महज़ डेढ़ दशक में गंदे नाले से ख़ूबसूरत नदी बनी साबरमती

By: | Last Updated: Sunday, 21 June 2015 7:22 AM
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अहमदाबाद/नई दिल्ली: क्या थेम्स जैसी कोई नदी भारत में संभव है, जो उतनी ही साफ हो और उसके किनारे भी उतने ही खूबसूरत हों. इसका जवाब हां में है, क्योंकि एक नदी ऐसी है, जो लंदन की तरह ही एक प्रमुख भारतीय शहर के बीच से गुजरती है और जिसे काफी खूबसूरत स्वरुप दिया गया है.

जी हां, ये नदी है साबरमती और शहर है अहमदाबाद. अहमदाबाद इसी नदी के दोनों किनारों पर बसा हुआ है. यहां तक कि महात्मा गांधी भी जब दक्षिण अफ्रीका से लौटे तो उन्होंने अपना आश्रम इसी नदी के किनारे बसाया, जो अब पूरी दुनिया में साबरमती आश्रम के तौर पर मशहूर है.

 

लेकिन एक दौर ऐसा भी आया जब ये साबरमती नदी महज एक गंदा नाला रह गई और इसके किनारे पूरी तरह झुग्गी-झोपड़ियों में तब्दील हो गये थे. बाद में इस नदी और इसके किनारों को पुनर्जीवित करने की एक परियोजना बनी. जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, उसी दौर में इस परियोजना को गति मिली, किनारे विकसित किये गये और अब ये साबरमती रिवरफ्रंट के तौर पर नरेंद्र मोदी की महत्वपूर्ण उपलब्धियों के तौर पर गिनाया जाता है.

 

यहां तक कि जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने और उनके कार्यकाल के पहले ही वर्ष में यानी पिछले साल सितंबर में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत के दौरे पर आये, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी साबरमती रिवरफ्रंट के सामने वाले गार्डन में उनकी आगवानी की, उनके सम्मान में रात्रि भोज दिया और यही पर दोनों की गूफ्तगू भी हुई. और इस मुलाकात के बहाने ही साबरमती रिवरफ्रंट को पूरी दुनिया ने देखा भी और जाना भी.

 

17 सितंबर 2014, साबरमती रिवरफ्रंट गार्डन के किनारे घुमते चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और उन्हें इस परियोजना की बारीकियां समझाते पीएम नरेंद्र मोदी, दुनिया भर में ये तस्वीरें गईं. टेलीविजन पर लोगों ने देखा कि किस तरह पीएम मोदी एक झूले पर चीन के राष्ट्रपति के साथ गूफ्तगू कर रहे थे या फिर कैसे गुजरात की सांस्कृतिक झांकी मेहमान के स्वागत में पेश की गई. दोनों ही नेताओं ने करीब डेढ घंटे का समय साबरमती रिवरफ्रंट गार्डन में बिताया, जिस दौरान दोनों ही देशों के महत्वपूर्ण अधिकारी भी मौजूद थे.

 

ये पहली ही बार था, जब किसी राष्ट्राध्यक्ष और वो भी चीन के राष्ट्रपति जैसे बड़े शख्स के दौरे की शुरुआत दिल्ली से नहीं हो रही थी, बल्कि हो रही थी अहमदाबाद से. जाहिर है प्रधानमंत्री मोदी शी जिनपिंग के सामने बतौर मुख्यमंत्री अपने कार्यकाल की उपलब्धियों की झांकी दिखाना चाह रहे थे और ऐसे में साबरमती रिवरफ्रंट से बेहतर प्रतीक भला क्या हो सकता था.

 

जिस साबरमती रिवरफ्रंट गार्डन में पीएम मोदी ने शी जिनपिंग के सम्मान में रात्रिभोज दिया, वो अहमदाबाद के लोगों के लिए भी उतना ही प्रिय है. सुबह-सुबह सैकड़ों की तादाद में लोग यहां टहलते नजर आते हैं. क्या युवा, क्या महिलाएं और क्या बुजुर्ग, सभी सैर करने के लिए आते हैं यहां.

