बॉलीवुड का सबसे बड़ा स्कैंडल: कैसे दी गई सेंसर बोर्ड के सीईओ को घूस?

By: | Last Updated: Wednesday, 20 August 2014 2:59 PM
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नई दिल्ली: आज जो खबर हम आपको देने जा रहे हैं वह चौंकाती भी है और तकलीफ भी देती है. बॉलीवुड का सबसे बड़ा स्कैंडल. एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने की गुहार कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ उनका ही एक बड़ा अधिकारी रिश्वतखोरी के इल्जाम में जेल पहुंच गया है. सीबीआई ने केंद्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड के सीईओ राकेश कुमार को बिचौलियों के जरिए एक छत्तीसगढ़ी फिल्म को सेंसरबोर्ड का प्रमाणपत्र देने के लिए 70 हजार रुपये की घूस लेने के लिए गिरफ्तार किया गया है.

 

फिल्मों की सपनीली दुनिया का सबसे बड़ा ख्वाब है ये. फिल्म बने तो उसे थिएटर भी नसीब हो . दर्शक नसीब हों. छत्तीसगढ़ी भाषा की फिल्म मोर डौकी के बिहाव भी इसी सपने के साथ बनाई गई थी लेकिन इसे चुकानी पड़ी इस सपने की कीमत.

 

छत्तीसगढ़ी भाषा की इस फिल्म मोर डौकी के बिहाव को सेंसर बोर्ड का सर्टिफिकेट तब मिला जब आरोप के मुताबिक सेंसर बोर्ड के इस आला अधिकारी राकेश कुमार की जेब 70 हजार रुपये की रिश्वत से गर्म कर दी गई.

 

कैसे दी गई 70 हजार रूपये की घूस?

आरोप के मुताबिक छत्तीसगढ़ी फिल्म को सेंसर बोर्ड का सर्टिफिकेट दिलवाने के लिए फिल्म निर्देशक क्षमानिधि मिश्रा जो कि गायक और अभिनेता भी हैं, ने आधिकारिक एजेंट श्रीपति मिश्रा को ये काम सौंपा था . एजेंट श्रीपति मिश्रा ने फिल्म को सेंसर बोर्ड का सर्टिफिकेट दिलवाने के लिए सेंसर बोर्ड के सलाहकार प्रकाश जायसवाल से संपर्क साधा. जायसवाल के जरिए सेंसर बोर्ड के सीईओ राकेश कुमार को रकम पहुंचाई गई और फिल्म को सर्टिफिकेट मिल गया.

 

इस मामले में श्रीपति मिश्रा, बोर्ड के सलाहकार प्रकाश जायसवाल की गिरफ्तारी के बाद राकेश कुमार को भी गिरफ्तार कर लिया गया है.

 

कौन हैं राकेश कुमार?

 

जिस शख्स को रिश्वत देने का आरोप लगा है वह राकेश कुमार सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन जिसे आसान भाषा में हम और आप सेंसर बोर्ड कहते हैं उसके सीईओ हैं. सेंसर बोर्ड में उनकी नियुक्ति साल 2014 की जनवरी यानी सिर्फ सात महीने पहले हुई थी. चौंकाने वाली बात ये है कि फिल्मों को सर्टिफिकेट देने वाली संस्था के ये बड़े अधिकारी रेलवे विभाग से सीधे फिल्म सेंसर बोर्ड में आए और फिल्मों की तकदीर तय करने लगे. राकेश ने 1997 यानी 17 साल पहले रेल विभाग में बतौर आईआरएस नौकरी शुरू की थी. सेंसर बोर्ड में आने से पहले राकेश कुमार वडोदरा के रेल विभाग में तैनात थे.

 

सेंसर बोर्ड घूस कांड: सलमान खान की फिल्म किक से जुड़े लोगों ने भी राकेश कुमार से संपर्क किया था

 

राकेश कुमार को एक छत्तीसगढ़ी फिल्म को सर्टिफिकेट देने के लिए गिरफ्तार किया गया है लेकिन सीबीआई से जुड़े सूत्रों के मुताबिक ये इकलौता मामला नहीं है. कई दूसरी बड़ी हिदी फिल्मों के लिए भी ऐसी ही सौदेबाजी की खबर जांच एंजेसी को मिली है. दरअसल वजह ये है कि मनोरंजन की दुनिया में सेंसर बोर्ड के पास इतने अधिकार हैं कि निर्माता निर्देशक उसके सामने घुटने टेकने पर मजबूर हो जाते हैं.

 

क्या है फिल्म सेंसर बोर्ड ?

कोई भी फिल्म सेंसर बोर्ड की मंजूरी के बिना पर्दे तक नहीं पहुंच सकती. कुछ ऐसी है सेंसर बोर्ड की ताकत फिल्म सेंसर बोर्ड का पूरा नाम है केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड या फिर सेंट्रल बोर्ड फॉर फिल्म सर्टिफिकेशन. फिल्मों में दिखाए जाने वाले हर दृश्य पर मुहर लगाने वाली ये संस्था केंद्र सरकार के तहत काम करती है.

 

सेंसर बोर्ड के मुखिया होते हैं सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष. फिलहाल इस पद पर मशहूर नृत्यांगना लीला सैमसन तैनात हैं. उनके मातहत काम करते हैं सीईओ. इसी पद पर राकेश कुमार तैनात थे जो अब गिरफ्तार हो चुके हैं . सीईओ के तहत देश के नौ अलग अलग हिस्सों में क्षेत्रीय़ सेंसरबोर्ड कार्यालय काम करता हैं. ये दफ्तर मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, बैंगलोर, हैदराबाद तिरुअनंतपुरम, नई दिल्ली, कटक और गुवाहाटी में हैं. इसके साथ साथ 12 से 25 सदस्यों को सेंसर बोर्ड में केंद्र की सिफारिश पर सलाहकार भी बनाया जाता है.

 

अब जरा वो सर्टिफिकेट भी देखिए जो ये बोर्ड फिल्मों को देता है –

यू सर्टिफिकेट– यानी वे फिल्म जिसे हर कोई देख सकता है

ए सर्टिफिकेट– जिसे सिर्फ वयस्क लोग देख सकते हैं

यूए सर्टिफिकेट– यानी सबके लिए लेकिन 12 साल से छोटे बच्चों को माता पिता की सलाह जरूरी है और एस सर्टिफिकेट – यानी वो फिल्म जिसे कोई खास दर्शक वर्ग ही देख सकता है.

 

तरीका ये होता है कि निर्माता निर्देशक रिलीज से पहले अपनी फिल्म क्षेत्रीय कार्यालय या फिर मुंबई में मौजूद सेंसर बोर्ड के हेडऑफिस में जमा करवाते हैं. छोटी फिल्म है तो सेंसर बोर्ड और सलाहकार बोर्ड के एक एक अधिकारी जिसमें एक महिला जरूरी है फिल्म पर फैसला लेते हैं जबकि बड़ी फिल्मों के लिए दो-दो अधिकारी फिल्म पर फैसला लेते हैं. बदलाव करने हों तो सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष समेत 9 सदस्यों का पैनल फिल्म को देखता है. निर्देश के मुताबिक फिल्म में कांट छांट होती है जिसके बाद सर्टिफिकेट मिलता है.

 

लेकिन अरसे से सेंसर बोर्ड के फैसलों में मनमानी का आरोप लगता रहा है लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है कि सेंसर बोर्ड का कोई अधिकारी घूस लेने के आरोप में जेल पहुंच गया है.

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