शिवसेना के 'सामना' में एनसीपी पर हमला, बीजेपी पर कोई तंज नहीं

By: | Last Updated: Tuesday, 21 October 2014 3:19 AM

नई दिल्ली: महाराष्ट्र में सरकार के सवाल पर सामना में संपादकीय छपा है लेकिन बीजेपी पर कोई तंज, कोई निशाना नहीं साधा गया है. एनसीपी पर जरूर निशाना साधा गया है. इससे भी संकेत मिलते हैं कि बीजेपी-शिवसेना में कुछ खिचड़ी पक सकती है.

 

शिवसेना के मुखपत्र सामना के संपादकीय में आज एनसीपी को आडे हाथ लिया गया है. ‘सामना’ में जहां एनसीपी को मौकापरस्त कहा गया है तो वहीं दुसरी तरफ अप्रत्यक्ष रुप से गठबंघन के लिए कहीं न कहीं ग्रीन सिग्नल जरुर दे दिया है.

 

गौरतलब है कि आज राजनाथ सिंह मुबई में जाने वाले हैं. परंपरागत रुप से देखें तो अटल बिहारी वाजपेयी, राजनाथ सिंह और लालक्रष्ण आडवाणी जैसे नेता महाराष्ट्र औऱ मुंबई के दौरे पर जब कभी आए हैं तब उनके मातोश्री जाने की परंपरा हमेशा से ही रही है. ऐसे में राजनाथ सिंह के मुबई जाने और विधायक दलों में मुख्यमंत्री चुनने की औपचारिकता से ठीक पहले सामना ‘संपादकीय’ का ये लेख कहीं न कहीं इशारा करता है कि शिवसेना और बीजेपी का गठबंधन ही महाराष्ट्र की सत्ता पर काबिज हो सकता है.

 

सामना संपादकीय में शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल को आड़े हाथों लेते हुए उन्हें एक ऐसा मौकापरस्त बताया गया है जो केवल मतलबपरस्ती का शिकार हैं. ‘सामना’ संपादकीय में खिल्ली उडाते हुए कहा गया है कि महाराष्ट्र की जमीन साधु संतों की रही है लेकिन वर्तमान में ये जमीन मतलबपरस्तों की बनकर रह गई है. अगर ऐसा नही होता तो अचानक ही पलटी मारकर एनसीपी भारतीय जनता पार्टी को बिना किसी शर्त के समर्थन देने के लिए अचानक कहां से आ गई जबकि चुनाव के ठीक एक दिन पहले एकनाथ खडसे ने सार्वजनिक सभा में कहा था कि कुछ भी हो जाए बीजेपी किसी भी हाल में एनसीपी का सर्मथन नही लेगी. लेकिन शायद मोटी चमड़ी और कच्चे कान के एनसीपी के नेताओं के कान तक ये बात नही पहुंची.

 

‘सामना’ संपादकीय में एनसीपी की खिंचाई करते हुए कहा गया कि संभव है कि जन्मजात बंघिरत्व एनसीपी ने आत्मसात किया हो इसलिए प्रफुल्ल् पटेल ने चुनाव परिणामों के बीच ही उन्होने बीजेपी को बिना शर्त समर्थन देने की बात कही और तर्रा ये था कि बीजेपी को समर्थन महाराष्ट्र के विकास और स्थिरता के लिए दिय़ा जा रहा है. ‘सामना’ में प्रफुल्ल पटेल की खिंचाई करते हुए कहा गया है कि प्रफुल्ल पटेल को महाराष्ट्र की चिंता कब से सताने लगी जो दल विरोघी दल का नेता पद पाने लायक भी नही बचा है और जिस पार्टी के लोगों पर भ्रष्टाचार के और घोटालों के कई आऱोप लगे हैं वो कोई नया नही है.