1984 का दंगा : रोंगटे खड़े कर देने वाला सच

By: | Last Updated: Friday, 31 October 2014 2:22 PM
riots after indira death

नई दिल्ली: 31 अक्टूबर 1984 को देश की राजधानी दिल्ली में अफरातफरी मची थी क्योंकि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से हर कोई स्तब्ध था. ऐसे नाजुक माहौल में इंदिरा के बेटे राजीव ने देश की कमान संभाली.

 

जिस वक्त राजीव गांधी देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों की शपथ ले रहे थे. उसी वक्त दिल्ली की सड़कों पर एक अजीब सा शोर उठने लगा. एक ऐसा शोर, जिससे इंदिरा की मौत के बाद पसरा सन्नाटा टूटने लगा. 

 

“खून का बदला खून”, “सरदार गद्दार हैं”. कुछ ऐसे नारों के साथ शुरू हुआ हिंसा का वह तांडव जिसे कभी कोई याद नहीं करना चाहेगा. लेकिन जिन्होंने उसे झेला है. वे चाहकर भी उसे कभी भुला नहीं पायेंगे.

 

एम्स के अंदर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का पार्थिव शरीर था और बाहर हजारों की भीड़ इकट्ठा थी. उस भीड़ में हिंदू भी थे, मुसलमान भी और सिख भी. लेकिन फिर अचानक कुछ ऐसा हुआ कि भीड़ में शामिल सिख वहां से हटने लगे.

 

इंदिरा गांधी की हत्या करने वाले दोनो बॉडीगार्ड सिख थे. इसी बात पर दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में सिखों को निशाना बनाया जाने लगा. राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह भी इसका शिकार बने. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या की खबर मिलते ही राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह अपना यमन दौरा बीच में ही छोड़कर देश लौटे थे. वह एयरपोर्ट से सीधे एम्स जा रहे थे. शाम के करीब पौने पांच बजे एम्स से लगभग एक किलोमीटर पहले करीब 20 लोगों का गुट हाथ में मशाल और लोहे की छड़ लिए हुए सिख विरोधी नारे लगा रहा था. तभी उधर से ज्ञानी जैल सिंह का काफिला गुजरा. भीड़ में से कुछ लोगों ने राष्ट्रपति के काफिले पर हमला कर दिया. इस हमले में काफिले की आखिरी कार के शीशे टूट गये.  

 

तरलोचन सिंह उस दिन उसी कार में मौजूद थे. तब वह राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के प्रेस सेक्रेटरी हुआ करते थे. तरलोचन सिंह बताते हैं कि कुछ लड़के शाउटिंग कर रहे थे उन्होंने मेरी कार पर हमला किया मैं किसी तरह बच कर राष्ट्रपति भवन गया. दूसरा हमला फिर राष्ट्रपति के एम्स से निकलने के बाद हुआ.

 

राष्ट्रपति के एम्स से निकलने के बाद हिंसा की वारदातें एम्स के आसपास के इलाकों में फैलने लगी. पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज दिल्ली की पहली घटना अरबिन्दो मार्ग पर हुई जहां एक सिख की मोटरसाइकिल जला दी गयी थी. लेकिन इस तरह की कई वारदातें एक साथ कई जगहों पर हो रही थीं. कहीं सिखों को पीटा जा रहा था तो कहीं उनकी गाड़ियां जलाई जा रही थीं. कहीं उनके घरों और दुकानों में लूटपाट हो रही थी.

इस बीच राष्ट्रपति भवन में शपथ ग्रहण समारोह खत्म हो चुका था. दिल्ली में हालात ऐसे हो गये थे कि ज्ञानी जैल सिंह के पास मदद के लिए लोगों के फोन आने लगे. तब जैल सिंह ने प्रधानमंत्री राजीव गांधी को फोन किया. राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने कहा था कि राजीव जी दिल्ली में हालात बहुत खराब  हैं. मेरी यह सलाह है कि  बिना किसी देरी के आर्मी को बुला लेना चाहिए.

 

राजीव गांधी ने कहा था कि मेरी हालात पर नजर है. अगर पुलिस फोर्स हालात को काबू में नहीं कर पाती है तो आर्मी को मदद के लिये बुलाया जाए. तरलोचन सिंह बताते हैं कि राष्ट्रपति कुछ कर नहीं पा रहे थे.

