व्यक्ति विशेष: यहां चॉकलेट भी हथौड़े से तोड़ा जाता है!

By: | Last Updated: Saturday, 13 February 2016 9:07 PM
व्यक्ति विशेष: यहां चॉकलेट भी हथौड़े से तोड़ा जाता है!

नई दिल्ली: यहां आम इंसान नहीं सैनिक रहते हैं, क्योंकि इंसान के रहने की सीमाएं यहां खत्म हो जाती हैं. यहां से शुरू होती है अदम्य साहस की वो कहानी जिसे हिन्दुस्तान का एक सैनिक ही जी सकता है. ये सियाचिन है. यहां पानी के लिए भी बर्फ को पिघलाना पड़ता है. यहां पड़ने वाली ठंड इतनी ज्यादा है कि चॉकलेट को तोड़ने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल करना पड़ता है. इतना ही नहीं अगर किसी सैनिक ने खुले हाथ किसी राइफल की ट्रिगर को भी छू दिया तो महज 15 सेकेन्ड में ही उस सैनिक का हाथ हमेशा के लिए सुन्न हो सकता है. ये दुनिया का सबसे ऊंचा रण क्षेत्र है. शून्य से 70 डिग्री सेल्सियस नीचे यहां का तापमान है. 24 घंटे हड्डी को चीर देने वाली ठंडी हवा से दुश्मनों का मुकाबला करने के लिए 365 दिन यहां डटे रहते हैं भारत के जांबाज सैनिक. बर्फ के तूफान में यहां कब कौन और कैसे दफन हो जाए ये कोई नहीं जानता लेकिन तमाम खतरों के बीच भी साहस की कुछ ऐसी कहानियां हैं जो यहां रहने वाले सैनिकों को सीमा पर डटे रहने की हिम्मत देती हैं. और अब अदम्य साहस की उन्हीं कहानियों में शहीद हनुमंथप्पा की कहानी भी जुड़ गई है.

जम्मू कश्मीर के उत्तर में मौजूद सियाचिन की ये बर्फीली पहाड़ियां रणनीतिक और सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम है. एक तरफ चीन है तो दूसरी तरफ पाकिस्तान के बीच सीना ताने खड़े सियाचिन के ये ग्लेशियर्स भारत की सरहदों की निगहबानी करते हैं. अगर सियाचिन पर भारत का कब्जा नहीं होता तो चीन और पाकिस्तान भारत के लिए और बड़ा खतरा बन सकते हैं.
1987 का साल था. एक दिन अचानक पाकिस्तान के सैनिक भारतीय सीमा के अन्दर घुस आए और देखते ही देखते करीब 6300 मीटर ऊंचाई वाले इस क्षेत्र में अपनी चौकी खड़ी कर दी. पाकिस्तानी सैनिकों ने अपनी इस चौकी का नाम ‘कायद चौकी’ रखा. ये नाम पाकिस्तान के जनक कायदे-आजम मोहम्मद अली जिन्ना के नाम पर रखा गया था. पाकिस्तानी सैनिक ऐसी चौकी में थे जो बर्फ की दीवारों से बनाई गई थी और 450 मीटर ऊंची थी. भारतीय सेना के सामने पाकिस्तानी दुश्मनों को उस चौकी से हटाने की चुनौती थी जो किसी अभेद्य किले की तरह था. दुश्मन ऊंचाई पर बैठे थे और बर्फीली दीवारों से सुरक्षित थे. इसलिए दीवार पर चढ़ने वाले को वो आसानी से मार सकते थे. ऐसे हालात में पाकिस्तानियों को वहां से खदेड़ना एक बेहद चुनौती भरा काम था. सेना के अधिकारी अभी रणनीति बनाने के लिए बैठे ही थे तभी करीब साढ़े पांच फीट के नायब सूबेदार बाना सिंह न सिर्फ अपनी ऊंचाई को बल्कि भारतीय सेना को एक नई ऊंचाई पर ले जाने के लिए हाजिर हुए. बाना सिंह ने अपने सीनियर्स से अभियान पर जाने का आदेश मांगा.