 

गार्डन के अलावा साबरमती नदी के किनारे वाकवे भी बने हैं, जिस पर दौड़ते हुए युवा सुबह-शाम नजर आते हैं. लेकिन रिवरफ्रंट का आकर्षण सिर्फ गार्डन या वाकवे ही नहीं है, इसके किनारे घाट से लेकर बोटिंग स्टेशन बने हैं, तो एम्युजमेंट पार्क से लेकर हेरिटेज प्लाजा, एग्हिबिशन सेंटर, क्रीडा संकुल और इवेंट्स ग्राउंड तक. हाल ये है कि रिवरफ्रंट पर ही पुस्तक मेले का आयोजन होता है, तो मकर संक्रांति के मौके पर अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव का. इन तमाम सुविधाओं के अलावा रिवरफ्रंट के बगल में सड़कें भी बनी हैं, जिस पर लोग शहर के हिस्से से दूसरे हिस्से तक आसानी से जा सकते हैं. शहर के पालड़ी इलाके में तो शहरी वन खड़ा किया गया है, यानी बड़ी तादाद में पेड़ पौधों को लगाकर ग्रीन कवर कायम करने की कोशिश. 

 

साबरमती नदी और इसके किनारे आज न सिर्फ अहमदाबाद के लोगों, बल्कि बाहर से आने वाले सैलानियों के लिए भी आकर्षण का बड़ा केंद्र हैं. लेकिन साबरमती नदी और इनके किनारों की तस्वीर अचानक नहीं बदली. इसके बारे मे सबसे पहले सोचा गया 1961 में, तब अहमदाबाद शहर के कुछ गणमान्य लोगों ने ये सोचा कि इस नदी और इसके किनारों को विकसित किया जाए. लेकिन उस सोच को यथार्थ में तब्दील होने में करीब साढ़े तीन दशक लग गये. 1997 में इसे औपचारिक स्वरुप दिया गया, जब साबरमती रिवरफ्रंट डेवलपमेंट कॉरपोरेशन नाम से एक खास कंपनी बनाई गई और इस पर काम शुरु हुआ.

 

साबरमती रिवरफ्रंट डेवलपमेंट कॉरपोरेशन का गठन अहमदाबाद नगर निगम के स्वामित्व वाली कंपनी के तौर पर किया गया और इसकी भूमिका तय की गई रिवरफ्रंट डेवलपमेंट परियोजना को आगे बढ़ाने की. लेकिन चुनौती बड़ी थी. पहले नदी के किनारे महज झुग्गी-झोपड़ियां नजर आती थीं. नदी के किनारे तक पहुंचना भी मुहाल था. नदी में अगर कुछ पहुंचता था तो नाले का पानी.

 

शहर की गंदगी पचास से भी ज्यादा ड्रेनेज पाइपों के जरिये इस नदी में गिराई जाती थी. करीब साढ़े पांच वर्षों तक अहमदाबाद नगर निगम के आयुक्त और साबरमती रिवरफ्रंट डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के सीएमडी रहे वरिष्ठ आईएएस अधिकारी आई पी गौतम बताते हैं कि चुनौती बड़ी थी, लेकिन उन्हें पूरी बैकिंग हासिल थी राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी की, जो हर कीमत पर इस परियोजना को आगे बढ़ता देखना चाहते थे.

 

अक्टूबर 2001 में नरेंद्र मोदी पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने और उन्होंने अपनी सरकार की प्राथमिकताओं में साबरमती रिवरफ्रंट डेवलपमेंट को रखा. अगले तेरह वर्षों में इस परियोजना पर काफी तेजी से काम हुआ और आखिरकार सियासत की सीढियां चढ़ते-चढ़ते जब मई 2014 में वो भारत के प्रधानमंत्री बने तो उनकी विरासत के तौर पर यानी जब वो गुजरात के मुख्यमंत्री रहे, उस विरासत के तौर पर इस प्रोजेक्ट को महत्वपूर्ण स्थान मिला.

 

इस परियोजना को गति देने के लिए मोदी ने आई पी गौतम जैसे अधिकारी को अहमदाबाद नगर निगम का आयुक्त बनाया. गौतम की छवि नो-नौनसेंस अधिकारी की थी, जो परियोजनाओं को सही समय पर पूरा करने के लिए जाने जाते थे. मोदी का विश्वास सही साबित हुआ और गौतम के नगर निगम आयुक्त रहते ही साबरमती रिवरफ्रंट डेवलपमेंट परियोजना का ज्यादातर काम हुआ.

