बेहतर वैज्ञानिक माहौल की जरुरत

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वैज्ञानिकों से कहा कि सरकार देश में वैज्ञानिक शोध करना आसान बनायेगी, साथ ही उनसे इंजीनियरिंग और शोध के केंद्र में अर्थव्यवस्था, पर्यावरण, उर्जा, संवेदना और निष्पक्षता के पांच सिद्धांतों को रखने को कहा. उन्होंने कहा हम भारत में विज्ञान और शोध को आसान बनायेंगे. नवोन्मेष केवल विज्ञान के लक्ष्य के लिए नहीं होने चाहिए बल्कि वैज्ञानिक प्रक्रियाओं से संचालित होना चाहिए.

 

सच्चाई यह है कि देश में वैज्ञानिक शोध और आविष्कार का माहौल बनाना होगा . इसके साथ ही देश में विज्ञान के कमजोर बुनियादी ढांचें को दुरुस्त करना होगा . इसके लिए सबसे पहले नवोन्मेष ,शोध सहित सभी वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के लिए बजट बढ़ाना होगा . फिलहाल देश में विज्ञान का बजट बहुत कम है पिछले साल भी विज्ञान कांग्रेस में कहा गया था कि सरकार विज्ञान के लिए बजट में जीडीपी का दो फीसदी खर्च करेगी लेकिन वो वादा भी अधूरा रह गया . भारत रत्न से सम्मानित शीर्ष वैज्ञानिक प्रोफेसर सीएनआर राव प्रोफेसर राव के अनुसार विज्ञान के लिए बजट में प्रावधान और जीडीपी में विज्ञान का योगदान दोनों ही संतोषजनक नहीं है. हमारे देश में विज्ञान का मौजूदा बुनियादी ढाँचा ही बेहद कमजोर है . इसीलिए 12वीं के बाद विज्ञान के प्रतिभाशाली छात्र-छात्राएं भौतिकी, रसायन और जीव विज्ञान के बजाय तकनीकी व प्रबंधन से जुड़े पाठ्यक्रमों को प्राथमिकता देने लगे हैं. इन क्षेत्रों में भारी-भरकम पैकेज के साथ-साथ सामाजिक प्रतिष्ठा भी हासिल हो जाती है. मैसूरु में भारतीय विज्ञान कांग्रेस के एक सत्र में प्रोफेसर सीएनआर राव ने विज्ञान छोड़कर सिर्फ पैसे के लिए आईटी कंपनियां ज्वाइन करने वाले युवाओं के प्रति नाखुशी जाहिर करते हुए कहा कि धन अर्जित करने की यह विवशता ठीक नहीं है. उन्होंने कहा कि हमें ऐसे युवा लड़के और लड़कियों की जरूरत है जिनका विज्ञान के प्रति आकर्षण और समर्पण हो.

 

