व्यक्ति विशेष: ‘शत्रु’ किसके दोस्त?

By: | Last Updated: Saturday, 1 August 2015 4:32 PM
shatrughan sinha

चेहरे अलग. झंडे अलग और कसमे- वादे, प्यार और वफा के इरादे भी अलग – अलग. राजनीति वो तिलिस्म है जहां जनता से किए जाने वाले वादे और सत्ता के बड़े दावे एक साथ गूंजते हैं क्योंकि राजनीति की दुनिया में परदे के पीछे साम, दाम, दंड, भेद हर वो तरीका आजमाया जाता है जो नेताजी को पहुंचा सके सत्ता के करीब. आम आदमी की चौखट से निकल कर सत्ता की दहलीज तक पहुंचने में नेताजी को ना जाने कितने चक्रव्यूह तोड़ने पड़ते हैं और इस पूरी कवायद में जब कभी नेताजी की राह में कोई रुकावट खड़ी होती है तो वो हो जाते हैं बागी. बीजेपी के सांसद शत्रुध्न सिन्हा के ऐसे बगावती तेवरों से उनकी पार्टी बीजेपी परेशान है क्योंकि बिहार का चुनावी मैदान सज चुका है राजनीतिक दलों की सेनाओं ने मोर्चा भी संभाल लिया है लेकिन बिहार में चुनावी घमासान से पहले ही नेताओं की बदलती वफादारियों के बीच शत्रुध्न सिन्हा ठोंक रहे हैं अपनी ही पार्टी के खिलाफ ताल.

 

यूं तो बिहार में बीजेपी के कई शत्रु हैं लेकिन शत्रुध्न पिछले कुछ समय से अपनी ही पार्टी के लिए शत्रु की भूमिका में नजर आ रहे हैं. कभी वो लालू प्रसाद यादव की बर्थडे पार्टी में केक खाने पहुंच जाते हैं तो कभी जेडीयू नेता नीतीश कुमार से गले मिलते नजर आते हैं. नरेंद्र मोदी को बीजेपी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने से लेकर अभी तक पिछले करीब एक साल से शत्रुध्न सिन्हा इसी तरह पार्टी विरोधी बयान देते नजर आए हैं. शॉटगन के नाम से मशहूर शत्रुध्न ने अपनो के सिर पर ही जिस तरह बयानों की गन तान रखी है उससे उनके पाला बदलने के कयास भी लग रहे हैं और इसीलिए वो इन दिनों बन गए है बिहार की चुनावी राजनीतिक का एक चर्चित केंद्र.

 

बिहार के चुनावी मैदान में सेनाए सज चुकी हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बिहार में रैली कर विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार का आगाज कर दिया है. मोदी और उनकी पार्टी बीजेपी हर हाल में बिहार का दुर्ग जीत लेना चाहती है लेकिन नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव का गठबंधन उनकी राह में बड़ी चुनौती बन कर खड़ा है. बयानों और आरोपों के तीर बीजेपी ही नहीं जेडीयू और आरजेडी की तरफ से भी बरस रहे हैं. बिहार की इस चुनावी जंग में पक्ष और विपक्ष एक दूसरे पर प्रहार करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं लेकिन बिहार में छिडी इस चुनावी जंग में एक नेता ऐसा भी है जो अपने ही सहयोगियों और अपनी ही पार्टी पर बरसा रहा है बयानों के तीर.

व्यक्ति विशेष: शत्रुघ्न सिन्हा ‘शत्रु’ किसके दोस्त? 

बीजेपी सांसद शत्रुध्न सिन्हा ने हाल के बिहार मे चुनावी जीत पर कहा था कि इतराने की जरुरत नहीं है. बिहार के पटना साहिब सीट से बीजेपी के सांसद और अभिनेता शत्रुध्न सिन्हा के ऐसे बोलों ने उनकी पार्टी बीजेपी को ही मुश्किल में डाल रखा है. पिछले कुछ दिनों से शत्रुध्न कभी अपनी पार्टी को आईना दिखाते हैं तो कभी पार्टी के नेताओं के खिलाफ ही अचानक आक्रामक हो जाते हैं. यही नहीं बयानबाजी से आगे बढ़ कर वो कभी लालू प्रसाद यादव से तो कभी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से गले मिलते भी नजर आए हैं और यही वजह है कि शत्रुध्न सिन्हा इन दिनों बिहार की चुनावी राजनीति में चर्चा का एक केंद्र बन गए है.