‘कायद पोस्ट’ की सपाट बर्फ की दीवार पर चढ़ना बेहद कठिन और जोखिम भरा काम था. भारतीय सैनिकों ने इसके पहले भी कई बार इस दीवार पर चढ़ने की कोशिश की थी पर नाकाम रहे थे. रात का तापमान शून्य से भी तीस डिग्री नीचे गिरा हुआ था. तेज हवाएं चल रही थी. तीन दिनों से लगातार जबरदस्त बर्फ गिर रही थी. भयंकर सर्दी के कारण बन्दूकें भी ठीक से काम नहीं कर रहीं थीं. इस बीच अंधेरे का फायदा उठाते हुए बाना सिंह और उनके साथी दुश्मनों के खिलाफ मोर्चा लेने के लिए आगे बढ़ रहे थे. रास्ते में उन्हें उन भारतीय बहादुरों के शव भी पड़े दिख रहे थे जिन्होंने यहां पहुंचने के रास्ते में प्राण गंवाए थे. जैसे-तैसे बाना सिंह अपने साथियों को लेकर ठीक ऊपर तक पहुंचने में कामयाब हो गये.

अब बिना वक्त गंवाए बाना सिंह अपने चार साथियों के साथ पाकिस्तानी घुसपैठियों को मार भगाने के लिए और आगे बढ़े. बाना सिंह ने कुशल रणनीति का परिचय देते हुए दुश्मन के पास पहुंचने के लिए एक ऐसा रास्ता ढूंढ निकाला, जिसकी कल्पना उनके साथियों ने भी नहीं की थी. कायद चौकी पर आक्रमण भी अचानक करना था. बाना सिंह अपने साथियों के साथ बर्फ के पहाड़ पर राह बनाते हुए आगे बढ़ रहे थे. सैनिक शारीरिक रूप से थक रहे थे लेकिन मानसिक रूप से सियाचिन के बर्फ के पत्थर की तरह मजबूत थे. इसी मानसिक संबल के बल पर सरक-सरक कर भारतीय सैनिक आधी रात को उस चौकी के करीब पहुंचे जहां पाकिस्तानी सैनिकों ने कब्जा कर रखा था. कायद पोस्ट पर पहुंचते ही नायाब सूबेदार बाना सिंह ने ताबड़तोड़ गोलियां चलानी शुरू कर दीं. इस गोलाबारी से पाकिस्तानी सैनिक भौंचक्के रह गए. पाकिस्तानी सैनिक तैयार भी नहीं थे, क्योंकि जिस ओर से आक्रमण किया गया था, उसे पाकिस्तानी सैनिक सुरक्षित समझ रहे थे. पाकिस्तानियों में भगदड़ मच गई. बाना सिंह ने दुश्मनों को आमने-सामने की लड़ाई में उलझाए रखा. बाना सिंह और उनके साथियों ने उनकी चौकी में ही कुछ पाकिस्तानी सैनिकों को दबोच लिया. चौकी पर पाकिस्तान के स्पेशल सर्विस ग्रुप (SSG) के कमांडो तैनात थे, जो इस अचानक हमले में मारे गए और कुछ चौकी छोड़कर भाग निकले. कुछ ही देर में वह चौकी दुश्मनों के हाथ से भारतीय बहादुरों के हाथ में आ गई. मोर्चा फतह हुआ. चौकी पूरी तरह पाकिस्तानियों से मुक्त हो चुकी थी. और इस शानदार जीत के नायक बने नायब-सूबेदार बाना सिंह.

