बिहार में सहयोगियों के नखरें क्यों सह रही है बीजेपी?

By: | Last Updated: Wednesday, 16 September 2015 4:41 PM
Setback for NDA

नई दिल्ली: सीट बंटवारे के बाद से ही एनडीए में महाभारत छिड़ा हुआ है. मंगलवार की रात बीजेपी ने 43 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी की. इसमें पार्टी ने 5 मौजूदा विधायकों का पत्ता साफ कर दिया. इन्हीं में से एक विधायक अब बागी हो गया है.

 

अमन पासवान भागलपुर जिले की पीरपैंती सीट से विधायक हैं. बीजेपी ने इस सीट से ललन पासवान को टिकट दिया है. गुस्साए अमन पासवान ने नीतीश से मुलाकात की है और जेडीयू का टिकट मांगा है.

 

बीजेपी में तो टिकट कटने से विधायक बागी हुए हैं. लेकिन सहयोगी पार्टियों ने बीजेपी को पानी पिला रखा है. कभी पासवान नाराज होते हैं तो कभी मांझी. अब उपेंद्र कुशवाहा ने मुंह फुला रखा है.

 

कुशवाहा क्यों हुए नाराज ?

 

सीट बंटवारे में कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के खाते में 23 सीटें गई हैं. सीटों की संख्या को लेकर तो कुशवाहा को कोई एतराज नहीं है. लेकिन बीजेपी ने मंगलवार को उम्मीदवारों की जो पहली लिस्ट जारी की है उससे पार्टी परेशान है.

 

असली विवाद उस काराकट सीट को लेकर है जहां से उपेंद्र कुशवाहा खुद सांसद हैं. बीजेपी ने इस सीट से जेडीयू छोड़कर आए राजेश्वर राज को टिकट दिया है. कुशवाहा की पार्टी इस पर अपना दावा कर रही थी.

 

कुशवाहा के नखरे क्यों सह रही बीजेपी?

 

उपेंद्र कुशवाहा जिस कोइरी जाति से आते हैं वो बिहार में पैसे और प्रभाव वाली बिरादरी है. ओबीसी बिरादरी की इस मजबूत जाति के वोट बैंक पर नीतीश कुमार की पकड थी. लोकसभा चुनाव के वक्त कोइरी वोट बैंक में सेंध लगी. बीजेपी नहीं चाहती कि कुशवाहा को नाराज करके कोइरी वोटरों को नाराज किया जाए.

 

बिहार में कोइरी जाति के वोटरों की संख्या 6 फीसदी है. लोकसभा चुनाव में करीब 26 फीसदी कुर्मी कोइरी वोट एनडीए को मिले थे.

 

पासवान की परेशानी क्या है ?

 

रामविलास पासवान का आरोप है कि बीजेपी ने जितनी सीटें देने का वादा किया था उतना नहीं दिया. पासवान की पार्टी कुशवाहा की पार्टी को मिली सीटों के फॉर्मूले के हिसाब से बंटवारा चाह रही थी. कुशवाहा फॉर्मूले से अगर सीट बंटवारा होता तो फिर 46 सीटें उनके खाते में जाती. लेकिन बीजेपी ने उन्हें 40 पर ही सेट कर दिया. नतीजा हुआ कि रामा सिंह जैसे पार्टी के बाहुबली सांसद को बागी होना पड़ा है.

 

पासवान के नखरे क्यों सह रही बीजेपी ?

 

दलित वर्ग के एक खास समूह पर पासवान की अच्छी पकड़ है. अपना वोट ट्रांसफर कराने में पासवान माहिर माने जाते हैं. लोकसभा चुनाव में पासवान बीजेपी को अपनी इस ताकत का एहसास करा चुके हैं.

 

पिछले साल लोकसभा चुनाव में पासवान की जाति के 68 फीसदी वोट एनडीए को मिले थे. जो सवर्णों के वोट से महज दस फीसदी ही कम था. पासवान जिस दलित वर्ग से आते हैं उसकी आबादी बिहार में साढ़े चार फीसदी है. और दलितों में ये समुदाय दबंग भी माना जाता है.

 

बीजेपी का विजय फैक्टर ही दलित-महादलित वोट बैंक है. ऐसे में बीजेपी हर हाल में पासवान को खुश रखना चाहती है.

 

मांझी क्यों मुंह फुलाए हैं ?

मांझी की पार्टी को बीजेपी ने लड़ने के लिए बीस सीटें दी हैं . मांझी की मांग इससे कहीं ज्यादा की थी . सीट बंटवारे को लेकर मांझी ने तीन दिन तक मुंह फुलाए रखा . सीट बंटने के बाद भी सबको मांझी खुश नहीं रख पाए और पार्टी के बड़े नेता देवेंद्र यादव ने इस्तीफा दे दिया .

 

मांझी के नखरे क्यों सह रही बीजेपी ?

महादलित वोटरों पर मांझी की अच्छी पकड है. नीतीश का साथ छोड़ने के बाद मांझी महादलितों के बड़े नेता बनकर उभरे हैं.

 

लोकसभा चुनाव में जब मांझी बीजेपी के साथ नहीं थे तब महादलितों का 33 फीसदी वोट एनडीए को मिला था. अब मांझी साथ हैं तो बीजेपी को लग रहा है कि और ज्यादा वोट मिलेंगे.

 

इऩ नेताओं का भविष्य तो चुनाव के नतीजे तय करेंगे. फिलहाल बीजेपी कोई रिस्क लेकर आगे नहीं बढ़ना चाहती. यही वजह है कि अपनी अपनी बिरादरी के इन तमाम राजनीतिक हस्तियों को साधे रखने के लिए बीजेपी इनके नखरे सह रही है.

India News से जुड़े हर समाचार के लिए हमे फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस पर फॉलो करें साथ ही हमारा Hindi News App डाउनलोड करें
Web Title: Setback for NDA
Explore Hindi News from politics, Bollywood, sports, education, trending, crime, business, साथ ही साथ और भी दिलचस्प हिंदी समाचार
First Published:

Get the Latest Coupons and Promo codes for 2017