चमत्कार के इस कहानी को आपकी दुआओं की जरूरत है!

By: | Last Updated: Tuesday, 9 February 2016 5:30 PM
Siachen survivor Hanumanthappa remains ‘critical’

नई दिल्ली: किसी इंसान के सीने पर 150 घंटे तक दो मंजिला मकान के बराबर बर्फ का पहाड़ जमा रहे और वो जिंदा बच जाए तो इसे चमत्कार ही कहेंगे. कुछ ऐसा ही हुआ है पिछले हफ्ते हिमस्खलन का शिकार हुई भारतीय सेना के जवान हनुमंतथप्पा के साथ. पूरे छह दिन बाद हनुमंतथप्पा बर्फ की कब्र से जिंदा निकल आया है.

सियाचिन की 19,500 फुट की इस चोटी से आई है एक ऐसी खबर जिसकी ना तो कोई उम्मीद कर सकता है और ना ही कल्पना. 25 फुट ऊंचे बर्फ की कब्र में छह दिन पहले दफ्न हो चुके भारतीय सेना के जवान हनुमंथप्पा के जिंदा निकल आने की कहानी किसी चमत्कार से कम है भी नहीं.

देश के दूसरे कोने में यानी कर्नाटक के धाड़वाड़ में मद्रास रेजिमेंट के लांस नायक हनुमंतथप्पा के परिवार में जश्न का ये मौका आखिर क्यों कैसे आया इसके लिए आपको एक हफ्ते पहले आई 2 फरवरी की मनहूस तारीख तक लिए चलते हैं.

भारतीय सेना के जवानों के लिए सियाचिन की करीब 20 हजार फुट ऊंची ये उत्तरी चोटी दुनिया का सबसे खतरनाक और जोखिम भरा मोर्चा माना जाता है. लांस नायक हनुमंथप्पा और उसके 9 साथी 2 फरवरी को कुछ इसी तरह देश की हिफाजत के लिए मौसम से हर रोज जारी रहने वाली भयावह जंग लड़ रहे थे.

सूखी हवाएं, हर तरफ बर्फ का सफेद खौफ और शरीर के हर अंग को गला देने की ताकत रखने वाली माइनस 40 डिग्री सेल्सियस की भयावह ठंड मानो काफी नहीं थी कि तभी कुदरत ने एक करवट ली.

ऊंचाई से आती बर्फ दरअसल एक हिमस्खलन है जो बर्फ की दुनिया में कुदरत का सबसे खौफनाक हमला माना जाता है. हनुमंतथप्पा और उनके 9 साथी इसी हमले का शिकार हुए थे. 1 किलोमीटर चौड़ा और 800 मीटर ऊंची बर्फ की एक दीवार उनके कैंप पर आ गिरी.

10 जिदंगियां, उनकी सांसें और उनके जीने की हर उम्मीद उस पल में दफ्न हो गई. सिवा एक रेडियो सिग्नल के जो सियाचिन के उस कैंप से बेस कैंप तक आया था और ये खबर दे गया था कि सब कुछ तबाह हो चुका है.

तबाही का पुराने तजुर्बे ने सिर्फ 2 दिनों तक का इंतजार किया और फिर ये मान लिया गया कि मद्रास रेजिमेंट के 10 जवान जिनमें लांसनायक हनुमंथप्पा भी था अब जीवित नहीं हैं.

भारतीय सेना जिंदगी नहीं अपने खोए हुए साथियों की आखिरी निशानियां खोजने पहुंची थी. 20 हजार फुट की ऊंचाई पर भारतीय सेना का बचाव दल भारी भरकम मशीनें और खोजी कुत्तों के साथ पहुंचा था लेकिन तलाश आसान नहीं थी.

माइनस 40 डिग्री पर यहां की बर्फ किसी चट्टान में बदल जाती है और ऐसे में बर्फ को तोड़ने और काटने के लिए ऐसी आरियों की जरूरत पड़ती है. खोजी कुत्तों की सूंघने की क्षमता भी यहां की सूखी हवा छीन लेती है.

