आखिरकार संजय जोशी ने डाले हथियार, कहा- 'पीएम नरेंद्र मोदी मेरे नेता हैं'

By: | Last Updated: Wednesday, 22 April 2015 7:37 AM
Sanjay Joshi accepts Narendra Modi as leader

नई दिल्ली: बीजेपी के वरिष्ठ नेता संजय जोशी और पीएम नरेंद्र मोदी का झगड़ा छिपा हुआ नहीं है, दोनों एक दूसरे के धुर विरोधी हैं. लेकिन अब संजय जोशी ने नरेंद्र मोदी के सामने हथियार डाल दिया है.

 

संजय जोशी ने नागपुर ने कहा कि वह बीजेपी के कार्यकर्ता हैं और कार्यकर्ता ही रहेंगे. इसके बाद जोशी ने कहा, “नरेंद्र मोदी मेरे नेता हैं.”

 

जोशी ने ये बात ऐसे वक़्त में कबूल की है जब बीते हफ्ते ये खबर आई थी कि संजय जोशी के जन्मदिन पर पोस्टर लगवाने वाले तीन केंद्रीय मंत्रियों को फटकार खानी पड़ी थी.

 

संजय जोशी प्रधानमंत्री के धुर विरोधी माने जाते हैं. यहां आपको बताते हैं कि संजय जोशी कौन हैं और मोदी के साथ उनका क्या विवाद है.

 

कौन हैं संजय जोशी?

संजय जोशी बीजेपी और आरएसएस में कई अहम पदों पर रह चुके हैं. संजय जोशी का शुमार बीजेपी में उन ताकतवर नेताओं में होता है जिन्हें शायद आम जनता ठीक से नहीं जानती लेकिन पार्टी में उनका कद काफी ऊंचा था. 1980 के दशक में बीजेपी के मौजूदा अध्यक्ष नितिन गडकरी और संजय जोशी नागपुर में आरएसएस की एक ही शाखा में काम किया करते थे. इसीलिए आरएसएस के साथ साथ उनकी बीजेपी के कार्यकर्ताओं में भी अच्छी लोकप्रियता है. खास तौर से जो जमीन से जुड़े कार्यकर्ता संजय जोशी के सबसे ज्यादा करीब है और तो और पार्टी छोड़ चुके पुराने नेता भी संजय जोशी की तारीफ करते नहीं थकते.

 

संजय जोशी मूल रूप से नागपुर के हैं. उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है. मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद वो सीधे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ जुड़ गए. वो संघ के रास्ते बीजेपी में आए और उन्हें बीजेपी को मजबूत बनाने के लिए पहली बड़ी जिम्मेदारी गुजरात की दी गई.

 

वो 1990 में महाराष्ट्र से गुजरात आए. 1995 में गुजरात में बीजेपी की पहली बार सरकार बनीं उस वक्त वो गुजरात बीजेपी के महासचिव बनाए गए. जोशी करीब तेरह साल तक गुजरात में रहे और बीजेपी के सबसे ताकतवर नेताओं में से एक रहे.

 

साल 2001 में नरेंद्र मोदी से खटपट होने के बाद वो दिल्ली आ गए. दिल्ली में उन्हें बीजेपी ने संगठन को मजबूत बनाने के लिए महासचिव बनाया. जोशी को सबसे बड़ा धक्का लगा जब 2005 में कथित सीडी कांड में उनका नाम आया और उन्हें पार्टी में अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था.

 

लेकिन सीडी कांड में क्लीन चिट मिलने के बाद उन्हें फिर से पार्टी में अहम रोल अदा करने का मौका मिला. बीजेपी ने जोशी को उत्तर प्रदेश के 2012 के विधानसभा चुनावों की बाग़डोर सौंप दीं. हालांकि इन चुनाव में बीजेपी कोई कमाल नहीं कर पाई.

 

संजय जोशी ने शादी नहीं की है. भले ही वो नागपुर के हैं लेकिन उनके परिवार के कई लोग गुजरात में रहते हैं.