बाना सिंह की इस वीरता को देखते हुए इस चौकी का नाम आगे चलकर “बाना पोस्ट’ रख दिया गया. बाना सिंह को कैप्टन की मानद उपाधि दी गई और उन्हें वीरता के सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. कहते हैं जमीन ऐसी बंजर और दर्रे इतने ऊंचे कि सिर्फ पक्के दोस्त और कट्टर दुश्मन ही सियाचिन तक पहुंच सकते हैं. मुश्किल हालात में उम्मीद साथ न छोड़े, ऐसे में संबल बन कर सामने आते हैं ओपी बाबा. दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध मैदान सियाचिन में सैनिकों के लिए किसी ईश्वर से कम नहीं हैं ओपी बाबा. सियाचिन बेस कैंप के पास ही ओपी बाबा का ये मंदिर है. करीब 22,000 फीट की ऊंचाई पर भी हर कठिनाई से लड़ने का जज्बा पैदा करती है ओपी बाबा के प्रति सैनिकों की ये आस्था. सियाचिन में तैनात होने वाले सैनिक सबसे पहले ओपी बाबा के दरबार में हाजिरी लगाते हैं. बाबा से ऑर्डर लेने के बाद ही सैनिक दुश्मनों के छक्के छुड़ाने के लिए निकल पड़ते हैं. इतना ही नहीं ड्यूटी खत्म होने की रिपोर्ट भी सबसे पहले ओपी बाबा को ही की जाती है. जानकार बताते हैं कि ऐसी कहानियां प्रतिकूल हालात में योद्धाओं के लिए किसी संबल की तरह काम आती हैं.

ओपी बाबा की कहानी का जन्म 1980 के दशक में हुआ था. कहते हैं कि ओम प्रकाश नाम के एक सैनिक ने मालौन चौकी पर हुए दुश्मन के हमले को अकेले ही नाकाम कर दिया था. दिलचस्प है कि उस समय ओम प्रकाश नाम का कोई भी सैनिक वहां तैनात नहीं था. ओमप्रकाश कौन था, कहां से आया था और बाद में उसका क्या हुआ, ये अभी भी रहस्य बना हुआ है. सैनिकों का यहां तक विश्वास है कि ओपी बाबा सपने में चेतावनी देकर दुश्मनों से उनकी रक्षा करते हैं.

सियाचिन का मोर्चा भारत के लिए भले ही नाक का सवाल है लेकिन ये मोर्चा अपने आप में हमारे जवानों के लिए किसी दुश्मन से कम नहीं है. यहां कुदरत हमले करती है और इंसान को अपने जज्बे से लड़नी होती है बड़ी जंग. सियाचिन की ये तस्वीरें एक ऐसे सफेद खौफ की तस्वीरे हैं जहां जिंदगी का हर पल किसी बड़ी जंग से कम नहीं है. जहां तक नजर दौड़ाएंगे वहां तक बर्फ नजर आएगी – तापमान माइनस 25 से माइनस 60 डिग्री तक चला जाता है. ये वो तापमान है जहां इंसान का जिस्म इतना ठंडा हो सकता है कि उसकी मौत हो जाए. इतनी ठंड कि याददाश्त चली जाए और इंसान खाना, पीना छोड़ दे. यही नहीं आपको नींद न आने की बीमारी हो सकती है और आपकी याददाश्त भी जा सकती है. ऐसे हालात में करीब 22 हजार फुट पर भारतीय जवान पाकिस्तान से लगी एलओसी पर दिन रात तैनात रहते हैं.

कहने को तो सियाचिन का नाम सिया यानी गुलाब और चिन यानी घाटी से मिलकर बना है लेकिन ये गुलाबों की घाटी नहीं बल्कि हड्डियों को तोड़ देने वाली सर्द मौसम की ये सेज है. भारतीय सैनिकों के लिए यहां तीन चौकियां हैं जिनमें सबसे ऊंची और खतरनाक है नॉर्दन ग्लेशियर. यहां सैनिकों को तीन महीने तक लगातार मौसम से जूझकर देश की रक्षा करनी पड़ती है.