 

महीप सिंह ने बताया कि ज्ञानी जैल सिंह एक तरह से बेबस जैसा महसूस करने लगे थे. राष्ट्रपति हमारे यहां तीनों सेनाओं का प्रमुख होता है वह चाहे तो आज्ञा दे सकता है मगर स्थिति ऐसी हो गयी थी की जैल सिंह वैसा नहीं कर सके और अपनी आंखों के सामने वह सब होते देखते रहे.

 

राष्ट्रपति बेबस थे लेकिन उनसे भी ज्यादा बेबस थे वे सिख जो दिल्ली और देश के दूसरे कई हिस्सों में हिंसा का शिकार बन रहे थे. अब तक ये हिंसा सिर्फ मारपीट, लूटपाट और आगजनी तक ही सीमित थी. दंगा पीड़ितों के वकील एच एस फुल्का बताते हैं कि असली जो कत्ले आम शुरू हुआ पहली नवंबर को सुबह शुरू हुआ. जैसे किसी ने स्विच ऑन कर दिया हो इस तरह से एकदम से सारी दिल्ली में. सबके हाथों में रॉड सारी दिल्ली में एक पाउडर जिसको जहां फेंको वहां आग लग जाती थी. उसे केवल एक्सपर्ट यूज कर सकते थे. सबसे पहले गुरूद्वारे को आग लगाई फिर घरों को . सारी दिल्ली में पुलिस ने पहले जाकर सिखों के हथियार छीने कहा हम आपको बचाएंगे. आप अपने अपने एरिये मे जाओ. जिस-जिस एरिया में उन्होंने अपने हथियार पुलिस को दे दिए वहां सिखों को मार दिया.

 

31 अक्टूबर को एक प्रधानमंत्री की हत्या हुई लेकिन 1 नवंबर से जो हुआ वह लोकतंत्र की हत्या थी. दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, बोकारो, इंदौर और मुरैना जैसे कई दूसरे शहरों में सिखों की हत्याएं शुरू हो गयीं. अगले तीन दिन में देशभर में हजारों सिख मारे गये. लेकिन सबसे ज्यादा बुरी हालत थी दिल्ली में. बावजूद इसके कि देश की सरकार अपनी पूरी प्रशासनिक व्यवस्था के साथ दिल्ली में बैठी थी, अकेले दिल्ली में करीब तीन हजार सिखों की हत्या हुयी.

 

पत्रकार जरनैल सिंह ने बताया कि रात को मीटिंग्स हुईं. रामपाल सरोज जैसे नेताओं के घर मीटिंग्स हुईं. एचकेएल भगत के यहां मीटिंग हुयी उसके बाद सफेद पाउडर उपल्ब्ध कराया गया. कांग्रेस के लीडर्स ने वोटर लिस्ट दिलाई.

 

पत्रकार तवलीन सिंह ने बताया कि ये एक सोची समझी साजिश थी सिखो को सबक सिखाने की.जिसके पीछे सरकार थी. हिंदुस्तान के इतिहास में इससे पहले कभी भी किसी सरकार या किसी राजनीतिक दल पर इतने गंभीर आरोप नहीं लगे थे. यह आरोप लगाने वाले कोई एक दो लोग नहीं बल्कि सैकड़ों लोग थे. कितने ही लोगों ने कांग्रेस के छोटे-बड़े नेताओं के उस हिंसक भीड़ में शामिल होने का दावा किया. 

 

एच के एल भगत, सज्जन कुमार, जगदीश टाइटलर, धर्मदास शास्त्री, यह कुछ ऐसे नाम हैं जिनके खिलाफ कितने ही लोग गवाही दे चुके हैं. कुछ अपने बयानों से पलटे भी. नतीजा यह हुआ कि कानून की नजर में अब तक इनमें से किसी पर भी दोष साबित नहीं हुआ है. यही वजह है कि हजारों सिख परिवारों के लिए 30 साला पुराना वह जख्म आज भी उतना ही ताजा है.

 

पूर्वी दिल्ली में कल्याणपुरी, शाहदरा. पश्चिमी दिल्ली में सुल्तानपुरी, मंगोलपुरी, नांगलोई. दक्षिणी दिल्ली में पालम कॉलोनी और उत्तरी दिल्ली में सब्जी मंडी और कश्मीरी गेट जैसे कुछ ऐसे इलाके हैं जहां सिखों के पूरे-पूरे परिवार खत्म कर दिए गये.   