 

राजनीतिक विश्लेषक राधिका रामशेषन ने बताया कि बीजेपी और अन्य पार्टी जो है सेलेब्रिटीज के साथ उनका जो अनुभव है वो बुहत अच्छा नहीं रहा क्योंकि ये जो सेलेब्रिटीज है वो अनुशासन के दायरे में कभी आते नहीं है. वो अपने आप को सबसे ऊंचा समझते हैं. तो शत्रुध्न सिन्हा भी उस कैटेगिरी में है. इन सबके बावजुद बीजेपी ने कुछ नहीं कहा उन्हें. ना कहा कि डिसिपिलिनरी एक्शन लेंगे कुछ नहीं कहा तो मुझे लगता है कि बीजेपी भी थोडी केयरफुल है. इस वक्त चुनाव जब आ रहे हैं बिहार में शत्रुध्न सिन्हा के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई कुछ नहीं होने वाला है. और हो सकता है लिमिटेड तौर पर उनका उपयोग करेगी जैसा पहले भी करती थी.

 

देश के तीसरे सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले राज्य बिहार में चुनावी बिसात पर शह और मात का खेल अभी शुरुआती दौर में है. हांलाकि साल 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की लहर ने समूचे बिहार में विपक्ष पार्टियों का सूपड़ा साफ कर दिया था लेकिन अब एक बार फिर बिहार में विधानसभा चुनाव के लिए मैदान सज चुका है जहां नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी की एक बार फिर अग्निपरीक्षा होनी है और यहीं वजह भी है कि 25 जुलाई को जब नरेंद्र मोदी बिहार में अपनी पहली चुनावी रैली करने मुजफ्फरनगर पहुंचे तो सबसे ज्यादा उनके निशाने पर थे नीतीश कुमार. लेकिन यहां खास बात ये है कि इस रैली के बाद शाम को नरेंद्र मोदी की पार्टी के ही सासंद शत्रुध्न सिन्हा ने जब नीतीश कुमार से मुलाकात की तो इसको लेकर छिड़ गया बीजेपी में एक संग्राम.

 

दरअसल शत्रुध्न सिन्हा को लेकर बीजेपी में मचे इस घमासान की सबसे बड़ी वजह ये है कि चुनाव में जो नीतीश कुमार बीजेपी के टारगेट पर हैं. जिन नीतीश कुमार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी रैलियों में हमला बोल रहे हैं और जिन नीतीश कुमार को पूरी बीजेपी कटघरे में खड़ा करने की कोशिशों में जुटी है. उन्ही नीतीश कुमार की शान में शत्रुध्न सिन्हा कसीदे पढ़ रहे है.

 

शत्रुध्न सिन्हा ने कहा था कि तारीफ करना बुरी बात नहीं हैं. अपने सीएम की न करे तो किसकी करें. चुनावी मौसम में शुत्रध्न सिन्हा का अपनी ही पार्टी के खिलाफ ये कोई पहला बयान नहीं है. नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी से लेकर लालू प्रसाद यादव के जन्मदिन पर उनसे मुलाकात करने तक उन्होंने कई बार पार्टी विरोधी बयान दिए है और यही वजह है कि शत्रुध्न अपनी ही पार्टी बीजेपी के शत्रु भी बनते नजर आए हैं. लेकिन यहां बड़ा सवाल ये है कि बिहार चुनाव में जो नीतीश कुमार बीजेपी का मेन टारगेट है उन्ही नीतीश के बहाने शत्रुध्न क्यों अपनी ही पार्टी पर कर रहे हैं प्रहार.