OP BABAबेस कैंप से भारत की जो चौकी सबसे दूर है उसका नाम इंद्रा कॉल है और सैनिकों को यहां तक पैदल जाने में करीब 20 से 22 दिन का समय लग जाता है. चौकियों पर जाने वाले सैनिक एक के पीछे एक लाइन में चलते हैं और एक रस्सी सबकी कमर में बंधी होती है ताकि अगर कोई खाई में गिरने लगे तो बाकी लोग उसे बचा सकें. लेकिन ये सब तब तक काम आता है जब तक मौसम सामान्य होता है. हिमस्खलन जैसे हादसों में तो सियाचिन जिंदगी और मौत के बीच जंग का मैदान बन जाता है.

हिमस्खलन जैसे हादसों की यादें सियाचिन में तैनात रह चुके सैनिकों को अब भी सिहरने पर मजबूर कर देती हैं. दिलचस्प है कि ये चुनौती सिर्फ खुद को बचाने की नहीं अपने साथियों को बचाने की होती है. ये हैं 7 राजपूताना राइफल्स के नायक नरेंद्र सिंह गौर. 25 फरवरी 2015 की बात है. नरेंद्र सिंह तलवार पोस्ट पर आपदा टीम के प्रभारी थे. उन्हें सूचना मिली कि उनके एक साथी की नर्लिंग टॉप पर तबीयत खराब हो गई है. उसी दौरान हिम स्खलन की चपेट में बाकी जवान भी आ गए. कई जवान बर्फ के नीचे दब गए. नरेंद्र सिंह के सामने अब अपने साथी को बचाने की चुनौती थी जिसे उन्होंने अपनी जान की परवाह किये बिना बखूबी निभाया.

सियाचिन में चलने के लिए फिसलन भरी बर्फ है और दूसरी तरफ सर्दी से बचने के लिए सैनिक को कपड़ों की कई पर्ते लादनी पड़ती हैं. सबसे ऊपर जो कोट पहना जाता है उसे स्नो कोट कहते हैं जो बेहद भारी होता है. सियाचिन में टेंट को गर्म रखने के लिए एक खास तरह की अंगीठी का इस्तेमाल किया जाता है जिसे स्थानीय भाषा में बुखारी कहते हैं. इसमें लोहे के एक सिलिंडर में मिट्टी का तेल डालकर उसे जला देते हैं. इससे वो सिलिंडर गर्म होकर बिल्कुल लाल हो जाता है और टेंट गर्म रहता है.

OP BABA 3 OP BABA 2 OP BABA 1 सैनिक लकड़ी की चौकियों पर स्लीपिंग बैग में सोते हैं और ऑक्सीजन की कमी से मौत ना हो जाए इसलिए एक जवान रात में उन्हें कई बार जगा भी देता है. नहाने के बारे में यहां सोचा भी नहीं जा सकता है. यहां तैनात सैनिक अपनी दाढ़ी नहीं बनाते क्योंकि त्वचा इतनी नाजुक हो जाती है कि उसके कटने का खतरा काफी बढ़ जाता है.

सबसे ऊंचाई तक जाने और सबसे ऊंचाई पर बने हेलिपैड पर लैंड करने वाले हेलिकॉप्टर का रिकॉर्ड चीता हेलीकॉफ्टर के नाम है, लेकिन आप ये जानकर चौंक जाएंगे कि यहां चीता हेलिकॉप्टर सिर्फ 30 सेकेंड के लिए ही रुकता है. हर पल उसे दुश्मनों के हमले का डर लगा रहता है.

सियाचिन में एक सैनिक के लिए कितनी मुश्किल है जिंदगी फिर भी कैसे खुद को तैयार करते हैं दुश्मनों को छक्का छुड़ाने के लिए सैनिक. अगर ये आपको देखना हो तो आपको चलना पड़ेगा सियाचिन के सैनिकों के लिए खास तरह के बनाए गए ट्रेंनिंग सेंटर पर. दुनिया की सबसे मुश्किल जगहों में से एक है सियाचिन. यहां एक जवान की ड्यूटी साल में सिर्फ 8 महीने ही रहती है. क्योंकि उससे ज्यादा यहां कोई नहीं रह सकता. इस ऊंचाई तक पहुंचने के लिए बेस कैंप से 8-10 दिन लगते हैं. जवान जब लेह पहुंचते हैं तो उन्हें 6 दिन का वक्त सिर्फ मौसम के अनुकूल खुद को ढालने में लग जाता है. इसके बाद ही उन्हें खास ट्रेनिंग दी जाती है और फिर उन्हें फॉरवर्ड पोस्ट पर भेजा जाता है.

