प्रेस कॉन्फ्रेंस: 'उफ न करुंगा, आंसू पी लूगां लेकिन मैं आडवानी जी, अटल जी की कद्र करना नहीं छोडूंगा'

By: | Last Updated: Saturday, 29 August 2015 2:28 PM
shatrughan sinha

एबीपी न्यूज के खास कार्यक्रम में आज शत्रुघन सिन्हा से सवाल और जवाब.

सवाल दिबांग- शत्रु जी आप किस रोल में हैं? आप हीरो हैं, विलेन हैं, कैरेक्टर आर्टिस्ट हैं, आप बीजेपी के साथ हैं या जेडीयू के साथ, नीतीश कुमार के साथ हैं.

 

जवाब शत्रुघन- जबाव देने से पहले ये कहना ज़रूरी होगा कि मैं पहला व्यक्ति पूरे भारत के फिल्म उद्योग से हूं, जो भरपूर जवानी में ऊंचाइयों के शिखर पर टायर्ड और रिटायर्ड हुए बगैर अपने सामाजिक जिम्मेदारी के तहत जय प्रकाश नारायण, नाना जी देशमुख, अटल बिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवानी से प्रेरित होकर राजनीति में आया. मैं उस वक्त बीजेपी में आया जब सिर्फ दो सीटों की पार्टी थी. जिसका दूर-दूर तक किसी ने नहीं सोचा था कि सत्ता में आएगी. उस वक्त से लेकर आज तक मैं सुख-दुख का भागीदार रहा हूं बीजेपी का, दमखम के साथ चला हूं. आज तक कहीं किसी और पार्टी में नहीं गया हूं मैं. बीजेपी में पहली और शायद इंशा अल्लाह मेरी आखिरी पार्टी होगी. इसके बाद ये पूछने का कोई महत्व ही नहीं बनता कि मैं किसके साथ हूं. दोस्ती अलग जगह है, व्यक्तिगत रिश्ते और संबंध वो शिष्टाचार के तहत आते हैं, वो संस्कार के तहत आते हैं.

जेपी जी के पॉलिटिक्स का हेल्थी प्रोडक्ट हूं तो इसका मतलब कि हमारा विपक्षी हमारा दुश्मन नहीं है. वो सब हमारे ही समाज के हैं.

 

दिबांग- आप तो अच्छे एक्टर हैं लेकिन राजनीति में आप की एक्टिंग लगती है कि आप पार्टी में हैं फिर भी विलेन हैं. विलेन के रोल में आप क्यों आ जाते हैं. ये सवाल आप से क्यों पूछा जाता है.

 

जवाब शत्रुघन- मैं विलेन या जीरो से हीरो बना हूं फिल्मों में भी और भारतीय फिल्म उद्योग का रिकॉर्ड कायम हुआ कि पहला आदमी जो कैबिनेट मिनिस्टर बना. आज तक भारतीय फिल्म उद्योग का कोई आदमी कैबिनेट मिनिस्टर नहीं बना है. बड़े-बड़े लोग आए चाहे साउथ इंडिया में वो स्टेट पॉलिटिक्स में रहे, कैबिनेट मिनिस्टर कोई नहीं बना. तो मैं संघर्ष करके जीरो से हीरो फिल्मों और राजनीति में बना. इसलिए हीरो हूं, था और हीरो ही रहूंगा. अब रही बात कि लोग ऐसा क्यों सोचते हैं तो वो चश्मा पहने हैं, उनमें सब नहीं हैं, कुछ लोग हैं. चश्में की वजह से उनको ऐसा दिखाई पड़ रहा है. मैं अगर जाता हूं किसी से मिलता हूं, अभी हमारे प्रधान मंत्री डैसिंग डायमिक एक्शन हीरो नरेंद्र मोदी जी. अभी दिग्विजय सिंह के यहां गए थे, हाथ पकड़ कर घूम रहे थे उनकी शादी में या मुलायम सिंह के यहां जो इंगेजमेंट थी या लालू यादव जी थे वहां लालू जी का हाल-चाल पूछा तो ये शिष्टाचार है. इसमें ज्यादा राजनीति पड़ने की जरूरत नहीं है.

 

अगर मैं नीतीश कुमार जी से मिलता हूं और बिहार के विकास के बारे में, अपने संसदीय क्षेत्र के बारे में. एक फिल्म सिटी का प्रोजेक्ट हमने दिया हुआ है, जिसको केजरीवाल जी ने मांगा है और उस पर अपनी सहमती जतायी है कि बहुत अच्छा लगा. अगर वो प्रोजेक्ट लेकर मैं सालों से संघर्ष कर रहा हूं. और हमारे कुछ लोग जब सरकार में थे भी तो जिन खास कारणों से उन्होंने नहीं किया या नहीं करना चाहे तो आज नीतीश जी उसमें इट्रेस्ट ले रहे हैं तो मैं इंड ऑफ द टलन पर लाइट देख रहा हूं कि सामने आ जाएगा. तो फिर मैं अपने बिहार के मुखिया, बिहार के गार्जियन, हमारे व्यक्तिगत मित्र और दोस्त नीतीश बाबू से मिलता हूं तो इसमें कहां कुछ गलत है, इसमें कहां राजनीति है.

 

सवाल विनोद- बीजेपी से आपका पुराना नाता है और आप कई बार सांसद और मंत्री रहे लेकिन जिस तरह से आप पार्टी लाइन से अलग जाकर चाहे वो याकूब मेमन वाला मसला हो फांसी के सजा के खिलाफ आप ने बात की.

 

जवाब शत्रुघन- दस्तखत नहीं किया हमने, यही कहा कि जो लोग चश्मा पहनते हैं जब उनका हर वार खाली जाता है तो फिर कोई नया तीर छोड़ देते हैं. मैं क्लीयर कर दूं कि मैंने कभी कोई दस्तखत नहीं किया. और रही बात फांसी की सजा कि तो आज से नहीं शुरु से खिलाफ हूं. दुनिया के बहुत सारे मुल्क ऐसे हैं जहां फांसी की सजा नहीं दी जाती है. चाहे बिहारी, पंजाबी, हिंदू, मुस्लिम किसी को भी मिले मैं उसके खिलाफ हूं. लेकिन हां अगर भारत के संविधान में है तो मैं भारत के संविधान के साथ हूं और कानून को सलाम करता हूं.

 

विनोद- मेरा सवाल है कि आपकी नाराजगी भारतीय जनता पार्टी से है या भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से है.

 

जवाब शत्रुघन- बहुत अच्छे से कन्क्लूड किया विनोद जी आपने मैं आप की तारीफ करता हूं. पहली बात तो ये कि मुझे बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व से कभी कोई मतभेद रहा ही नहीं. उनका जितना स्नेह, प्यार, मान मिला. मेरे एक फोन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, शायद पीएम बनने के बाद सबसे पहले अगर किसी के यहां शादी में गए तो मेरे यहां आए और सिर्फ शादी में आए मुंबई, शादी अटेंड की और आशीर्वाद दिया मेरे बेटे और उसकी पत्नी को. मैं उनका तहे दिल से आभारी हूं. कि जो प्यार सम्मान मेरे बच्चों को दिया. तो उनसे तो कभी कोई मतभेद रहा ही नहीं. आडवानी जी तो मेरे गाइड गुरु की तरह रहे हैं, मैं जिंदगी में बहुत कुछ सीखा है उनसे. अटल जी रहे हों. कभी भी आपने सुना है कि मैंने या राजनाथ सिंह जी ने कभी मेरे खिलाफ बोला है या मैंने बोला हो. सुषमा स्वराज जी मेरे बहुत अच्छी मित्र हैं, मनपसंद नेता हैं, कभी सुना कि उन्होंने मेरे खिलाफ या मैंने उनके खिलाफ कुछ बोला है. पार्टी में कुछ लोग हैं मैं यहां नहीं बोलना चाहता जो अपनी इनसिक्योरिटी से  यानि मैं जाता हूं तो एक टॉरिंग पर्सनालिटी बन जाता हूं, वो शायद बौने हो जाते हैं इसलिए वो हमको रोकने-टोकने की कोशिश करते हैं. लेकिन वो हमारा हार्म नहीं कर रहे हैं, वो अपनी हरकतों से हम तो डूबे हैं सनम तुझे भी ले डूबेंगे, वो कर रहे हैं वो लोग.