देश में विज्ञान की इस स्थिति के लिए हमारे विद्यार्थी और उनके अभिभावक जिम्मेदार नहीं हैं. दरअसल हमारी शिक्षा प्रणाली में ऐसा बोध ही पैदा नहीं किया गया कि विज्ञान को पाठ्यक्रम में शामिल एक विषय से भी आगे समझा जाए. शायद यही वजह है कि पिछले 50 सालों में देश एक भी ऐसा वैज्ञानिक पैदा नहीं कर पाया, जिसे पूरी दुनिया उसकी अनोखी देन के कारण पहचाने. किसी भारतीय नागरिक को नोबेल भी 86 साल पहले मिला था (सीवी रमन, 1930 भौतिकी). तब से हम भारतीय मूल के विदेशी नागरिकों द्वारा अर्जित नोबेल पर ही खुशी मनाते आए हैं. देश की ज्यादातर यूनिवर्सिटीज के अंदरूनी हालात ऐसे हो गए हैं कि वहां शोध के लिए स्पेस काफी कम रह गया है. उच्च शिक्षा पाने वालों में से केवल एक प्रतिशत छात्र ही शोध करते हैं. किन विषयों पर शोध हो रहा है और समाज के लिए उसकी क्या उपयोगिता है, इसका मूल्यांकन करने वाला कोई नहीं है. इसके उलट नियामक संस्थाओं के कई सारे ऐसे प्रावधान हैं, जो गंभीर शोधपरक संस्कृति के विकास में रुकावट डालते हैं. वास्तव में विज्ञान के क्षेत्र में विकास के लिए वैज्ञानिकों की जरूरत होगी और वो भी आधारभूत विज्ञान विषयों से जुडे शोधार्थियों की, इसलिए यह जरूरी है कि मेधावी छात्रों को विज्ञान विषय को पढ़ने के लिए आकर्षित किया जाए. विज्ञान के छात्रों और शोधार्थियों को रोजगार की सुनिश्चित गारंटी दी जाए. वैज्ञानिक अनुसंधान कल-कल बहती जलधारा की तरह है इनमें सततता जरूरी है एवं स्वायतता भी. आज जरुरत है विज्ञान के विषय में गंभीरता से एक राष्ट्रीय नीति बनाने की और उस पर संजीदगी से अमल करने की .

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनुसंधान और इंजीनियरिंग के लिए ‘पांच ई’ का सिद्धांत देते हुए कहा कि वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीविद अगर पांच ई के सिद्धांत पर अमल करेंगे तो विज्ञान का प्रभाव काफी बढ़ेगा. ‘पांच ई’ मंत्र में अर्थव्यवस्था (इकॉनॉमी), पर्यावरण (एनवॉयरमेंट), ऊर्जा(एनर्जी) सहानुभूति(एम्पेथी) और न्यायसंगत (ईक्विटी) हैं. उन्होंने कहा कि वाजिब और प्रभावशाली उपाय अपनाने पर अर्थव्यवस्था (ईकोनोमी) का मंत्र फलीभूत होगा, पर्यावरण (एंनवॉयरमेंट) यानी जब हमारा कार्बन फुटप्रिंट सबसे कम होगा और ऊर्जा(एनर्जी) का मंत्र तब फलीभूत होगा जब हम हमारी संपन्नता ऊर्जा पर कम से कम निर्भर होगी और हम जिस ऊर्जा का प्रयोग करेंगे वह हमारे आकाश को नीला और पृथ्वी को हरा-भरा रखेगी. सहानुभूति(एम्पेथी) तब आएगी, जब प्रयास संस्कृति, परिस्थिति और सामाजिक बदलाव के अनुकूल होंगे और न्यायसंगत (ईक्विटी) तब होगा, जब विज्ञान समावेशी विकास को बढ़ाएगा और सबसे कमजोर का कल्याण करेगा. इस बार भारतीय विज्ञान कांग्रेस का मुख्य विषय ‘‘भारत में स्वदेशी विकास के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी’ था . प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि आर्थिक वृद्धि, रोजगार के अवसर और समृद्धि के लिए शहर महत्वपूर्ण इंजन है. हमें तेजी से बढते शहरीकरण की चुनौतियों से निपटना होगा. यह सतत विश्व के लिए महत्वपूर्ण है. हमें स्थानीय पारिस्थितिकी और धरोहर को ध्यान में रखते हुए संवेदनशीलता के साथ योजना बनाकर शहरों का वैज्ञानिक रास्तों से विकास करना चाहिए. आज वैश्विक उर्जा मांग की दो तिहाई से अधिक हिस्सेदारी शहरों की है, इसके परिणामस्वरुप 80 प्रतिशत तक वैश्विक ग्रीन हाउस उत्सर्जन होता है. स्वच्छ हरित उर्जा प्रौद्योगिकी उपलब्ध कराने, सभी के लिए इसे सुगम और वहनीय बनाने के लिए हमें शोध एवं नवोन्मेष की जरुरत है. हमें शहरी योजना को स्थानीय पारिस्थितिकी और धरोहर से जुडी संवेदनशीलता के साथ बेहतर बनाना चाहिए और हमें ठोस कचरा प्रबंधन का व्यवहारिक एवं वहनीय समाधान निकालना चाहिए.