 

क्या है झगड़ा

मोदी और जोशी के बीच आज जो झगड़ा है इसकी नींव आज से करीब 17 साल पहले पड़ी थी. बात तब की है जब जोशी गुजरात में बीजेपी के बड़े ताकतवर नेता हुआ करते थे और मोदी और जोशी में कड़ी टक्कर थी. पार्टी के भीतर सत्ता के संघर्ष की एक अनूठी कहानी इन दोनों के झगड़े की है.

एक कहावत है कि एक मयान में दो तलवारें नहीं रह सकती है कुछ ऐसी ही कहानी बीजेपी के दो नेताओं संजय जोशी और नरेंद्र मोदी की है. वो मयान गुजरात था जहां राजनीति में दोनों की धार तेज थी. कभी मोदी की धार जोशी पर भारी पड़ी तो कभी जोशी की धार मोदी पर. साल 1990 में संजय जोशी महाराष्ट्र में आरएसएस कैंप से बीजेपी में शामिल होने के लिए अहमदाबाद आए थे. अहमदाबाद आने के पहले संजय जोशी नागपुर में प्रचारक थे और उससे पहले उसी शाखा के स्वयंसेवक, जहां गड़करी भी बतौर स्वयंसेवक जाया करते थे.

 

1990 में जब संजय जोशी को गुजरात बीजेपी में संगठन मंत्री का पद दिया गया, उस वक्त नरेंद्र मोदी को उनसे ठीक उपर के पद यानी संगठन महामंत्री के पद पर काम करते हुए दो साल हो चुके थे. दोनों ने पार्टी की गुजरात इकाई में करीब 5 साल तक साथ-साथ काम किया, संगठन को मजबूत किया, जिसका परिणाम ये हुआ कि 1995 में बीजेपी ने अकेले अपने दम पर गुजरात में पहली बार सरकार बनाई.

 

उस समय गुजरात में मुख्यमंत्री पद के दो प्रमुख दावेदार थे- बीजेपी के सबसे वरिष्ठ नेता और शक्तिशाली पाटीदार समुदाय से आने वाले केशुभाई पटेल और उतने ही ताकतवर शंकरसिंह वाघेला, जिनकी पार्टी पर भी खासी ग्रिप थी.

 

दरअसल शंकरसिंह वाघेला 1993 तक पार्टी के अध्यक्ष बने रहे थे और मोदी और जोशी दोनों ने उन्हीं के मार्गदर्शन में संघ के प्रचारक की भूमिका के बाद सियासत का पाठ पढ़ा था. लेकिन जब बीजेपी की गुजरात में पहली सरकार के मुख्यमंत्री बनने का मामला सामने आया, तो मोदी और जोशी दोनों ने केशुभाई पटेल का साथ दिया.

केशुभाई पटेल के मुख्यमंत्रित्व में गुजरात में बीजेपी की पहली सरकार की शानदार शुरुआत हुई थी, लेकिन कुछ महीनों के अंदर ही शंकरसिंह वाघेला ने बगावत कर दी. बगावत का कारण था कि शंकरसिंह वाघेला को केशुभाई पटेल भाव नहीं दे रहे थे. वाघेला इन सबके लिए नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार मान रहे थे, जिनका केशुभाई पटेल पर जबरदस्त असर था. ऐसे में वाघेला के बगावत को शांत करने के लिए पार्टी के अंदर समझौता हुआ, तो समझौते की शर्त के तौर पर मोदी को दिल्ली की तरफ निर्वासित होना पड़ा और केशुभाई पटेल की जगह सुरेश मेहता मुख्यमंत्री बने. आपको बता दें कि वाघेला की बगावत भारतीय राजनीति में खजुराहो कांड के तौर पर मशहूर है.

 

जब मोदी दिल्ली भेजे गये, तो राज्य बीजेपी में खाली हुई संगठन महामंत्री की कुर्सी संजय जोशी ने संभाली. इस तरह मोदी से गुजरात छिन गया और संजय जोशी के लिए मैदान खाली हो गया.