   

दिबांग- कौन वो नेता हैं कम से कम इशारा तो कीजिए

शत्रुघन- वैसे तो आप लोग समझदार हैं

दिबांग- कौन से राज्य के हैं, आप ही के राज्य के हैं. सांसद हैं ?

शत्रुघन- हां बिहार स्टेट के ही हैं

दिबांग- क्या मंत्री भी हैं

शत्रुघन- हां मंत्री भी हैं और संत्री भी. अच्छे हैं, बढ़ियां लोग हैं. उनको अपनी कुलबुलाहट, अपनी खलबली, अपना एक भय मैं उनको हार्म नहीं कर रहा हूं. अगर मैं कहीं जाता हूं और टॉरिंग पर्सनालिटी बन जाता हूं या बहुत ज्यादा भीड़ आती है, बेपनाह भीड़ आती है. तो इसमें हमसे घबराने या कतराने की क्या जरुरत है? अपनी ही पार्टी का प्रचार हो रहा है. अपनी ही पार्टी की खबरें और विचारधारा आगे जा रही है.

 

दिबांग- ये जो मंत्री है क्या ये पटना के आस-पास के हैं?

शत्रुघन- बहुत जान है आप के सवाल में… हा हा हा.. ज्यादातर लोग पार्टी में ऐसे समय आए हैं जब पार्टी या तो पावर में थी या आने के कगार में थी. मैं सिर्फ एक ऐसा इंसान हूं वो उस वक्त आया जो दूर-दूर तक किसी ने ख्वाब में भी नहीं सोचा कि पार्टी पावर में आएगी और तब से सुख-दुख का भागीदार रहा हूं. अब कुछ लोगों को कांटे की तरह चुभ रहा हूं तो मेरा घाटा नहीं करेंगे. मेरे पास बहुत सारे ऑप्शन हैं लाइफ में अगर चाहूं तो. किताबें भी लिख सकता हूं, संतोष जी के साथ जाकर सामाजिक कार्य कर सकता हूं.

 

दिबांग- मैं आप से फिर एक सवाल पूछ रहा हूं कि आप पार्टी में पहले आए, तब आए जब पार्टी सत्ता में नहीं थी, आप ने पार्टी को उठाया, जिस तरह का फॉलोविंग है बिहार में रहते हुए नए आदमी आते हैं आपको कोहनी मार कर बिठा देते हैं. और आप सिर्फ इशारों में बताते हैं कि कुछ लोग हैं. आप के अंदर कोई कमजोरी रही है कि आप को पार्टी में जिस स्थान पर होना चाहिए वहां आप नहीं पहुंच पाए.

 

जवाब शत्रुघन- मेरी कमजोरी बिहार है, मेरी मजबूती बिहार है. उस बिहार के कुछ लोग अपनी बौखलाहट और घबराहट में मोनोपोलॉइज कर रहे हैं तो मैं तो प्रभु से कहूंगा कि उन्हें भी मांफ करें. लेकिन इसमें कहीं ऐसा ना कि बाजी जीतते-जीतते कहीं चूक जाएं.

सवाल विजय विद्रोही- पार्टी का जो शीर्ष नेतृत्व है वो क्यों आपकी इस प्रतिभा को पहचान नहीं पा रहा है?

शत्रुघन- नहीं शीर्ष नेतृत्व ने बहुत प्रतिभा को पहचाना तभी तो मैं कैबिनेट मिनिस्टर बना था.

विजय विद्रोही- वो शीर्ष नेतृत्व तो अब हासिए पर है मौजूदा शीर्ष नेतृत्व जो है वो क्यों नहीं पहचान पा रहा?

शत्रुघन- आ जाएंगे, पिया खींचे हुए, बंधे हुए चले आएंगे. आज नहीं तो कल आ जाएंगे, कभी-कभी खबरें पहुंचने में देरी हो जाती है. या कई बार डाइलूट हो जाती है. सच्चाई उभर कर सामने आएगी.

 

दिबांग- क्या पार्टी में जिस तरह कि डेमोक्रेसी होनी चाहिए थी, जिस तरह की मेच्यूरिटी पार्टी में होनी चाहिए थी. वो नजर नहीं आती. लोग छोटे-छोटे झगड़ों में उलझ ही जाते हैं वो चाहे कितने ही बड़े पदों पर क्यों ना बैठे हों.

 

जवाब शत्रुघन- कभी-कभी ऐसा होता है लेकिन आप मुझसे मेरे रिश्ते या मेरे संबंधों की बात कर रहे हैं तो मेरे अंदर वो संस्कार हैं कि आप कितने भी मेच्योर्ड हो जाएं, कितने भी बुजुर्ग हो जाएं, कितने भी दमदार, शानदार, जानदार हो जाएं आप अपने माता-पिता, मार्गदर्शकों, अपने बुजुर्गों को नहीं भूलेंते बल्कि यही कामना करते हैं कि हमेशा स्वस्थ्य रहें ताकि आपको अच्छा मार्गदर्शन दे सके. मैंने पहले भी कहा कि आडवानी जी हमारे फ्रैंड फिलास्पर, गाइड गुरू और अल्टीमेट लीडर रहे हैं, आज भी हैं. कुछ लोगों का ये मानना है कि इस बार मंत्री पद इसलिए नहीं मिला, शत्रुघन सिन्हा जिसका ट्रैक रिकॉर्ड अच्छा रहा तो कई लोग कहते हैं शायद जानबूझ कर नहीं दिया गया है कि आडवानी जी को आप मार्गदर्शक मानते रहे हैं. मैं कहना ये चाहता हूं कि पहली बात तो पद देना, नहीं देना ये प्रधानमंत्री का अपना विशेषाधिकार है.

 

अगर वो देते हैं तो बहुत अच्छी बात है, मुझे इस काबिल समझते हैं बहुत अच्छी बात है. नहीं देते हैं तो कोई गिला नहीं, कोई शिकवा नहीं. हां मेरे समर्थकों को, मेरे चाहने वालों को इस बात का जरूर अफसोस हुआ होगा कि आखिर क्या बात है कि सीनियरटी के बावजूद, एक बेदाग छवि के बावजूद, एक बेदाग छवि का इंसान है, इतना बढ़िया व्यक्तित्व है, उस आदमी को कैबिनेट पद नहीं मिला और जिनको-जिनको मिला आप सभी को पता है. मैं इस मामले में उफ न करुंगा, लब सिलूंगा, आंसू पीलूगां लेकिन मैं आडवानी जी, अटल जी का कद्र करना नहीं छोडूंगा.

 

दिबांग- क्या आप को लगता है कि आडवानी जी और जो दूसरे नेता हैं क्या उनको उसी तरह का सम्मान मिला हुआ है जो आपकी नजरों में मिला हुआ है. उनको वही स्थान मिला है आज जो उनको मिलना चाहिए.

 

शत्रुघन- ये पैमाना तय करना थोड़ा मुश्किल है. मेरी नजरों में वो जिस सम्मान के हकदार हैं उससे ज्यादा मिलना चाहिए. क्योंकि ये वो लोग हैं जिन्होंने बीजेपी को 2 सीटों से लेकर 200 सीटों तक पहुंचाया है. इन लोगों का ट्रैक रिकॉर्ड, ये लोग पॉलिटिशियन नहीं है, सही मायनों में ये स्टेट्स मैन हैं. इनके बारे में कह सकते हैं कि ये लोग घने काले बादलों के बीच चमकती हुई सुनहरी किरण हैं. ऐसे लोग विरले ही मिलते हैं. अगर ये सामने हैं तो इनको जितना भी सम्मान मिले वो कम ही होगा.

