ब्लॉग: अबकी बार संवेदनहीन सरकार

By: | Last Updated: Thursday, 18 December 2014 1:17 PM
sanjay nirupam

26/11 के भयावह आतंकवादी हमले के बाद दादर स्थित प्रदेश कार्यालय में हमने शहीदों के लिए श्रद्धांजलि का कार्यक्रम रखा था . कांग्रेस के सभी प्रमुख नेता, मंत्री इत्यादि आये थे . साथ में मराठी साहित्य-कला और सिनेमा के कलाकार भी आये थे . श्रद्धांजलि अर्पित करने के बाद हम कॉन्फ्रेंस रुम में बैठे चर्चा कर रहे थे . कोई ताज में अभी आतंकवादी छुपे हैं, यह बता रहा था. कोई तुकाराम ओंबले की बहादुरी की किस्से सुना रहा था . हमने यह जानकारी भी आपस में बांटी कि किसी फिदायनी हमले में पहली बार कोई जिंदा आतंकवादी पकड़ा गया है .

हमें मुंबई पुलिस पर गर्व है . मगर हेमंत करकरे, विजय सालसकर और अशोक कामटे के खोने का दुख भी है . बातचीत में कई मंत्रियों के अलावा उस समय के राजस्व मंत्री अशोक चव्हाण भी शामिल थे . कई मराठी कलाकारों के बीच अंकुश और तेजाब के निर्माता-निद्रेशक एन. चंद्रा भी थे . जब बातचीत पुरी हुई और बिछड़ने की घड़ी आयी तब एन. चंद्रा ने  अशोकराव को अपनी नयी फिल्म के प्रिव्यू के लिए आमंत्रित किया उन्होंने हां कह कर मुझसे भी चलने को कहां, मैंने कोई जवाब नहीं दिया. उन्हें चंद्रा से दूर लेकर जाकर याद दिलाया अभी-अभी शहर पर इतना बड़ा आतंकी हमला हुआ है, हमारा कोई फिल्म देखने जाना अच्छी बात नहीं है . लोग हसेंगे . अशोकराव ने इशारा समझ लिया और चंद्रा को करीब बुलाकर तपाक से मराठी में बोले “ चंद्रू, संजय सही कह रहे हैं तुम्हारे प्रिव्यू के लिए सही टाईम नहीं है बाद में देखेंगे” यह कह कर वह चलते बने . चंद्रा मुझसे नाराज हो गए मुझे बोले, संजु तुमने अच्छा नहीं किया . मैं उनसे क्षमा मांगते हुए यह सोचके निकला कि सिनेमा देखने का शौक मुझे भी है, पर यह समय सही नहीं हैं.

 

एक दिन बाद उस समय के मुख्यमंत्री स्व. विलासराव देशमुख आतंकवाद की आग में झुलसे ताज होटेल देखने गये थे, उनके साथ उनके फिल्म स्टार सुपुत्र रितेश देशमुख भी थे . साथ में, मुआयना करने फिल्म निर्देशक रामगोपाल वर्मा भी गये थे . कुछ मिनिटों में यह खबर देश भर में फैल गयी सारे टीवी चैनलों ने हाहाकार मचा दिया था . सवाल उठाया गया कि, मुख्यमंत्री फिल्म कलाकारों के साथ ताज क्यों गए ? उपर से आग में घी डाला रामगोपाल वर्मा ने यह कह कर कि, “मेरी अगली फिल्म आतंकवाद पर होगी . इस लिए मैं यथार्थ का दर्शन करने गया था .” उस पर और शोर मचा मुझे आज भी याद है तब शायद एबीपी न्युज, स्टार न्यूज हुआ करता था . 