20 से 24 हजार फीट की ऊंचाई पर सियाचिन की फॉरवर्ड पोस्ट पर तैनाती से पहले हरेक जवान को इस स्कूल में कड़ी ट्रैनिंग से गुजरना पड़ता है. पहाड़ पर सीधी खड़ी चढ़ाई, घायल साथी को पीठ पर लेकर पहाड़ पर चढ़ना और उतरना, शव को लेकर पहाड़ से नीचे उतरना ये सब कुछ यहां सिखाया जाता है.

ग्लेशियर की छोटी लेकिन गहरी खाइयों को क्रेविस कहा जाता है. कई बार जवान क्रेविस में गिर जाते हैं. उनका सालों-साल तक कोई पता नहीं चल पाता है. आपको याद होगा 2014 की बात है. 18 साल बाद एक जवान का शव सियाचिन में मिला था. उत्तर प्रदेश के मैनपुरी के रहने वाले हवलदार गया प्रसाद 1996 में सियाचिन ग्लैशियर पर ड्यूटी के दौरान लापता हो गए थे. गया प्रसाद की मौत कैसे हुई इसकी वजह का आज तक पता नहीं चला पर माना जाता है कि गया प्रसाद हिमस्खलन की चपेट में आ गए होंगे. जब गया प्रसाद लापता हुए थे उस वक्त वह थलसेना की 15 राजपूत यूनिट में तैनात थे.

सियाचिन में औसतन हर साल भारतीय सेना के करीब 33 जवान शहीद होते हैं. इसकी वजह है यहां का मौसम और भौगोलिक स्थितियां. सियाचिन पर कब्जा बनाए रखने के लिए भारत को हर दिन करीब 5 करोड़ रुपए खर्च करने पड़ते हैं फिर भी पिछले 32 सालों से हमारी सेनाएं दुनिया के इस सबसे ऊंची युद्धभूमि पर मजबूती के साथ डटी हुई है. इसकी वजह है भारत के लिए सियाचिन का रणनीतिक महत्व.

करीब 20 हजार फीट की ऊंचाई पर लहराता ये तिरंगा भारतीय जवानों की वीरता की वो कहानी है जिसे सिर्फ वही समझ सकता है जो कभी यहां आया हो. दुनिया के सबसे ऊंचे और सबसे ठंडे जंग के मैदान कहे जाने वाले सियाचिन मे तिरंगे की शान को बरकरार रखने के लिए हमारे वीर जवानों को किन हालातों का सामना करना पड़ता है उसकी एक झलक देखिए.
जब इन्हें प्यास लगती है तो वो बर्फ के टुकड़ों को तोड़कर इकट्ठा करते हैं, फिर उन टुकड़ों को आग में पिघलाते हैं, इस तरह उन्हें मिलता है पीने का पानी. जब पानी के लिए ये मशक्कत करनी पड़ती है तो बाकी चीजों का अंदाजा आप लगा सकते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इस दुर्गम जगह पर भारतीय सेना की मौजूदगी की जरूरत क्या है.

12 महीने बर्फ से ढके इस पहाड़ के एक तरफ पाकिस्तान है तो दूसरी तरफ चीन. खतरा भारत को दोनों तरफ से है. जानकारों का कहना है कि अगर सियाचिन पर भारत का कब्जा नहीं होता तो चीन और पाकिस्तान भारत के लिए और बड़ा खतरा बन सकते हैं.