 

दिबांग- आपकी फिल्म चंबल का डायलॉग है कि एक बार कदम बढ़ाकर पीछे नहीं हटते, तौहीन समझते हैं.

सवाल जेपी यादव- मोदी जी ने बिहार के लिए विशेष पैकेज का एलान काफी ड्रमैटिक रूप में किया उसको लेकर काफी आलोचना हुई कि जिस लहजे में किया गया उससे बिहारी अस्मिता को ठेस पहुंचा कि उस लहजे में नहीं करना चाहिए. आप बिहारी तो हैं ही लेकिन उससे आगे बिहारी बाबू हैं तो क्या बिहारी बाबू को ठेस लगी, जिस अंदाज में पैकेज का एलान किया.

 

जवाब शत्रुघन- यादव जी मैं कहने को बहुत कुछ कह सकता हूं लेकिन उसका अर्थ बदल जाएगा. अभी राजनीति की इस घड़ी में चुनाव भी सामने आ गया है. लेकिन मैं इतना जरूर मानता हूं कि पब्लिक स्पीकिंग में चाहे मैं हूं आप हों. मंत्री हों, संत्री हो कोई भी हो अपनी भाषा और शब्दों के चयन का ख्याल रखना चाहिए. भाषा से किसी को आहत ना करें, किसी  के अस्मिता को ठेस ना पहुंचे तो बहुत बेहतर होगा. हां अब आपने हमारे माननीय प्रधानमंत्री की बात की तो हो सकता है कि जो बात उन्होंने कही वो कहना ना चाहते हैं. कई बार ऐसा होता है कि एक्सटेपोर बोलने में जनसभाओं में कई बार स्लिप कर जाते हैं.

 

जेपी यादव- ऐसा इसलिए लोगों ने बोला कि बोली लगाई जा रही है बिहार की और बिहार की नीलामी हो रही है. इस तरह के शब्द इस्तेमाल किए गए सोशल मीडिया में. नीतीश कुमार और अरविंद केजरीवाल ने कहा कि शायद बिहारियों को इतना सस्ता समझा जा रहा है कि सवा लाख करोड़ में खरीद लेगें वो.

 

जवाब शत्रुघन- फिलहाल मुझे इस सवाल के चक्रव्यूह से बाहर निकाल दें तो मैं आपका बड़ा आभारी रहूंगा.

दिबांग- पर आप तो बेबाक बोलते हैं?

शत्रुघन- मैं कभी पार्टी लाइन से बाहर जाके नहीं बोलता लेकिन हां अपने सिद्धांतों पर, सच्चाई पर बोलता हूं. मेरे लिए राजनीति कोई प्रोफेशन नहीं हैं बल्कि मेरे लिए मिशन है. इसलिए आया हूं. इसलिए मैं कहता हूं कि आबरू पर आंच आए अगर तो टकराना जरूरी है. जो जिंदा हो तो जिंदा नजर आना जरूरी है. इसलिए मैं कई बात कहता हूं. वरना मुझे कोई शौक नहीं किसी को छेंड़ने का, हां लोग मुझे छेंड़ रहे हैं.

 

जैसे हमारे मित्र लालू यादव जी ने कई बार मैं विष का प्याला पी जाता हूं लेकिन जब कोई बात सिर के ऊपर आ जाती है तो बोलना पड़ता है, अपने बचाव में नहीं बल्कि इस उम्मीद, कोशिश और कशिश से ये बात करता हूं कि उनको सदबुद्धि मिले. मेरे बारे में कई मेरे से जुनियर मंत्री, नेता बोल देते हैं लेकिन मैं कहता हूं क्षमा करो. क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात. करने दो उत्पाद उनको.

 

सवाल जय शंकर गुप्त- इन दिनों बिहार और बिहार के लोगों के डीएनए की चर्चा बहुत जोरों से हो रही है. तो आप ने अपना डीएनए टेस्ट करवाया क्या?

जवाब शत्रुघन- हा हा हा मुझे तो आज ही खबर मिली है कि मेरे डीएनए की पुष्टि करते हुए एक बिहार में एक प्रसिद्ध हेल्थ और फीजिकल एजुकेशन का कॉलेज है, हमने बहुत दिनों से कोशिश की और लोगों कि बहुत दिनों से मांग थी कि मेरे पिता जी श्री बीपी सिन्हा के नाम पर हो वो फाउंडर फादर थे. आज ही मुझे खबर मिली है कि नीतीश बाबू ने कैबिनेट से फैसला करके मेरे पिता के नाम पर कर दी है. हमारे लोगों ने भी कोशिश की शायद दिल से कोशिश नहीं कि हमारे बीजेपी के लोगों ने जब वो सरकार में थे लेकिन इन्होंने कर दिया है. यानि इस खबर से मेरे डीएनए की पुष्टि होती होती है. हां मैं कहना चाहूंगा कि इस तरह की बातें अगर न हों तो बहुत अच्छा रहेगा.

 

दिबांग- पर ऐसी बातें होती ही क्यों हैं और बहुत शीर्ष से ऐसी बातें आती हैं.

शत्रुघन- इन सवालों के चक्रव्यूह से फिलहाल मुझे निकालिए, चुनाव नजदीक है और मैं इसका राजनीतिकरण कर के कोई चुनावी मुद्दा नहीं बनाना चाह रहा हूं.

सवाल भाषा- प्रधानमंत्री जी कुछ घोटालों पर नहीं बोलते और कुछ पर बोलते हैं तो अभी कोबरा पोस्ट ने कुछ खुलासे किए हैं बिहार में रणवीर सेना को लेकर उसमें भाजपा के की नेताओं के नाम आए हैं क्या इस पर बिहार को लेकर जो चुप्पी है वो टूटेगी क्या आप का आंकलन है.

 

जवाब शत्रुघन- पहली बार मैंने किसी कन्या का नाम भाषा सुना मुझे बहुत अच्छा लगा है. दूसरी बात आप ने की आंकलन किया नहीं है. उसके बारे में मुझे पूरी जानकारी नहीं है. जाहिर है जल्द ही मेरे पास पूरी जानकारी आ जाएगी. और मैं इसको देख लूंगा. लेकिन तीसरी बात जो सबसे महत्वपूर्ण दिखती है. चाहे बीजेपी का मामला हो कि किसी और पार्टी का मामला हो, जो मामला लॉ एंड आर्डर के अधीन आता है तो लॉ उस पर अपना काम करे. चाहे बीजेपी का हो गड़बड़ किया है तो जांच करो और जो सजा मुकर्रर करनी है करो. 

भाषा- आज नीतीश जी ने वादा भी किया है इसपर.

शत्रुघन- बहुत अच्छी बात है, बधाई देता हूं इस बात पर.

दिबांग- पॉलिटिक्स में आपकी टाइमिंग उतनी नहीं जम पा रही है, जितनी फिल्मी पर्दे पर जमती थी. क्या आप इस आलोचना से सहमत हैं.

 

शत्रुघन- दिबांग जी बहुत दिनों से सुनता आया हूं कि वक्त वक्त पर एक दौर चलता आया है और उसमें मीडिया भी तरह तरह के नाम अपने दोस्तों को दे देती है. किसी को मास्टर ब्लास्टर बोल देती है, किसी को लिटिल मास्टर बोल देते हैं,किसी को बादशाह बोल देती है. उसी तरह यहां बोल देती है कि चाहे शत्रुघन सिन्हा हो या उमा भारती हों वो नाराज हैं, बहुत बिगड़े हैं. अरे मैं बहुत कूल काल्म और कंपोज बैठा हूं आपके सामने. ये सब बातें तो आवन-जावन आती रहेंगी. पॉलिटिक्स में आप तो जान ही रहे हैं कि कल जो था वो आज नहीं है और आज जो है वो कल नहीं होगा. इतना बदलाव और परिवर्तन चलता रहता है. और टाइमिंग का जहां तक सवाल है वो चाहे फिल्मों में हो या राजनीति में हो टाइमिंग बहुत इंपॉर्टेंट है. और तीन चीजें तो बहुत ही महत्वपूर्ण होती है. फिल्मों में भी और राजनीति में भी शुरुआत, बीच और अंत कनक्लू़ड जो करते हैं आप.

