सत्ता की भाषा एक ही होती है?

By: | Last Updated: Wednesday, 25 March 2015 11:53 AM
Section 66A

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कल आईटी एक्ट की धारा 66A को खत्म कर दिया जिसके बाद सोशल मीडिया पर कुछ लिखने पर तुरंत गिरफ्तारी नहीं हो सकती है . सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का कांग्रेस ने स्वागत किया है, वहीं बीजेपी दबी जुबां से कह रही है बोलने की आजादी पर कुछ प्रतिबंध जरुरी है . बीजेपी और कांग्रेस के इस रुख के बाद एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है क्या सत्ता की भाषा एक होती है ?

 

सुप्रीम कोर्ट ने आईटी एक्ट की जिस धारा 66 A को निरस्त किया है, उसे यूपीए सरकार ने साल 2008 में लागू किया था . अब जब सुप्रीम कोर्ट ने इस धारा को खत्म कर दिया है तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम कर रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा सही फैसला किया है. मैं सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का स्वागत करता हूं जिसमें कोर्ट ने धारा 66 a को असंवैधानिक बताया है . इस धारा की रुपरेखा गलत तरीके से तैयार की गई थी और ये खतरनाक थी .

 

ये उन पी चिदंबरम का बयान है जिनके बेटे कार्ति चिदंबरम के खिलाफ टिप्पणी के लिए एक व्यापारी को इसी कानून के तहत जेल जाना पडा था . बीजेपी विपक्ष में रहते हुए कई मौकों पर इस धारा का विरोध कर चुकी थी लेकिन अब सत्ता में आने के बाद वो दबी जुबां में कह रही है कि धारा को पूरी तरह खत्म नहीं किया जाना चाहिए .

 

सत्ता में रहते हुए कांग्रेस आईटी एक्ट की धारा 66 A को जरुरी मानती थी, अब सत्ता में आयी बीजेपी इस धारा को जरुरी मान रही है . बडा सवाल- क्या सत्ता की भाषा एक होती है ?

 

सत्ता के इस बदलते सुर की कहानी को समझने के लिए थोड़ा पीछे चलते हैं . 26/11 के मुंबई हमले के समय एटीएस चीफ हेमंत करकरे आतंकवादियों की गोली से शहीद हुए थे, लेकिन उस समय के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री ए आर अंतुले ने करकरे की मौत में साजिश की बात करते हुए जांच की मांग कर दी थी .

 

अंतुले के इस बयान पर 22 दिसंबर 2008 को लोकसभा में जबरदस्त हंगामा हुआ और उसी हंगामे के बीच सरकार ने आधे घंटे के अंदर लोकसभा में तीन बिल पास करा लिए जिसमें एक बिल आईटी एक्ट की धारा 66A से जुड़ा था. उसके अगले दिन यानी 23 दिसंबर 2008 को ये बिल राज्यसभा में भी बिना चर्चा के पास हो गया . मतलब, बोलने की आजादी पर रोक लगानेवाला बिल दोनों सदनों में बिना चर्चा के पास हो गया था.

 

गौरतलब है कि ये बिल आईटी मंत्रालय से संबधित स्टैंडिग कमेटी के पास भी विचार विमर्श के लिए गया था. उस स्टैंडिग कमेटी में मोदी सरकार के टेलिकॉम मंत्री रविशंकर प्रसाद भी थे लेकिन स्टैंडिंग कमेटी के किसी सदस्य को उस समय नहीं लगा था कि आईटी एक्ट की धारा 66A का इस कदर दुरुपयोग हो सकता है कि ममता बनर्जी अपने कॉर्टून से नाराज होकर प्रोफेसर अंबिकेश महापात्रा को जेल भेज देगी .

 

ममता बनर्जी का कॉर्टून बनानेवाले अंबिकेश महापात्रा की गिरफ्तारी के बाद आईटी एक्ट की धारा 66A के दुरुपयोग का मुद्दा जोर शोर से उठा था लेकिन मनमोहन सरकार के वरिष्ठ मंत्री कपिल सिब्बल उस समय मजबूती से इस कानून के पक्ष में खड़े रहते थे .

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