सियाचिन पर भारत के कब्जे की कहानी कोई कम दिलचस्प नहीं है. 32 साल पहले की बात है. 1984 का साल था. सेना को इस बात की खबर लगी कि पाकिस्तानी सेना सियाचिन पर कब्जा करने के लिए कूच कर रही है. इससे पहले तक अपने ठंडे जलवायु और 12 महीने बर्फ के कारण ये ग्लेश्यिर वीरान रहता था. जैसे ही ये खबर भारत पहुंची, भारतीय सेना ने भी इस क्षेत्र की तरफ कूच कर दिया. हालांकि, पाकिस्तानी सेना ने पहले चढ़ना शुरू कर दिया था, लेकिन भारतीय सैनिकों ने बाजी मार ली और दुनिया के सबसे ऊंचे दर्रों पर अपना कब्जा जमा लिया. इस अभियान को भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन मेघदूत’ नाम दिया था.

इन ऊंची पहाड़ियों पर कब्जा जमाना भारत के लिए बहुत मुश्किल ऑपरेशन था. इसकी वजह थी सियाचिन ग्लेशियर की भौगोलिक बनावट.

इसी अभियान में भारत के हाथों शिकस्त खाने के बाद पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टों ने उस वक्त के राष्ट्रपति जिया उल हक को बुर्का पहने की नसीहत देकर उनका मजाक उड़ाया था. यानी इसकी बनावट कुछ ऐसी है जिसमें भारत की तरफ का हिस्से से चढ़ाई बेहद खतरनाक है जबकि पाकिस्तान की तरफ से उतनी ऊंचाई नहीं है यानी उनके लिए ग्लेशियर पर चढ़ना आसान था. इसके बावजूद भारतीय जांबाजों ने करीब 76 किलोमीटर की लंबाई में फैले इन ग्लेशियर्स पर अपना कब्जा कर लिया.

हालांकि इस कब्जे को बनाए रखने के लिए भारत को बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है. बर्फ के इन पहाड़ों में पिछले 32 सालों में हमारी सेना के करीब 1000 जवान शहीद हो चुके हैं. एक अनुमान के मुताबिक इनमें से 90 फीसदी से ज्यादा जानें मौसम की वजह से गईं. सियाचिन में तैनात जवानों का सबसे बड़ा दुश्मन यहां का मौसम है. 12 महीने बर्फ से ढके रहने वाले इन पहाड़ों पर माइनस 50 डिग्री तक तापमान रहता है. यहां हमेशा करीब 3000 जवान तैनात रहते हैं.

सियाचिन में पाकिस्तानी फौज नीचें की तरफ है, इस वजह से ऊंचाई पर बैठे भारतीय जवांनो के लिए उन पर नजर रखना आसान होता है. इतनी ऊंचाई पर सेना को रसद और सैनिक साजो सामान की सप्लाई के लिए वायुसेना के हेलिकॉप्टर लगातार उड़ान भरते रहते हैं. यहां दुनिया का सबसे ऊंचा हैलिपैड है. सामरिक महत्व के अलावा सियाचिन भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इसे भारतीय उपमहाद्वीप में पानी का सबसे बड़ा स्रोत माना जाता है.

भारतीय सेना के जवानों के लिए सियाचिन की करीब 20 हजार फुट से ज्यादा ऊंची ये उत्तरी चोटी दुनिया का सबसे खतरनाक और जोखिम भरा मोर्चा माना जाता है. लांस नायक हनुमंथप्पा और उसके 9 साथी 2 फरवरी को कुछ इसी तरह देश की हिफाजत के लिए मौसम से हर रोज जारी रहने वाली भयावह जंग लड़ रहे थे.

सूखी हवाएं, हर तरफ बर्फ का सफेद खौफ और शरीर के हर अंग को गला देने की ताकत रखने वाली माइनस 40 डिग्री सेल्सियस की भयावह ठंड मानो काफी नहीं थी कि तभी कुदरत ने एक करवट ली.