राजनीति, फिल्म हो या पत्रकारिता हो ये सीख बहुत पहले आडवानी जी ने सीख दी थी मुझे, महात्मा गांधी की वाणी बनाया था मुझे कि कोई भी नए आंदोलन या कार्यक्रम को संपन्न करने से पहले आपको चार दौर से गुजरना ही पड़ेगा. पहला दौर है उपहास,उ सके आगे बढ़ेंगे तो दूसरा उपेक्षा उससे भी आगे निकलेंगे तो तिरस्कार, गालियां देंगे आप का कोई कसूर नहीं होगा फिर भी गालियां देंगे, फिर इन सबसे निकले तो चौथा होगा, दमन. और अगर आप उपहास, उपेक्षा, तिरस्कार और दमन से तो फिर सम्मान आप के कदम अवश्य चुमेंगा. लेकिन अगर आप पूछना चाहेंगे कि इस वक्त मैं कौन से दौर से गुजर रहा हूं तो दमन और सम्मान के बीच झूल रहा हूं और झेल रहा हूं.

 

सवाल संजय सिंह- आप अच्छे प्रचारक भी हैं. अब आप ना मंत्री रहे ना पार्टी में किसी महत्वपूर्ण पद पर हैं, बिहार चुनाव उसके बाद कई आए गए. एक समय में आप पार्टी के अंदर मुख्यमंत्री के दावेदार माने जाते थे. ऐसा क्या हो गया कि आप क्या टीम प्लेयर नहीं होते या जो आप ने 5 संज्ञाएं बताई उसमें फिट नहीं बैठते या नेतृत्व के साथ तालमेल नहीं होता. चुनाव आते-आते बीजेपी के विरोधियों में कोई दिख जाता है. ऐसा क्या हो रहा है जिसके कारण वो जो सम्मान जो आपको कैबिनेट मंत्री के तौर पर दिया गया वो पार्टी में नहीं हो रहा है और सरकार में नहीं हो रहा है. वो तो अलग है आप प्रचारक बहुत अच्छे हैं उसके लिए भी पार्टी आपको उपयुक्त इस्तेमाल नहीं कर रही है.

 

जवाब शत्रुघन- संजय जी मैं आपकी बहुत सारी बातों से सहमत हूं. ये सही है कि पार्टी में मेरे पास कोई पद नहीं है लेकिन ये भी सही है कि कद है जिसके भरोसे आज तक चल रहा हूं और जिसके आधार पर आज आप ने मुझे निमंत्रण दिया है, इतना प्यार, मान, सम्मान आप ने दिया है. ये कद के आधार पर दिया है आप ने कि कोई जनरल सेक्रेट्री हूं कि मैं उपाध्यक्ष हूं या अध्यक्ष हूं. एक शत्रुघन सिन्हा का अपना व्यक्तित्व है जैसे लता मंगेश्कर की आवाज उनकी पहचान है, मैं समझता हूं कि शत्रुघन सिन्हा का व्यक्तित्व ही उनकी पहचान है. मेरे आगे पीछे कुछ ना लिखें, केवल शत्रुघन सिन्हा लिख दें काफी है. लोग जानते हैं कौन है.

 

पहले बीजेपी को लोग बोलते थे कस्बों की पार्टी है, शहरों की पार्टी है, बनियों की पार्टी है, ऐसा बोलते थे लोग. धीरे-धीरे बढ़ते हुए ये पार्टी आज गांव-गांव की पार्टी हो गई है. पूरे देश में ऐसी कोई जगह नहीं होगा अरुणाचल से लेकर तमिलनाडू तक जहां कि इसका झंडा नहीं लहराता हो. तो जाहिर है कि जब इतनी बढ़ी पार्टी होगी तो बहुत सारे लोग होंगे, जब बहुत सारे लोग होंगे तब बहुत सारे अवसरवादी लोग भी आ गए. उन्होंने देखा कि बढ़त अच्छी है, उस समय संघर्ष करने तो आए नहीं. जब पार्टी जीत कर आ गई या जीतने के कगार पर आ गई तब आ गए. अब जाहिर है कि उनकी महत्वकांक्षाएं भी बहुत बढ़ गई है. और सबसे ज्यादा खतरा, आप पत्रकारिता में ही देख लें, जिसका नाम नंबर एक या दो पर आता है पहले उसी को काटने की कोशिश करते हैं. आप ने ठीक कहा कि आडवानी जी ने तो दो बार भेजा था मुझे कि मुख्यमंत्री बनाया जाए वहां पर. हालांकि मैंने शुरु से कहा कि ना मेरी सीएम बनने की इच्छा है ना ही अपेक्षा, लेकिन जिम्मेदारी के तहत मैं करने को तैयार हूं. अगर मेरे आने से बिहार का विकास हो सके तो मैं यथाशक्ति, यथाभक्ति तैयार हूं. लेकिन जब जब भेजने की बात हुई तो आप में से कई लोगों को पता है कि कहां-कहां से काटने की कोशिश हुई. तो मैं इसलिए कहता हूं तुम खुश रहो एहल-ए-वतन, हम तो चमन छोड़ चले.

 

दिबांग- चमन छोड़ चले की बात तो जब रिटायर या टायर्ड होने पर की जाती है.

शत्रुघन- मैं चुनाव की बात कर रहा हूं. हालांकि स्टार प्रचारक की बात रही तो मैंने दीमापुर से लेकर कई नक्सल एरिया में स्टार प्रचार किया और सबसे ज्यादा भीड़ इकट्ठा करने वालों में एक नाम शत्रुघन सिन्हा का भी है.

 

दिबांग- 2005 में तो बहुत गंभीरता से आपका नाम था. एनडीए पूरी यात्राएं प्लान कर रहा था आप की और नीतीश कुमार की. अब प्रधानमंत्री वहां जाते हैं तो आप स्टेज पर भी नहीं दिखाई देते. और उनकी कई रैलियां हो चुकी हैं.

 

जवाब शत्रुघन- अब जब वहां कोई निमंत्रण नहीं, आमंत्रण नहीं, कोई सूचना नहीं, कोई प्रसार, प्रचार नहीं मेरी बात का. इसमें तो कोई दो राय नहीं हो सकती कि वो जितना कंबाइंड मिला कर क्राउड नहीं जुटा सकते, जो अकेला शत्रुघन सिन्हा मान सम्मान के साथ ले सकता है. आप लोग खुद ही कहते हैं कि बोलता बहुत अच्छा हूं. ऊपर से भीड़ जुटाने की क्षमता बहुत अच्छी है. आप जान लीजिए कि किस-किस का बैनर पोस्टर नहीं बना है जो पटना का सांसद भी नहीं है उसका भी बन चुका है. रिकॉर्ड मार्जिन से जीता हूं आप को पता हो कि कितना विरोध कर रहे थे शायद इस बार हाइएस्ट वोट शेयर लेकर आया हूं. 55 परसेंट मेरा वोट शेयर है. जो अच्छे-अच्छों का नहीं है. अब नाम नहीं लेना चाहता मैं. पिछली बार रिकॉर्ड मार्जिन से जीता, उसके बाद भी रिकॉर्ड को तोड़ते हुए और ज्यादा मार्जिन से जीता. उसके बाद भी आप नहीं बुला रहे हैं, बैनर नहीं, पोस्टर नहीं. सामने एक प्रोग्राम था हमारे मित्र भूपेद्र यादव जी आए बुलाने तो मैंने कहा कि चलूंगा. आप के ही मीडिया के लोग आए कहा आप जाएंगे तो गजब हो जाएगा. सारा मीडिया आप ही का वेट कर रही है कि फिर आपका कोई बैनर नहीं, पोस्टर नहीं. अब आप खुद बताइए कि ये जानबूझ कर नहीं तो और क्या है.

