सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर शिवसेना की आपत्ति, पूछा- क्या ये सांसद की अवमानना नहीं है?

By: | Last Updated: Friday, 15 May 2015 5:09 AM
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मुंबई: शिवसेना के मुखपत्र सामना ने न्यायालयों के फैसलों पर सवाल खड़ा किया है. हाल ही में सर्वोच्च न्यायलय ने सरकारी खर्चे से राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और प्रधान न्यायाधीश के अपवाद के सिवा किसी भी मंत्री या राजनेता की तस्वीर विज्ञापन में प्रकाशित करने पर रोक लगा दी है.

 

इसी फैसला के आधार पर सामना में न्याय व्यवस्था के फैसलों पर सवाल खड़ा किया है. सामना में कहा है कि क्या इस तरह के फैसलों से न्यायपालिका लोकनियुक्त सरकार, विधानसभा और सांसद की अवमानना नहीं है? क्या न्यायपालिका इस लोकतंत्र के इन संस्थाओं को बगल दे कर सत्ता का संचालन करने का प्रयत्न कर रही है?

 

लेखिका शोभा डे का नाम ना लेते हुए कटाक्ष किया गया है कि मराठी भाषा का अवमानना करने पर विधानसभा में उन पर लाये गए विशेषाधिकार हनन के प्रस्ताव को न्यायपालिका ने स्थगित करना क्या सही है?

 

देश में कई अहम निर्णय प्रलंबित है जैसे सामान नागरिक संहिता लागू हो, कश्मीर में संविधान का अनुच्छेद 370 रद्द हो, साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित और आसाराम बापू सहित बेलगांव का प्रश्न भी सालों से प्रलंबित है. लेकिन सलमान खान जैसे लोकप्रिय निर्णय तुरंत होते है.

 

एकतरफ लोकतंत्र के गाने गए जाते है और दूसरी तरफ लोकतंत्र की कमर तोड़नेवाले निर्णय न्यायपालिका द्वारा लिए जाएं. इस वजह से न्यायव्यवस्था की प्रतिष्ठा बढ़ने की बजाय उसका पतन होने की संभावना ज्यादा है.

 

कौन किस से विवाह करे, पति पत्नी का व्यवहार कैसा हो, बेडरूम के परदे किस रंग के हो, कौन क्या खाए और क्या ना खाए, राम मंदिर का क्या किया जाए…ऐसे फैसले भी न्यायालय करेगी तो लोगो का ‘तराजू’ पर से विश्वास उठ जाएगा.

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