क्या है मोदी के खिलाफ संजीव भट्ट की साजिश की वो कहानी?

By: | Last Updated: Wednesday, 14 October 2015 3:32 PM

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात काडर के बर्खास्त आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट की वो याचिका खारिज कर दी है, जिसमें उन्होंने मांग की थी कि 27 फरवरी 2002 की रात गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो बैठक की थी, उस मामले की नये सिरे से जांच एसआईटी गठित कर की जाए. दरअसल भट्ट ये दावा करते रहे हैं कि गोधरा कांड के बाद हुई इस बैठक में नरेंद्र मोदी ने अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को सबक सिखाने की बात करते हुए आपत्तिजनक टिप्पणियां की थी और वो खुद उस बैठक में मौजूद थे.

 

सुप्रीम कोर्ट ने भट्ट की इस मांग को खारिज करते हुए जो फैसला सुनाया है, उससे न भट्ट की छवि प्रपंच और साजिश रचने वाले एक अधिकारी के तौर पर उभरी है, बल्कि उस साजिश में विपक्षी पार्टी के नेता, एनजीओ चलाने वाले लोग और यहां तक कि पत्रकारों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठे हैं. आखिर क्या है साजिश की वो कहानी, जिसे रचने के चक्कर में भट्ट तो पूरी तरह बेनकाब हो ही गये हैं, बल्कि सियासी कुश्ती कोर्ट के अंदर भी खेलने की झलक मिली है. इसके लिए पलटने पड़ेंगे सुप्रीम कोर्ट के फैसले के वो पन्ने, जिसमें ये साजिश पूरी तरह उभर कर सामने आई है.

 

चीफ जस्टिस एच एल दत्तू और जस्टिस अरुण मिश्रा की खंडपीठ ने 75 पन्नों का जो अपना फैसला संजीव भट्ट की याचिका को खारिज करते हुए सुनाया है, उसमें कई जगहों पर भट्ट और गुजरात की विपक्षी पार्टी के नेताओं के बीच की सांठगांठ का जिक्र किया है. कोर्ट ने अपने फैसले में उन तमाम ईमेल्स का भी जिक्र किया है, जिसे संजीव भट्ट ने विपक्षी पार्टी के नेताओं को लिखा था और जिन्हें सुप्रीम कोर्ट के सामने रखते हुए गुजरात सरकार ने दावा किया था कि भट्ट विपक्षी पार्टी के इशारे पर काम कर रहे थे. दरअसल इन ईमेल्स के जरिये ये साफ होता है कि भट्ट तत्कालीन गुजरात विधानसभा में विपक्ष के नेता के संपर्क में थे. यही नहीं, वो विपक्षी पार्टी के नेताओं से पैकेज और अन्य सामग्री भी हासिल कर रहे थे और विपक्षी पार्टी को अपनी पार्टी तक बता रहे थे.

 

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पृष्ठ नंबर 11 और 12 पर ईमेल्स का जिक्र है, जिसमें यहां तक उल्लेख है कि भट्ट नानावटी कमीशन के सामने अपनी पेशी के दौरान विपक्षी पार्टी के वकील के प्रदर्शन से नाखुश थे और यहां तक ईमेल में कहा था कि उनका भरपूर इस्तेमाल नहीं हुआ.

 

फैसले के पृष्ठ नंबर 13 और 14 के जरिये ये हकीकत भी सामने आई है कि संजीव भट्ट 27 फरवरी 2002 को सीएम के यहां हुई बैठक में अपनी उपस्थिति को साबित करने के लिए के डी पंथ नामक जिस जूनियर अधिकारी के हलफनामे का जबरदस्ती इस्तेमाल कर रहे थे, उस हलफनामे पर हस्ताक्षर कराने के लिए वो पंथ को विपक्षी पार्टी के लीगल सेल के अध्यक्ष के कार्यालय ले गये थे, जहां 17 जून 2011 को तड़के हलफनामे पर पंथ के हस्ताक्षर कराये गये थे.

 

फैसले के पृष्ठ नंबर 39 पर भट्ट और विपक्षी पार्टी के नेता के बीच 27 और 28 अप्रैल 2011 को हुए ईमेल एक्सचेंज का भी जिक्र है, जिसमें एक तरफ जहां भट्ट ने विपक्षी पार्टी के नेता से कुछ मुद्दे मांगे थे वही इस बात का भी पता चलता है कि विपक्षी पार्टी के नेता ने भट्ट को पैकेज भेजा था. यहां तक कि 28 अप्रैल के ही ईमेल संवाद में ये बात भी सामने आई है कि भट्ट और विपक्षी पार्टी के नेता मिलकर रणनीति बना रहे थे कि किस तरह सुप्रीम कोर्ट में एसआईटी सदस्यों के खिलाफ आरोप लगाने के लिए मुद्दे तैयार किये जाएं.

 

फैसले के पृष्ठ नंबर 40 में एक और ईमेल संवाद का जिक्र है, जिसमें भट्ट विरोधी पार्टी के नेता से ये पूछ रहे हैं कि एमाइकस क्यूरी के मामले में कोई प्रगति हुई या नहीं, समय बीतता जा रहा है और हमें तुरंत कदम उठाने होंगे.

 

यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इस बात का भी जिक्र किया है कि जिस तरह से संजीव भट्ट के ईमेल सामने हैं, उससे पता चलता है कि वो न सिर्फ विपक्षी पार्टी, बल्कि कुछ बड़े एनजीओ कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ पत्रकारों के भी संपर्क में थे और पूरे मामले में कैसे आगे बढ़ा जाए, इसकी तैयारी कर रहे थे.

 

इन्हीं सब ईमेल के हवाले से कोर्ट ने ये निष्कर्ष निकाला है कि संजीव भट्ट आईपीएस अधिकारी होने के बावजूद राज्य के प्रमुख विपक्षी नेताओं के संपर्क मे थे और उनका पूरा व्यवहार उचित नहीं था. अदालत ने ये भी कहा है कि भट्ट अदालत में स्वच्छ हाथ से नहीं आए हैं. जाहिर है, देश की सबसे बड़ी अदालत के इस फैसले और उसमें की गई टिप्पणियों से ये साफ है कि भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी होने के बावजूद संजीव भट्ट ने तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी के सामने झूठे मामले को खड़ा करने की कोशिश की और इस साजिश में विपक्षी पार्टियों के नेताओं, एनजीओ कार्यकर्ताओं और कुछ पत्रकारों को भी जोड़ा.

 

गौरतलब है कि जिस वक्त का ये मामला है उस समय राज्य की विपक्षी पार्टी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अर्जुन मोढ़वा़ड़िया थे, जबकि गुजरात विधानसभा में विपक्ष के नेता शक्तिसिंह गोहिल थे. बीजेपी ने ये आरोप लगाया था कि भट्ट और विपक्षी पार्टी के नेता के बीच के ईमेल में जिस पैकेज का जिक्र है, उसका मतलब विपक्ष की तरफ से भट्ट को दी जाने वाली मोटी रकम की किश्त है.

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Web Title: Sanjiv Bhatt a tool in hands of opposition parties: Supreme Court
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