 

अभी पटना के वैटनरी कॉलेज में प्रोग्राम था मुझे बुलाया गया, मैं ब्यूटीफुली और ड्यूटीफुली गया. कृष्ण मेमोरिय हॉल और मुज्जफरपुर में प्रोग्राम था प्रधानमंत्री जी का. मुझे पूरा यकीन है कि मोदी जी को इस बात की खबर नहीं होगी. लेकिन ना मुज्जफरपुर परिवर्तन रैली में बुलाया गया ना कृष्ण मेमोरियल हॉल में बुलाया गया. ना गया में ना ही आरा में बुलाया गया. जब नहीं बुलाया गया, मैं सिर्फ वहीं जाता हूं जहां से निमंत्रण मिलता है. जब बुलाया नहीं गया तो जाने का क्या मतलब है.

 

दिबांग- इसमें कोई लाल सिग्नल तो नहीं  है आप के लिए.

शत्रुघन- हूं.. हो सकता है. ये कन्फ्यूजन का भी एक प्रतीक हो सकता है. कई बार होता क्या है कि जब लंगूर के हाथ में अंगूर आता है तो उसे समझ में नहीं आता कि अंगूर खाऊं कि कुचल दूं, फेक दूं अंगूर को. ऐसी कन्फ्यूजन की सिच्यूएशन हो सकती है.

 

दिबांग- इस पर बड़े कयास लगेंगे कि आप लंगूर किसको कह रहे हैं और अंगूर किसको.

शत्रुघन- मैं अपने मित्रों की ही बात कर रहा हूं कि ऐसी घबराहट क्यों है, ऐसी बौखलाहट क्यों. मैं आप का हूं, आप का था, आप का ही रहूंगा. मैं आप से दूर भी चला जाऊंगा, जहां मेरी फिल्मों के बाद राजनीति मे परवरिश हुई है, मेरा लालन-पालन किया कैलाशपति मिश्रा जी ने या मुझे मेरी पब्लिक लाइफ में घुसाया सुबोधकांत सहाय जी का, अटल बिहारी बाजपेयी और नाना जी देशमुख, जय प्रकाश नारायण जी से उनकी गोद में मैंने बैठ के सीखा है तो मैं कहां छोड़ कर जाउंगा.

 

विजय विद्रोही- अभी आप कह रहे थे कि आप दमन और सम्मान के बीच कहीं हैं लेकिन आप की बातों से लग रहा है कि आप उपेक्षा और तिरस्कार के बीच कहीं है.

शत्रुघन- नहीं उपेक्षा नहीं उससे तो आगे बढ़ चुका हूं. आप लोग सीरियली ले रहे हैं तभी तो मैं यहां आया हूं. अभी मुझको ये लगता है कि मेरे साथ ऐसा कर के मेरे समर्थकों, वोटरों का, बिहारी बाबू का बिहार में सम्मान नहीं करोगे तो कहीं आप अपने पैरों पर कुल्हाड़ी तो नहीं मार रहे हैं. और अगर हमारी पार्टी को क्षति पहुंचेगी तो शायद मैं भी अपने आप को मांफ ना कर पाउंगा, मुझे भी बहुत तकलीफ होगी.

 

सवाल अदिती- हम लोग सुन रहे हैं कि शायद आप अपनी पत्नी को चुनाव लड़वा रहे हैं तो इस संघर्ष में काहे उनको झोंक रहे हैं, कौन सी पार्टी से लड़ेंगी वो.

जवाब शत्रुघन- करीब-करीब सही सुना है. दरअसल आजतक वो मुझसे लड़ती रही हैं और मुझको लड़ाती भी रही हैं. मेरा कहना ये है कि मेरी लीडर तो मेरी पत्नी हैं, श्रीमती पूनम सिन्हा. जब वो मुझको लड़ाने से फ्री हो जाएंगी तब ही ऐसा कुछ सोचेंगी. हो सकता है कि कुछ अपनों ने कुछ परायों ने बात फैलाई हो. और अगर ऐसा होगा भी तो कुछ लोगों ने उनको तो राज्यसभा के लिए भी कहा है, कुछ लोगों ने चाहा था कि वो लोकसभा का चुनाव लड़ें. तो अभी मेरा ख्याल है कि पटना से थोड़ी दूर जो मेरा संसदीय क्षेत्र है वहां से थोड़ा दूर एक क्षेत्र है दिघा मेरे घर से दूर है थोड़ा. मेरा अपना एरिया कुम्हणार है, कदमकुआं है जहां का मैं रहने वाला हूं. वहां से नहीं. तो मैं कहूंगा कि कुछ अपनों-परायों की एक छेंड़-छाड़ है.

 

दिबांग- तो आप इस खबर को बेसलेस बता रहे हैं.

शत्रुघन- गनिमत है नॉनसेंस नहीं बता रहा हूं. इसमें कोई दम नहीं है. मेरे पास कुछ मित्र आए थे जो उन्हें राज्यसभा भेजने के लिए कह रहे थे. अभी उनके पास बहुत सारे काम-काज है, लव, कुश बच्चे हैं.

 

दिबांग- ये जो आप कुछ मित्र बता रहे हैं वो बीजेपी के हैं या दूसरी पार्टियों में भी मित्र हैं.

शत्रुघन- मेरे मित्र तो हर तरफ हैं. देखिए कलाकार होने के नाते तो मेरे चाहने वाले हर तरफ हैं.

दिबांग- आप भी एंटिंग को खोल देते हैं, फीता बांधते नहीं हैं.

शत्रुघन- दिबांग जी अभी थोड़ी देर पहले विद्रोही जी ने कहा था कि आप उपेक्षा और तिरस्कार के बीच हैं तो मैं ये कहना चाहूंगा कि जो लोग घबड़ाए हुए हैं वो मुझे काटने के चक्कर में उसी डाली को काट रहे हैं जिस पर वो बैठे हैं. ये नादानी है उनकी. बहरहाल मैं समझता हूं कि हमारा शीर्ष नेतृत्व इस बात से अवगत होगी और इस पर न्यायोचित कार्रवाई करेगी. लेकिन हां इस बीच में मैं कहना चाहता हूं कि ये जो ऑप्शन की बात है तो मैं ये नहीं कह रहा कि पार्टी बदलूंगा, मैं टीचिंग कर सकता हूं मैं जाता भी हूं जब लोग लेक्चर के लिए बुलाते हैं, मैं इंडिपेटेंट भी हो सकता हूं. अगर कभी ऐसी जरुरत पड़ी. लेकिन उनके पास क्या ऑप्शन है बस जीना यहां, मरना यहां बर्बाद हो जाएंगे ये. कौन स्वीकारेगा उनको.

 

हम तो केजरीवाल साहब के पास जाते हैं तो गले लगाते हैं, हमको नीतीश बाबू भी इतना मानते हैं, लालू जी भी चाहते हैं,मानते हैं, प्यार करते हैं. उनको कौन करेगा किधर जाएंगे वो. जाएं तो जाएं कहां ये टाइटल लग जाएगी उनके ऊपर.