 

राहुल बेदी उन तीन पत्रकारों में से एक हैं जिन्होने सबसे पहले त्रिलोकपुरी में हुई हैवानियत को अपनी आंखों से देखा. राहुल बेदी बताते हैं कि हम थाने पहुंचे वहां एक ट्रक पर लाशें पड़ी थीं. एक लड़का जिंदा था उसने हमें बताया कि वहां सबको मार दिया गया.

 

कल्याणपुरी थाने के अंतर्गत आने वाले त्रिलोकपुरी में ज्यादातर गरीब सिख परिवार रहा करते थे. नानावटी कमीशन में दिये गये हलफनामों के मुताबिक त्रिलोकपुरी में हिंसा की शुरूआत 1 नवंबर की सुबह 10 बजे के करीब हुई. करीब 300 से 400 लोगों की भीड़ पहले ब्लॉक नंबर 36 के गुरूद्वारे के पास इकट्ठा हुई. कुछ ही मिनटों में गुरुद्वारे को आग लगा दी गयी.

 

साधु सिंह नाम के व्यक्ति ने नानावटी कमीशन को दिए बयान में कहा कि उस भीड़ में स्थानीय कांग्रेस नेताओं के साथ पुलिस वाले भी मौजूद थे. गुरुद्वारे को जलाने के बाद यह भीड़ ब्लॉक 32 की तरफ बढ़ी. यहां के सिख परिवारों ने उनके पास मौजूद कृपाण और कुछ छोटे हथियारों की मदद से इकट्ठा होकर भीड़ का मुकाबला करने की कोशिश की लेकिन पुलिस ने खुद सुरक्षा देने का भरोसा दिलाकर सिखों के सारे हथियार ले लिए और उन्हें अपने अपने घर लौट जाने के लिए कहा. 

 

पत्रकार राहुल बेदी बताते हैं कि 72 घंटो में कत्लेआम हुआ. हथियार ले लिए गये थे. त्रिलोकपुरी में 190 घरों में आग लगा दी गयी. 6 पुरूषों को छोड़कर सारे सिख पुरूषों को मार दिया गया. और मारने के बाद केरोसीन डालकर उन्हें जला दिया गया. 

 

 

तब त्रिलोकपुरी में रहने वाली तीरथ कौर ने अपनी आंखों से अपने परिवार के 7 लोगों को मरते देखा. तीरथ के मुताबिक जब वह बच्चों के साथ वहां से भागने लगीं तो दंगाइयों की नजर उनके बच्चों पर पड़ गयी. मैने कहा मेरे बच्चे को मत मारो मै उनके ऊपर लेट गयी वह मारते रहे. तीन दिन तक बच्चे के मुंह से खून आता रहा.

 

नवंबर की दोपहर तक त्रिलोकपुरी में तीरथ कौर की तरह करीब 300 से ज्यादा महिलाएं विधवा हो चुकी थीं. यही नहीं भीड़ में शामिल लोगों पर महिलाओं से बलात्कार के भी आरोप लगे. आहुजा कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक पूर्वी दिल्ली में 1234 सिख मारे गये थे जिसमें से 610 कत्ल सिर्फ कल्याणपुरी में हुये. वहीं पश्चिमी दिल्ली के सुल्तानपुरी और मंगोलपुरी जैसे इलाकों में भी सिखों की सामुहिक हत्याएं हुयीं.

 

 

3 दिन और करीब 450 कत्ल. सुल्तानपुरी ब्लॉक A-4 में 1 नवंबर की दोपहर को हमला शुरू हुआ और 2 नवंबर की सुबह 9 बजे तक लगातार दंगाई सिखों को मारने और उनके घरों को जलाने में लगे रहे. लगभग पूरा का पूरा ब्लॉक तबाह कर दिया गया. लेकिन इसी ब्लॉक के मकान नंबर 165 में रहने वाली पद्मी कौर के घर जो हुआ वह और भी ज्यादा शर्मनाक था.

 

वकील एच एस फुल्का बताते हैं कि एक लड़की की 2 नवंबर को शादी थी. सारे रिश्तेदार उसके घर पर थे. पहली नवंबर को भीड़ ने हमला किया. रंगनाथ मिश्रा कमीशन को दिए बयान में पद्मी कौर ने कहा कि उन्होंने मेरी बेटी को पकड़ा और उसके कपड़े फाड़ने लगे. मेरे पति ने हाथ जोड़कर उनसे कहा कि उसे छोड़ दें. उन्होंने मेरे पति को मारने की धमकी दी. फिर मेरी बेटी के हाथ पैर तोड़े और उसे उठा ले गये. इसके बाद भीड़ ने मेरे पति और घर में मौजूद दूसरे लोगों को मारना शुरू कर दिया.   

