1965 : जब पत्तों की तरह उड़ा दिए थे पाकिस्तानी टैंक

By: | Last Updated: Saturday, 12 September 2015 7:00 AM
Story of Lieutenant Colonel Ardeshir B. Tarapore PVC

नई दिल्ली : 1965 के युद्ध में भारतीय सैनिकों ने पाक को लोहे के चने चबवा दिए थे. इस युद्ध में भारत का हर जवान दम-खम से लड़ा था. लेकिन, कुछ ऐसे नाम हैं जो इतिहास में हमेशा अमर रहेंगे. इन्हीं में से एक नाम है लेफ्टिनेंट कर्नल ए बी तारापोर.

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11 सितंबर को तारापोर के नेतृत्व वाली भारतीय सेना की टुकड़ी को एक खास निर्देश मिला. इसके बाद रेजिमेंट को लेकर तारापोर आगे बढ़ते रहे. इसी बीच पाकिस्तान की ओर से फिल्लौर में जबरदस्त हमला किया गया. लेकिन, तारापोर की कमान में जब जवाबी कार्रवाई हुई तो पाक सेना के छक्के छुड़ने लगे. तारापोर ने जबरदस्त साहस और कौशल दिखाते हुए पत्तों की तरह पाक टैंकों को उड़ा दिया.

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60 पाकिस्तानी टैंकों को बर्बाद कर दिया गया जबकि भारत के सिर्फ 9 टैंक नुकसान हुए. इस बीच लड़ाई के दौरान एक गोला तारापोर के टैंक पर गिरा और इसमें वे शहीद हुए. पांच दिनों तक लगातार उन्होंने यह लड़ाई लड़ी और पाकिस्तानियों के पसीने छुड़ा दिए.

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इसके बाद भारतीय सेना के युद्धकाल के सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से इन्हें सम्मानित किया गया. यह तमगा पाने वाले वे प्रथम भारतीय सैनिक थे. फिल्लौर की लड़ाई में अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन करने के लिए मरणोपरांत उन्हें यह प्रदान किया गया. 11 सितंबर को तभी से सेना की खड्ग कोर के अधीन आने वाली पटियाला स्थित आर्म्ड डिवीजन में इस युद्ध की वर्षगांठ मनाई जाती है. डिवीजन में बने ब्लैक एलीफेंट युद्ध स्मारक पर श्रद्धांजलि समारोह का आयोजन होता है.

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देश से उनके प्यार को इसी से समझा जा सकता है कि कर्नल तारापोर ने अपने साथी को निर्देश दिया था कि अगर इस लड़ाई के दौरान वे इस दुनिया में न रहें तो उनका अंतिम संस्कार युद्ध के मैदान पर ही किया जाए. उनकी यूनिट ने तारापोर की अंतिम इच्छा का सम्मान किया. तारापोर की अंत्येष्टि पाकिस्तानी सेना के आग उगलते गोलों के बीच लड़ाई के मैदान में ही की गई.

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तारापोर का जन्म 18 अगस्त, 1923 को मुंबई में हुआ था. वे छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना के जनरल रत्नाजीबा के खानदान के थे. ए बी तारापोर बचपन से ही बहादुर थे. 7 साल की उम्र में उन्होंने अपनी बहन की जान बचाई थी. उनकी बहन घरेलू गाय की चपेट में आ गई थी.

 

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