 

सवाल सिद्धार्थ मिश्रा- शत्रुघन जी काफी देर से आप को सुन रहा हूं, आप ने अभी अपने कद-काठी की बात की, अपने प्रचार-प्रसार की बात की, अपनी पर्सनालिटी की बात की, अपने आवाज की बात की, अपने डायलॉग की बात की, आपने अपने कमजोरी की भी बात की. आप भीड़ जुटाते हों, जनता आप को सुनने आती हो लेकिन फैक्ट ऑफ द मैटर ये है कि रियल पॉलिटिक्स में आप पटना के कायस्थ बहुल इलाके से कभी बाहर निकल नहीं पाए और आपकी पॉलिटिकल लीडरशिप वहां तक सीमित है. बिहारीबाबू आप कहलाते हों लेकिन बिहार के लीडर के रूप में आप को भी कोई ऐसा कॉन्फिडेंस नहीं आया कि आप उस तरह की लीडरशिप दे पाएं.

 

जवाब शत्रुघन- पहली बात तो ये कि पैन बिहार, मैं तो पैन इंडिया हूं. मैं नागालैंड, दिमापुर से लेकर त्रिवेंद्रम कहां-कहां नहीं गया और शायद कोई नहीं गया हो. और 50 हजार या लाख जो भी क्राउड लेकर आया, आप में से कई लोग तो इसके गवाह भी हैं. दूसरी बात मैं तो सर्वधर्म संभाव, सर्वधर्म संभाव का हूं. मैं तो कभी किसी कास्ट के दायरे में बंधा नहीं और बिहार के लोग इसकी तारीफ भी करते हैं. और कहते हैं बिहारी बाबू हैं. अभी नीतीश बाबू ने हाल ही में कहा है कि शत्रुघन जी बिहार के गौरव हैं. अब जाहिर है मैं पटना से चुनाव लडू़ंगा, अभी दो ही बार चुनाव लड़ा है पटना से इससे पहले तो राज्यसभा से था, पूरे बिहार से था.

 

एक बात और महत्वपूर्ण है मुझे पार्टी ने कहा था और खासकर हमारे फ्रैंड फिलास्पर, गाइड गुरू और अल्टीमेट लीडर आडवानी जी ने कहा था जब मैं राज्यसभा से छोड़कर लोकसभा में आने वाला था कि पूरे भारत में तुम चाहे जहां से चुनाव लड़ो जीत जाओगे. लेकिन सीट चुनने की पहला अधिकार आपका होगा.

 

सिद्धार्थ- पटना ही क्यों चुना?

शत्रुघन- जब मैं राज्यसभा मे बिहार से था तो लोग कहते थे कि पिछले दरवाजे से आया है तो मैंने कहा बिहार से ही सामने के दरवाजे से आता हूं और बिहार के राजधानी से ही आता हूं. वैसे बता दूं कि कुछ लोगों ने सुझाव दिया था कहीं और क्षेत्र से लड़ने के लिए. बहुत पहले रांची से मुख्यमंत्री बनने की बात हुई थी तो कहा कि रांची या दरभंगा से चुनाव लड़ाओ एक संदेश चला जाएगा कि एक मुख्यमंत्री कौन बनेगा. इस बार भी दिल्ली से लड़ने की बात चल रही थी लेकिन मैंने कहा नहीं लडूंगा तो यहीं से क्योंकि पटना साहिब सीट मेरी पहली और आखिरी पसंद है.

 

दिबांग- शत्रुघन जी ये जो आप बता रहे हैं कि पूरे देश में पैन इंडिया करते हैं, इसमें जो आपकी फिल्में हैं, आपके डायलॉग बहुत चलते हैं, आपकी आवाज माशाअल्लाह गुंजती है. कौन से ऐसे डायलॉग हैं, कुछ हम सुन सकते हैं क्या कि जिनको बोलते ही लोगों में एक नशा सा छा जाता है.

 

शत्रुघन- मैं बताऊं हालांकि मेरी बहुत अच्छी दोस्त हैं, हेमामालिनी जी जब सभा में जाती हैं तो लोग उनसे बहुत अनुरोध करते हैं तो वो बसंती वाला सुना देती हैं. हमारे और भी दोस्त करते हैं. हमें बहुत पहले भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी ने मुझसे कहा था कि जिस दिन से तुमसे पब्लिक डायलॉग सुनाने के लिए नहीं कहेंगे तो समझ लेना कि तुम जननेता बन गए. मैं बहुत शुक्रगुजार हूं कि पुछले 15-20 सालों में एक जगह भी नहीं कहते कि फिल्मी डायलॉग बोलो. वो जानते हैं कि जो मैं बोल रहा हूं वो सच्चाई के आधार पर, ज्ञान के आधार पर मौके की नजाकत को समझते हुए, शब्दों के चयन की मर्यादा का ख्याल रखते हुए बोलता हूं और उसमें उनको डायलॉग का ही आनंद आता है.

 

दिबांग- मतलब आप एबीपी न्यूज के दर्शकों को अपना कोई डायलॉग नहीं सुनाना चाहते.

शत्रुघन- ऐसे तो आप जितना कहें, मेरी याददाश्त अच्छी है. अभी आपने मेरा डायलॉग चलाया आप ने वो बहुत पापुलर हुआ था. गुलजार साहब की फिल्म थी. उस फिल्म से मैं स्टार बना रातोंरात. और मेरा सौभाग्य था कि मीना कुमारी के साथ काम करने का मौका मिला. मैं एक बात और बता दूं आपके एबीपी न्यूज को कि शायद मैं आज एक ही कलाकार हूंगा जो आपको यकीन नहीं होगा कि राज कपूर से लेकर पृथ्वीराज कपूर के साथ से लेकर चिम्पू कपूर तक, अशोक कुमार से लेकर अनिल धवन तक, दिलीप कुमार से लेकर डेविड धवन तक सारा. अफसोस है दो के साथ काम नहीं कर पाया मधुबाला जी और नूतन. तो आप ने गुलजार साहब का जिक्र किया तो गुलजार साहब कल ही 81 साल के हुए तो उनको सलाम करते हुए वो डायलॉग बहुत प्रचलित है. आये तो कह देना कि छेनू आया था, बहुत गर्मी है खून में तो बेशक आ जाए मैदान में, जो हसरत निकालनी है निकाल लेकिन आइंदा मेरे किसी भी लड़के को हाथ लगाया तो मुहल्ले का मुहल्ला उड़ा कर रख दूंगा मैं.

 

दिबांग- ये सारे मंत्री-संत्रियों के लिए है जो बीजेपी में हैं. इन्होंने चेतावनी दे दी है.

शत्रुघन- उनके लिए एक और है… खामोश

 

सवाल विजय विद्रोही- आप को क्या लगता है कि 2017 में अगर स्थितियां ठीक रहती हैं तो उनको राष्ट्रपति बना देना चाहिए. 

जवाब शत्रुघन- मुझे तो आपके सवाल से ऐसा लगता है कि इतनी तारीफ उनकी मैंने कर दी है कि अगर मेरा भी 2017 तक मंत्री बनने के चांस भी हों तो वो भी टल जाए. बहरहाल आडवानी जी युवा हैं आज भी उनकी सोच बहुत स्पष्ट है, बहुत एक्टिव हैं और मुझे लगता है 2017 का इंतेजार क्यों करें उससे पहले भी बहुत कुछ हो सकता है. हमारे बहुत अच्छे दोस्त और कलाकार हैं अनुपम खेर उनका एक बहुत बढ़िया प्ले आपने भी देखा और सुना होगा उसका टाइटल था, कुछ भी हो सकता है. यानि कुछ भी हो सकता है और होना चाहिए.

 

सवाल प्रदीप कौशल- संसद के काम काज में जो विप की व्यवस्था है, उसके विषय में आपकी क्या राय है. क्या आप इस बात के पक्षधर हैं कि संसद सदस्य अपने विवेक से राय और वोट दे सकें.