 

वकील एच एस फुल्का ने बताया कि 9 लोगों को मार दिया और लड़की को उठा ले गये. 3 दिन बाद लड़की आयी तो पागल जैसी हो गयी थी. अक्सर यह सफाई दी जाती रही है कि 1984 में जो हुआ वह इंदिरा गांधी की हत्या की प्रतिक्रिया थी, लोगों का गुस्सा था. लेकिन क्या सुल्तानपुरी की पद्मी कौर की बेटी के साथ जो हुआ या फिर त्रिलोकपुरी की विधवाओं के साथ जो किया गया, वह कुछ ऐसे लोगों का गुस्सा था जो अपने नेता की हत्या से दुखी हों या फिर कुछ दंगाइयों की दरिंदगी ?  

 

तरलोचन सिंह बताते हैं कि दिल्ली के लोगों ने सिखों को बचाया यह जो गुंडे थे यह बाहर से लाये गये. मंगोलपुरी में शायद कोई गुरूद्वारा ऐसा नहीं बचा था जिस पर हमला न किया गया हो, जिसे जलाया न गया हो. अचानक कहीं से एक भीड़ आती थी, गुरुद्दारे में लूटपाट करती थी और फिर आग लगा देती थी. सवाल ये भी था कि आखिर यह भीड़ आ कहां से आ रही थी. ऐसा कैसे हो रहा था कि पूरी दिल्ली में अलग-अलग जगहों पर एक ही तरीके से, एक ही पैटर्न पर सिखों को निशाना बनाया जा रहा था. एक सफेद पाउडर, जलता हुआ टायर, केरोसीन और मिट्टी का तेल और कुछ सौ लोगों की भीड़ . आखिर कहां से आ रहा था यह सब?

 

पत्रकार जरनैल सिंह बताते हैं कि बाकायदा रोहतक से ट्रेन लगाई गयी. कातिलों को जेल से छोड़ा गया. हरियाणा रोडवेज और डीटीसी की बसें लगाई गयीं ड्राइवरों को ड्यूटी लगाई गयी. तेल के डिपों के मालिकों से कहा गया कि आपको मिट्टी का तेल प्रोवाइड कराना है. पुलिस को कहा गया कि आपको जहां अगर विरोध हो वहां जाना है वरना आपको एफआईआर दर्ज नहीं करनी है.

 

उस वक्त नांगलोई की जे जे कॉलोनी में रहने वाली बिशन कौर ने अपने हलफनामे में लिखा है कि हमले की घटनाओं के बाद गुरूद्वारे के ग्रंथी साहब ने लाउडस्पीकर पर सिखों को गुरूद्वारे में इकट्ठा होने के लिए कहा. इसके बाद लगभग सभी सिख गुरूद्वारे में इकट्ठा हो गये. भीड़ ने उस गुरूद्वारे पर हमला कर दिया. लेकिन सिखों ने भीड़ को गुरूद्वारे में घुसने नहीं दिया. उसी दिन करीब 12 बजे रोहतक की तरफ से एक ट्रेन आयी जिसमें से सैकड़ों लोग उतरे. उनके हाथ में लोहे की रॉड थी और साथ में एक सफेद केमिकल. इन लोगों ने सिखों के घरों पर वह सफेद केमिकल फेंककर आग लगाना शुरू कर दिया. इस तरह बिशन कौर के पति समेत नांगलोई में कुल 122 सिख मारे गये.

 

पत्रकार महीप सिंह बताते हैं कि तीन से चार दिन तो अबाध रूप से हत्यायें होती रहीं. सेना नहीं बुलाई गयी. पुलिस दंगाइयों के साथ जुड़ गयी. सिखों के घर जलाये जा रहे थे और पुलिस का रोल ये था कि पुलिस कहती थी कि जो करना है जल्दी कर लो क्योंकि ज्यादा समय नहीं है.