 

रिवरफ्रंट पर काम शुरु करने के पहले गौतम के सामने यहां की झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले दस हजार परिवारों के पुनर्वास की चुनौती थी. इस संबंध में कानूनी अड़चनें भी काफी अधिक थीं. लेकिन पुनर्वास का काम किया गया और झुग्गियों में रहने वाले लोगों को नदी से सात किलोमीटर की दूरी के अंदर ही 19 कॉलोनियां बनाकर बसाया गया.

 

इसके बाद जब साबरमती नदी में नर्मदा नदी की मुख्य नहर से हासिल हुए पानी को छोड़ा गया, तो शहर के लोगों को अंदाजा लगा कि नाले की तरह कई दशकों तक दिखती रही साबरमती कितनी खूबसूरत दिख सकती है, अगर रिवरफ्रंट परियोजना आगे बढ़े तो. आम तौर पर मानसून के समय में ही साबरमती में पानी होता था, लेकिन नर्मदा का पानी लाकर इसे सालों भर भरा हुआ रखने की गुंजाइश थी.

 

इस परियोजना का मास्टर प्लान तैयार करते समय तमाम पहलुओं का ध्यान रखा गया. मसलन पर्यावरण को कोई नुकसान न पहुंचे या फिर रिवरफ्रंट की वजह से शहर में बाढ़ का खतरा पैदा न हो. यही नहीं, इसकी तैयारियों के तहत साबरमती में गिरने वाले नालों को बंद कर ट्रीटमेंट प्लांट लगाये गये, जिससे गंदे पानी को शहर से दूर ले जाकर, ट्रीट कर नदी में छोड़ा गया. जहां तक शहर का सवाल था, ग्यारह किलोमीटर तक साबरमती नदी के दोनों किनारों को विकसित किया गया.

 

वर्ष 2005 में इस परियोजना के तहत रिवरफ्रंट निर्माण का काम शुरु हुआ था और 2012 तक इसका बड़ा हिस्सा अस्तित्व में आ गया. मोदी ने इस परियोजना के एक हिस्से का उदघाटन उसी साल किया. परियोजना में इस  बात का ध्यान रखा गया कि एक तरफ जहां साबरमती नदी और इसके किनारे हमेशा साफ-सुथरे बने रहें, वही ये पूरी परियोजना अपना भरण-पोषण खुद कर सके. इसके लिए रणनीति अपनाई गई इस परियोजना के तहत नदी की रिक्लेम की गई जमीन का करीब पांचवा हिस्सा व्यावसायिक तौर पर बेच कर परियोजना का खर्च निकालने की और ये आगे भी निर्बाध चलती रहे, इसके लिए एक बड़ा कोष बनाने की. करीब डेढ़ हजार करोड़ रुपये की इस परियोजना के तहत शहर के अंदर से गुजरने वाली साबरमती नदी की कुल चौड़ाई को सवा ग्यारह किलोमीटर तक एक समान रखा गया यानी 263 मीटर की चौड़ाई, यही नहीं, करीब 202 हेक्टेयर जमीन भी रिक्लेम की गई.

 

इस परियोजना को देश-विदेश में ख्याति भी मिली है, 2011 और 2012 में हुडको ने इसे अवार्ड दिया. न सिर्फ भारत के अलग-अलग राज्यों, बल्कि विदेशों से भी इसे विशेषज्ञ देखने आने हैं, यहां तक कि जुलाई 2014 में पाकिस्तान का एक प्रतिनिधिमंडल भी इसे देखने के लिए आया, ताकि लाहौर में रावी को भी इसी तरह विकसित किया जा सके.

 

महज डेढ़ दशक में साबरमती नदी एक गंदे नाले की जगह साफ-सुथरी नदी में तब्दील हो चुकी है तो इसके किनारे इस तरीके से विकसित हो चुके हैं कि न सिर्फ भारत, बल्कि भारत से बाहर भी रिवरफ्रंट डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के तौर पर उदाहरण स्वरुप हैं. ऐसे में ये सारा कुछ बताता ये है कि भारत में भी संभव है, ये सब कुछ करना, अगर दृढ़ इच्छा शक्ति हो और आप किसी चीज के पीछे लग जाएँ.

 

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