 

लेकिन वाघेला का विरोध यहीं खत्म नहीं हुआ एक साल के भीतर वाघेला ने बीजेपी से बगावत करके राष्ट्रीय जनता पार्टी बनाई और सुरेश मेहता की सरकार गिर गई और फिर कांग्रेस के सहयोग से वाघेला गुजरात के मुख्यमंत्री बन गए. साल 1998 में बीजेपी दोबारा सत्ता में आई. ये वो वक्त था जब नरेंद्र मोदी और संजय जोशी के बीच दरार कम होने की जगह इतनी ज्यादा गहरी हो गई कि फिर कभी भर नहीं पाई.

 

बीजेपी के दोबारा सत्ता में आने के बाद मोदी गुजरात वापस लौटना चाहते थे. लेकिन जोशी ने मोदी के लिए तब गुजरात के दरवाजे नहीं खोले. 1998 में केशुभाई एक बार फिर गुजरात के मुख्यमंत्री बने. मोदी मन मसोस कर रह गए. ये वो वक्त था जब दोनों के बीच खटास नफरत में बदलने लगी. दोनों के बीच गहरी होती इस दरार में जोरदार चोट लगी साल 2001 में जब उस वक्त गुजरात में कुछ विधानसभा सीटों के लिए हुए उपचुनाव में बीजेपी को हार झेलनी पड़ी थी और केशुभाई को सीएम की गद्दी से हटाकर नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बना दिया गया.

 

जिस मोदी को गुजरात से वनवास देकर दिल्ली भेजा गया था उसी मोदी के सत्ता में आते ही महीने भर के अंदर संजय जोशी को गुजरात से वनवास दे दिया गया.लेकिन जोशी का सितारा तुरंत चमकने लगा. संजय जोशी को दिल्ली में बीजेपी के राष्टीय महामंत्री का पद दिया गया. लेकिन मोदी को तब ये डर सताने लगा कि संजय जोशी राष्ट्रीय स्तर पर उनकी जगह नहीं बनने देंगे.

 

धीरे-धीरे मोदी बीजेपी के सशक्त नेता के रूप में स्थापित होते गए और संजय जोशी संघ के आदमी बनकर जमीनी स्तर पर संगठन के लिए काम करते रहे. बीजेपी में संजय जोशी का रुतबा कम नहीं था वो संजय जोशी ही थे जिन्होंने जिन्ना विवाद पर लाल कृष्ण आडवाणी से अध्यक्ष पद से इस्तीफा मांग लिया था और आडवाणी को इस्तीफा देना पड़ा था.

 

लेकिन जोशी का रुतबा मोदी के लिए परेशानी का सबब था. मोदी को लगता था कि जोशी गुजरात में उनके विरोधियों से मिलकर उन्हें कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं. दोनों के बीच मनमुटाव की वजह एक कथित सीडी भी रही. आरोप है कि संजय जोशी की सीडी के पीछे भी दोनों के बीच का विवाद था. सीडी में नाम आने पर ही जोशी को 2005 में अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था.

 

इसके बाद से तो दोनों एक-दूसरे को देखना तक पसंद नहीं करते थे. बाद में जोशी को क्लीन चिट मिल गई थी, लेकिन उन्हें लंबे समय तक राजनीतिक वनवास झेलना पड़ा. हालांकि गडकरी के बीजेपी अध्यक्ष बनने के बाद ये वनवास खत्म हुआ. गड़करी ने 2011 में यूपी में विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी को मजबूत करने की जिम्मेदारी चुनाव प्रभारी के तौर पर दी.

 

मोदी इससे इतने नाराज हुए कि वो यूपी में 2012 में हुए चुनावों के दौरान पार्टी का प्रचार करने तक नहीं गए थे और मुंबई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में शामिल होने के लिए मोदी ने संजय जोशी का इस्तीफा तक दिलवा दिया. तब से संजय जोशी बीजेपी में किनारे ही हैं.

 

पीएम मोदी और संजय जोशी के बीच क्या है झगड़ा? 

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