 

उन तीन दिनों में दिल्ली में जो हुआ उससे पुलिस की भूमिका पर सबसे ज्यादा सवाल उठे. जितनी भी वारदातें हुईं चाहे वह टैक्सी और ट्रक जलाने की घटनाएं हो या फिर घरों और गुरूद्वारों को जलाने के मामले. पुलिस हर जगह मौजूद थी लेकिन सिर्फ मूक दर्शक की तरह. बल्कि ज्यादातर मामलों में तो पुलिस पर दंगाइयों के साथ शामिल होने के आरोप लगे.

 

पत्रकार जरनैल सिंह ने कहा कि पुलिस यहां आश्रम में लोगों को भड़का रही थी कि सिखों ने हिंदुओं की ट्रेन काटकर पंजाब से भेजी है. उन्होंने जहर मिला दिया है पानी में. इस तरह की अफवाहें फैलाइ जा रही थीं.

 

निरप्रीत कौर तब 16 साल की थीं. दिल्ली के वेंकटेश्वर कॉलेज में बीएससी की पढ़ाई करने वाली निरप्रीत 1984 में पालम के राजनगर में अपने परिवार के साथ रहा करती थीं. लेकिन 2 नवंबर 1984 को जो हुआ उससे निरप्रीत का भरोसा ऐसा टूटा कि वह उग्रवादियों के साथ जुड़ने को मजबूर हो गयीं. निरप्रीत के गुस्से की वजह भी दंगाइयों से ज्यादा वह पुलिस है जिसने उनके पिता के साथ धोखा किया. 

 

निरप्रीत कौर बताती हैं कि पुलिस के कहने पर मेरे फादर साहब गये काम्प्रोमाइज के लिए और पुलिस इंस्पेक्टर कौशिक ने माचिस दी जिससे मेरे पिता को जिंदा जलाया गया. जब मै वापस आयी मेरे पिता जल गये मैं दौड़ के घर के अंदर की तरफ आयी हूं और मैने देखा कि मेरी मां बेहोश पड़ी है और हमारे घर में पुलिस खड़ी है. और हमारे घर को आग लगी हुई है. ये है पुलिस का रोल.

निरप्रीत जिस राजनगर में रहती थीं वहां सिखों के 250-300 परिवार थे. जब सिखों पर हमले शुरू हुए तो इनमें से ज्यादातर लोग निरप्रीत के घर पर इकट्ठा हो गये. यह लोग डटकर दंगाइयों का मुकाबला करने लगे. इसी वजह से भीड़ ने पुलिस की मदद से निरप्रीत के पिता निर्मल सिंह को निशाना बनाया.

 

निरप्रीत कौर बताती हैं कि मैने अपनी आंखों के सामने अपने पिता को जिंदा जलते देखा. तीन बार मेरे पिता ने बचने की कोशिश की. नाले में गिरे हैं और उन्होंने फिर बाद में लाठियां मारी हैं. सरिये से मारा है. चार घंटे हमने हिफाजत खुद की है. चार घंटे बाद इन्होंने धोखे से मेरे पिता को भीड़ के सामने कर दिया.

 

निरप्रीत कौर ने पूर्व सांसद और कांग्रेस नेता सज्जन कुमार के खिलाफ कोर्ट में गवाही दी. सज्जन कुमार समेत 6 लोगों पर दिल्ली कैंट में 5 सिखों की हत्या का मामला दर्ज हुआ. लेकिन ट्रायल कोर्ट ने बाकी 5 को दोषी मानते हुए सज्जन कुमार को इसमें बरी कर दिया.  

 

राजनगर, सागरपुर, महावीर एनक्लेव और द्वारकापुरी – दिल्ली कैंट के वो इलाके हैं जहां सिख विरोधी हिंसा में सबसे ज्यादा मौते हुईं. हिंसा के शिकार लोग जब पुलिस से मदद मांगने गये तो पुलिस ने उनकी शिकायत दर्ज करने से इंकार कर दिया. आहूजा कमेटी के मुताबिक दिल्ली कैंट में 341 सिखों की हत्या हुईं लेकिन यहां सिर्फ 5 एफआईआर दर्ज हुयीं.

 

वकील एच एस फुल्का बताते हैं कि दिल्ली कैंट के केस में जगदीश कौर ने बयान दिया कि उसके पति और बेटे को मार दिया. दो दिन तक लाशें पड़ी रहीं फिर उसने घर की चारपाइयों की लकड़ी से उनका अंतिम संस्कार किया.