ना तो उस पल की तस्वीरें मौजूद हैं और ना ही कोई वीडियो लेकिन हम आपको दुनिया के दूसरे हिस्सों में कुदरत की वैसी ही तबाही की ये तस्वीर दिखा रहे हैं जो उस दिन सियाचिन की चोटी से हनुमंथप्पा और उसके साथियों की ओर बढ़ चली थी.

इस तस्वीर में दिख रही ऊंचाई से आती बर्फ दरअसल एक हिमस्खलन है जो बर्फ की दुनिया में कुदरत का सबसे खौफनाक हमला माना जाता है. हनुमंतथप्पा और उनके 9 साथी इसी हमले का शिकार हुए थे – कुछ इसी तरह 1 किलोमीटर चौड़ा और 800 मीटर ऊंची बर्फ की एक दीवार उनके कैंप पर आ गिरी.

10 जिदंगियां, उनकी सांसें और उनके जीने की हर उम्मीद उस पल में दफ्न हो गई. सिवा एक रेडियो सिग्नल के जो सियाचिन के उस कैंप से बेस कैंप तक आया था और ये खबर दे गया था कि सब कुछ तबाह हो चुका है.

तबाही का पुराने तजुर्बे ने सिर्फ 2 दिनों तक का इंतजार किया और फिर ये मान लिया गया कि मद्रास रेजिमेंट के 10 जवान जिनमें लांसनायक हनुमंथप्पा भी था जो अब जीवित नहीं हैं. दरअसल लांस नायक हनुमंथप्पा हिमस्खलन के वक्त अपने कैंप में थे और जब बर्फ उन पर गिरी तो वो टेंट में ही थे.

माइनस 40 डिग्री के तापमान पर चट्टान की तरह जमी हुई 25 फुट ऊंची बर्फ के नीचे दफ्न हो चुके थे हनुमंथप्पा. यूं समझ लीजिए एक दो मंजिला मकान के बराबर बर्फ की सिल्ली थी उनके शरीर के ऊपर लेकिन शायद किस्मत ने हनुमंतथप्पा के लिए कुछ और सांसे लिख रखी थीं. बर्फ जब टेंट पर गिरी तो टेंट और हनुमंतथप्पा के बीच हवा का एक टुकड़ा बचा रह गया. हवा के इसी बुलबुले ने हनुमंतथप्पा की सांसे बचाए रखीं. बचाव दल ने जब हनुमंतथ्प्पा को निकाला तो उनकी नाड़ी धीमी गति से चलती हुई मिली लेकिन वो बेहोश थे. सेना के बचाव दल ने उन्हें हेलिकॉप्टर की मदद से जम्मू के आर आर हॉस्पिटल पहुंचा और इसके बाद अब उन्हें दिल्ली के सेना रिसर्च एंड रेफरल अस्पताल में भर्ती करवाया गया लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी हनुमंथप्पा को बचाया नहीं जा सका.

33 साल के हनुमंथप्पा कर्नाटक के धारवाड़ के बेटूर गांव के रहने वाले थे. चार भाईयों में सबसे छोटे हनुमंथप्पा का परिवार खेती करता है और दो एकड़ जमीन में तीन भाई गुजारा करते हैं.. चार साल पहले हनुमंथप्पा की शादी हुई थी.. घर में एक बेटी नेत्रा है जिसका पिछले साल ही जन्म हुआ था. 13 साल की सेना की नौकरी में हनुमंथप्पा सात साल तक मोर्चे पर तैनात रहे और सियाचिन की बर्फ की आंधी में भी उनका जज्बा नहीं डिगा. सियाचिन में सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए जिन वीरगाथाओं की जरूरत पड़ती है उन गाथाओं में शामिल हो गया है वीर हनुमंथप्पा का नाम.

First Published:

Related Stories

उत्तरकाशी में बड़ा हादसा: बस के नदी में गिरने से 22 लोगों की मौत
उत्तरकाशी में बड़ा हादसा: बस के नदी में गिरने से 22 लोगों की मौत

नई दिल्लीः उत्तराखंड के उत्तरकाशी में बड़ा हादसा हुआ है. आज तीर्थयात्रियों से भरी एक बस के...