 

जवाब शत्रुघन- आप मेरी व्यक्तिगत राय पूछ रहे हैं. जब पार्टी का आदेश होता है तो अध्यादेश होता है लेकिन मेरी व्यक्तिगत राय और इच्छा तो यही है जो आपने पार्ट टू में कहा. कि संसद सदस्य को अपने विवेक से वोट देने का अधिकार होना चाहिए. लोकतंत्र में होना ऐसे ही चाहिए लेकिन जब आप किसी पार्टी में रहते हैं तो उसके दायरे में आप बंध जाते हैं. वो बात अलग है लेकिन जब महिला आरक्षण बिल की बात हुई थी तो हमने बहुत लोगों को देखा कि जो हम से कह रहे थे. आप ने देखा होगा कि करीब-करीब बगावत सी हो रही थी. उन्होंने कहा महिलाओं को आरक्षण मिलना ही चाहिए. जब कहा गया कि आप वोट करो पार्टी के लाइन पर तब कई लोग कह रहे थे कि नहीं अपने विवेक के आधार पर वोट देना चाहिए. तो सर मैं आप की बात से बिल्कुल सहमत हूं.

 

सवाल- बीजेपी ने घोषित कर दिया है कि बिहार के चुनाव में कोई मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित नहीं करेंगे. पीएम मोदी ही चुनाव प्रचार में मुख्य चेहरा रहेंगे. तो आप इससे सहमत हैं ?

 

जवाब शत्रुघन- अब तो बड़ी देर कर दी है मेहरबा आते-आते. तो सहमति और असहमति की कोई बात ही नहीं है. हम अपने प्रधानमंत्री की कद्र करते हैं और ये भी सही है कि मोदी जी जैसा कोई स्टार प्रचारक नहीं है देश में. जो उनकी पकड़ है, एनर्जी लेवल जैसा है कमाल करते हैं, गजब कर रहे हैं. बिहार में मैंने खुद कहा था कि कोई चेहरा होता तो बेहतर होता. मैं तो कह रहा हूं कि मैं रेस में हूं ही नहीं. मेरी इच्छा भी नहीं है और अपेक्षा भी नहीं है. अभी हमारी निगाह है कि किस तरह अच्छा करें, किस तरह बिहार को प्रगतिशील बनाएं. हमारा कोई चेहरा होता तो बहुत अच्छा होता. लेकिन नहीं हुआ है तो अब देर हो गई है. अब हमारे नेता हैं नरेंद्र मोदी जी, हम उनके आभारी हैं. अच्छा कर रहे हैं, बहुत मेहनत कर रहे हैं. अब वक्त बहुत कम रह गया है और प्रतिद्वंदी ज्यादा हैं. हमारे यहां मुख्यमंत्री पद के दावेदार ज्यादा है और कार्यकर्ता कम दिख रहे हैं. तो हमें उन सब में जोश का संचार करना चाहिए. हम समझते हैं कि रिजल्ट अच्छा होगा.

 

सवाल संजय सिंह- आप नीतीश कुमार की तारीफ करते हैं तो आप चाहेंगे उन्हें पांचवीं बार मुख्यमंत्री देखना.

जवाब शत्रुघन- ये ट्रिकी सवाल है. मैं बीजेपी का हूं लेकिन जो भी बहुतम का प्रतीक मुख्यमंत्री होगा हम उनको सलाम करेंगे. और अपना हो तो बहुत अच्छा है.

 

सवाल हरीश गुप्ता- आपके दोस्त यशवंत सिन्हा का ये कहना था कि पार्टी में 75 साल से ऊपर वाले ब्रेनडेड हो गए हैं और आप तो 75 से नीचे वालों में हैं. तो जो ये बहुत नीचे वाले हैं इनको किस कैटगरी में, क्या नाम देंगे.

प्रेस कॉन्फ्रेंस: ‘उफ न करुंगा, आंसू पी लूगां लेकिन मैं आडवानी जी, अटल जी की कद्र करना नहीं छोडूंगा’

जवाब शत्रुघन- ये तो बड़े फर्टाइल लोग हैं, अच्छे लोग हैं. देखिए यशवंत सिन्हा जी की मैं बहुत कद्र करता हूं. वो मेरे बड़े भाई समान हैं. गजब के ब्यूरोक्रेट रहे हैं और पॉलिटिक्स में बहुत मेच्योर हैं. हम जैसे लोगों को इंसपायर करने में यशवंत भाई का बहुत बड़ा हाथ रहा है. ये मेरे सामने कहा था उन्होंने और इस पर अभी कोई प्रतिक्रिया आई नहीं. उन्होंने कहा था कि 75 साल के ऊपर वाले जो लोग हैं उन्हें ब्रेन डेड करार दे दिया गया है. मैं उनकी इतनी कद्र करता हूं कि कई बार मैं उनकी बात से सहमत ना भी हूं तो उनकी बता पर प्रतिक्रिया नहीं देता हूं. मिसाल के तौर पर मैं आज ही कहीं देख रहा था किसी चैनल पर वो नहीं करनी चाहिए. ठीक है वो बहुत गुणी आदमी हैं, विद्वान आदमी हैं. लेकिन मैं इस मामले में कहूंगा कि नहीं. लोग हो सकता है कि गलत अर्थ निकालें लेकिन इस मामले में मैं मणिशंकर अय्यर का बहुत कायल हूं. मेरे सामने मणिशंकर जी ने कहा था कि वहां पर कि बातचीत जो है वो चलती रहनी चाहिए बिना रूके हुए.

 

हरीश गुप्ता- मगर आप की तो बात ही नहीं चल रही है. मेरा सवाल तो ब्रेन डेड से है कि आप की बातचीत कहां पर डेड है.

शत्रुघन- नहीं नहीं मेरी बातचीत अगर डेड होती तो क्या प्रेस कॉन्फ्रेंस एबीपी न्यूज में बुलाया होता क्या मुझे. 

 

हरीश- पार्टी में आप की बातचीत डेड इंड पर है क्या.

शत्रुघन- नहीं नहीं वो तो फिर शुरु हो जाएगी.

 

सवाल संतोष भारती-  आप विलेन बन कर भी तालियां बटोरते थे और मैं निश्चित हूं कि आप का आज का इंटरविव भी तारीफ बटोरेगा. लेकिन आपकी पार्टी को लेकर आपके मन में दर्द है बहुत ज्यादा. जिस पार्टी ने आपको चार बार संसद में भेजा उस पार्टी में आप को एक भी आदमी मुख्यमंत्री पद के लायक नहीं लगा. आप परसेप्सन बनाने वालों में हैं आप ने राजीव गांधी को दागी बनाने के लिए बड़ा रोल प्ले किया. उसी तरह आप ने परसेप्सन बनाया कि बीजेपी में कोई नहीं है, रामविलास पासवान हैं जो सीएम बन सकते हैं वो हो नहीं सकते तो इसका मतलब है कि आप सीधे-सीधे नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने का दुबारा माहौल बना रहे हैं. ये आप के पार्टी के लोगों का दर्द है. इस दर्द को आप दूर करेंगे.