 

क्या पुलिस हिंसा के शिकार लोगों की मदद इसलिए नहीं कर रही थी क्योंकि उन पर ऊपर से दबाव था. सब्जी मंडी पुलिस स्टेशन की कहानी यही साबित करती है. 31 अक्टूबर 1984 को एसएचओ गुरमेल सिंह थे. वह खुद सिख थे. यही नहीं उस दिन सब्जी मंडी सब डिवीजन के एसीपी भी एक सिख थे जिनका नाम केवल सिंह था. 31 अक्टूबर को जब हिंसा की घटनाएं शुरू ही हुयी थीं तब पूरी दिल्ली में यह पहला थाना था जहां दंगाइयों के खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज हुई. लेकिन उसके कुछ घंटो के अंदर ही दोनों पुलिसवालों को यहां से हटा दिया गया. 1990 में कुसुम लता मित्तल ने अपनी जांच रिपोर्ट में साफ कहा कि उन दोनों पुलिसवालों को सिर्फ इसलिए हटाया गया क्योंकि वह स्थिति को संभालने की कोशिश कर रहे थे. 1 नवंबर से यहां भी वही हुआ जो बाकी दिल्ली में हो रहा था.

 

उन तीन दिनों में सिखों के परिवार के परिवार खत्म किए जा रहे थे और उन हिंदुओं को भी निशाना बनाया जा रहा था जो सिख परिवारों की मदद कर रहे थे. वकील एच एच फुल्का बताते हैं कि दिल्ली में एक भी जगह ऐसी नहीं थी जहां सिख सेफ हो छुपने के लिए भी नहीं थी. साउथ एक्स में मेरे घर पर हमला हुआ. लैंडलॉर्ड एम्स ले गये वहां सेफ नहीं लगा तो एय़रफोर्स के मेरे दोस्त ने साकेत में दो दिन तक मुझे छुपा कर रखा.  ये हालत थी सारी दिल्ली की एक भी जगह सेफ नहीं थी.

 

दिल्ली का दिल कहे जाने वाले कनॉट प्लेस में भी सिर्फ आग और धुंए का गुबार दिख रहा था. अपनी तस्वीरों के जरिए 1984 का सच सामने लाने वाले फोटोग्राफर अशोक वाही कहते हैं कि उन्होंने जो कुछ देखा वह मंजर रोंगटे खड़े कर देने वाला था. 

 

संसद से कुछ ही दूरी पर स्थित गुरूद्वारा रकाबगंज साहब भी भीड़ के निशाने पर आया. नानावटी आयोग को दिए गये हलफनामों के मुताबिक यहां 4 से 5 घंटों तक कुछ हजार लोगों की भीड़ हंगामा करती रही. हलफनामों के मुताबिक कांग्रेसी नेता कमलनाथ को भी इस भीड़ में काफी देर तक मौजूद देखा गया. 

 

पत्रकार जरनैल सिंह बताते हैं कि गुरूद्वारा रकाबगंज साहब पर भी हमला किया गया. वहां बाहर कमलनाथ वसंत साठे पुलिस कमिश्नर सुभाष टंडन वहां खड़े थे गुरूद्वारा साहब पर गोलियां चलाई गयीं. ये नानावटी कमीशन की रिपोर्ट है. मुख्यतियार सिह का हलफनामा है उसमें उन्होंने बताया है कि किस तरह से दो सिखों को जला दिया गया.

उन तीन दिनों में अगर गरीब सिख बस्तियों को पूरी तरह तबाह किया गया तो तथाकथित वीआईपी इलाके भी बहुत सुरक्षित नहीं थे. मशहूर लेखक खुशवंत सिंह ने अपनी आंखों से खान मार्केट में दंगाइयों को पुलिस की मौजूदगी में आगजनी और लूटपाट करते देखा. इसके बाद उन्होंने अगली दो रातें स्वीडश एम्बैसी में रहकर गुजारी. 

 

खास हो या आम. 84 के उन तीन दिनों में शायद ही ऐसा कोई सिख परिवार हो जो किसी न किसी तरह से उस हिंसा का शिकार न बना हो. एयरफोर्स के ग्रुप कैप्टन मनमोहन बीर सिंह तलवार को 1971 में पाकिस्तानी हवाई हमले को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए महावीर चक्र से सम्मानित किया गया. लेकिन शर्म है कि दंगाइयों ने देश का गौरव बढ़ाने वाले उस वीर को भी निशाना बनाने की कोशिश की क्योंकि वह सिख थे. 84 में कैप्टन तलवार अपने परिवार के साथ पटेल नगर में रहते थे. 

