सुप्रीम कोर्ट ने चार को छोड़कर सारे कोल ब्लॉकों के आवंटन रद्द किए, जुर्माना भी ठोका

By: | Last Updated: Thursday, 25 September 2014 9:36 AM

नई दिल्ली: कापरेरेट जगत के लिए एक जबर्दस्त झटके भरे घटनाक्रम में आज उच्चतम न्यायालय ने विभिन्न कंपनियों को 1993 से आबंटित किए गए 218 कोयला ब्लाकों में से 214 के आबंटन रद्द कर दिये. दावा किया गया है कि इन कोयला ब्लाकों में करीब दो लाख करोड़ रूपए का निवेश हो चुका है.

प्रधान न्यायाधीश आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ ने सिर्फ चार कोयला ब्लाकों का आबंटन रद्द किए जाने की कार्रवाई से बख्शा. रद्द होने से बचे कोयला ब्लाकों में एनटीपीसी और सेल के एक एक ब्लाक और दो ब्लाक अति वृहद विद्युत परियोजनाओं के लिए दिए गए हैं. पीठ में न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और कुरियन जोसफ भी शामिल हैं.

 

न्यायालय ने जिन कंपनियों के कोयला ब्लाक रद्द किए हैं उन्हें उनमें अपना कामधाम समेटने के लिए छह सप्ताह का वक्त दिया है.

 

न्यायालय ने इस फैसले में उन कंपनियों को सरकार के राजस्व के नुकसान की भरपाई करने का निर्देश दिया जिन्होंने अभी तक कोयला निकासी का काम चालू नहीं किया था. न्यायालय ने कैग के इस निष्कर्ष को स्वीकार किया कि इन कोयला ब्लाकों में उत्पादन चालू नहीं होने के कारण 295 रूपए प्रति टन की दर से राजस्व का नुकसान हुआ.

 

शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में एनडीए सरकार के इस दृष्टिकोण का भी संज्ञान लिया कि यदि कोयला खदानों का आबंटन रद्द किया जाता है तो वह ‘‘इसके सामाजिक-आर्थिक प्रभाव का सामना करने के लिये तैयार है.’’

 

इस मामले की पहले सुनवाई के दौरान यूपीए सरकार ने कोयला ब्लाकों के आबंटन रद्द करने का विरोध करते हुये कहा था कि आबंटन के बाद से इनमें विभिन्न कंपनियों ने करीब दो लाख करोड़ रूपए निवेश किये हैं.

 

शीर्ष अदालत ने 25 अगस्त को अपने फैसले में सरकार द्वारा 1993 से विभिन्न कंपनियों को आबंटित सारे कोयल ब्लाकों के आबंटन गैरकानूनी और मनमाने घोषित कर दिये थे.

 

शीर्ष अदालत ने 1993 से किये गए कोयला आबंटनों के लिये स्क्रीनिंग समिति की 36 बैठकों में अपनायी गयी प्रक्रियाओं की निन्दा करते समय हर तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया था लेकिन उसस समय ये आबंटन रद्द नहीं किये थे. न्यायालय ने कहा था कि इसके परिणामों से उत्पन्न स्थिति पर विचार करना होगा.

 

न्यायालय ने 2010 में शुरू हुयी नीलामी की प्रक्रिया से पहले के सभी 218 कोयला ब्लाकों के आबंटनों की जांच की थी और कहा था कि गंभीरता से विचार किये बगैर और जनहित को ध्यान में रखे बगैर ही बहुत ही लापरवाह तरीके से इनका आबंटन किया था. न्यायालय ने कहा था कि कोयला जैसी राष्ट्रीय संपदा का वितरण ‘अनुचित तरीके से’ किया गया था और आबंटन में ‘निष्पक्षता और पारदर्शिता’नहीं थी.

 

न्यायालय ने कहा था कि 14 जुलाई 1993 से जांच समिति की 36 बैठकों में कोयला खदानों के आबंटन के बारे में की गयी सारी सिफारिशें मनमानी थीं और इसमें कानूनी दृष्टि से खामी थी.

 

न्यायालय ने अपने 163 पेज के फैसले में कहा था कि स्क्रीनिंग समिति के काम में कभी भी तारतम्यता नहीं थी और इसमें पारदर्शिता का अभाव था. कई मामलों में तो समिति के सामने कोई सामग्री और संबंधित तथ्य भी नहीं थे.

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