 

राजनीतिक विश्लेषक राधिका रामशेषन ने बताया कि मुझे लगता है कि ये पूरा चुनाव जो है वो नीतीश की पर्सनालिटी के इर्दगिर्द ही लड़ा जा रहा है. तो एक एंटी नीतीश वोट होगा और एक प्रो नीतीश वोट होगा. क्योंकि मोदी जो है वो तो लोकसभा चुनाव में जरुर छाए हुए थे. ये तो मुख्यमंत्री तो नहीं बनने वाले हैं औऱ ना ही मुख्यमंत्री के दावेदार है. तो दिल्ली में तो बीजेपी ने किरण बेदी को प्रोजेक्ट किया उसके कारण बुहत नुकसान हुआ बीजेपी को. लेकिन बिहार में नहीं प्रोजेक्ट कर ही है तो एक अलग टाइप का प्रयोग कर रही है वहां. तो देखना पडेगा. मुझे लगता है कि ये बिहार का जो चुनाव है वो नीतीश जी की पर्सनालिटी उनके काम कार्यकाल उसके इर्दगिर्द ही लड़ा जा रहा है.

 

बिहार की राजनीति में एक बार फिर नीतीश और लालू के एक साथ आ जाने से  बीजेपी की चुनावी संभावनाओं को झटका लगा है. दरअसल बिहार में बीजेपी दो तरफा दबाव में है. बीजेपी पर पहला दबाव ये कि पार्टी के अंदर और बाहर ये सवाल बरकरार है कि नीतीश कुमार के मुकाबले में उसका मुख्यमंत्री उम्मीदवार कौन है ? और बीजेपी पर दूसरा दबाव गैर बीजेपी वोटों के ध्रुवीकरण का भी है. अभी तक बीजेपी मुख्यमंत्री पद के लिए अपना उम्मीदवार घोषित करने के सवाल से बचती रही है और इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि बीजेपी के घोषित उम्मीदवार के राजनीतिक कद की तुलना नीतीश कुमार से होने लगेगी. वही दूसरी तरफ पार्टी के अंदर खेमेबंदी का संकट भी खड़ा हो सकता है जिससे पार पाना बीजेपी के बड़े नेताओं को भी भारी पड़ सकता है इसीलिए बीजेपी अब विपक्ष को विभाजित करने की कोशिश में लगी है. इसके लिए रामविलास पासवान, जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाह जैसे नेताओं के जरिए हवा भी दी जा रही है ताकि सर्वण जातियों और महादलितों के समर्थन से पार्टी की राह आसान की जा सके. लेकिन पार्टी की इस मजबूरी की परवाह किए बिना शत्रुध्न सिन्हा सीएम उम्मीदवार का नाम उछालकर विरोधियों की ही मदद करते नजर आए हैं.

 

राजनीतिक विश्लेषक संकर्षण ठाकुर बताते हैं कि नाम घोषित न करना बीजेपी के लिए घाटे की बात है क्योंकि दूसरी तरफ नीतीश कुमार का नाम साफ तौर पर घोषित हो चुका है. भाजपा के सबसे बड़े नेता नरेंद्र मोदी है और वो तो मुख्यमंत्री नहीं होने जा रहे वो प्रधानमंत्री हैं. राज्य में लोग लोकल लीडर खोजते हैं. दिल्ली में भी वही हुआ.

 

बिहार के राजनीतिक हालात से साफ है कि यहां विधानसभा चुनाव में मुकाबला नीतीश कुमार बनाम नरेंद्र मोदी होने वाला है और इसीलिए बिहार के चुनाव में अगर बीजेपी पिछले लोकसभा चुनाव का इतिहास नहीं दोहरा सकी तो इसके मायने नरेंद्र मोदी की लहर कम होने से लगाए जाएंगे और जिसका असर देश की राजनीति पर पड़ना तय माना जा रहा है.

 

जाहिर है बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे बीजेपी और उनके नेता नरेंद्र मोदी के लिए बेहद अहम है लेकिन राज्य में चुनाव से पहले ही बीजेपी के सांसद शत्रुध्न सिन्हा ने अपने बेबाक बयानों से पार्टी को मुश्किल में डाल रखा है.