ऐसे में कोई सुराग नहीं था कि यहां जिंदगी का एक टुकड़ा अब भी दफ्न है. बर्फ की चंद सेंटीमीटर परतें हटाई जा रही थीं लेकिन ऑक्सीजन की कमी 20 से 30 मिनट की खुदाई के बाद लंबा आराम मांग रही थी. वक्त बीत रहा था लेकिन 6 दिन बाद हो गया चमत्कार.

दरअसल लांस नायक हनुमंथप्पा हिमस्खलन के वक्त अपने कैंप में थे और जब बर्फ उन पर गिरी तो वो टेंट में ही थे. माइनस 40 डिग्री के तापमान पर चट्टान की तरह जमी हुई 25 फुट ऊंची बर्फ के नीचे दफ्न हो चुके थे हनुमंथप्पा – यूं समझ लीजिए एक दो मंजिला मकान के बराबर बर्फ की सिल्ली थी उनके शरीर के ऊपर लेकिन शायद किस्मत ने हनुमंतथप्पा के लिए कुछ और सांसे लिख रखी थीं. बर्फ जब टेंट पर गिरी तो टेंट और हनुमंतथप्पा के बीच हवा का एक टुकड़ा बचा रह गया हवा के इसी बुलबुले ने हनुमंतथप्पा की सांसे बचाए रखीं.

बचाव दल ने जब हनुमंतथ्प्पा को निकाला तो उनकी नाड़ी धीमी गति से चलती हुई मिली लेकिन वो बेहोश थे. सेना के बचाव दल ने उन्हें हेलिकॉप्टर की मदद से जम्मू के आर आर हॉस्पिटल पहुंचा और इसके बाद अब उन्हें दिल्ली के सेना रिसर्च एंड रेफरल अस्पताल में भर्ती करवाया गया है.

Modi hospital visit Modi hospital 1

अब सवाल ये है कि आखिर हनुमंतथप्पा को ये जिंदगी मिली कैसे? डॉक्टर का कहना है कि डेथ का मतलब है ब्रेन डेथ. ब्रेन को नॉर्मल कंडीशन में ऑक्सीजन और एनर्जी की सप्लाई 4 से 5 मिनट बंद कर दी जाए तो ब्रेन डेथ हो जाती है अगर बॉडी का टेम्परेचर कम किया जाए तो हर डिग्री कम करने से बॉडी का मेटाबॉलिज्म 5 से 7 फीसद कम हो जाता है. मतलब ऑक्सीजन और एनर्जी की जरुरत कम हो जाती है एक टेम्परेचर के बाद ये इतनी कम हो जाती है कि जरूरत कम हो जाती है तो ब्रेन कई दिनों तक चल सकता है. अगर उसकी ऑक्सीजन और एनर्जी की जरुरत उतनी कम हो जाए तो उनकी टेम्परेचर की वजह से ये जरुरत उतनी कम हो गई कि ब्रेन काम कर पाया. 28 डिग्री से नीचे टेम्परेचर होने पर भी डॉक्टर मृत घोषित नहीं करते अगर दिल काम नहीं कर रहा तो पहले उसके टेम्परेचर को 28 से ज्यादा लाते हैं फिर देखते हैं कि अंग काम नहीं कर रहे हैं तभी मृत घोषित करते हैं. तो शायद उस जवान की बॉडी सस्पेंडेड एनीमेशन में चली गई हो और ऑक्सीजन और एनर्जी की जरुरत इतनी कम हो गई हो कि वो जिंदा बच गया हो.

कर्नाटक के धारवाड़ में हुबली जिले से 50 किलोमीटर दूर थप्पा गांव में हनुमंत का परिवार भी यकीन नहीं कर पा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो कि सियाचिन में पिछले हफ्ते हुए हिमस्खलने के उस हादसे के बाद सभी 10 जवानों की मौत पर श्रद्धांजलि दे चुके थे इस चमत्कार को अपनी आंखों से देखने दिल्ली के सेना के अस्पताल जा पहुंचे.

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