पड़ताल: क्या विकास के लिए मिल रही है ब्राह्मण होने की सजा ?

By: | Last Updated: Friday, 30 October 2015 12:44 PM
special investigation in yajuar village

नई दिल्ली: बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के एक गांव का विकास करीब 40 साल से रुका हुआ है. गांव वालों का आरोप है कि गांव की तरक्की इसलिए नहीं हो रही है गांव के ज्यादातर लोग ब्राह्मण जाति से आते हैं और जाति के आधार पर उनके साथ भेदभाव किया जाता है. क्या है बिहार के यजुआर गांव का सच पड़ताल की आपके संवाददाता अभिसार शर्मा ने

 

ये कहानी है बिहार के संभवता सबसे बड़े गांव यजुआर की. सबसे बड़ा गांव और इसके नाते ये एक मॉडल गांव होना चाहिए था. यहां तरक्की और विकास होना चाहिए था, मगर यहां बिजली नहीं स्कूल खंडहर में बदल गए हैं. स्वस्थ्य सेवाएं रसातल में चली गयी हैं आखिर क्यों? सच क्या है ? आपके चैनल एबीपी न्यूज़ ने की है इसकी पड़ताल

 

हमने अपनी पड़ताल का आग़ाज़ किया यहां के अस्पताल से. कहते हैं किसी भी इलाके का हाल जानना हो तो वहां के अस्पताल को देखना चाहिए. इस गांव में जो रास्ता अस्पताल को जाता है वह बारिश पड़ते ही चलने लायक नहीं रहता. ऐसा ही यहां है यहां बना छह बेड वाला अस्पताल.

 

जब हमने यहां मौजूद कंपाउंडर से पूछा, ”बताइए यहां काम कैसे होता है ?” उनका जवाब आपको हैरान कर देगा. जवाब: सर यहां कोइ सुविधा मौजूद नहीं है. यहां इलाज कैसे होगा सब प्राइवेट को रेफेर कर देते हैं.

 

जब यहां मौजूद डॉक्टर हसीन कादरी से भी यही सवाल किया तो उनका भी जवाब कुछ इलग नहीं था. उन्होंने कहा, ”हमने कई बार कहा है इनसे मगर कोई नहीं सुनता इंस्पेक्शन भी हुआ.”

 

इस अस्पताल के बिस्तर और दीवारों की जो हालत थी वहां अच्छा खासा आदमी भी बीमार पड़ जाए. यहां काम करने वाले कंपाउंडर का कहना है कि जब बारिश होती है तो मरीजों को बाहर बैठाना पड़ता है.

 

इस अपताल में होपहर के वक्त भी अंधेरा था. इस अस्पताल के ऑपरेशन थिएटर की हालत तो और भी खस्ता हाल है. ऑपरेशन थिएटर के सवाल पर डॉ हसीन कादरी ने कहा, ”यहां ऑपरेशन नहीं होता. यहां सुरक्षा नहीं है. पहले होता था.”

 

हम आपको इसके आगे जो बताने जा रहे हैं उसे जानकर आपको शायद ही विस्वास हो. अस्पताल के अंदर शराब की बोलतें बिखरीं पड़ीं हैं. इस अस्पताल में स्थानीय गुंडे आकर शराब पीते हैं. यहां शराब और बीयर की बोतलें बिकरीं पड़ीं हैं.

 

यहां स्टाफ के लिए बने क्वाटर खंहर में तब्दील हो चुके हैं. यहां जानवरों का मल मूत्र पड़ा हुआ है. इसका जवाब किसके पास है ? क्या इसलिए क्योंकि यहां जो रहते हैं वोह किसी का वोटबैंक नहीं हैं ?

 

अस्पताल के तजुर्बे से किसी तरह बच कर हम पहुंचे यहां के एक मात्र स्कूल की ओर यहां भी वही दास्तां गूंज रही थी. यहां स्कूल खंडहर में बदल गया है अब यहां साइकिल पार्क होती है. स्कूल का काम अब एक कम्युनिटी हॉल में होता है और उसके साथ जो बिल्डिंग है वहां ग्यारहवीं और बारहवीं की पढाई होती है मगर टीचर नहीं हैं.

 

इस कम्युनिटी हॉल में स्कूल चल रहा है और यहां 5 किलोमीटर के आसपास के सभी छात्र यही पड़ते हैं. इस स्कूल के प्रिंसिपल नवल किशोर तिवारी का ने बताया, ”हमारे यहां टीचर का अभाव है 1200 लड़कों के लिए 6 टीचर हैं. ग्यारवीं और 12वीं के लिए कोई टीचर नहीं है”

स्कूल का भी हाल अस्पताल जैसा ही है. इसी स्कूल में मतदान केंद्र भी है. क्या शिक्षा और स्वस्थ्य की इन बदनुमा तस्वीरों की ओर किसी का ध्यान नहीं गया और क्यों ?

 

बिहार के सबसे बड़े गांव के ऐसे हालात क्यों है ? हम इसके मर्म तक पहुंचना चाहते थे हमने बात की दो जाने मानें लोगों से.

 

प्रदेश ब्राह्मण महा सभा के अध्यक्ष आशुतोष झा ने बताया, ”यहां तीन पंचायत हैं और इसमें 80 फीसदी आबादी ब्राह्मणों की है. जो लोग कुर्सी पर बैठते हैं वह यहां वही करते हैं जो वह आरोप ब्राह्मणों पे लगाते थे कि ब्राह्मणों ने महादलितों के साथ ऐसा किया.”

 

इस गांव के ही नीरज ठाकुर बताते हैं कि इसका मुख्या कारण है कि गांव को फुटबॉल बना रखा है. यहां मूलभूत सुविधाओं पे धयान नहीं दिया गया.

 

ये गांव अब भी सत्तर के दशक के अपने नायक पूर्व रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र को याद करता  है. जो काम वह 70 की शुरुआत में कर गए थे वह अब तक अधर में लटके हुए हैं.

 

यहां एक पानी की टंकी है. यह टंकी सत्तर की शुरुआत में बनी और उसके बाद इसमें से एक बूंद पानी लोगों के काम नहीं आया. फिल्म शोले की पानी की टंकी की तरह इसमें कोई वीरू भी नहीं चढ़ता.

 

गांव अब विकास के मुद्दे पर ही वोट देने का ऐलान कर चुका है. गांव भर में पोस्टर लगे हैं बिजली नहीं तो वोट नहीं.  गांव में अब वाकई शर्मनाक स्थिती है. क्या एक जगह का विकास इस बात पर निर्भर करेगा की वहां रहने वाले लोगों की जाति क्या है. और उससे भी बड़ा सवाल के कहां गईं वह पार्टियां जिन्हें विश्लेषक अगड़ों की पार्टी मानते हैं. उन नेताओं का ध्यान क्यों नहीं गया इस इलाके की ओर.

 

य़हां देखें संवाददाता की स्पेशल रिपोर्ट
ब्राह्मण होने की सजा: मुजफ्फरपुर के यजुआर गांव की कहानी  

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Web Title: special investigation in yajuar village
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