 

राजनीतिक विश्लेषक राधिका रामशेषन के मुताबिक ये तो पॉलिटिक्स है. नीतीश पूरा प्रयास कर रहे हैं कि बीजेपी को किसी तरह नीडिल करे. क्योंकि असली फाइट बीजेपी वर्सेस नीतीश लालू ही हैं. तो नीतीश भी जितने हथकंडे हैं अपने उनका जरुर इस्तेमाल करेंगे. और ये मौका मिला जब शत्रुध्न सिन्हा अजीब अजीब बयान दिए तो नीतीश जी तो अवसरवादी हैं ही हैं वो मौके की तलाश में है. इसका मतलब ये नहीं है कि शत्रुध्न सिन्हा नाव पार करने वाले हैं. कल ही इसीलिए मुझे लगता है कि बीजेपी भी सावधानी बरत रही है. क्योंकि उनको मालूम है कि शत्रुध्न सिन्हा को आप ज्यादा प्रवोक करे तो उससे वो ऐसा कदम लें जिससे पार्टी को थोडा बहुत नुकसान हो सकता है. चुनाव में तो वो चुप हैं.

 

शत्रुध्न सिन्हा के खिलाफ अनुशासन की कार्रवाई करने की हिम्मत अभी तक बीजेपी नहीं दिखा सकी है. वैसे भी शत्रुध्न की अपनी पार्टी बीजेपी से नाराजगी की खबरें बरसों से आती रही हैं लेकिन बिहार में ऐन चुनाव से पहले एक बार फिर वो नाराज हैं.

 

बिहार की चुनावी जंग मे बीजेपी अपनी पूरी ताकत के साथ मैदान में उतर चुकी है लेकिन बीजेपी के स्टार प्रचारक और सांसद शत्रुध्न सिन्हा पार्टी की फ्रंट लीड से ही गायब नजर आ रहे हैं. पटना के गांधी मैदान में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की रैली में भी शत्रुध्न नजर नहीं आए थे यहां तक कि पार्टी के झंडे बैनर और पोस्टरों तक से उनका चेहरा गायब रहा है. सवाल ये है कि शत्रुध्न सिन्हा क्यों इस तरह बीजेपी में साइडलाइन हो गए हैं. 

 

शत्रुध्न सिन्हा ने कहा था कि लालू प्रसाद यादव को बर्थ डे पर शुभकामनाएं देने आया था. रिश्ता है. निभाते हैं. शत्रुध्न की ये पहली टेढी चाल है जब उन्होंने लालू प्रसाद यादव के जन्मदिन पर ना सिर्फ उनसे मुलाकात की बल्कि यहां तक कह दिया कि देश-प्रदेश को लालू का नेतृत्व मिलता रहेगा. बिहारी बाबू ने लालू की जो तारीफ की उससे पार्टी की काफी किरकिरी भी हुई थी. बिहार चुनाव में बीजेपी ने अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है लेकिन शत्रुध्न सिन्हा ने कभी रामविलास पासवान तो कभी उपेंद्र कुशवाह का मुख्यमंत्री पद के लिए नाम उछाल दिया. बिहार में पूरी बीजेपी ने नीतीश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है लेकिन बीजेपी के सांसद शत्रुध्न सिन्हा ना सिर्फ उन्हें विकास पुरुष बताकर उनकी तारीफों के पुल बांध रहे हैं बल्कि उन्हें सबसे बेहतर मुख्यमंत्री भी बता रहे हैं. इतना ही नहीं विधान परिषद चुनाव में बीजेपी की जीत पर भी वो सवाल खड़े कर चुके हैं. बीजेपी विधान परिषद चुनाव को नीतीश – लालू की दोस्ती की जब हार बता रही थी तब शत्रुघन सिन्हा अपनी ही पार्टी को इस जीत पर ज्यादा ना इतराने की सलाह देते नजर आ रहे थे. जाहिर है उनका ये बयान भी पार्टी नेताओं को चुभा.  हाल ही में मुंबई बम धमाकों के आरोपी याकूब मेमन की फांसी पर पार्टी लाइन से अलग हट कर उन्होंने एक नया बयान भी ठोंक दिया था.