GOOD NEWS: मानसून के 30 मई के पहले केरल पहुंचने की उम्मीद
GOOD NEWS: मानसून के 30 मई के पहले केरल पहुंचने की उम्मीद

नई दिल्ली: भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने केरल में इस साल मानसून की शुरूआत की घोषणा भले 30 मई के लिए...

पढ़ें, सेना की कार्रवाई पर क्या बोले कृष्णा घाटी शहीद के परिवार वाले?
पढ़ें, सेना की कार्रवाई पर क्या बोले कृष्णा घाटी शहीद के परिवार वाले?

नई दिल्ली: भारत ने पाकिस्तान से लिया पुंछ में भारतीय जवानों के सिर काटने का बदला लिया. कृष्णा...

सहारनपुर: मायावती की रैली से लौट रहे दलितों पर हमला, सीएम योगी ने बैठक बुलाई
सहारनपुर: मायावती की रैली से लौट रहे दलितों पर हमला, सीएम योगी ने बैठक बुलाई

नई दिल्ली: यूपी के सहारनपुर में मायावती की सभा से लौटते हुए दलितों पर हमला हुआ है. एक गाड़ी में 5-6...

विवादास्पद तांत्रिक चंद्रास्वामी का 66 साल की उम्र में निधन
विवादास्पद तांत्रिक चंद्रास्वामी का 66 साल की उम्र में निधन

नई दिल्ली: विवादास्पद तांत्रिक चंद्रास्वामी की आज निधन हो गया. चंद्रास्वामी का 66 साल की उम्र...

एबीपी न्यूज पर दिनभर की बड़ी खबरें
एबीपी न्यूज पर दिनभर की बड़ी खबरें

1. भारतीय सेना ने नौशेरा में पाक पोस्ट पर तोप से गोले दागे और उसको तबाह कर दिया. किसी को कोई शक ना...

जरूर जानें : क्या है भारत की 'सर्जिकल स्ट्राइक पार्ट 2' का कृष्णा घाटी कनेक्शन?
जरूर जानें : क्या है भारत की 'सर्जिकल स्ट्राइक पार्ट 2' का कृष्णा घाटी कनेक्शन?

नई दिल्ली: घुसपैठ के खिलाफ भारतीय सेना ने पाकिस्तान के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए बदला लिया...

पत्थरबाज को बोनट पर बांधने वाले मेजर गोगोई आए सामने, सुनाई उस दिन की पूरी अनसुनी कहानी
पत्थरबाज को बोनट पर बांधने वाले मेजर गोगोई आए सामने, सुनाई उस दिन की पूरी...

नई दिल्ली: कश्मीर में 9 अप्रैल को वोटिंग के दिन पत्थरबाज युवक को जीप के बोनट पर बांधने वाले मेजर...

फर्जी पासपोर्ट INFO केसः कोर्ट का टाइटलर के खिलाफ कार्रवाई का निर्देश
फर्जी पासपोर्ट INFO केसः कोर्ट का टाइटलर के खिलाफ कार्रवाई का निर्देश

नई दिल्ली: दिल्ली की एक स्पेशल कोर्ट ने मंगलवार को कांग्रेस नेता जगदीश टाइटलर के खिलाफ...

पाक को जवाब पर सरकार की पहली प्रतिक्रिया, जितेंद्र सिंह बोले- हम सदैव सेना के ऋणी रहेंगे
पाक को जवाब पर सरकार की पहली प्रतिक्रिया, जितेंद्र सिंह बोले- हम सदैव सेना के...

नई दिल्ली: भारतीय सेना ने आज पाकिस्तान को उसकी नापाक हरकतों का मुंहतोड़ जवाब दिया है. भारतीय...

Get the Latest Coupons and Promo codes for 2017