आरक्षण की चिंगारी: आज गुजरात कल पूरा देश !

By: | Last Updated: Wednesday, 26 August 2015 11:12 AM

गुजरात में पटेल समुदाय ओबीसी आरक्षण मांग को लेकर सड़क पर है, हार्दिक पटेल के नेतृत्व में की गई महारैली के बाद इस आन्दोलन की चिंगारी पूरे गुजरात में फ़ैल गई है. राज्य में कई जगह आन्दोलन हिंसक भी हुआ, सैकड़ो सरकारी बसें और संपत्ति जला दी गई, कुछ जगहों पर कर्फ्यू भी लगा और अहमदाबाद सहित कुछ जगहों पर इंटरनेट की सेवा भी बंद की गई. यह सब उस राज्य में हो रहा है जहां के विकास मॉडल की दलीलें पूरी दुनियाँ में दी जाती थी लेकिन आज वहां राजनैतिक और आर्थिक रूप से सबसे ताकतवर जाति “पटेल “ आरक्षण पाने के सड़कों पर है और इसे पाने के लिए वो किसी भी हद तक जाने को तैयार भी दिख रहें है.

पटेलों में इस असंतोष की वजह चाहे कुछ भी हो लेकिन आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर सतह पर आ गया. गुर्जरों, जाटों के बाद अब पटेल मैदान में है. पटेल आंदोलन के अगवा युवा हार्दिक पटेल के अनुसार पटेल उम्मीदवार को 90 % अंक प्राप्त करने पर भी एमबीबीएस में दाखिला नहीं मिलता वहीँ आरक्षण प्राप्त उम्मीदवार को केवल 40 -45 % अंक लेने पर दाखिला मिल जाता है’, हार्दिक पटेल का यह बयान काफी मायने रखता है कि “या तो देश भर में आरक्षण पूरी तरह से ख़त्म करके सबको बराबर कर दो या फिर हमें आरक्षण दो.” कुलमिलाकर देश में आरक्षण व्यवस्था के प्रति उपजी उनकी और उनके समाज की नाराजगी सबके सामने है क्योंकि उन्होंने जान लिया है कि आरक्षण आज के समय में सिर्फ एक राजनैतिक हथियार है जिसे जन बल के दबाव में आसानी से लिया जा सकता है.

 

पिच्च्ले दिनों ही जाट आरक्षण रद्द करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि जाति को पिछड़ेपन का एकमात्र आधार मानना गलत है. पिछड़ेपन की पहचान सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक आधार पर हो सकती है. कोर्ट ने कहा कि ओबीसी वर्ग में नई-नई जातियों को लगातार शामिल किया जा रहा है, लेकिन अब तक किसी को भी इसमें से बाहर नहीं निकाला गया है. अब आरक्षण राजनैतिक नफे नुकसान के आधार पर दिया जाने लगा है. राजनैतिक पार्टियों अब आरक्षण को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करने लगी है. लेकिन अब समय आ गया जब देश में हर तरह के आरक्षण की समीक्षा हो क्योंकि सच्चाई यह है कि जो वास्तविक रूप से जरूरतमंद है, उन तक आरक्षण का लाभ नहीं पहुंच पा रहा है. आज देश में उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय, महाराष्ट्रियन, पंजाबी, तमिल की पहचान भारतीयता की पहचान पर हावी हो गई है. देश के हर हिस्से ,हर वर्ग में अलग अलग कारणों से आरक्षण की मांग उठ रही है. जबकि आजादी के बाद आरक्षण की व्यवस्था सिर्फ 10 साल के लिए की गयी थी जिसे बाद में समय समय पर सिर्फ राजनैतिक कारणों से आगे बढ़ाया गया. आरक्षण की समीक्षा करना किसी भी सरकार ने जरूरी नहीं समझा क्योंकि उन्हें हमेशा एक जाति और एक वर्ग के वोट खोने का डर बना रहा. हमारे संविधान का अनुच्छेद-16 सभी को समान अधिकार देता है. संविधान के निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाले डॉ. भीमराव अंबेडकर भी सदा के लिए आरक्षण जारी रखने के पक्ष में नहीं थे. अगस्त, 1949 में अनुसूचित जाति के लिए 10 साल तक आरक्षण जारी रखने के विधेयक का समर्थन करते अम्बेडकर सहित सभी वक्ताओं ने बहुत सावधान हो कर कहा है कि इस व्यवस्था को 10 साल बाद खत्म हो जाना चाहिए. न केवल तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू बल्कि डॉ. अंबेडकर समेत दलित हितों की राजनीति करने वाले अन्य नेताओं ने भी उनके (अंबेडकर) जीवन के अंतिम काल के कुछ ही पहले कहा था कि आरक्षण को 1960-61 के बाद तक जारी नहीं रखना चाहिए. उनका विश्वास था कि ‘आरक्षण की नीति कुछेक अपवादों को छोड़ कर पिछड़ापन, अकुशलता और आत्मविास के अभाव को बढ़ावा देगी.’