 

कभी नीतीश कुमार की तारीफ तो कभी लालू प्रसाद यादव का महिमा गान बीजेपी के सांसद शत्रुध्न सिन्हा के पार्टी विरोधी ऐसे बर्ताव के बावजूद भी बीजेपी उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं दिखा सकी है. खास बात ये है कि हमेशा बेबाक बयानों से लैस नजर आने वाले शत्रुध्न सिन्हा का ऐसा अंदाज रीयल लाइफ से लेकर रील लाइफ तक में नजर आता रहा है. 

 

अपने दबंग अंदाज की वजह से बॉलीवुड में भी शत्रुध्न सिन्हा हिट हुए थे. फिल्म प्रेम पुजारी में एक छोटे से किरदार से फिल्मी करियर की शुरुआत करने वाले बिहारी बाबू शत्रुध्न शुरु में परदे पर एक विलेन के तौर पर नजर आए थे लेकिन अपनी एक्टिंग और अंदाज के दम पर जल्द ही उन्होंने बॉलीवुड में बतौर हीरो अपना सिक्का जमा लिया था.

 

बॉलीवुड की फिल्मों में एक लंबी पारी खेलने के बाद शत्रुध्न सिन्हा ने राजनीतिक की पिच पर भी जमकर अपने हाथ आजमाये हैं. फिल्मी दुनिया से निकलकर उन्होंने उस वक्त भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया था जब रामजन्म भूमि आंदोलन के बाद बीजेपी को भी नए मुद्दों और नए चेहरों की तलाश थी.

 

राजनीतिक विश्लेषक राधिका रामशेषन के मुताबिक शत्रुध्न सिन्हा को बीजेपी में लाने में एलके आडवाणी ने बहुत अहम भूमिका निभाई थी. उस समय उनका स्टार वैल्यू बहुत था करिश्मा था बिहारी आइडेंटिटी भी थी. क्योंकि शत्रुध्न सिन्हा क्राउड पुलर हैं और भीड़ के साथ बहुत अच्छे से रिलेट करते हैं. जो हुनर कम लोगों में ही है. तो उनकी जरुर वैल्यू थी उस समय. जबकि बीजेपी को सैलीब्रिटी की बहुत तलाश थी. उस समय दीपिका चिकालिया जो सीता की भूमिका निभाई थी रामायण सीरियल में कुछ वकत तक मनोज कुमार भी थे बीजेपी में तो बीजेपी की तलाश थी बीजेपी उभरती हुई पार्टी थी उस समय. रामजन्मभूमि आंदोलन के पश्चात तो उनको सेलेब्रिटी की जरुरत थी.

 

शत्रुध्न सिन्हा बीजेपी के अहम नेता माने जाते हैं लेकिन पार्टी में कभी भी उन्हें जमीनी नेता नहीं माना गया है. उनकी पहचान हमेशा एक भीड़ जुटाने वाले नेता की ही रही है. नब्बे के दशक से लेकर आज तक शत्रुध्न सिन्हा बीजेपी के स्टार प्रचारक बने हुए हैं लेकिन अपनी राजनीति के इस दो दशकों के सफर के दौरान उनके बागी तेवरों में कभी कोई कमी भी नहीं आई हैं. साल 2009 के लोकसभा चुनाव में जब बीजेपी की करारी हार हुई थी उस वक्त भी उन्होंने बीजेपी में सर्जरी की वकालत कर अपने बेबाक बयानों से पार्टी में हंगामा खड़ा कर दिया था.

 

बीजेपी के अंदर यूं तो शत्रुध्न सिन्हा की बगावत का इतिहास पुराना रहा है लेकिन साल 2012 में जब तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी के खिलाफ बीजेपी में ही माहौल बन रहा था उस दौरान शुत्रध्न सिन्हा ने भी खुल कर गडकरी के खिलाफ मोर्चो खोल दिया था.