 

इस खबर को उसने जोरदार ढंग से उछाला . मेरी प्रतिक्रिया मांगी फोन पर . मुझे इस बात का एहसास था कि मेरी पार्टी की सरकार है, मेरे मुख्यमंत्री है, रोज सुबह शाम मैं ताज हॉटेल का हाल देखने जा रहां था . इसी पृष्ठभूमि में मैने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की, जो विलासराव जी के व्यवहार के खिलाफ थी . मैंने कहा था कि फिल्मकारों के साथ मुख्यमंत्री का ताज विजिट संवेदनहीनता का परिचायक है . उसी ताज दौरे का नतीजा यह निकला कि विलासराव जी को मुख्यमंत्री पद से हाथ धोना पडा. कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी ने मुख्यमंत्री के इस बर्ताव को संवेदहीन माना और आतंकवाद जैसे गंभीर विषयों के प्रति शासको का ऐसा रवैया जन-हित और देशहित के खिलाफ है, ऐसा उन्होंने माना था .

 

5 दिसंबर को भारत-पाक सीमा के बीच उरी सेक्टर में पकिस्तान ने आतंकवादी हमला किया जिसमे हमारे 11 जवान मारे गए, उनमें एक लेफ्टिनेंट कर्नल स्तर के अधिकारी थे . हमले के तत्काल बाद आज की सरकार में बैठे लोग क्या कर रहे थे, यह पूरे देश ने देखा और जाना. प्रधानमंत्री की तस्वीरे पूरे देश में छपी एक फिल्म का प्रमोशन करते हुए, फिल्म स्टारों के साथ गलबहियां लगाते हुए देखे गये . रक्षामंत्री गोवा में एक किताब का विमोचन कर रहे थे . इस पर मीडिया में बातें हुईं मगर शोर-शराबा नहीं हुआ. बीजेपी के जो साथी देशभक्ति के नाम पर छाती पीटते थकते नहीं, उनको जैसे सांप सूंघ गया .

 

 राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोपरी मानने का दम भरने वाले और भारतीय सेना पर सदा सम्मान और गौरव का फर्जी नारा लगानेवाले बीजेपी वाले चुप रह गए . यही नहीं भारतीय सेना के जवानों के साथ सियाचिन जाकर दिवाली मनाने का ढोंग रचने वाले प्रधानमंत्री जी जब दो दिन बात श्रीनगर गए, तो सेना के सम्मान में और बट्टा लगाया . जो कश्मिरी आफ्शा के नाम पर भारतीय सेना के जवानों को कोसते बाज़ नहीं आते वहां उनके बीच प्रधानमंत्री ने भारत के सेना के जवानों का कैसे अपमान किया यह देखें. उन्होंने आफ्शा पीड़ित कश्मिरियों के सामने गरजते हुए कहा  “यह मोदी सरकार का कमाल है कि सेना ने पहलीबार अपनी गलती पर माफी मांगी” . सच पूछिये तो प्रधानमंत्री को इस बयान के लिए देश से माफी मांगनी चाहिए क्योंकि एक तो वे श्रीनगर में चुनावी सभा संबोधित कर रहे थे, दुसरा भारतीय सेना के जवानों में अविश्वास करने वाले कश्मीरियों से वोट मांग रहे थें . तीसरा भारत के प्रधानमंत्री होने के नाते उन्हें कोई ऐसा बयान नहीं देना चाहिए जो सेना के मनोबल को तोडता हो .

 

मगर प्रधानमंत्री चुप हैं . भाजपा वाले के गले में घिघी बंधी हुई है . सेना, सुरक्षा और आतंकवाद के मामले सब गौण हो चुके है . भारतीय जनता पार्टी विपक्ष में रहते हुऐ जितनी संवेदनशील बनती थी, आज सत्ता में आने के बाद उतनी ही संवेदनहीन हो गयी है . क्या किसी ने देश के रक्षामंत्री मनोहर पर्रीकर से पूछा , “हमले में मारे गए जवानों की अंतिम क्रिया में जाने के बजाय वह एक किताब के विमोचन में क्यों मशगुल थे ”? अगर कांग्रेस का शासन होता तो रक्षा मंत्री को अपनी खुर्सी से वैसे ही हाथ धोना पडता, जैसे विलासराव जी को खुर्सी छोड़नी पड़ी थी . कांग्रेस के राज में हमारे गृहमंत्री ने दिल्ली बम धमाकों के बाद एक दिन में तीन कपड़े बदले थे उन्हे गद्दी छोडनी पड़ी थी, हमारे प्रधानमंत्री चार दिन में 23 कपडे बदलते हैं . रोज 5 से जादा . उनसे सवाल पूछने वाला कोई नही है ?

