विकलांगो की मां - "सविता मां"

By: | Last Updated: Tuesday, 12 August 2014 5:22 PM
savita maa

नई दिल्लीः आज के मौजुदा वक्त मे हर कोई अपने और सिर्फ अपनो के बारे मे ही सोचता है किसी को भी दुसरे के बारे मे सोचने जानने की फुरसत नही है. ऐसे मे अगर विकलांग और समाज से तिरस्कृत लोगो के बारे अगर सोचने और उनके लिए कुछ करने की बात हो तो लोग कोसो दुर नजर आयेंगे. लेकिन जनपद गाजीपुर मे एक दो नही बल्कि 200 विकलांग और मुक बधिर बच्चो की मां सविता,मां बनी हुई है जो पेशे  से आर0ई0एस0विभाग मे लेखाकार के पद पर कार्यरत है और बिना किसी सरकारी सहायता के अपने वेतन के दम पर पिछले कई सालो से विकलांगो की देखभाल,पढाई,भोजन,और हास्टल की सुविधा दे रही है.

 

आज के मौजुदा समय मे एक बच्चे को संभालना मां के लिए बडी बात है वही जनपद मे एक ऐसी मां है जो एक दो नही बल्कि 200 विकलांग बच्चो को प्रतिदिन संभालती ही नही है बल्कि उन्हे अपने पैरो पर खडे करने के लिए उन्हे ’शिक्षा के साथ ही व्यावसायिक ’शिक्षा  भी देती है. ताकी ये बडे होकर किसी पर बोझ बनने के बजाय वे आत्मनिर्भर बन सके. जी हां हम बात कर रहे है पैरो से विकलांग सविता सिंह की जिन्हे बच्चे प्यार से सविता मां भी पुकारते है.

 

इन्होने विकलांगो के दर्द को महसुस किया और उनकी जिंदगी रो’ान करने के लिए खुद को फना कर दिया. इनके द्वारा संचालित राजे’वरी विकलांग विद्यालय मे दो सो से अधिक बच्चे ’शिक्षा ग्रहण कर रहे है. पढाई के लिए किताब कापी और ड्रेस भी उन्हे मिलता है. सविता सिंह ने विकलांगो को ही अपना पुरा परिवार मान लिया है. सविता सिंह अपने 6 भाई बहनो सबसे छोटी थी स्वस्थ पैदा हुई लेकिन 6 माह बाद एक पैर पोलियो से ग्रस्त हो गया.

मां बाप ने ईलाज के बहुत सारे प्रयास किये लेकिन सफल नही हो पाये. सविता सिंह विकलांगता के बाद भी अपनी पढाई पुरी कर ग्रामीण अभियंत्रण सेवा मे लेखाकार के पद पर कार्यरत होकर विवाह ना करने का फैसला किया. वे खुद विकलांग है इसलिए दुसरे विकलांग का दर्द खुद महसुस करती है. उनकी सेवा को ही अपना संकल्प मान लिया है. और परिवार ने भी इनके फैसले का सम्मान किया. और साल 2004 से ही विकलांगो के सेवा के लिए इस विद्यालय को आरम्भ किया.

 

इन विकलांग बच्चो को पढाने और आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई तरह की समस्या भी इनके सामने आती है. सबसे बडी समस्या उनहे आथिर्के समस्या आती है जिसके लिए ये अपने किसानो से अन्न दान और व्यवसायियो से धन आदी की व्यवस्था करती है साथ ही अपना पुरा वेतन भी इनके देखरेख और स्टाफ के वेतन देने मे खर्च कर डालती है. अब तक इनके इस मिशन को किसी भी तरह की सरकारी सहायता नही मिल पाई है.  वही सरकारी सहायता के नाम पर एक जमीन भी मिला तो यहां के एक रसुखदार मंत्री के चहेतो ने उस पर कब्जा कर रखा है जिसे मुक्त करा पाने मे वे असहाय है.वही सविता अपने इस कार्य के लिए जनपद सहित  जगह सम्मानित भी हो चुकी है.

 

एक ओर जहां सविता सिंह इन विकलांग बच्चो पर अपना जीवन न्योक्षवर कर दिया है वही अपने परिवार और समाज से तिरस्कृत बच्चे इनकी ममता की छाव पाकर आज चहकते और आत्मनिर्भर बनते दिख रहे है और अपनी इस प्यारी मां का गुणगान किये बिना नही रह पाते . क्योकी इनके ही वजह से ये छात्र सिलाई पेन्टिंग बौर ज्वेलरी बनाने मे महारत हासिल कर चुके है.

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