 

सच्चाई यह है कि शोध और अनुसंधान किसी भी देश की तर्रक्की में सबसे ज्यादा सहायक होते है . बिना इसके देश प्रगति के रास्ते पर निरंतर आगे बढ़ सकता . अंतरिक्ष के क्षेत्र में हमनें कई असाधारण उपलब्धियां हाँसिल की है लेकिन विज्ञान के कई अन्य क्षेत्रों में हमनें पर्याप्त ध्यान नहीं दिया . दुनिया को बताने लायक हमने कोई नई खोज और आविष्कार नहीं किया है. जबकि पड़ोसी देश चीन पूरे योजनाबद्ध तरीके से काम कर रहा है. वहां जो भी काम होता है वह विशाल और युद्ध स्तर पर होता है. चाहे वह सड़क निर्माण का कार्य हो, अंतरिक्ष कार्यक्रम हो या फिर ओलम्पिक को फतह करने का काम. चीन ने यह जान लिया है और मान लिया है कि बौद्धिक संपदा के विकास और उसकी समृद्धि के बिना वह अमेरिका को नहीं पछाड़ सकता है. इसी का नतीजा है कि अब वह विज्ञान के क्षेत्र में शोध और विकास पर बड़े पैमाने पर जुट गया है. चीन के विश्वविद्यालय और उद्योग वैज्ञानिक बड़े पैमाने पर इस काम को अंजाम दे रहे हैं. इसके लिए वहां की सरकार ने अपने खजाने खोल दिए है और अनुकूल माहौल भी बना दिया है. चीन में इस क्षेत्र में खास तरह की एकाग्रता और खुलापन देखने को मिल रहा है. जबकि हमने इस बारे में अब सोचना ही शुरू किया है. इसी तरह अमेरिका बुनियादी विज्ञान विषयों की प्रगति का पूरा ध्यान रखता है. उसकी नीति है कि वैज्ञानिक मजदूर तो वह भारत से लेगा, पर विज्ञान और टेक्नोलॉजी के ज्ञान पर कड़ा नियत्रंण रखेगा. चीन में भी शिक्षा का व्यावसायीकरण हुआ है, पर बुनियादी विज्ञान और टेक्नोलॉजी की प्रगति का उसने पूरा ध्यान रखा है. भारत को चीन से शिक्षा लेनी चाहिए. ‘वर्ल्ड क्लास’ बनने के लिए बुनियादी विज्ञान का विकास जरूरी है.

 

प्रधानमंत्री जी को अपने वादे पर अमल करते हुए केंद्रीय बजट में विज्ञान और अनुसंधान के लिए और अधिक धनराशि स्वीकृत करनी चाहिए जिससे देश में वैज्ञानिक अनुसंधान में धन की कमी आड़े न आये और देश में वैज्ञानिक शोध और आविष्कार का एक सकारात्मक माहौल बने . देश के विज्ञान कांग्रेस जैसे समारोह एक वैज्ञानिक माहौल पैदा करने के लिए जरूरी है और ये एक सकारात्मक कदम है लेकिन बेहतर होगा जब इस तरह के समारोहों से विज्ञान ,शोध और अनुसंधान के लिए कोई ठोस कदम उठाये जाए जिससे देश का आम आदमी भी विज्ञान से जुडाव महसूस कर सके .

लेखक
शशांक द्विवेदी
डिप्टी डायरेक्टर (रिसर्च), मेवाड़ यूनिवर्सिटी ,चित्तौड़गढ़ ,(राजस्थान )

 

नोट: यह लेखक का स्वतंत्र विचार है.

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