  

कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार का कामकाज भारत की जनता ने 10 से 15 वर्षों तक दिल्ली से लेकर मुंबई तक देखी थी . उसपर कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी की जबरदस्त छाप थी, छोटीसी गलती भी बर्दास्त नहीं की जाती थी, चाहे कोई कितना भी बडा हो, या मामला कितना भी महज शक-शुबहो के बीच हो . पवन कुमार बन्सल, अश्विनी कुमार, शशी थरुर जैसे मंत्रियों का हश्र क्या और क्यों हुआ सभी को मालूम है . दो पर महज आरोप लगे थे. तीसरे पर अदालत की टिप्पणी थी . आदर्श कोई घोटाला था . यह अभी तक साबित भी नहीं हुआ है पर अशोक चव्हाण का मुख्यमंत्रीत्व अतीत में समा चुका है . महज आरोप लगा था . यहां नयी सरकार के मंत्रियों पर सुप्रीम कोर्ट रोज टिप्पणी कर रही है सरकार के कान पर जूं तक नही रेंगती .  केंद्रीय मंत्री जनरल वी. के. सिंह का मामला एक ज्वलंत उदाहरण  है . बलात्कार का एक आरोपी मंत्री छह महिनों से मोदी मंत्रिमंडल में है . जयपुर की कोर्ट ने बलात्कार के आरोप में मंत्री के खिलाफ समन जारी कर रखा है, राजस्थान पुलिस उसे कोर्ट में हाजिर नहीं कर पा रही है . कह रही है कि मंत्री का पता नहीं ? जब कि, मंत्री रोज दिल्ली में पाये जाते हैं कभी घर पे कभी लोकसभा में सीधे प्रसारण के जरिए देखे जा सकते है . महिला सुरक्षा के लिए हमेशा संवेदना व्यक्त करनेवाले बीजेपी के लोग चुपचाप तमाशा देख रहे है . न भाजपा शासित राजस्थान सरकार को शर्म है, ना मोदी सरकार को, ना स्वयं मंत्री महोदय को .

 

हां. इतना आवश्य है कि अगर युपीए की सरकार होती तो निहालचंद अभी जेल में होता . वही नही, साध्वी भी अभी तक नहीं बचती और शिक्षामंत्री का डिग्री घोटाला उन्हें कब का घर बैठा दिया होता, लेकिन यह कांग्रेस प्रणित सरकार नहीं है, सोनिया जी का नेतृत्व नहीं है, अभी मोदी जी का निरंकुश शासन चल रहा है, संवेदनशीलता दफन हो चुकी है, संवेदनहीनता चरम पर है .

 

सरकारें प्रतिबद्धता से ज्यादा, धारणा पर चलती हैं . धारणा बनानी पड़ती है . स्थापित करनी पड़ती है . अपने व्यवहार से, अपने आचरण से. अपने फैसलों से. भाजपा सरकार सामाजिक सरोकार के मामलों को लेकर गलत धारणाएं प्रस्तुत कर रही है . अपनी बहुमत के दंम में पिछले सात महिनों में अक्सर यह सरकार जनआकांक्षाओं की अवहेलना करती दिख रही है . नतीजतन, सरकार से देश की जनता ने जो उम्मीदें की थी, वह रोज–दर-रोज बिखर रही है . 

 

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