 

वकील एच एस फुल्का बताते हैं कि पटेल नगर में ग्रुप कैप्टन मोहन वीर सिंह तलवार के घर पर अटैक हुआ. पुलिस को फोन किया पुलिस नहीं आयी. जब घर को आग लगा दी तब उन्होंने फायरिंग की भीड़ हटाने के लिए. मगर जब पुलिस शाम को पहुंची, आर्मी पहुंची तब उन्होंने तलवार के घर पर अटैक किया और उसे अरेस्ट किया. भीड़ में से एक आदमी नहीं पकड़ा. जब एसएचओ से मैंने पूछा तो उसने कहा भीड़ बहुत ज्यादा थी हम कम थे. 15 दिन वो जेल में रहा.

 

1984 के वो तीन दिन दिल्ली के ज्यादातर सिख परिवारों पर कहर बनकर टूटे. हिंसक भीड़ उन्हें मारने पर आमादा थी और पुलिस उस भीड़ की मदद कर रही थी. लेकिन 3 नवंबर को इंदिरा गांधी के अंतिम संस्कार के साथ ही यह हिंसा थम गयी.

 

फुल्का बताते हैं कि आर्मी इफ्केटिव हुई. 3 नवंबर को तब एकदम वायलेंस खत्म हो गयी. पहली नवंबर को शुरू हुई जैसे किसी ने स्विच औन किया हो तीन नवंबर को एकदम खत्म हुई जैसे किसी ने स्विच बंद कर दिया हो. आमतौर पर कहा जाता है कि 72 घंटे इन्होंने दिये थे सिखों को सबक सिखाने के लिए और जब वह पूरे हुए तो उन्होने स्विच बंद कर दिया.

 

सिख विरोधी हिंसा में पुलिस की भूमिका की जांच के लिए कपूर मित्तल कमेटी बनाई गयी. 1990 में इस कमेटी ने 6 आईपीएस अफसरों समेत 72 पुलिसवालों पर कार्रवाई की सिफारिश की. लेकिन इनमें से कुछ एक मामलों को छोड़कर ज्यादातर पुलिसवालों को प्रमोशन मिलता रहा और कुछ सम्मान के साथ रिटायर हो गये.   

 

पुलिस के रवैये की वजह से हजारों बेगुनाह मारे गये और गुनहगार बच गये. न दोषी पुलिसवाले पकड़े गये, न उन नेताओं को सजा मिली जिनके इशारे पर सब हुआ. न वो लोग जिन्होंने खुद हत्याओं को अंजाम दिया. 2733 सिखों की हत्या के मामले में अब तक सिर्फ 49 लोगों को उम्र कैद की सजा हुयी है. ज्यादातर केस सबूतों के अभाव में बंद कर दिये गये. इस सब की वजह है कि उन तीन दिनों में दिल्ली के 76 पुलिस थानों में से ज्यादातर में कोई एफआईआर ही नहीं दर्ज की गयी.

 

पत्रकार जरनैल सिंह बताते हैं कि अगर एफआईआर दर्ज करनी भी पड़ी तो यह किया कि भीड़ ने 300 लोगों का यहां कत्ल किया दो लाइन की एफआईआर में. कौन लीड कर रहा था किसने मारा कोई तफ्तीश ही नहीं है. क्या इस दो लाइन की एफआईआर में केस कभी प्रूव हो सकता है.

 

उन तीन दिनों में जो हुआ उसने राजीव गांधी सरकार को शुरु में ही कटघरे मे खड़ा कर दिया. लेकिन हिंसा थमने के कुछ दिनों बाद राजीव गांधी ने दिल्ली के बोट क्लब में जो बयान दिया वह और ज्यादा चौंकाने वाला था. राजीव गांधी ने कहा कि जब कोई बहुत बड़ा और भारी भरकम पेड़ गिरता है तो आसपास की धरती हिलती तो है ही.

 

3 कमीशन और 7 कमेटियों ने 1984 की सिख विरोधी हिंसा की जांच की. सबने माना जो हुआ बहुत गलत हुआ. इसी साल सिख विरोधी हिंसा की जांच के लिए SIT के गठन की घोषणा भी की गई लेकिन इतने सब के बावजूद हिंसा के शिकार आज भी इंसाफ का इंतजार कर रहे हैं.