 

शत्रुध्न सिन्हा के राजनीतिक सफर पर नजर डाले तो साल 1996 और 2002 में वो दो बार राज्यसभा सांसद बने हैं. जनवरी 2003 में बीजेपी की सरकार में उन्हें केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री भी बनाया गया था और अगस्त 2004 में शिपिंग मंत्रालय भी उन्हें दिया गया. 2009 के आम चुनाव में शत्रुध्न सिन्हा ने पटना साहिब सीट से अभिनेता शेखर सुमन को हराकर लोकसभा का चुनाव जीता था. लेकिन पार्टी के लिए भीड़ जुटाने की उनकी अहमियत के बावजूद वो कभी भी बीजेपी में कोई बड़ा पद हासिल करने में नाकाम रहे हैं खास बात ये है कि शत्रुध्न सिन्हा ने चुनावों में बीजेपी के लिए हवा तो खूब बनाई लेकिन खुद हवा के साथ आगे बढने में वो नाकाम ही रहे हैं.

 

राधिका रामशेषन के मुताबिक बीजेपी ने उनकी अच्छी तरह से देखभाल की. उनको एमपी बनाया दो बार औऱ 2004 में वो मंत्री भी थे हेल्थ और फैमिली वैल्फेयर के. ये कहना कि शत्रुध्न सिन्हा को इगनोर किया वो बहुत गलत होगा. उनको काफी महत्व दिया. मैं ये भी कहना चाहती हूं कि जब वो मंत्री थे उनको मंत्री बनने का मौका तो जरुर मिला. लेकिन तब उन्होंने ऐसा कोई काम नहीं किया जिसके लिए लोग उन्हें याद करे. बल्कि एक कंप्लेंट था उस समय कि शत्रुध्न सिन्हा आफिस आते ही नहीं थे. इसीलिए उन्होंने कोई लास्टिंग इंप्रेसन नहीं छोडा. तो पॉलिटिक्स में जब आपको मौका मिलता है तो मौके का फायदा उठाना आप पर है. आप कितनी हद तक उठाते है आपको जो पद मिलता है उसका क्या करते हैं. कैसे यूज करते हैं तो उसमें मुझे लगता है कि कही ना कही शत्रुध्न सिन्हा जी पीछे छूट गए है.

 

शत्रुध्न सिन्हा साल 2013 की शुरुआत तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन में खुलकर बयान दिया करते थे लेकिन पिछले करीब दो सालों से उनका रुख बदल गया और यही वजह है कि उसके बाद वो अपने सभी बयानों में मौजूदा नेतृत्व के खिलाफ ही आवाज बुलंद करते नजर आए हैं.

 

बीजेपी में नेतृत्व को लेकर शत्रुध्न सिन्हा की बागी आवाज पहली बार उस वक्त बुलंदी से सुनी गई थी जब 2014 के लोकसभा चुनाव करीब थे और चुनावों से पहले प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर बीजेपी के अंदर जंग तेज हो गई थी.

 

साल 2013 में भी शत्रुध्न सिन्हा सांसद तो बीजेपी के थे लेकिन तारीफ जेडीयू के नेता नीतीश कुमार की कर रहे थे वो भी उस वक्त जब बीजेपी खुलकर ये तक नहीं कह पाई थी कि उनकी तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ही बनने वाले हैं लेकिन उस वक्त भी नीतीश कुमार के पक्ष में आवाज उठाने में बिहारी बाबू ने कोई कमी नहीं छोड़ी थी.

 

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के समर्थन में शत्रुध्न सिन्हा का ये बयान उस वक्त आया था जब बीजेपी के अंदर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर कोई फैसला नहीं हुआ था लेकिन जब गोवा में बीजेपी राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने नरेंद्र मोदी को 2014 के लोकसभा चुनाव की, चुनाव कैंपेन कमेटी का अध्यक्ष चुन लिया तो इसके बाद शत्रुध्न ने आडवाणी के समर्थन में मोर्चा खोल दिया था. बीजेपी में प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर तब शत्रुध्न सिन्हा ने तमाम सवाल भी उठाए थे. उन्होंने ये भी कहा था कि पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के आशीर्वाद के बिना नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री नहीं बन सकते हैं. 

