गूंगी लड़की के बलात्कारी को सुप्रीम कोर्ट ने दी सज़ा, कहा- बयान दर्ज न होना बरी करने का आधार नहीं

गूंगी लड़की के बलात्कारी को सुप्रीम कोर्ट ने दी सज़ा, कहा- बयान दर्ज न होना बरी करने का आधार नहीं

बांडु ने 14 साल की जिस लड़की के साथ बलात्कार किया था, वो गूंगी-बहरी और मानसिक रूप से विकलांग थी. उसने अपनी मां को बहुत मुश्किल से अपने साथ हुई घटना की जानकारी दी थी. मां की शिकायत पर एफआईआर दर्ज हुई थी.

By: | Updated: 28 Oct 2017 08:45 PM
SC convicts rapist of dumb & restarted minor
नई दिल्ली: रेप पीड़िता का बयान दर्ज न होने के आधार पर हाई कोर्ट ने एक आरोपी को बरी किया लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कारी ठहराते हुए सज़ा दी. ऐसा महाराष्ट्र के बांडु उर्फ़ दौलत के साथ हुआ.

दरअसल, बांडु ने 14 साल की जिस लड़की के साथ बलात्कार किया था, वो गूंगी-बहरी और मानसिक रूप से विकलांग थी. उसने अपनी मां को बहुत मुश्किल से अपने साथ हुई घटना की जानकारी दी थी. मां की शिकायत पर एफआईआर दर्ज हुई थी.

जांच में पुलिस के जुटाए सबूतों को काफी मानते हुए निचली अदालत ने उसे 10 साल की सज़ा दी. लेकिन हाई कोर्ट ने इस आधार पर उसे बरी कर दिया कि निचली कोर्ट में पीड़िता का न तो बयान दर्ज हुआ, न ही उससे पूछताछ हुई.

मामला 29 जून 2008 का है. नागपुर के एक गांव में रहने वाली पीड़िता को बांडु बहला कर अपने साथ ले गया. पीड़िता का परिवार पहले बांडु के घर पर किराए में रहता था. इसलिए, वो लड़की की हालत जानता था. उसने एक सुनसान जगह पर उससे बलात्कार किया. बाद में उसे गांव के ही बाजार में छोड़ दिया.

बाज़ार में गांव के 2 लोगों ने लड़की को देखा और उसे घर पहुंचाया. लड़की ने मां को इशारों में घटना की जानकारी दी. एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस को भी इशारों में सब कुछ बताया. घटनास्थल और आरोपी की पहचान की. लड़की की मेडिकल जांच में बलात्कार की पुष्टि हुई. उसके कपड़ों की फोरेंसिक जांच से भी सबूत मिले. एक गवाह भी मिला जिसने लड़की को बांडु के साथ देखा था.

इन सबूतों और गवाहों के आधार पर नागपुर के एडिशनल सेशन जज ने दोषी को 10 साल की सज़ा दी. लेकिन 2013 में बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने सज़ा रद्द कर दी. हाई कोर्ट ने निचली अदालत में पीड़िता की गवाही न होने के चलते उसके फैसले को गलत करार दिया.

इसके खिलाफ महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की. सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ए के गोयल और यु यु ललित की बेंच ने निचली अदालत के फैसले को बहाल कर दिया. हालांकि, बांडु की सज़ा 7 साल कर दी गई है.

सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट को सलाह दी है कि वो अपने राज्य में मानसिक विकलांग, गूंगे और बयान देने में असमर्थ लोगों के बयान दर्ज करने के लिए विशेष व्यवस्था करें.

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