 

जवाब शत्रुघन- नहीं इस दर्द को मैं दूर कर रहा हूं. मैंने रामविलास जी का नाम लिया वो हमारी नजरों में बहुत अच्छे इंसान हैं, सीनियर लीडर हैं. मैं बता रहा था ना कि हमारे यहां सीएम पद के उम्मीदवार ज्यादा दिखते हैं. हमारे यहां काबिल बहुत लोग हैं सुशील मोदी जी काबिल हैं, सीपी ठाकुर साहब सीनियर हैं, चंद्रमोहन राय जी हैं. बहुत सारे लोग हैं. बस सपोर्ट मिल जाए. मैंने तो सभी दल की सहमति बने इसलिए मैंने रामविलास जी का नाम लिया. मेरा मंशा ये थी कि मामला सलट जाए और सब अच्छे से हो जाए बगैर किसी लड़ाई-झगड़े के. पहले तो हमने भी किया था. जो एक्सपेक्टेबल हो रामविलास पासवान रिस्पेक्टेबल हैं. और रामविलास पासवान एबल हैं, एक्सपीरियंस हैं. इसलिए उनको बनाओ. लेकिन अब मैं ये सब नहीं कह रहा हूं. और रही बात मुख्यमंत्री बनने की तो वो तो पार्टी को तय करना है मेरी कोई इच्छा और अपेक्षा है ही नहीं. अगर मेरे हाथ में फैसला होता तो मैं अपने आप को मुख्यमंत्री क्या, प्रधानमंत्री बना दिया होता मैंने. मुझे पता है इसका मतलब गलत निकलेगा, जब चलेगा एबीपी पर. लेकिन अगर मेरे हाथ में फैसला होता तो मैं अपने आप को मुख्यमंत्री क्या, प्रधानमंत्री बना देता. लेकिन ये फैसला पार्टी करती है. मैंने कह दिया कि फिल्मों से अगर कोई आदमी राष्ट्रपति के लिए तो अमिताभ बच्चन से बढ़िया कौन हो सकता है. तो उसका गलत मतलब निकाला गया. तो मैंने किसी से तुलना नहीं की थी. लेकिन मैंने कहा कि अगर वो बनेगा तो इतने सालों का तजुर्बा है. अमिताभ की भी शान बढ़ेगी और देश का भी नाम बढ़ेगा कि देखो उस जोन से भी एक आदमी को लाया.

 

मुझसे नीतीश बाबू के बारे में पूछा गया था कि क्या नीतीश बाबू प्रधानमंत्री बनने लायक हैं. मैंने कहा हां यकीनन प्रधानमंत्री बन सकते हैं. लेकिन आप भी बन सकते हैं और मैं भी बन सकता हूं. अगर हमारे पास सपोर्ट हो. वोट हो और पार्टी का आशीर्वाद हो पार्टी का. बाकि सब कट गया और आया वो कि क्या नीतीश कुमार प्रधानमंत्री बन सकते हैं तो आया वो कि हां बन सकते हैं. बाकी लाइन कट गई.

 

दिबांग- ये जो आप हर चुनाव से पहले रूठ जाते हैं. एक प्रेशर क्रिएट करते हैं आप तो क्या आप को नहीं लग रहा कि इसकी भी एक्सपायरी डेट हो चुकी है अब. अब ये चल नहीं रहा है जिस तरीके से पहले होता था.

 

शत्रुघन- अगर ये चल नहीं रहा होता तो आप मुझसे ये सवाल ही नहीं कर रहे होते. मैं ये कहना चाहता हूं कि ये प्रेशर टैक्टिस नहीं है. ये सहमति है, लोगों कि फिक्र है. क्या इस आदमी की छवि ठीक नहीं होगी, शायद सबसे अच्छी छवि होगी. एक आरोप नहीं, इनकम टैक्स का अटैक नहीं, एक एफआईआर नहीं. जो इतने सालों से जनजीवन से जुड़ा हुआ, संघर्ष करता हुआ आ रहा है. और अब आप उस आदमी को दरकिनार करना चाह रहे हैं. आप ने कहा कि चार बार पार्टी ने भेजा तो चार बार पार्टी ने नहीं, दो बार पार्टी ने और दो बार पब्लिक ने भेजा. पार्टी के आशीर्वाद से. लेकिन उस आदमी के साथ आप ऐसा क्यों कर रहे हैं. लेकिन शायद घाटा हो सकता है. इससे फायदा नहीं होगा. इसलिए जहां बुलाया जाता है तो जाता हूं और जहां नहीं बुलाया जाता तो नहीं जाता हूं.

 

दिबांग- चेतावनी तो नहीं है छुपी हुई है.

शत्रुघन- अपने लोगों को क्या चेतावनी देना. कभी-कभी नसीहत दे देता हूं.

दिबांग- ये जो 15 महीने मोदी सरकार के बीते हैं उसे आप कैसे देखते हैं. पहले कहा जाता था कि कोई दागी नहीं है, किसी पर भ्रष्टाचार के कहीं आरोप नहीं लगे. कहा गया 100 दिन में 15-15 लाख आ जाएंगे. कैसे आंकते हैं मोदी सरकार को.

शत्रुघन- दिबांग जी आप बहुत मेच्योर्ड हैं और मेरी भी मेच्योरिटी को समझेंगे कि जहां मैं डीसिजन मेकिंग बॉडी का अंग नहीं हूं तो मेरे लिए इन सब बातों पर रोशनी डालना बेहतर नहीं होगा. तो इन सब मामले पर बात करना अच्छा नहीं होगा. कई मामले मेरे लिए ऑफिस ऑफ प्रॉफिट और कई मामले हितों के टकराव के हैं.

 

रैपिट फायर राउंड

सवाल नं1 

दिबांग-  अगर आप को मौका मिले तो आप क्या बनना चाहेंगे. केद्र में मंत्री या बिहार का मुख्यमंत्री?

जवाब शत्रुघन- केंद्र में मंत्री

दूसरा सवाल- आपकी निजी जिंदगी का सवाल है कि आपकी बीबी ने दो बार रंगे हाथों पकड़ा था तो पहली बार ज्यादा मुश्किल होती है या दूसरी बार.

जवाब शत्रुघन- दूसरी बार पकड़ा जाना. उससे मुश्किल भी होती है और सबक भी मिल जाता है. जैसे मुझे मेरी पत्नी ने कहा कि आज के बाद मुझे किसी और लड़की के बारे में पता चला तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा. मैं वफादार पति हूं. वो दिन है और आज का दिन मैंने उनको पता चलने ही नहीं दिया.

 

तीसरा सवाल- आपकी राय में बिहार का मुख्यमंत्री कैसा हो सुशील मोदी जैसा या नीतीश कुमार जैसा?

जवाब शत्रुघन- इस सवाल को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दें तो बेहतर होगा.

दिबांग- चलिए इसके आगे खामोश लिख देता हूं.

चौथा सवाल- बेहतर प्रधानमंत्री कौन है अटल बिहारी बाजपेया या नरेंद्र मोदी?

जवाब शत्रुघन- अटल जी बहुत ही जबरदस्त जैसा कि मैंने कहा भूतपूर्व के साथ अभूतपूर्व प्रधानमंत्री रहे हैं और जो आज के पीएम हैं जिनको मैं कहता हूं कि डैशिंग डायनमिक एक्शन हीरो नरेंद्र मोदी मैं समझता हूं कि ये सब उन्हीं के प्रोडक्ट हैं, उन्ही से सीखे हुए हैं. उन्होंने अपने आप को मील का पत्थर साबित किया अपने आप को तो अटल बिहारी बाजपेयी यकीनन ऑल टाइम बेस्ट प्रधानमंत्री हैं. अंदाज-ए-बयां हर बात को नई शक्ल दे देता है, वरना इस दुनिया में कोई नई बात नहीं है तो मोदी जी का जो अंदाज-ए-बयां है वो सब अटल जी की ही देन है. सबसे अधिक योगदान उनका है इसलिए अटल जी देश के सबसे बढ़िया प्रधानमंत्री हैं.

 

पांचवां सवाल- आप के अच्छे दिन कब थे जब आप फिल्मों में थे, एक के बात एक फिल्म हिट हो रही थी. या अब राजनीति में रहते हुए कभी इधर की रहते हुए कभी इधर की एक्टिंग कर रहे हैं तो कभी उधर की ऐक्टिंग कर रहे हैं.

जवाब शत्रुघन- मैंने सुना है दिबांग जी अच्छे दिन आने वाले हैं.

दिबांग- दोनों ऑप्शन में से आप क्या चुनना चाहेंगे.

शत्रुघन- पहले चूंकि वो प्रोफेशन था आज के दिन मिशन है. तो जाहिर मिशन के जरिए मैं लोगों का ज्यादा भला कर सकता हूं तो मैं मानूंगा कि मेरा मिशन जो राजनीति जिम्मेदारी के तहत है तो इसे अच्छे दिन मानूंगा.

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