 

गांधी जी ने अपनी किताब ‘मेरे सपनों का भारत’ में लिखा है, ‘सरकारी महकमों में जहां तक कोटे की बात है, अगर हमने उसमें सांप्रदायिक भावना का समावेश किया तो यह एक अच्छी सरकार के लिए घातक होगा. मैं समझता हूं कि सक्षम प्रशासन के लिए, उसे आवश्यक रूप से हमेशा योग्य हाथों में होना चाहिए. निश्चित ही वहां भेदभाव की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए.’ ‘पदों का वितरण हरेक समुदाय के सदस्यों के अनुपात में नहीं होना चाहिए. जो सरकारी सेवाओं में जवाबदेही के पदों को पाने की लालसा रखते हैं, वे इसके लिए जरूरी परीक्षा पास करने पर ही उन पर काबिज हो सकते हैं.’

 

पंडित नेहरू ने 27 जून 1961 को मुख्यमंत्रियों को लिखे एक पत्र में कहा था, ‘ऊपर मैंने सक्षमता का उल्लेख किया है और लीक पीटने की हमारी परंपरा से बाहर आने का जिक्र किया है. हमें आरक्षण की पुरानी आदत और इस जाति या उस समूह को दी गई खास तरह की रियायतों से बाहर आने की आवश्यकता है. यह सच है कि अनुसूचित जाति/जनजाति को मदद करने के प्रसंग में हम कुछ नियम-कायदों और बाध्यताओं से बंधे हैं. वह मदद के पात्र हैं लेकिन इसके बावजूद मैं किसी भी तरह के कोटे के खिलाफ हूं, खासकर सरकारी सेवाओं में. मैं किसी भी तरह की अक्षमता और दोयम दज्रेपन के सर्वथा विरुद्ध हूं. मैं चाहता हूं कि मेरा देश हरेक क्षेत्र में अव्वल देश बने. जिस घड़ी हम दोयम दर्जे को बढ़ावा देगें, हम मोर्चा हार जाएंगे.’ इसके बावजूद भी आरक्षण आजादी के 68 साल बाद आज भी जारी है. किसी सरकार ने इसकी समीक्षा करना जरूरी नहीं समझा. देश की सामाजिक संरचना बिगड़ती रही लेकिन हर सरकार अपने राजनीतिक फायदे के लिए इसका दुरुपयोग करती रही. आरक्षण की यह व्यवस्था शुरू में सिर्फ 10 वर्षों की अवधि तक के लिए ही थी मगर बाद में यह लगातार जारी रही और वोटों की लोभी किसी भी पार्टी के लिए यह संभव नहीं है कि वे इसे अनादि काल तक जारी रखने का विरोध कर सकें. जनता दल के शासनकाल में मंडल आयोग का गठन किया गया जिसने पिछड़ी जातियों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की सिफारिश कर दी. इसके बाद भी आरक्षण का यह सिलसिला खत्म नहीं हो रहा बल्कि दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है। कुछ राज्यों में तो कुल आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से भी ज्यादा तक पहुँच गयी है। जातियों के बाद अब सरकारें धर्म के नाम पर भी आरक्षण देनें का खतरनाक खेल खेल रहीं है.  पिछली यूपीए सरकार ने मुसलमानों के वोट बटोरने के लिए रंगनाथ मिश्र आयोग का गठन किया जिसने यह सिफारिश की कि अल्पसंख्यकों को सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में कम-से-कम 15 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए और इसमें से कम-से-कम दस प्रतिशत मुसलमानों के लिए होना चाहिए. कुलमिलाकर देश में आरक्षण एक विशुद्ध राजनैतिक हथियार बन गया है जिससे कि किसी जाति ,वर्ग या धर्म के एकमुश्त वोट हथियाएं जा सकें.

 

लेकिन अब समय आ गया है कि हर तरह के आरक्षण की समीक्षा हो. इस पर एक प्रश्न उठना लाजिमी है कि आरक्षण !! लेकिन कब तक? आखिर कोई तो समय सीमा होनी चाहिए.

 

निश्चित रूप से किसी भी व्यक्ति के लिए आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता कड़ी मेहनत है. जाति, लालच और सिफारिश, आरक्षण या धर्म की आड़ लेकर यह नहीं हो सकता. आरक्षण का झुनझुना देश के विकास की गति को भी रोकेगा और देश की सामाजिक एकता को भी नुकसान पहुंचायेगा. आरक्षण की वजह से विभिन्न जाति और वर्गों के बीच वैमनस्यता भी पैदा होगी. सच्चाई यह है कि जाति को पिछड़ेपन का एकमात्र आधार माना ही नहीं जा सकता. कुलमिलाकर देश में हर जाति और समुदाय के गरीबों को समुचित शिक्षा, स्वास्थ्य और संसाधन उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है लेकिन आखिर में आगे बढ़ने के लिए योग्यता ही एकमात्र पैमाना होना चाहिए. देश के कई हिस्सों में हो रहे आरक्षण के आन्दोलन साफ़ संकेत दे रहें है कि आगे आने वाले समय में अगर आरक्षण की समीक्षा ठीक ढंग से नहीं की गई तो यह समस्या बहुत विकराल रूप धारण कर सकती है. इस देश की एकता को सिर्फ “आरक्षण की व्यवस्था ही चोट पहुंचा सकती है या यह कह सकते है कि चोट पहुंचा रही है.

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