहूंगा, दूधनाथ सिंह जी की स्मृतियां मेरे साथ रहेंगी। सलाम और श्रद्धांजलि मेरे प्रिय शिक्षक और साथी दूधनाथ सिंह जी!"


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