 

शत्रुध्न सिन्हा ने कहा था कि प्रधानमंत्री पद का फैसला पार्लियामेंटरी बोर्ड करेगा. लेकिन आडवाणी जी से बेहतर तो मेरा ख्याल है बिरले ही कोई ऐसा नेता होगा. आडवाणी जी की वरिष्ठता देखिए उनकी मैच्योरिटी देखिए. उनका स्टेटमैनशिप देखिए. और ऐसा नेता अगर हमारे पास है तो मेरा ख्याल है हमे अगल बगल कहीं झांकने और देखने की जरुरत नहीं है.

 

2014 के लोकसभा चुनाव से पहले का ये वो दौर था जब बीजेपी आम चुनाव की तैयारी में जुटी थी दिल्ली में तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह अपनी नई टीम के साथ बैठक में नेताओं को बयानबाजी करने से बचने की सलाह दे रहे थे. लेकिन ठीक उसी समय शत्रुध्न सिन्हा, प्रधानमंत्री पद की रेस में लालकृष्ण आडवाणी को लेकर ऐसा बडा बयान दे रहे थे.

 

शत्रुध्न सिन्हा का ऐसा बागी अंदाज तो फिल्मी था लेकिन इससे आगे बढ़ कर उन्होंने किसी मंझे हुए राजनेता की तरह इशारों ही इशारों में ये तक कह दिया था कि नरेंद्र मोदी के लिए दिल्ली अभी दूर है.

 

जाहिर है कि बीजेपी के स्टार प्रचारक शत्रुध्न सिन्हा का बेबाक अंदाज और उनकी बागी आवाज आज भी बरकरार है. उनके बागी तेवरों में आज भी कोई कमी नहीं आई है और यही वजह भी है कि प्रधानमंत्री पद के लिए पार्टी में लालकृष्ण आडवाणी का खुलकर समर्थन करने वाले शत्रुध्न सिन्हा को आज भी अपनी पार्टी से अच्छे दिनों की आस है.

 

राधिका रामशेषन बताती हैं कि साइड लाइन तो हुए है कई लोग मोदी जी और अमित शाह के डिसपेंशेसन में. और शायद शत्रुधन सिन्हा भी उनमें है. लेकिन ये कहना कि मोदी जी ने उन्हें साइडलाइन किया ये भी गलत होगा. क्योंकि वो घड़ी घड़ी इस टाइप के प्रोवेकेटिव स्टेटमेन्ट देते हैं. कोई जरुरत ही नहीं है कोई कान्टेस्ट ही नहीं है. कुछ ना कुछ कहते हैं और फिर इस तरह का रिएक्शन होता है जरुर. अक्सर पार्टी उनको इग्नोर कर देती है. लेकिन जब ज्यादा हो जाता है तो पार्टी को भी कुछ कहना पडता है.

 

बिहार में चुनावी माहौल तवे की तरह गर्म हो चुका है. विरोधी दलों के बीच तलवारें भी तन चुकी है. बिहार में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय नेताओं की रैलियों का रेला भी लगने लगा है. लेकिन इन सबके बीच ना सिर्फ पार्टी की रैलियों बल्कि प्रेस कान्फ्रेंस से लेकर बैनर और पोस्टरों तक में बीजेपी सांसद शत्रुध्न सिन्हा का चेहरा नदारद है. ये वो ही शत्रुध्न सिन्हा है जो कभी बीजेपी के स्टार प्रचारक माने जाते थे. लेकिन बदले राजनीतिक हालत के बीच आज शत्रुध्न बीजेपी में दरकिनार हो चुके है. नीतीश कुमार से उनकी दोस्ती के किस्से, लालू प्रसाद यादव से करीबियत की ये तस्वीरें और अपनी ही पार्टी के खिलाफ बयानों का अंबार शायद इन्ही राजनीतिक हालत से उपजी शत्रुध्न सिन्हा की प्रतिक्रियांए है जिनके जरिए वो अपनी पार्टी का ध्यान अपनी ओर खींचना चाहते हो लेकिन अब आगे ये देखना भी दिलचस्प होगा कि बिहार के चुनाव से पहले शत्रुध्न, दोस्तों से शत्रुता निभाते हैं या फिर शत्रुओं की तरफ दोस्ती का हाथ बढाते हैं.

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